Mahashveta
Author:
Tarashankar BandyopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 48
₹
60
Unavailable
सुविख्यात बांग्ला उपन्यासकार ताराशंकर बंद्योपाध्याय की यह पुस्तक कथावस्तु और रचना-शिल्प की दृष्टि से एक अनूठी और मार्मिक कथाकृति है।</p>
<p>माता-पिताविहीन नीरजा नामक एक बालिका का जैसा चरित्र-चित्रण यहाँ हुआ है, वह सिर्फ़ तारा बाबू जैसे कथाकार ही कर सकते हैं। पशुवत् मनुष्यों के लोभ, कुत्सा और समाज की कुरूपताओं से अनथक संघर्ष करती हुई नीरजा मानो तेजोद्दीप्त भारतीय नारी का प्रतीक बनकर उभरती है, जिसमें परदुख-कातरता भी है और उसके लिए आत्मोत्सर्ग की भावना भी। एक ओर वह अनाचार से जूझने के लिए जलती हुई मशाल है, तो दूसरी ओर उसके अन्तर में प्रेम की अन्तःसलिला प्रवाहित हो रही है। नारी की आत्मनिर्भरता उसके जीवन का मूलमंत्र है, जिसे वह सम्मानपूर्वक जीने की पहली शर्त मानती है। वस्तुतः तारा बाबू ने इस उपन्यास में स्थितियों और परिवेश को नाटकीयता प्रदान करके विलक्षण प्रभाव उत्पन्न किया है।
ISBN: 9788171781997
Pages: 182
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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जो सतह पर दिखता है, वह अवास्तविक है। कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यू पर 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ नाम की अस्सी परिवारों वाली इमारत सतह पर खड़ी दिखती है, पर उसकी वास्तविकता मेट्रो की सुरंग खोदने से ढहने और ढहाए जाने में है। अंग्रेज़ी में एक शब्द चलता है ‘अंडरवर्ल्ड’, जिसका ठीक प्रतिरूप हिन्दी में नहीं है। अंडरवर्ल्ड ग़ैरक़ानूनी ढंग से धन कमाने, सौदेबाज़ी और जुगाड़ की दुनिया है। इस दुनिया के ढेर सारे चरित्र हमारे जाने हुए हैं, पर अक्सर हम नहीं जानते कि वे किस हद तक हमारे जीवन को चलाते हैं और कब हमें अपने में शामिल कर लेते हैं। तब अपने बेदख़ल किए जाने की पीड़ा दूसरों को बेदख़ल करने में आड़े नहीं आती।
जयगोविन्द 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कलकत्ता लौट आया एक कम्प्यूटर इंजीनियर है। वह अपना एक जीवन जयदीप के रूप में अपने अधूरे उपन्यास में जीता है, तो दूसरा जीवन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से लेकर भारत के एक बड़े बाज़ार में बदलने या ‘नेशन स्टेट’ से ‘रीयल इस्टेट’ बनने के यथार्थ में। विडम्बना यह नहीं है कि जयगोविन्द का जीवन जयदीप से असम्पृक्त है; बल्कि यह है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है। फ़र्क़ इतना भर है कि एक वस्तुनिष्ठ आत्मकथा लिखने की कोशिश में बार-बार अपने को बचाने की मुहिम चली आती है, जो अपने ही लिखे को नहीं मानती। इसी क्रम में आज़ादी के बाद इस देश की जवान हुई पहली पीढ़ी को मिले धोखे और नाकाम 'सिस्टम’ की दास्तानें अमेरिका के वियतनाम-युद्ध से लेकर विकीलीक्स के धोखे तक फैली हैं।
‘अमेरिका’ इस उपन्यास में एक ‘मोटिफ़’ की तरह है जिसमें विस्थापन के कई स्तर हैं—वहाँ कुछ साल बिताकर लौटा जयदीप है जो न इधर का है न उधर का; उसके एन.आर.आई. मित्र हैं जो इंफ़ेक्शन के डर से इंडिया नहीं आते; वे हैं जो लौटने के लिए तड़प रहे हैं; उसका बेटा रोहित है जो इंडिया को चिड़ियाघर कहता है।
सड़क पर गुज़रती हर बस के साथ हिलता 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नया अर्थ-संकेत है—पूरे देश का, जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन, पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमज़ोर को सबसे पहले बेदख़ल करने में लगा हुआ है।
Hindi Ki Manak Vartani
- Author Name:
Dr. K.C. Bhatia +1
- Book Type:

- Description: "हिंदी की मानक वर्तनी—कैलाशचंद्र भाटिया प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी के तीन अत्यधिक व्यावहारिक पक्षों को रखा गया है—वर्तनी, विरामचिह्न तथा प्रूफ-संशोधन। उक्त तीनों पक्ष एक-दूसरे से इतने अधिक संबद्ध हैं कि पृथक् करने में कठिनाई है। प्रूफ-संशोधन में जहाँ वर्तनी का शुद्ध रूप रखना पड़ता है, वहीं विरामचिह्नों के ठीक प्रयोग का। ‘मानक हिंदी वर्तनी’ का कार्यक्षेत्र केंद्रीय हिंदी निदेशालय का है, जिनकी सिफारिशों को इसमें समुचित स्थान दिया गया है। वर्तनी का क्षेत्र मात्र शब्दों तक नहीं है, उसमें संक्षिप्त रूप, प्रतीक, व्यक्ति-स्थान नामों का अपार भंडार है। वर्तनी से ही विरामचिह्न जुड़े हुए हैं। यह सर्वविदित है कि पूर्ण विराम ‘।’ के अतिरिक्त सभी चिह्न अंग्रेजी के संसर्ग से प्राप्त हुए हैं। व्याकरण की विभिन्न पुस्तकों में यत्किंचित् सामग्री विरामचिह्नों पर भी है। इस पुस्तक में पहली बार इन्हें विस्तार से समझाया गया है; जिससे विद्यार्थी व सुधी पाठक लाभान्वित होंगे। प्रूफ-संशोधन कार्य उक्त दोनों से जुड़ा हुआ है। हिंदी पत्रकारिता में भी अब इसकी आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा है। साधारणत: हिंदी लेखक इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे ही, साथ ही विद्वानों को इस दिशा में अंतिम रूप से निर्णय लेने में चिंतन का अवसर मिलेगा। "
Firangi Raja
- Author Name:
Rajgopal Singh Verma
- Book Type:

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Description:
आम इनसानों से लेकर ऋषि-मुनियों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों और घुमक्कड़ों के लिए हिमालय का आकर्षण हर काल में रहा है। इनमें से कुछ लोग तो यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। सैन्य जीवन की जटिलताओं से निकल कर आए ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक फिरंगी सैन्य अधिकारी फ्रेडरिक विल्सन की कहानी कुछ ऐसी ही थी। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अदम्य उद्यमशीलता के बलबूते उसने अपनी शरण स्थली गढ़वाल, हिमालय के हर्षिल क्षेत्र को आजीवन कर्मस्थली में परिणित कर दिया था। लगभग चार दशक तक उसके नाम का डंका ऐसे बजा कि तत्कालीन जनसाधारण से लेकर विशिष्ट जनों के मध्य वह ‘हर्षिल का राजा’ के रूप में चर्चित हो गया था। फ्रेडरिक विल्सन की उद्यमी सफलता की कहानियाँ आज भी गढ़वाली समाज में खूब कही और सुनी जाती हैं। गढ़वाल, हिमालय में उन्नीसवीं शताब्दी में एक तरफ वह प्रकृति का क्रूर विदोहक माना गया तो दूसरी ओर सर्वांगीण विकास का नव-प्रवर्तक भी साबित हुआ।
‘फिरंगी राजा’ में राजगोपाल सिंह वर्मा ने गढ़वाल में बीती विल्सन की जीवन-यात्रा को तत्कालीन स्थानीय वन्यता, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, शासन-प्रशासन की कार्यशैली और विकास के विभिन्न पड़ावों के साथ बेहद खूबसूरत अन्दाज में रेखांकित किया है। यह उपन्यास उन्नीसवीं सदी के गढ़वाल का इतिहास नहीं है, पर उस कालखंड के मर्म को बखूबी उद्घाटित करता है। मानवीय साहस-दुस्साहस और उसकी प्रकृति के प्रति व्यवहार की परिणिति को विल्सन के उत्थान और अवसान के जरिये उपन्यासकार ने प्रभावी तथ्यों के साथ सामने रखा है। विल्सन की वेदना के माध्यम से यह उपन्यास हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश ही नहीं देता वरन उससे बढ़कर एक उपयोगी और कारगर नीति की रूपरेखा भी पेश करता है। इन अर्थों में यह उपन्यास नीति नियन्ताओं के लिए एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह है। उपन्यास में लेखक ने गढ़वाल के इतिहास में अकारण ही भुला दिये गए नायक/प्रतिनायक फ्रेडरिक विल्सन के समूचे जीवन और परिवेश को पठनीय रोचकता के साथ रचा है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।
—डॉ. अरुण कुकसाल
Meri Teri Uski Baat
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
युगद्रष्टा, क्रान्तिकारी और सक्रिय सामाजिक चेतना से सम्पन्न कथाकार यशपाल की कृतियाँ राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आज भी प्रासंगिक हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान और स्वातंत्र्योत्तर भारत की दशा-दिशा पर उन्होंने अपनी कथा-रचनाओं में जो लिखा, उसकी महत्ता दस्तावेज़ के रूप में भी है और मार्गदर्शक वैचारिक के रूप में भी।
'मेरी तेरी उसकी बात' की पृष्ठभूमि में 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन है, लेकिन सिर्फ़ घटनाओं का वर्णन नहीं। एक दृष्टिसम्पन्न रचनाकार की हैसियत से यशपाल ने उसमें ख़ासतौर पर यह रेखांकित किया है कि क्रान्ति का अभिप्राय सिर्फ़ शासकों का बदल जाना नहीं, समाज और उसके दृष्टिकोण का आमूल परिवर्तन है।
स्त्री के प्रति प्रगतिशील और आधुनिक नज़रिया उनके अन्य उपन्यासों की तरह इस उपन्यास के भी प्रमुख स्वरों में एक है।
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