Ek Ummid Aur
(0)
Author:
Abhimanyu AnatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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चर्चित और यशस्वी उपन्यासकार अभिमन्यु अनत का यह उपन्यास समकालीन उपन्यासों की धारा से कुछ हटकर है जो सहज ही पठनीयता को आमंत्रित करता है। पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित इस उपन्यास में गर्भस्थ शिशु को नैरेटर बनाकर कथानक का ताना-बाना सिरजा गया है जिसके माध्यम से समकालीन जीवन में बन रहे सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण पर न केवल गहरी और सार्थक चिन्ता है, बल्कि उससे निजात पाने के आवश्यक संकेत भी।</p> <p>बढ़ते शहरीकरण ने जहाँ प्रकृति की सुन्दरता को विनष्ट किया है, वहीं सियासतदानों की स्वार्थपरता ने मानव-मानव के बीच नफ़रत और हिंसा की गहरी खाई पैदा कर दी है। आम आदमी जो कि इन राजनीतिज्ञों और मज़हबी, साम्प्रदायिक ताक़तों की इस चाल को नहीं समझते हैं, वे इनके झाँसे में आकर इस धरती की सुन्दरता को और इंसानियत के निरन्तर प्रवाह को क्षति पहुँचाते हैं, लेकिन जब एक शिशु के जन्म की वेला आती है तो फिर दुखी और पीड़ित इंसानों के मन में ‘एक और उम्मीद’ की कोंपल फूटती है।</p> <p>यह उपन्यास इंसानियत की इसी उम्मीद की कोंपल के खिलने की दास्तान है जो अपनी रचनात्मक विशिष्टता और सहज प्रवाह के कारण न केवल पाठकीय संवेदना को स्पन्दित करता है, बल्कि वैचारिक उत्तेजना को भी नया आयाम प्रदान करता है।
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चर्चित और यशस्वी उपन्यासकार अभिमन्यु अनत का यह उपन्यास समकालीन उपन्यासों की धारा से कुछ हटकर है जो सहज ही पठनीयता को आमंत्रित करता है। पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित इस उपन्यास में गर्भस्थ शिशु को नैरेटर बनाकर कथानक का ताना-बाना सिरजा गया है जिसके माध्यम से समकालीन जीवन में बन रहे सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण पर न केवल गहरी और सार्थक चिन्ता है, बल्कि उससे निजात पाने के आवश्यक संकेत भी।</p>
<p>बढ़ते शहरीकरण ने जहाँ प्रकृति की सुन्दरता को विनष्ट किया है, वहीं सियासतदानों की स्वार्थपरता ने मानव-मानव के बीच नफ़रत और हिंसा की गहरी खाई पैदा कर दी है। आम आदमी जो कि इन राजनीतिज्ञों और मज़हबी, साम्प्रदायिक ताक़तों की इस चाल को नहीं समझते हैं, वे इनके झाँसे में आकर इस धरती की सुन्दरता को और इंसानियत के निरन्तर प्रवाह को क्षति पहुँचाते हैं, लेकिन जब एक शिशु के जन्म की वेला आती है तो फिर दुखी और पीड़ित इंसानों के मन में ‘एक और उम्मीद’ की कोंपल फूटती है।</p>
<p>यह उपन्यास इंसानियत की इसी उम्मीद की कोंपल के खिलने की दास्तान है जो अपनी रचनात्मक विशिष्टता और सहज प्रवाह के कारण न केवल पाठकीय संवेदना को स्पन्दित करता है, बल्कि वैचारिक उत्तेजना को भी नया आयाम प्रदान करता है।
Book Details
-
ISBN9788126707737
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भवभूति आठवीं सदी में हुए थे। नाटककार थे, कवि थे। संस्कृत में लिखे उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है।
यह उपन्यास उनके जीवन पर आधारित है, जिसकी मुख्य कथाधारा ब्राह्मण होने के बावजूद नाट्य-कर्म में उनकी प्रवृत्ति और उसके चलते अपने समाज में उनके संघर्ष के साथ-साथ चलती है।
महेश कटारे इससे पूर्व भर्तृहरि पर केन्द्रित एक अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास की रचना कर चुके हैं। भारत के सांस्कृतिक इतिहास के उल्लेखनीय पड़ावों को औपन्यासिक कलेवर में प्रस्तुत करते हुए वे तत्कालीन तथ्यों और आज के प्रश्नों को बराबर ध्यान में रखते हैं। देश, काल और पात्रानुकूल भाषा तथा जीवन-व्यवहार के विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए वे एक तरफ जहाँ अतीत को मूर्तिमान कर देते हैं, वहीं मानव-समाज और व्यवस्था के लिए हमेशा प्रासंगिक रहने वाले मुद्दों को भी अनदेखा नहीं करते।
भवभूति के बहुवर्णी चरित्र पर केन्द्रित यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।
Ateet Ke Chalchitra
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein
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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
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