Khule Gagan Ke Lal Sitare
Author:
Madhu KankariyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
‘भंगी और कम्युनिस्ट पैदा नहीं होते, बना दिए जाते हैं,’ इन्द्र ने बताया था मणि को, जब नक्सलबाड़ी गाँव से उठे एक सशस्त्र आन्दोलन ने कॉलेजों के भीतर घुसकर ’70 की युवा पीढ़ी को छूना शुरू किया था। और, जब तक मणि ने इस वास्तविकता को समझकर आत्मसात् किया, इन्द्र ग़ायब हो चुका था।</p>
<p>तीस साल तक लगातार प्रतीक्षारत मणि को आभास शुरू से ही था कि इन्द्र का क्या हुआ, लेकिन उस हक़ीक़त को उसने माना नहीं। वह उन हज़ारों युवाओं के साथ पुलिस की क्रूरता की भेंट चढ़ चुका था जिसे राज्य-तंत्र की ओर से नक्सलियों का आमूल सफाया करने का काम सौंपा गया था। मणि की भोली आशा के विपरीत वह उन लगभग 20 हज़ार क़ैदियों में भी शामिल नहीं था जिन्हें पाँच-पाँच साल तक बिना ट्रायल के ही बन्दी रखा गया और जिन्हें आपातकाल के बाद केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों ने छोड़ा। मणि को विश्वास तब हुआ जब गोविन्द दा उस विकलांग कवि से मिलकर आए जिसके सामने, पुलिस-यंत्रणा के बीच इन्द्र ने दम तोड़ा था। इस बीच एक मध्य-वित्त परिवार में जन्मी मणि ने अपने घर में, और बाहर भी जीवन व भाग्य की अनेक विरूपताओं को ठीक अपने सीने पर झेला; लेकिन अपनी उम्मीद और जिजीविषा को टूटने नहीं दिया।</p>
<p>भावनाओं और विचारों, दुख और आक्रोश, भय और साहस के अत्यन्त महीन धागों से बुनी यह औपन्यासिक संरचना हमें नक्सलवादी आन्दोलन के वे दहला देनेवाले विवरण देती है जो इतिहास में सामान्यत: नहीं लिखे जाते। साथ ही कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार की उन गलघोंटू परिस्थितियों का विवरण भी इसमें है जिनका मुकाबला विचार और विद्रोह के हथियार ही करें तो करें, वैसे सम्भव नहीं; जैसा कि इस उपन्यास में मणि और कुछ साहसी आत्माएँ अपने जीवन में करती हैं।</p>
<p>इस उपन्यास को पढ़ना इसकी भाषा में निहित आवेग के कारण भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह भाषा बताती है कि सत्य और संवेद का कोई शास्त्रसम्मत आकार नहीं होता।
ISBN: 9788126700219
Pages: 172
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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वस्त्र चयन ही नहीं पुस्तक चयन में भी बेजोड़ थी कृष्णवेणी। पर दूसरों का भविष्य देख सकने की उसकी दुर्लभ क्षमता ने अनजाने ही उसका भविष्य भी कहला डाला तो? एक मार्मिक प्रेमकथा?
“मोहब्बत में खरे सोने की खाँटी लीक मैं कहाँ तक अछूती रख पाई हूँ, यह बताना मेरा काम नहीं है...यदि फिर भी किसी को यह लगे वह अलाँ है या वह फलाँ है, तो मैं कहूँगी, यह विचित्र संयोग मात्र है...।”
सम्पन्न घर में जन्म लेकर भी परित्यक्त रहा डॉ. वैदेही बरवे का बेटा। अभिशप्त किन्नर बिरादरी के सदस्य बने परित्यक्त मोहब्बत की हृदय मथ देनेवाली कहानी।
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