Peedhiyan
(0)
Author:
Neel PadamnabhanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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तमिल साहित्य की पहली आंचलिक कृति के रूप में समादृत प्रस्तुत उपन्यास ‘पीढ़ियाँ’ (तमिल : तलैमुरैगळ) को मास्टर पीसेज़ ऑफ़ इंडियन लिटरेचर के यशस्वी सम्पादक डॉ. के.एम. जॉर्ज ने भारतीय साहित्य की उत्कृष्ट कृति के रूप में स्थान दिया है।</p> <p>तमिल के श्रेष्ठ महाकाव्य ‘शिलप्पाधिकारम’ के रचयिता कवि इलंगो ने जिस श्रेष्ठि-कुल के सामान्य जन को काव्य के केन्द्र में रखा था, उसी कुल की एक शाखा कालान्तर में धुर दक्षिण की ओर संक्रमण कर गई और कन्याकुमारी ज़िले में इरणियल परिसर के सात गाँवों में बसकर एलूर चेट्टी कहलाई। आधुनिक तमिल साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर नील पद् मनाभन ने इसी चेट्टी-समुदाय के सम्पूर्ण जीवन को, वर्तमान युग में अपनी ही रूढ़ियों और अन्धविश्वासों के मकड़जाल में फँसकर अपनी अस्मिता बनाए रखने के लिए उसके द्वारा किए जा रहे जद्दोजहद को इस उपन्यास में उकेरा है। उपन्यास की ख़ासियत यह है कि एक समुदाय-विशेष के आस्था-विश्वास, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत विविध संस्कार, रूढ़ियाँ, अन्धविश्वास और वर्जनाएँ, लोरी और शोकगीत सहित ग्राम्य गीत, कर्ण-परम्परा से चली आ रही दन्तकथाएँ आदि पात्रों की अपनी बोली में अविकल रूप से इसमें दर्ज हैं। इस कारण यह उपन्यास नृविज्ञानियों और समाज-भाषावैज्ञानिकों के लिए अमूल्य दस्तावेज़ का काम दे सकता है।</p> <p>लगभग सत्तर साल की कालावधि में व्याप्त तीन पीढ़ियों के इतिवृत्त के केन्द्र में है दिरवी का परिवार, जो अपनी नेकनीयती और भोलेपन के कारण समाज के सबल वर्ग के स्वार्थपूर्ण हथकंडों का शिकार बनता है। अपनी बहन पर लगाए गए झूठे इल्जाम के ख़िलाफ़ यौवन की दहलीज़ पर क़दम रख रहे दिरवी को अकेले ही एक धर्मयुद्ध लड़ना पड़ता है और इस संघर्ष में वह कैसे कामयाब होता है, यही इस उपन्यास का केन्द्रबिन्दु है।</p> <p>उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि अर्थहीन रूढ़ियों और परम्परागत विश्वासों की दुहाई देकर नारी को घर की चहारदीवारी के अन्दर बन्द रखने की मूढ़ता जिस समुदाय में प्रचलित हो, उसमें रातोंरात आमूल-चूल परिवर्तन लाना सम्भव नहीं है। अभी एक विशाल रणांगण में एक लम्बा युद्ध लड़ना शेष है। कल्पना की रंगीनी और अतिरंजनापूर्ण वर्णनों से सर्वथा अस्पृश्य होकर भी कोई कृति इतनी रोचक और मर्मस्पर्शी हो सकती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है नील पद् मनाभन की ‘पीढ़ियाँ’।
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तमिल साहित्य की पहली आंचलिक कृति के रूप में समादृत प्रस्तुत उपन्यास ‘पीढ़ियाँ’ (तमिल : तलैमुरैगळ) को मास्टर पीसेज़ ऑफ़ इंडियन लिटरेचर के यशस्वी सम्पादक डॉ. के.एम. जॉर्ज ने भारतीय साहित्य की उत्कृष्ट कृति के रूप में स्थान दिया है।</p>
<p>तमिल के श्रेष्ठ महाकाव्य ‘शिलप्पाधिकारम’ के रचयिता कवि इलंगो ने जिस श्रेष्ठि-कुल के सामान्य जन को काव्य के केन्द्र में रखा था, उसी कुल की एक शाखा कालान्तर में धुर दक्षिण की ओर संक्रमण कर गई और कन्याकुमारी ज़िले में इरणियल परिसर के सात गाँवों में बसकर एलूर चेट्टी कहलाई। आधुनिक तमिल साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर नील पद् मनाभन ने इसी चेट्टी-समुदाय के सम्पूर्ण जीवन को, वर्तमान युग में अपनी ही रूढ़ियों और अन्धविश्वासों के मकड़जाल में फँसकर अपनी अस्मिता बनाए रखने के लिए उसके द्वारा किए जा रहे जद्दोजहद को इस उपन्यास में उकेरा है। उपन्यास की ख़ासियत यह है कि एक समुदाय-विशेष के आस्था-विश्वास, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत विविध संस्कार, रूढ़ियाँ, अन्धविश्वास और वर्जनाएँ, लोरी और शोकगीत सहित ग्राम्य गीत, कर्ण-परम्परा से चली आ रही दन्तकथाएँ आदि पात्रों की अपनी बोली में अविकल रूप से इसमें दर्ज हैं। इस कारण यह उपन्यास नृविज्ञानियों और समाज-भाषावैज्ञानिकों के लिए अमूल्य दस्तावेज़ का काम दे सकता है।</p>
<p>लगभग सत्तर साल की कालावधि में व्याप्त तीन पीढ़ियों के इतिवृत्त के केन्द्र में है दिरवी का परिवार, जो अपनी नेकनीयती और भोलेपन के कारण समाज के सबल वर्ग के स्वार्थपूर्ण हथकंडों का शिकार बनता है। अपनी बहन पर लगाए गए झूठे इल्जाम के ख़िलाफ़ यौवन की दहलीज़ पर क़दम रख रहे दिरवी को अकेले ही एक धर्मयुद्ध लड़ना पड़ता है और इस संघर्ष में वह कैसे कामयाब होता है, यही इस उपन्यास का केन्द्रबिन्दु है।</p>
<p>उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि अर्थहीन रूढ़ियों और परम्परागत विश्वासों की दुहाई देकर नारी को घर की चहारदीवारी के अन्दर बन्द रखने की मूढ़ता जिस समुदाय में प्रचलित हो, उसमें रातोंरात आमूल-चूल परिवर्तन लाना सम्भव नहीं है। अभी एक विशाल रणांगण में एक लम्बा युद्ध लड़ना शेष है। कल्पना की रंगीनी और अतिरंजनापूर्ण वर्णनों से सर्वथा अस्पृश्य होकर भी कोई कृति इतनी रोचक और मर्मस्पर्शी हो सकती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है नील पद् मनाभन की ‘पीढ़ियाँ’।
Book Details
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ISBN9788183612784
-
Pages248
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: आते हैं और आते रहेंगे- हर साल ये फाल्गुन की हवाऐं जेठ की दुपहरी आषाढ के बादल भाद्र की फुहार और काँपती-कँपकँपाती पूस की पछिया बयार... हर बार एक परदेसी कोई आएगा, लौटकर अपने देस; झांकेगा, ताकेगा, हर गली-हर मुहल्ला लिए, दबाए, छाती में हूक एक... हर साल, हर बार जो आएगा, झांकता जाएगा, थोड़ा घबराकर, थोड़ा ठहरकर, सरसरी निगाहों से या कि संग लंबी आहों के ये राहें ...ये चौराहे, आ बैठेगा फिर कोई हर साल, हर बार मन के आंगन में ... चुप...चुप...चुप... एक अनकहा आश्वासन देंगे वो, पाएंगे हम ,थामे रखना! आऐंगे ही हम बाँटने ये सब-कुछ हर साल-हर बार.....
Tripura Ki Lokkathayen
- Author Name:
Prof. Milanrani Jamatia
- Book Type:

- Description: प्रत्येक क्षेत्र के लोक-साहित्य में वहाँ की स्थानीय परंपराएँ, संस्कृति, लोकोक्तियाँ और तत्संबंधी अन्य विशिष्टताएँ समाहित होती हैं। लोक-साहित्य अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का बेहतरीन माध्यम है। कॉकबरक समेत आज तक त्रिपुरा की जनजातीय भाषाओं में मौजूद लोककथाओं का ठीक से संग्रह नहीं हुआ है; हिंदी में इन्हें लाना तो दूर की बात है। इस क्रम में ‘त्रिपुरा की लोककथाएँ’ शीर्षक पुस्तक का महत्त्व स्वयंसिद्ध है। इस संग्रह में 37 लोककथाएँ संकलित हैं। इन लोककथाओं में पाठक त्रिपुरा का स्थानीय जीवन-दर्शन, इतिहास और परंपराओं का दिग्दर्शन करेंगे। इनमें सदियों से चली आ रही एक ऐसी लोकधारा है, जिसे यहाँ का जनजातीय समुदाय एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करता रहा है। प्रस्तुत पुस्तक में त्रिपुरा में रहनेवाली लगभग सभी प्रमुख जनजातियों की लोककथाओं को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है। ये कथाएँ यहाँ की जनजातियों की संस्कृति का भावानुवाद कही जाएँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस क्रम में राइमा-साइमा नदियों का बहता प्रवाह इसका अप्रतिम उदाहरण है, जिन्हें समेटने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।
Jhipayya
- Author Name:
Arun Sadhu
- Book Type:

- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>‘झिपय्या' अरुण साधू की प्रयोगात्मक कथाकृति है। न तो इसे पूरी तरह कहानी कहा जा सकता है और न ही यह उपन्यास-विधा की सारी शर्तें पूरी करता है। इसीलिए श्री साधू ने अपनी इस कृति को सीधे-सीधे कहानी-संग्रह या उपन्यास न कहकर 'कथामालिका' कहा है। इसमें एक ही परिस्थिति में जीवन जीने का ईमानदार संघर्ष करते पात्रों की अनेक कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ श्री साधू ने 1977 से 1987 के बीच लिखीं और वे लगभग उपन्यास बन गईं। यह नया प्रयोग निश्चय ही कथा-विधा के लिए एक चुनौती की तरह है। उपन्यास का नायक 'झिपय्या' बारह-तेरह साल का किशोर है। घर में उसकी बहन लीला और उसकी माँ भी हैं। झिपय्या के अनेक साथी हैं जो बूट पालिश करने का धन्धा करते हैं। लेकिन मुम्बई की बदलती परिस्थितियों के बीच यह धन्धा ख़त्म होनेवाला है। इस अन्धकारमय भविष्य से झिपय्या परेशान नहीं होता। किसी असामाजिक कार्य में घुसने की नहीं सोचता। वह ईमानदारी से श्रम करके जीना चाहता है। यह ताक़त उसे अपनी आशावादी दृष्टि के कारण मिलती है। बूट पालिश करनेवाला झिपय्या के सभी साथी अपनी-अपनी तरह से ग़रीबी के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। श्री साधू ने अपनी इस कथा-कृति में मुम्बई में रहनेवाले समाज के सबसे निचले तबके की महागाथा लिखी है। यह रचना निश्चय ही उनकी सृजनयात्रा में भी एक कीर्तिमान है।</p>
Bhojan, Poshan Aur Swachchhata
- Author Name:
Dr. Virendra Singh Yadav +1
- Book Type:

- Description: किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ, स्फूर्तिमय और रोगमुक्त रहने के लिए स्वास्थ्यवर्धक भोजन, उत्तम पोषण और स्वच्छता का ध्यान सदैव रखना आवश्यक है। व्यक्ति प्रतिदिन संतुलित और पौष्टिक आहार लेकर, पर्याप्त जल एवं तरल पदार्थों का सेवन करके व्यक्ति कुपोषित होने से बच सकता है और रोगमुक्त होकर स्वस्थ जीवन जी सकता है। समाज में प्रचलित सामान्य गैर-संचारी बीमारियों, जैसे— डायबिटीज, उच्च रक्तचाप या अति तनाव, मोटापा या मेदुरता, कब्ज, अतिसार या डायरिया, टाइफायड या आंत्रज्वार के होने के कारण, बचाव और उपचार का ध्यान रखकर हम स्वयं तथा अपने परिवार और आसपास के इष्ट मित्रों को इन घातक बीमारियों से बचा सकते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों हेतु पुनर्गठित-एकीकृत सह-पाठ्यक्रम के सभी संकायों के स्नातक अर्थात् बी.ए., बी.एस-सी., बी.कॉम., बी.एस-सी. कृषि आदि के प्रथम सेमेस्टर या अन्य सेमेस्टर हेतु निर्धारित इस पाठ्यपुस्तक में भोजन, पोषण एवं स्वच्छता से संबंधित और पाठ्यक्रम में निर्धारित उपर्युक्त सभी क्षेत्रों के विषय में सरल, सहज व सुबोध भाषा में विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है, ताकि प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित इस सह-पाठ्यक्रम के समस्त बिंदुओं को विद्यार्थी आसानी से समझ सकें।
Samar Gatha
- Author Name:
Howard Fast
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Media Life : Drama Jhonk Ke, News Rok Ke
- Author Name:
Shashikant Mishra
- Book Type:

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Description:
मीडिया लाइफ में जो कथा-सन्दर्भ है वो अपनी कल्पनाशीलता के बावजूद न्यूजरूम और कारोबारी मीडिया के उस चरित्र का खाका खींच पाने में पूरी तरह कामयाब है, जिनका समाज का बड़ा वर्ग आकलन तो करता है लेकिन अन्दरखाने की बातें इस तरह उनके सामने नहीं आ पातीं।
उपन्यास में मीडिया और न्यूजरूम की अश्लीलता, फूहड़ता, बेशर्मी और अमानवीय पक्ष मजबूती से उभर आते हैं। भाषा का आकर्षण ऐसा है कि किताब कहीं भी बोझिल नहीं लगती।
यह उपन्यास भविष्य के लिए अब एक सन्दर्भ की तरह है।
—विनीत कुमार
मीडिया लाइफ की शुरुआत काफी मजेदार है। पूरी कहानी मीडिया पर लिखे व्यंग्य को सार्थक करती है। किताब में चैनलों की प्रतिद्वंद्विता, खबरों की तोड़-मरोड़ आदि को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। कहानी विभिन्न परिस्थितियों में मीडिया द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीति और खबरों के मैनिपुलेशन को दर्शाती है।
—नवीन चौधरी
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