Khule Gagan Ke Lal Sitare
(0)
Author:
Madhu KankariyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
395
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Available
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‘भंगी और कम्युनिस्ट पैदा नहीं होते, बना दिए जाते हैं,’ इन्द्र ने बताया था मणि को, जब नक्सलबाड़ी गाँव से उठे एक सशस्त्र आन्दोलन ने कॉलेजों के भीतर घुसकर ’70 की युवा पीढ़ी को छूना शुरू किया था। और, जब तक मणि ने इस वास्तविकता को समझकर आत्मसात् किया, इन्द्र ग़ायब हो चुका था।</p> <p>तीस साल तक लगातार प्रतीक्षारत मणि को आभास शुरू से ही था कि इन्द्र का क्या हुआ, लेकिन उस हक़ीक़त को उसने माना नहीं। वह उन हज़ारों युवाओं के साथ पुलिस की क्रूरता की भेंट चढ़ चुका था जिसे राज्य-तंत्र की ओर से नक्सलियों का आमूल सफाया करने का काम सौंपा गया था। मणि की भोली आशा के विपरीत वह उन लगभग 20 हज़ार क़ैदियों में भी शामिल नहीं था जिन्हें पाँच-पाँच साल तक बिना ट्रायल के ही बन्दी रखा गया और जिन्हें आपातकाल के बाद केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों ने छोड़ा। मणि को विश्वास तब हुआ जब गोविन्द दा उस विकलांग कवि से मिलकर आए जिसके सामने, पुलिस-यंत्रणा के बीच इन्द्र ने दम तोड़ा था। इस बीच एक मध्य-वित्त परिवार में जन्मी मणि ने अपने घर में, और बाहर भी जीवन व भाग्य की अनेक विरूपताओं को ठीक अपने सीने पर झेला; लेकिन अपनी उम्मीद और जिजीविषा को टूटने नहीं दिया।</p> <p>भावनाओं और विचारों, दुख और आक्रोश, भय और साहस के अत्यन्त महीन धागों से बुनी यह औपन्यासिक संरचना हमें नक्सलवादी आन्दोलन के वे दहला देनेवाले विवरण देती है जो इतिहास में सामान्यत: नहीं लिखे जाते। साथ ही कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार की उन गलघोंटू परिस्थितियों का विवरण भी इसमें है जिनका मुकाबला विचार और विद्रोह के हथियार ही करें तो करें, वैसे सम्भव नहीं; जैसा कि इस उपन्यास में मणि और कुछ साहसी आत्माएँ अपने जीवन में करती हैं।</p> <p>इस उपन्यास को पढ़ना इसकी भाषा में निहित आवेग के कारण भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह भाषा बताती है कि सत्य और संवेद का कोई शास्त्रसम्मत आकार नहीं होता।
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‘भंगी और कम्युनिस्ट पैदा नहीं होते, बना दिए जाते हैं,’ इन्द्र ने बताया था मणि को, जब नक्सलबाड़ी गाँव से उठे एक सशस्त्र आन्दोलन ने कॉलेजों के भीतर घुसकर ’70 की युवा पीढ़ी को छूना शुरू किया था। और, जब तक मणि ने इस वास्तविकता को समझकर आत्मसात् किया, इन्द्र ग़ायब हो चुका था।</p>
<p>तीस साल तक लगातार प्रतीक्षारत मणि को आभास शुरू से ही था कि इन्द्र का क्या हुआ, लेकिन उस हक़ीक़त को उसने माना नहीं। वह उन हज़ारों युवाओं के साथ पुलिस की क्रूरता की भेंट चढ़ चुका था जिसे राज्य-तंत्र की ओर से नक्सलियों का आमूल सफाया करने का काम सौंपा गया था। मणि की भोली आशा के विपरीत वह उन लगभग 20 हज़ार क़ैदियों में भी शामिल नहीं था जिन्हें पाँच-पाँच साल तक बिना ट्रायल के ही बन्दी रखा गया और जिन्हें आपातकाल के बाद केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों ने छोड़ा। मणि को विश्वास तब हुआ जब गोविन्द दा उस विकलांग कवि से मिलकर आए जिसके सामने, पुलिस-यंत्रणा के बीच इन्द्र ने दम तोड़ा था। इस बीच एक मध्य-वित्त परिवार में जन्मी मणि ने अपने घर में, और बाहर भी जीवन व भाग्य की अनेक विरूपताओं को ठीक अपने सीने पर झेला; लेकिन अपनी उम्मीद और जिजीविषा को टूटने नहीं दिया।</p>
<p>भावनाओं और विचारों, दुख और आक्रोश, भय और साहस के अत्यन्त महीन धागों से बुनी यह औपन्यासिक संरचना हमें नक्सलवादी आन्दोलन के वे दहला देनेवाले विवरण देती है जो इतिहास में सामान्यत: नहीं लिखे जाते। साथ ही कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार की उन गलघोंटू परिस्थितियों का विवरण भी इसमें है जिनका मुकाबला विचार और विद्रोह के हथियार ही करें तो करें, वैसे सम्भव नहीं; जैसा कि इस उपन्यास में मणि और कुछ साहसी आत्माएँ अपने जीवन में करती हैं।</p>
<p>इस उपन्यास को पढ़ना इसकी भाषा में निहित आवेग के कारण भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह भाषा बताती है कि सत्य और संवेद का कोई शास्त्रसम्मत आकार नहीं होता।
Book Details
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ISBN9788126700219
-
Pages172
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: सन् साठ के दशक के कई बांग्ला प्रकाशन महत्त्वपूर्ण थे। इसी दौर में ‘आंधारमानिक’ उपन्यास लगभग 1967 में प्रकाशित हुआ था। पहली बार कथावस्तु की तर्जनी जनता के इतिहास की तरफ़ उठी थी। इस उपन्यास में उपयोग किया गया ‘आंधारमानिक’ नाम एक ख़ास केन्द्रबिन्दु है और इसे रूपक ही मानना चाहिए। अठारहवीं सदी में बंगाल के समाज में धनी-मानी, ज़मींदार वग़ैरह वर्गों के मूल्यबोध का तो दिवाला ही निकल गया था। एक तरफ़ जातियों की किचिर-पिचिर, संकीर्णता, अनुदारता, दूसरी तरफ़ ऐश-विलास! इधर समाज में प्रचलित अन्धविश्वास, कुत्सित प्रथाएँ। बंगाल के समाज का इतिहास अनगिनत विचित्रताओं से भरा था। जंगल इलाक़ों के लोग, अपने सामन्त स्वामियों के ख़िलाफ़ काफ़ी अर्से पहले ही बागी हो चुके थे। इस कृति में वर्गीय आक्रमण और उससे जुड़ी कई घटनाओं तथा समाज पर पड़नेवाले उसके प्रभावों का प्रामाणिक चित्रण किया गया है। ‘आंधारमानिक’ प्रमुख रूप से लोकवृत्त का इतिहास है–कलकत्ता से जुड़े मध्यवित्त जीवन की शुरुआत से पूर्व–मुहूर्त का इतिहास! यह उपन्यास किसी अर्थ में समकालीन भी है, क्योंकि वर्ण-श्रेणी शासन की औरतों के प्रति तर्जनी ताने रहने जैसी कितनी बातें हमारे समाज के ऊपरी स्तर तले आज भी विद्यमान हैं। आशा है, इस उपन्यास को पढ़ना पाठकों के लिए एक दिलचस्प अनुभव होगा।
Man-Maati
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description: मन-माटी दरअसल उपन्यास से अधिक अपनी जड़ों की तलाश में लगे व्यक्तियों की व्यथा का एक दस्तावेज़ है। उपन्यास का कोई पारम्परिक ढाँचा नहीं है क्योंकि इसमें केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार की कथा नहीं है बल्कि एक खोज है जिसे हम केन्द्रीय मुद्दा मान सकते हैं। यह केन्द्रीय समस्या तरह-तरह के रंगों में हमारे सामने आती है। इसकी झलकियाश् कहीं सूरीनाम के जंगलों में मिलती हैं तो कहीं यह अमेरीका और योरोप के महाद्वीपों में नज़र आती है। अलग-अलग देशों में बसे लोगों की खोज इस तरह उद्घाटित होती है कि माटी को मन मान लेने पर विवश होना पड़ता है। दरअसल मन और माटी के प्रतीक को लेखक ने एक बड़े फलक पर स्थापित करने का प्रयास किया है। असग़र वजाहत के लेखन की आत्मीय, अनौपचारिक और रोचक शैली उनका बेबाक अन्दाज़ इस उपन्यास में पूरी तरह देखा जा सकता है। पात्रों के साथ उनके परिवेश में डूब जाना, उनके मनो-भावों, आशा-निराशा, सुख-दुख के साथ के आत्मीय रिश्ता बना लेना पाठक को सुहाता है। एक देश-काल की कहानी न होते हुए भी मन-माटी पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। युगों युगों से मनुष्य तरह-तरह की आवश्यकताओं या मजबूरियों के कारण एक जगह से उखड़ता है और दूसरी जगह जाकर बस जाता है। सरसरी ढंग से देखने पर यह बहुत सहज और सीधी बात लगती है लेकिन इसके मर्म तक पहुँचने पर लगता है कि यह तो मृत्यु और जन्म जैसे गम्भीर प्रश्न की तरह हमें चिन्तित करती है। इसी जिल्द में शामिल दूसरा उपन्यास ‘चहारदर’ भी प्रेम को ही प्रतिष्ठित करता है। साथ ही दोनों लघु उपन्यासों में राजनीति के षड्यंत्रों का भी पर्दाफाश किया गया है जिसके लिए व्यवस्था ही सर्वोपरि है, मनुष्यता और भावनाओं की कोई कीमत नहीं। दोनों लघु उपन्यासों की सहजता, सरलता ही उनकी विशिष्टता है।
Dozakh
- Author Name:
Syed Zaigham Imam
- Book Type:

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Description:
यह उपन्यास मज़हब और इनसानियत के बीच चलनेवाली एक अजीबो-ग़रीब कशमकश की कहानी है। एक ऐसे लड़के की दास्तान जिसे हिन्दू या फिर मुसलमान होने का मतलब ठीक से नहीं पता। मालूम है तो सिर्फ़ इतना कि वह एक इनसान है, जिसकी सोच और समझ किसी मज़हबी गाइडलाइन की मोहताज नहीं है।
असल में इस उपन्यास की कहानी के बहाने भारतीय समाज के उस धार्मिक ताने-बाने को उकेरने की कोशिश की गई है जो मज़हब और नफ़रत की राजनीति के उभरने से पहले देश के शहरों और क़स्बों की विरासत था, जहाँ मुसलमान अपने धर्म के प्रति सजग रहते हुए भी इस तरह बचाव की मुद्रा में नहीं होते थे, जैसे आज हैं।
उपन्यास का नायक अलीम अहमद उर्फ़ अल्लन उसी माहौल का रूपक रचता है और अपनी सहज और स्वतःस्फूर्त धार्मिकता के साथ हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की सीमाओं के परे चला जाता है। उपन्यास में कम उम्र में होनेवाले प्रेम की तीव्रता, एक मुस्लिम परिवार की आर्थिक तंगी, पीढ़ियों के टकराव और एक बच्चे के मनोविज्ञान का भी बख़ूबी अंकन हुआ है।
बनारस की पृष्ठभूमि में लिखे गए इस उपन्यास में कई जगह भद्दी गालियाँ हैं और कहीं-कहीं हालात से उपजी अश्लीलता भी। लेकिन इस सबके बावजूद यह उपन्यास अपने आप में मुकम्मल है और कई बार दिल को छूता है। आँखों की कोर गीली कर जाता है।
I..The Loser
- Author Name:
Sumit Kumar Sambhav
- Book Type:

- Description: What are the ingredients of the recipe for a looser? What are the circumstances which make a person looser? Zandu Singh, who lives in Dharamshala city of Himalayan Pradesh, dips his life into hard work to make himself perfect in his penance. But a single lie he speaks to his love, jyotsna, one day becomes so big that he becomes a loser for her and throws him to the ultimate darkness of confusion. Will zandu Singh ever be able to come out of this dilemma? Will he ever succeed in making his banwari Lal master Ji's dream true? Come and know about the thousands of athletes burning themselves in the fire of hard work, devotion and sacrifice but still living unidentified lives. Come to peep into their life through India’s first sports fiction.
Andhi Chhalaang
- Author Name:
Mandakranta Sen
- Book Type:

- Description: नाम तिथि। एक मध्यवित्त परिवार की लड़की। चेहरा अति साधारण। बी.ए. की छात्रा। जीवन की धुरी विद्यालय और घरेलू व्यस्तताएँ। अचानक एक दिन किसी की नज़र से नज़र मिली और तिथि के शरीर में बिजली दौड़ गई। लड़के का नाम पार्थ। तिथि की एक सहेली का चचेरा भाई। आयु में उससे बारह साल बड़ा। परिवार के विरोध के बावजूद तिथि पार्थ से विवाह करके निहायत निम्नवर्गीय परिस्थितियों में अपने दाम्पत्य जीवन का आरम्भ करती है। और, किराए के इसी अकेले कमरे में उसके सामने जीवन का वह पक्ष खुलता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बांग्ला में एक कवि के रूप में प्रतिष्ठित व चर्चित मन्दाक्रान्ता सेन अपने इस पहले उपन्यास में स्त्री-अस्मिता को एक नया विस्तार और नया चेहरा देने का प्रयास करती हैं; साथ ही अपनी सम्भावनाओं की तरफ़ भी पाठकों का ध्यान आकर्षित कराती हैं।
Rudra Gufa Ka Swami
- Author Name:
Shiv Vachan Choube
- Book Type:

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Description:
शिव वचन चौबे लोकगीतों और लोककथाओं में जीवन्तता तलाशनेवाले मिथक प्रेमी, कथाकार प्रेमी मात्र नहीं हैं। वे ग्रामीण जीवन के बदलते चरित्र को उसकी सहजता और चालाकी के साथ रेखांकित करनेवाले संवेदनशील रचनाकार हैं। ‘रुद्रगुफा का स्वामी' आत्मपरक वस्तुपरकता से विकसित आज के गाँवों और नगरों में विद्यमान सम्पत्ति-मोह के भीषण परिणामों का संकेत करनेवाला अत्यन्त रोचक उपन्यास है।
यह उपन्यास लोककथा के रहस्य, रोमांच, जिज्ञासा, कौतूहल आदि तत्त्वों के उपयोग से बना होने के कारण पाठक को अन्त तक बाँधे रहता है। हिन्दी में कौतूहल और रहस्य का सामाजिक यथार्थ के उद्घाटन की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।
देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों जैसा यह नाम निम्न जातियों के स्वार्थपरक इस्तेमाल का उद्घाटन करते हुए उनकी उद्बुद्ध विवेकशक्ति को रेखांकित करता है। रुद्रगुफा का स्वामी कौन है? और क्यों बना है? यह प्रश्न यथार्थ के अनेक हेतुओं का उद्घाटन करता है। पाठकों और आलोचकों को अपने स्वरूप और संकेत से आकर्षित करनेवाला एक उल्लेखनीय उपन्यास।
Pahchan
- Author Name:
Anwar Suhail
- Book Type:

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Description:
इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में भारतीय समाज का वह सीमान्त इलाक़ा है जहाँ के बच्चों की शिक्षा सिनेमा–हॉलों, गैरेजों और चाय–पान की गुमटियों में होती है, जिन्हें भूगोल का ज्ञान ट्रक चालकों से, इंजीनियरिंग का ज्ञान गैरेजों में खटकर, ड्रेस डिजाइनिंग का हुनर दर्जी की दुकान से और ब्यूटीशियन का डिप्लोमा नाई की दुकान से मिलता है। यूनुस इसी धरती पर उगा हुआ एक पौधा है, जिसे अपने लिए एक पहचान की तलाश है।
लेकिन उसके साथ चिपकी हुई एक पहचान उसका मुसलमान होना भी है, पर वह उसे हर कहीं उजागर नहीं करता, कम–से–कम अपने सलीम भाई की तरह तो नहीं जिसे गुजरात में ऑटो में बैठे–बैठे ज़िन्दा जला दिया गया; उसके लिए उससे ज़्यादा मायने अपनी वह छवि रखती है जिसे वह सनूबर की आँखों में देखता है। सनूबर जो उसकी महबूबा है और जो उसे मुहम्मद यूनुस नहीं, अंग्रेज़ी में संक्षेप करके ‘एम–वाई’ अर्थात् ‘माई’ बुलाती है।
एक आदमी की पहचान क्या होती है उसका धर्म, उसका पेशा या उसका हृदय? यह उपन्यास अपने नायक यूनुस के माध्यम से यही सवाल हमारे सामने रखता है। यूनुस निम्न मध्यवर्गीय भारतीय मुस्लिम समाज का एक प्रतिनिधि चरित्र है, और अपने बनने की प्रक्रिया में हमें अपनी स्मृतियों के साथ उस पूरे परिदृश्य से परिचित कराता है जिसमें साम्प्रदायिक ताक़तों की राष्ट्रीय राजनीति में घुल–मिल जाने के बाद, आज भारत का ग़रीब मुस्लिम तबका रह रहा है।
The Pocket Love Story
- Author Name:
Ajitabha Bose
- Rating:
- Book Type:

- Description: Love is one of the most beautiful expressions and emotions that humans are blessed with. Everyone has a love story. Some love stories have a happy ending and some doesn�t. Some love stories are known to the entire world and some are left unknown. Come, read some untold love stories.
Ummid Hai, Aayega Vah Din
- Author Name:
Emile Zola
- Book Type:

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Description:
यह उपन्यास मज़दूर आन्दोलन में स्वतःस्फूर्तता की महत्ता स्पष्ट करते हुए संघर्ष में सचेतनता के आविर्भाव और क्रमिक विकास की जटिल और मन्थर प्रक्रिया को तथा संघर्ष की विभिन्न मंज़िलों को इतने प्रभावी ढंग से दर्शाता है कि मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए आज भी यह एक ज़रूरी अध्ययन-सामग्री लगने लगता है। ज़ोला ने इस प्रक्रिया का प्रभावशाली चित्रण किया है कि किस प्रकार अल्पविकसित चेतना वाले मज़दूर नए विचारों के क़ायल होते हैं, किस प्रकार अपनी जीवन-स्थिति को नियति मानकर जीनेवाले मज़दूरों के सोचने-समझने का ढंग हड़ताल के प्रभाव में बदलने लगता है और किस प्रकार वे आन्दोलन द्वारा उठाए गए सवालों को समझने और उनके हल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगते हैं।
उपन्यास मज़दूरों की हड़ताल के दौरान कार्यनीति या रणकौशल (टैक्टिक्स) से जुड़े प्रश्नों पर भी विस्तार में जाता है। मिसाल के तौर पर इसमें हड़ताल के दौरान तोड़-फोड़ की कार्रवाई और ‘फ्लाइंग पिकेट्स’ की सम्भावित भूमिकाओं पर भी विचार किया गया है। ‘फ्लाइंग पिकेट्स’ की हड़ताल के दौरान एक विशेष भूमिका दर्शाई गई है। यह इतिहास का तथ्य है कि फ़्रांसीसी कोयला खदानों में इनकी स्थापित परम्परा रही थी और 1869 की ल्वार हड़ताल के दौरान इनका विशेष रूप से इस्तेमाल किया गया था।
उपन्यास एक तरह से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के यूरोपीय मज़दूर आन्दोलन का एक लघु प्रतिरूप प्रस्तुत करता है। खदान मज़दूरों के एक छोटे से गाँव में तीन राजनीतिक धाराओं के सुस्पष्ट-सटीक प्रतिनिधियों की उपस्थिति हमें देखने को मिलती है। रासेनोर एक सुधारवादी है जो टकराव के बजाय वार्ताओं की राजनीति में विश्वास रखता है। सूवारीन अराजकतावादी है। एतिएन की अवस्थिति इन दोनों के बीच की बनती है। अनुभववादी ढंग से वह जुझारू वर्ग संघर्ष की सोच और क्रान्तिकारी जनदिशा की सोच की ओर आगे बढ़ता हुआ चरित्र है। पेरिस कम्यून के पूर्व, पहले इंटरनेशनल में भी यही तीन राजनीतिक धाराएँ कमोबेश प्रभावी रूप में मौजूद थीं।
Sadiyon Ka Syanapan
- Author Name:
Sanjiv Shah
- Book Type:

- Description: इसे आप दर्शन की एक और पुस्तक न गिन लेना। महान् रूसी उपन्यासकार और सत्य के प्रखर साधक लियो टॉल्सटॉय की 25 वर्षों की साधना का यह फल है। इस पुस्तक में विश्व के समस्त धर्मों का सार है। इसमें सर्वोत्तम चिंतकों के श्रेष्ठतम विचार हैं और सैकड़ों महान् कृतियों का बहुमूल्य अर्क है। कल्पना कीजिए कि टॉल्सटॉय हमें वर्ष के 366 दिन, प्रतिदिन किसी विषय पर सदियों का सयानापन परोसते हैं! क्या इससे बढ़कर हमारा कोई और सद्भाग्य हो सकता है? ‘‘मैं आशा करता हूँ कि इस पुस्तक के वाचक वैसी कल्याणकारी एवं प्रेरणादायी भावना का अनुभव कर सकेंगे, जैसी मैंने इस पुस्तक की सृजन वेला में काम करते समय अनुभव की थी और जिसे मैं प्रतिदिन पढ़ते समय पुनः-पुनः अनुभव करता हूँ।’’ —ऌलियो टॉल्सटॉय
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