Prem Nahin, Sneh
(0)
Author:
Dilip Kumar Banerjee, Sunil GangopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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प्रेम नहीं, स्नेह कमाल नामक एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो बाहर से बहुत मस्तमौला होने के बावजूद अपने अन्तर में हाहाकार छुपाए हुए है। एक ओर उसे अपने व्यवसाय में आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ रहा है, दूसरी ओर वह अपनी नव-विवाहिता पत्नी के विश्वासघात से आहत है। वह लगभग विक्षिप्त हो जाता है। इस बिन्दु पर किसी भी परम्परागत उपन्यास का नायक टूटकर बिखर जाता, शराब के नशे में ग़र्क़ हो जाता या फिर आत्महत्या कर लेता। लेकिन वह बराबर अपनी कमज़ोरियों और दारुण परिस्थितियों से लड़ता है और उन पर विजय प्राप्त करता है। इस उपन्यास की शक्ति और विशेषता वस्तुतः इसी लड़ाई में निहित है। उसका जीवन इस बात का साक्षी है कि ग़म ग़लत करने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन की सक्रियता में अपने आपको डुबोकर जो सुख प्राप्त किया जा सकता है, वह और किसी भी नशे में सम्भव नहीं।
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About the Book
प्रेम नहीं, स्नेह कमाल नामक एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो बाहर से बहुत मस्तमौला होने के बावजूद अपने अन्तर में हाहाकार छुपाए हुए है। एक ओर उसे अपने व्यवसाय में आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ रहा है, दूसरी ओर वह अपनी नव-विवाहिता पत्नी के विश्वासघात से आहत है। वह लगभग विक्षिप्त हो जाता है। इस बिन्दु पर किसी भी परम्परागत उपन्यास का नायक टूटकर बिखर जाता, शराब के नशे में ग़र्क़ हो जाता या फिर आत्महत्या कर लेता। लेकिन वह बराबर अपनी कमज़ोरियों और दारुण परिस्थितियों से लड़ता है और उन पर विजय प्राप्त करता है। इस उपन्यास की शक्ति और विशेषता वस्तुतः इसी लड़ाई में निहित है। उसका जीवन इस बात का साक्षी है कि ग़म ग़लत करने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन की सक्रियता में अपने आपको डुबोकर जो सुख प्राप्त किया जा सकता है, वह और किसी भी नशे में सम्भव नहीं।
Book Details
-
ISBN9788119028115
-
Pages134
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
Suhag Ke Nupur
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Amritlal Nagar
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
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