Prem Nahin, Sneh
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प्रेम नहीं, स्नेह कमाल नामक एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो बाहर से बहुत मस्तमौला होने के बावजूद अपने अन्तर में हाहाकार छुपाए हुए है। एक ओर उसे अपने व्यवसाय में आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ रहा है, दूसरी ओर वह अपनी नव-विवाहिता पत्नी के विश्वासघात से आहत है। वह लगभग विक्षिप्त हो जाता है। इस बिन्दु पर किसी भी परम्परागत उपन्यास का नायक टूटकर बिखर जाता, शराब के नशे में ग़र्क़ हो जाता या फिर आत्महत्या कर लेता। लेकिन वह बराबर अपनी कमज़ोरियों और दारुण परिस्थितियों से लड़ता है और उन पर विजय प्राप्त करता है। इस उपन्यास की शक्ति और विशेषता वस्तुतः इसी लड़ाई में निहित है। उसका जीवन इस बात का साक्षी है कि ग़म ग़लत करने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन की सक्रियता में अपने आपको डुबोकर जो सुख प्राप्त किया जा सकता है, वह और किसी भी नशे में सम्भव नहीं।
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प्रेम नहीं, स्नेह कमाल नामक एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो बाहर से बहुत मस्तमौला होने के बावजूद अपने अन्तर में हाहाकार छुपाए हुए है। एक ओर उसे अपने व्यवसाय में आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ रहा है, दूसरी ओर वह अपनी नव-विवाहिता पत्नी के विश्वासघात से आहत है। वह लगभग विक्षिप्त हो जाता है। इस बिन्दु पर किसी भी परम्परागत उपन्यास का नायक टूटकर बिखर जाता, शराब के नशे में ग़र्क़ हो जाता या फिर आत्महत्या कर लेता। लेकिन वह बराबर अपनी कमज़ोरियों और दारुण परिस्थितियों से लड़ता है और उन पर विजय प्राप्त करता है। इस उपन्यास की शक्ति और विशेषता वस्तुतः इसी लड़ाई में निहित है। उसका जीवन इस बात का साक्षी है कि ग़म ग़लत करने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन की सक्रियता में अपने आपको डुबोकर जो सुख प्राप्त किया जा सकता है, वह और किसी भी नशे में सम्भव नहीं।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 5th
- Publication year
- 1987
- Weight
- 134 grams
- ISBN-13
- 9788119028115
- Pages
- 134
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल मिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
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