90ml Samundar

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Author:

Sunil Sahil

Language:

Hindi

148

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सुनील साहिल टीवी कॉमेडी शो लेखक एवं कवि-सम्मेलन मंचों पर हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में सक्रिय हैं, इंग्लैंड के कई शहरों में काव्य-पाठ का आमंत्रण, रेडियो सनराइज, लन्दन और रेडियो एक्सेल, बिर्मिंघम पर इंटरव्यू प्रसारित, ऍम ए टीवी, लन्दन पर कविताएँ प्रसारित, सब टीवी के शो ‘वाह-वाह’ में आमंत्रण. ‘ये कविताएँ मैंने नहीं लिखी हैं, ये कविताएँ मुझसे अभिव्यक्त हुई हैं, अस्तित्व ने मुझे चुना इन शब्दों, इन भावों का जरिया बनने को, माध्यम बनने को, साधन बनने को, जब मैं मिट गया तो लगा कि अस्तित्व और मुझमें संवाद हो रहा है, एक सम्बन्ध घट रहा है जिसमें ये कुछ सहज अभिव्यक्तियाँ प्रकट हुई, आप हमेशा ‘कवि’ बने नहीं रह सकते हैं, शायद कुछ पल आप कवि हो जाते हैं जब कविता आपकी रूह की जमीन पर उतरती है, तब आपको अनुभूति होती है कि आपकी देह, आपका मन, आपका जेहन भीतर की यात्रा पर निकला है- बस एक झलक मिलती है सम्बुद्ध होने की और फिर खो जाती है, बस उन्हीं चंद लम्हों का जमावड़ा है – 90 ml समंदर’

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ISBN
9789385137297
Pages
105
Avg Reading Time
2 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

सुनील साहिल टीवी कॉमेडी शो लेखक एवं कवि-सम्मेलन मंचों पर हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में सक्रिय हैं, इंग्लैंड के कई शहरों में काव्य-पाठ का आमंत्रण, रेडियो सनराइज, लन्दन और रेडियो एक्सेल, बिर्मिंघम पर इंटरव्यू प्रसारित, ऍम ए टीवी, लन्दन पर कविताएँ प्रसारित, सब टीवी के शो ‘वाह-वाह’ में आमंत्रण. ‘ये कविताएँ मैंने नहीं लिखी हैं, ये कविताएँ मुझसे अभिव्यक्त हुई हैं, अस्तित्व ने मुझे चुना इन शब्दों, इन भावों का जरिया बनने को, माध्यम बनने को, साधन बनने को, जब मैं मिट गया तो लगा कि अस्तित्व और मुझमें संवाद हो रहा है, एक सम्बन्ध घट रहा है जिसमें ये कुछ सहज अभिव्यक्तियाँ प्रकट हुई, आप हमेशा ‘कवि’ बने नहीं रह सकते हैं, शायद कुछ पल आप कवि हो जाते हैं जब कविता आपकी रूह की जमीन पर उतरती है, तब आपको अनुभूति होती है कि आपकी देह, आपका मन, आपका जेहन भीतर की यात्रा पर निकला है- बस एक झलक मिलती है सम्बुद्ध होने की और फिर खो जाती है, बस उन्हीं चंद लम्हों का जमावड़ा है – 90 ml समंदर’

Book Details

  • ISBN
    9789385137297
  • Pages
    105
  • Avg Reading Time
    2 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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90ml Samundar is not a collection crafted by intention but channeled through surrender. Sunil Sahil—known to television audiences as a comedy writer and to kavi-sammelan crowds as a hasya-vyangya poet—presents verses that he claims were not written but expressed through him, as if existence itself chose him as its medium. The title's quiet metaphor—a measured ocean, intimate yet infinite—captures the paradox of a performer who erases himself to let language speak. This is poetry born at the intersection of laughter and longing, where the satirist's eye meets the mystic's acceptance. Sahil's voice, sharpened on stages from London to Birmingham and refined in the disciplined chaos of television writers' rooms, carries the precision of comedy and the vulnerability of someone who has stopped claiming authorship. Each poem becomes an act of mitna—dissolution—where the boundary between speaker and spoken collapses. For readers weary of ego-driven verse, this is an offering of unusual humility.

यह किताब पढ़ते समय मुझे कैसा अनुभव होगा?

यह संग्रह आपको हंसाएगा और फिर चुप करा देगा। सुनील साहिल की कविताएं मंच की चुलबुलाहट से शुरू होकर आध्यात्मिक शून्यता में उतरती हैं, जहां कवि खुद को मिटाकर शब्द का माध्यम बन जाता है। पढ़ते हुए आप एक ऐसे संवाद में शामिल होते हैं जो अस्तित्व और भाषा के बीच घटित हो रहा है, कवि नहीं बल्कि आप स्वयं उसके साक्षी बनते हैं।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • जो हास्य-व्यंग्य कविता के पारंपरिक ढांचे से आगे देखना चाहते हैं
  • जो टीवी और मंच के कलाकार की निजी आध्यात्मिक यात्रा में रुचि रखते हैं
  • जो काव्य में अहंकार-शून्यता और आत्म-विलोपन के प्रयोगों की तलाश में हैं
  • जो समकालीन हिंदी कविता में ताजा, ईमानदार आवाज़ सुनना चाहते हैं

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठक के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है?

आज जब सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी आवाज़ को ब्रांड बना रहा है, सुनील साहिल की यह घोषणा कि "ये कविताएँ मैंने नहीं लिखी हैं" एक सांस्कृतिक प्रति-आख्यान है। यह संग्रह हमें याद दिलाता है कि भारतीय काव्य-परंपरा में कवि हमेशा द्रष्टा रहा है, रचयिता नहीं—एक दर्पण जो अस्तित्व को प्रतिबिंबित करता है।

इस विषय के प्रति लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?

सुनील साहिल टेलीविजन कॉमेडी के अनुशासित लेखक और मंचीय कवि-सम्मेलन के अनुभवी कलाकार हैं, लेकिन इस संग्रह में वे दोनों भूमिकाओं को त्यागकर केवल एक माध्यम बनते हैं। हास्य का तीखापन यहां आध्यात्मिक विनम्रता में बदल जाता है, जहां प्रदर्शन की जगह प्रकटीकरण ले लेता है—यह रूपांतरण ही इस काव्य को असाधारण बनाता है।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के भीतर क्या बचा रहता है?

  • रचना और रचयिता के बीच के रिश्ते पर नए सिरे से सोचने की प्रेरणा
  • हंसी और गंभीरता को अलग न मानने की समझ
  • भाषा को नियंत्रित करने की बजाय उसके प्रवाह में घुलने का अनुभव
  • अहंकार-शून्यता की उस दुर्लभ ईमानदारी की याद जो समकालीन कविता में बहुत कम मिलती है

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