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बिढार मराठी के विख्यात उपन्यासकार भालचन्द्र नेमाड़े की उपन्यास-श्रृंखला चांगदेव चतुष्टय की पहली कड़ी है। इसमें ऐसे एक युवा चांगदेव पाटील की कथा है जो अपनी पढ़ाई के सिलसिले में मुम्बई में है जहाँ वह जीवन और साहित्य से जुड़े अनेक प्रश्नों को अपने ढंग से सुलझाने का प्रयास करता है। आदर्शों और यथार्थ के द्वन्द्व में अपने विचारों की धार को तेज करते हुए वह शहरी जन-जीवन के कुरूप पहलुओं को भी देखता है और अपने समय के साहित्यिक समाज की वास्तविकता को भी। उसकी और उसके दोस्तों की आकांक्षा है कि वे अपनी पीढ़ी की ओर से साहित्य-संसार को कुछ ऐसा दें जो मानक बन जाए। उसके पीछे उसका गाँव भी है, जहाँ उसका परिवार है, उसकी स्मृतियों के रूप में हम उस समाज से रू-ब-रू होते हैं जो नितान्त अपने ढंग से जटिल है, जहाँ आशा और हताशा एक दूसरे में गुँथे हैं, और जीवन अपनी किसी अबूझ आन्तरिक शक्ति से गतिमान है। यह चांगदेव की बेचैन युवावस्था की कथा है जिसमें करुणा भी है, विचार भी हैं, खुद को सार्थकता की कसौटी पर कसने का आत्मघाती साहस भी है, हर तरफ फैली विद्रूपताओं से ऊबकर मर ही जाने की व्याकुलता भी है और मृत्यु के मुँह से लौट आने के बाद एक सादा और शान्त जीवन जीने की इच्छा भी है। चांगदेव का यह बिढार-समय उसके भीतरी परिवर्तन के बहुमुखी संघर्ष को दर्शाता है। चांगदेव एक सामन्ती समाज में पैदा हुआ है लेकिन उसका एक उदास-सा सपना भी है कि किसी तरह तो वह अपने ढंग से जी सकेगा। वैयक्तिक ईमानदारी, सहज मानवीय संवेदना, जीवन में सार्थकता की खोज, पश्चिमी शिक्षा और लेखकों से प्राप्त उदार वैश्विक सोच और भारतीय समाज की संकीर्ण समाज-संरचना से कुपित वह अपने आन्तरिक और बाह्य संघर्षों से अपनी दृष्टि अर्जित करता है। समाज-संसार में अपने होने के अर्थ को तलाशता हुआ वह अपनी वैयक्तिक सीमा से निकलकर अपने समय-समाज का प्रतिनिधि चरित्र बनकर हमारे सामने आता है। बिढार स्वतंत्र रूप से भी उतना ही दिलचस्प और पूर्ण पाठ है, जितना कि श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में। यह एक बड़ी विशेषता है।

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बिढार मराठी के विख्यात उपन्यासकार भालचन्द्र नेमाड़े की उपन्यास-श्रृंखला चांगदेव चतुष्टय की पहली कड़ी है। इसमें ऐसे एक युवा चांगदेव पाटील की कथा है जो अपनी पढ़ाई के सिलसिले में मुम्बई में है जहाँ वह जीवन और साहित्य से जुड़े अनेक प्रश्नों को अपने ढंग से सुलझाने का प्रयास करता है। आदर्शों और यथार्थ के द्वन्द्व में अपने विचारों की धार को तेज करते हुए वह शहरी जन-जीवन के कुरूप पहलुओं को भी देखता है और अपने समय के साहित्यिक समाज की वास्तविकता को भी। उसकी और उसके दोस्तों की आकांक्षा है कि वे अपनी पीढ़ी की ओर से साहित्य-संसार को कुछ ऐसा दें जो मानक बन जाए। उसके पीछे उसका गाँव भी है, जहाँ उसका परिवार है, उसकी स्मृतियों के रूप में हम उस समाज से रू-ब-रू होते हैं जो नितान्त अपने ढंग से जटिल है, जहाँ आशा और हताशा एक दूसरे में गुँथे हैं, और जीवन अपनी किसी अबूझ आन्तरिक शक्ति से गतिमान है।
यह चांगदेव की बेचैन युवावस्था की कथा है जिसमें करुणा भी है, विचार भी हैं, खुद को सार्थकता की कसौटी पर कसने का आत्मघाती साहस भी है, हर तरफ फैली विद्रूपताओं से ऊबकर मर ही जाने की व्याकुलता भी है और मृत्यु के मुँह से लौट आने के बाद एक सादा और शान्त जीवन जीने की इच्छा भी है। चांगदेव का यह बिढार-समय उसके भीतरी परिवर्तन के बहुमुखी संघर्ष को दर्शाता है।
चांगदेव एक सामन्ती समाज में पैदा हुआ है लेकिन उसका एक उदास-सा सपना भी है कि किसी तरह तो वह अपने ढंग से जी सकेगा। वैयक्तिक ईमानदारी, सहज मानवीय संवेदना, जीवन में सार्थकता की खोज, पश्चिमी शिक्षा और लेखकों से प्राप्त उदार वैश्विक सोच और भारतीय समाज की संकीर्ण समाज-संरचना से कुपित वह अपने आन्तरिक और बाह्य संघर्षों से अपनी दृष्टि अर्जित करता है। समाज-संसार में अपने होने के अर्थ को तलाशता हुआ वह अपनी वैयक्तिक सीमा से निकलकर अपने समय-समाज का प्रतिनिधि चरित्र बनकर हमारे सामने आता है।
बिढार स्वतंत्र रूप से भी उतना ही दिलचस्प और पूर्ण पाठ है, जितना कि श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में। यह एक बड़ी विशेषता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
208 grams
ISBN-13
9788119159031
Pages
367
Reading time
~12 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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