Kitne Chaurahe
(0)
Author:
Phanishwarnath RenuPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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‘कितने चौराहे’ फणीश्वरनाथ रेणु का पठनीय लघु उपन्यास है। पहली बार यह 1966 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के वृत्तान्त में लेखक ने निजी जीवन की कई घटनाओं को संयोजित किया है।</p> <p>‘कितने चौराहे' की रचना का उद्देश्य स्पष्ट है। यह उपन्यास आज़ादी के लिए संघर्ष करने और बलिदान देनेवाले युवकों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, ताकि आज के किशोरों में देशप्रेम, सेवा, त्याग आदि आदर्शों के भाव जाग्रत् हो सकें।</p> <p>यह उपन्यास व्यक्तिगत सुख-दु:ख, स्वार्थ-मोह से ऊपर उठकर देश के लिए जीने-मरने वालों के मानवीय, संवेदनशील रूप को उभारता है। पाठकों के मन में यह वृत्तान्त श्रद्धा जाग्रत् करता है। पाठक के मन में चारों ओर चीखते भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता आदि के प्रति क्षोभ उभरता है। उत्सर्गी परम्परा के प्रति आकर्षण बढ़ता है।</p> <p>‘कितने चौराहे' में 'आंचलिकता का विश्वसनीय पुट, ज्वलन्त चरित्र सृष्टि, मार्मिक कथावस्तु और चरित्रानुकूल भाषा मोहित करती है। साधारण में निहित असाधारणता का उन्मेष सर्वोपरि है। रेणु के उपन्यास-शिल्प की अनेक विशेषताएँ इस रचना में दृष्टिगोचर होती हैं। शब्दों के बीच से बिम्ब झाँकते हैं, 'सूरज पच्छिम की ओर झुक गया। बालूचर पर लाली उतर आई। परमान की धारा पर डूबते हुए सूरज की अन्तिम किरण झिलमिलाई।' जीवन का जयगान करता उपन्यास।
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‘कितने चौराहे’ फणीश्वरनाथ रेणु का पठनीय लघु उपन्यास है। पहली बार यह 1966 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के वृत्तान्त में लेखक ने निजी जीवन की कई घटनाओं को संयोजित किया है।</p>
<p>‘कितने चौराहे' की रचना का उद्देश्य स्पष्ट है। यह उपन्यास आज़ादी के लिए संघर्ष करने और बलिदान देनेवाले युवकों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, ताकि आज के किशोरों में देशप्रेम, सेवा, त्याग आदि आदर्शों के भाव जाग्रत् हो सकें।</p>
<p>यह उपन्यास व्यक्तिगत सुख-दु:ख, स्वार्थ-मोह से ऊपर उठकर देश के लिए जीने-मरने वालों के मानवीय, संवेदनशील रूप को उभारता है। पाठकों के मन में यह वृत्तान्त श्रद्धा जाग्रत् करता है। पाठक के मन में चारों ओर चीखते भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता आदि के प्रति क्षोभ उभरता है। उत्सर्गी परम्परा के प्रति आकर्षण बढ़ता है।</p>
<p>‘कितने चौराहे' में 'आंचलिकता का विश्वसनीय पुट, ज्वलन्त चरित्र सृष्टि, मार्मिक कथावस्तु और चरित्रानुकूल भाषा मोहित करती है। साधारण में निहित असाधारणता का उन्मेष सर्वोपरि है। रेणु के उपन्यास-शिल्प की अनेक विशेषताएँ इस रचना में दृष्टिगोचर होती हैं। शब्दों के बीच से बिम्ब झाँकते हैं, 'सूरज पच्छिम की ओर झुक गया। बालूचर पर लाली उतर आई। परमान की धारा पर डूबते हुए सूरज की अन्तिम किरण झिलमिलाई।' जीवन का जयगान करता उपन्यास।
Book Details
-
ISBN9788126726981
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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गांधी को लेकर एक बड़ा और चर्चित उपन्यास लिख चुके गिरिराज जी इस उपन्यास में कस्तूरबा गांधी को लेकर आए हैं। गांधी जैसे व्यक्तित्व की पत्नी के रूप में एक स्त्री का स्वयं अपने और साथ ही देश की आज़ादी के आन्दोलन से जुदा दोहरा संघर्ष। ऐसे दस्तावेज़ बहुत कम हैं जिनमें कस्तूरबा के निजी जीवन या उनकी व्यक्ति-रूप में पहचान को रेखांकित किया जा सका हो, नहीं के बराबर। इसीलिए उपन्यासकार को भी इस रचना के लिए कई स्तरों पर शोध करना पड़ा। जो किताबें उपलब्ध थीं, उनको पढ़ा, जिन जगहों से बा का सम्बन्ध था, उनकी भीतरी और बाहरी यात्रा की और उन लोगों से भी मिले जिनके पास बा से सम्बन्धित कोई भी सूचना मिल सकती थी।
इतनी मशक्कत के बाद आकार पा सका यह उपन्यास अपने उद्देश्य में इतनी सम्पूर्णता के साथ सफल हुआ है, यह सुखद है। इस उपन्यास से गुज़रने के बाद हम उस स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में चीन्ह सकेंगे जो बापू के बापू बनने की ऐतिहासिक प्रक्रिया में हमेशा एक ख़ामोश ईंट की तरह नींव में बनी रही। और उस व्यक्तित्व को भी जिसने घर और देश की ज़िम्मेदारियों को एक धुरी पर साधा। उन्नीसवीं सदी के भारत में एक कम उम्र लड़की का पत्नी रूप में होना और फिर धीरे-धीरे पत्नी होना सीखना, उस पद के साथ जुड़ी उसकी इच्छाएँ, कामनाएँ और फिर इतिहास के एक बड़े चक्र के फलस्वरूप एक ऐसे व्यक्ति की पत्नी के रूप में ख़ुद को पाना जिसकी ऊँचाई उनके समकालीनों के लिए भी एक पहेली थी। यह यात्रा लगता है कई लोगों के हिस्से की थी जिसने बा ने अकेले पूरा किया। यह उपन्यास इस यात्रा के हर पड़ाव को इतिहास की तरह रेखांकित भी करता है और कथा की तरह हमारी स्मृति का हिस्सा भी बनाता है।
इस उपन्यास में हम ख़ुद बापू के भी एक भिन्न रूप से परिचित होते हैं। उनका पति और पिता का रूप। घर के भीतर वह व्यक्ति कैसा रहा होगा, जिसे इतिहास ने पहले देश और फिर पूरे विश्व का मार्गदर्शक बनते देखा, उपन्यास के कथा-फ़ेम में यह महसूस करना भी एक अनुभव है।
Hookah Hits!
- Author Name:
Dinggi
- Book Type:

- Description: “The depth of my feelings for him was unimaginably stressful. When you realise the feeling — name it love — when it gets out of control, then the victim and the perpetrator get united. The want and the need to be loved then becomes a curse. And this curse can only be reversed by the spell of lying the truth.” – Lana Maxwell Lana Maxwell (the protagonist) had to make a decision; along with her mother’s Maxwell Enterprise, she had to inherit her life as well. Lana’s life is paused between her past and present — an ambitionless teenage, adventurous friends, first love, exploring the unknown, and shouldering real-life responsibilities with an accidental twist by Fate. This is a fiction based on real-life events. “If you think you are in for a light-read, you are mistaken. ‘Hookah Hits!’ is a story that will resonate with the emotions of every millennial. A beautiful piece of modern literature filled with undertones of realism and humour—this is a story of exploring one’s own dynamics of unleashing layers and layers of different chapters of life. With intriguing twists and turns in the plot, I would call this a classic book depicting the metamorphosis of human relationships.” – Priyanka Chakrabarti, Founder of thelifestylepotpourri.com & Deputy Editor at Maxim magazine. “Hookah Hits! takes you along with the protagonist on a discovery trip through a family’s saga. One can easily connect to the universality of the story and will be surprised how it unfolds. This novel is intriguing in its emotional depth and understanding.” – Alexander Funk, Producer at Oberon Film (A German Film Production)
Khule Gagan Ke Lal Sitare
- Author Name:
Madhu Kankariya
- Book Type:

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Description:
‘भंगी और कम्युनिस्ट पैदा नहीं होते, बना दिए जाते हैं,’ इन्द्र ने बताया था मणि को, जब नक्सलबाड़ी गाँव से उठे एक सशस्त्र आन्दोलन ने कॉलेजों के भीतर घुसकर ’70 की युवा पीढ़ी को छूना शुरू किया था। और, जब तक मणि ने इस वास्तविकता को समझकर आत्मसात् किया, इन्द्र ग़ायब हो चुका था।
तीस साल तक लगातार प्रतीक्षारत मणि को आभास शुरू से ही था कि इन्द्र का क्या हुआ, लेकिन उस हक़ीक़त को उसने माना नहीं। वह उन हज़ारों युवाओं के साथ पुलिस की क्रूरता की भेंट चढ़ चुका था जिसे राज्य-तंत्र की ओर से नक्सलियों का आमूल सफाया करने का काम सौंपा गया था। मणि की भोली आशा के विपरीत वह उन लगभग 20 हज़ार क़ैदियों में भी शामिल नहीं था जिन्हें पाँच-पाँच साल तक बिना ट्रायल के ही बन्दी रखा गया और जिन्हें आपातकाल के बाद केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों ने छोड़ा। मणि को विश्वास तब हुआ जब गोविन्द दा उस विकलांग कवि से मिलकर आए जिसके सामने, पुलिस-यंत्रणा के बीच इन्द्र ने दम तोड़ा था। इस बीच एक मध्य-वित्त परिवार में जन्मी मणि ने अपने घर में, और बाहर भी जीवन व भाग्य की अनेक विरूपताओं को ठीक अपने सीने पर झेला; लेकिन अपनी उम्मीद और जिजीविषा को टूटने नहीं दिया।
भावनाओं और विचारों, दुख और आक्रोश, भय और साहस के अत्यन्त महीन धागों से बुनी यह औपन्यासिक संरचना हमें नक्सलवादी आन्दोलन के वे दहला देनेवाले विवरण देती है जो इतिहास में सामान्यत: नहीं लिखे जाते। साथ ही कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार की उन गलघोंटू परिस्थितियों का विवरण भी इसमें है जिनका मुकाबला विचार और विद्रोह के हथियार ही करें तो करें, वैसे सम्भव नहीं; जैसा कि इस उपन्यास में मणि और कुछ साहसी आत्माएँ अपने जीवन में करती हैं।
इस उपन्यास को पढ़ना इसकी भाषा में निहित आवेग के कारण भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह भाषा बताती है कि सत्य और संवेद का कोई शास्त्रसम्मत आकार नहीं होता।
Krishnavtar : Vol. 2 : Rukmini Haran
- Author Name:
K. M. Munshi
- Book Type:

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Description:
‘कृष्णावतार’ परम पुरुष श्रीकृष्ण की जीवनलीला पर देश की किसी भी भाषा में आधुनिक उपन्यास लिखने का शायद पहला ही प्रयास है। पौराणिक परम्पराओं, विविध भाषाओं के काव्यों और लोक-साहित्य ने श्रीकृष्ण का जो बहुविध व्यक्तित्व और रूप हमारे सामने प्रस्तुत कर रखा है, वह अनन्य है, लेकिन उसे उपन्यास की विधा में बाँध लेने का श्रेय गुजराती के प्रमुख कथाकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को ही प्राप्त हो सका है।
‘रुक्मिणी हरण’ मुंशी के विराट् उपन्यास ‘कृष्णावतार’ का दूसरा खंड है, जिसमें ‘बंसी की धुन’ के बाद की कथा कही गई है। इस भाग में वयस्क कृष्ण के पराक्रमपूर्ण जीवन की गौरवशाली गाथाओं का चित्रण किया गया है। मगध-सम्राट् जरासंध का मान-मर्दन इस कथा-भाग का केन्द्रीय विषय है और इसकी परिणति रुक्मिणी हरण में होती है।
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