Khuda Sahi Salamat Hai
About the book
अगर ‘झूठा सच’ बँटवारे का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, तो बँटवारे के बावजूद भारत में हिन्दू-मुस्लिम जनता के सहजीवन का मार्मिक उद्घाटन ‘ख़ुदा सही सलामत है’ में सम्भव हुआ है। हजरी, अज़ीज़न, गुलबदन, शर्मा, सिद्दीकी, पंडित, पंडिताइन, गुलाबदेई, लतीफ़, हसीना, उमा, लक्ष्मीधर, ख़्वाजा और प्रेम जौनपुरी जैसे जीवन्त और गतिशील पात्र अपनी तमाम इनसानी ताक़त और कमज़ोरियों के साथ हमें अपने परिवेश का हिस्सा बना लेते हैं। शर्मा और गुल का प्रेम इन दो धाराओं के मिश्रण को पूर्णता तक पहुँचाने को है कि साम्प्रदायिकता की आड़ लेकर रंग-बिरंगे निहित स्वार्थ उनके आड़े आ जाते हैं। जैसे प्रेम क़ुर्बानी माँगता है, वैसे ही महान सामाजिक उद्देश्य भी। यह उपन्यास अन्तत: इसी सत्य को रेखांकित करता है। साम्प्रदायिकता के अलावा यह उपन्यास नारी-प्रश्न पर भी गहराई से विचार करता है। इसके महिला पात्र भेदभाव करनेवाली पुरुष मानसिकता की सारी गन्दगी का सामना करने के बावजूद अन्त तक अविचलित रहते हैं। अपनी समस्त मानवीय दुर्बलताओं के साथ चित्रित होने के बावजूद एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगता कि उन्हें उनके न्यायोचित मार्ग से हटाया जा सकता है। उत्तर मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की वारिस, तवायफ़ों के माध्यम से आनेवाली यह व्यक्तित्व सम्पन्नता काफ़ी मानीखेज़ है। यह हमें याद दिलाती है कि औपनिवेशिक आधुनिकता की आत्महीन राह पर चलते हुए हम अपना क्या कुछ गँवा चुके हैं। 1980 के दशक में हमारे शासकवर्ग ने साम्प्रदायिक मसलों को हवा देने का जो रवैया अपनाया था, वह ज़मीनी स्तर पर कैसे दोनों सम्प्रदायों के निहित स्वार्थों को खुलकर खेलने के नए-नए मौक़े मुहैया करा रहा था, और भारत की संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता इस घिनौने खेल को बन्द करनेवाला नहीं, इसे ढकने-तोपने वाला परदा बनी हुई थी, इसकी पड़ताल भी इस उपन्यास में आद्यन्त निहित है। आज़ाद भारत में ग़ैरमुस्लिम कथाकारों के यहाँ मुस्लिम समाज की बहुश्रुत अनुपस्थिति के बीच यह उपन्यास एक सुखद और आशाजनक अपवाद की तरह हमारे सामने है। अपनी इन्हीं ख़ूबियों के कारण यह उपन्यास ‘आग का दरिया’, ‘उदास नस्लें’, ‘झूठा सच’ और ‘आधा गाँव’ की परम्परा की अगली कड़ी साबित होता है। —कृष्णमोहन
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About the Book
अगर ‘झूठा सच’ बँटवारे का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, तो बँटवारे के बावजूद भारत में हिन्दू-मुस्लिम जनता के सहजीवन का मार्मिक उद्घाटन ‘ख़ुदा सही सलामत है’ में सम्भव हुआ है। हजरी, अज़ीज़न, गुलबदन, शर्मा, सिद्दीकी, पंडित, पंडिताइन, गुलाबदेई, लतीफ़, हसीना, उमा, लक्ष्मीधर, ख़्वाजा और प्रेम जौनपुरी जैसे जीवन्त और गतिशील पात्र अपनी तमाम इनसानी ताक़त और कमज़ोरियों के साथ हमें अपने परिवेश का हिस्सा बना लेते हैं। शर्मा और गुल का प्रेम इन दो धाराओं के मिश्रण को पूर्णता तक पहुँचाने को है कि साम्प्रदायिकता की आड़ लेकर रंग-बिरंगे निहित स्वार्थ उनके आड़े आ जाते हैं। जैसे प्रेम क़ुर्बानी माँगता है, वैसे ही महान सामाजिक उद्देश्य भी। यह उपन्यास अन्तत: इसी सत्य को रेखांकित करता है।
साम्प्रदायिकता के अलावा यह उपन्यास नारी-प्रश्न पर भी गहराई से विचार करता है। इसके महिला पात्र भेदभाव करनेवाली पुरुष मानसिकता की सारी गन्दगी का सामना करने के बावजूद अन्त तक अविचलित रहते हैं। अपनी समस्त मानवीय दुर्बलताओं के साथ चित्रित होने के बावजूद एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगता कि उन्हें उनके न्यायोचित मार्ग से हटाया जा सकता है। उत्तर मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की वारिस, तवायफ़ों के माध्यम से आनेवाली यह व्यक्तित्व सम्पन्नता काफ़ी मानीखेज़ है। यह हमें याद दिलाती है कि औपनिवेशिक आधुनिकता की आत्महीन राह पर चलते हुए हम अपना क्या कुछ गँवा चुके हैं।
1980 के दशक में हमारे शासकवर्ग ने साम्प्रदायिक मसलों को हवा देने का जो रवैया अपनाया था, वह ज़मीनी स्तर पर कैसे दोनों सम्प्रदायों के निहित स्वार्थों को खुलकर खेलने के नए-नए मौक़े मुहैया करा रहा था, और भारत की संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता इस घिनौने खेल को बन्द करनेवाला नहीं, इसे ढकने-तोपने वाला परदा बनी हुई थी, इसकी पड़ताल भी इस उपन्यास में आद्यन्त निहित है। आज़ाद भारत में ग़ैरमुस्लिम कथाकारों के यहाँ मुस्लिम समाज की बहुश्रुत अनुपस्थिति के बीच यह उपन्यास एक सुखद और आशाजनक अपवाद की तरह हमारे सामने है। अपनी इन्हीं ख़ूबियों के कारण यह उपन्यास ‘आग का दरिया’, ‘उदास नस्लें’, ‘झूठा सच’ और ‘आधा गाँव’ की परम्परा की अगली कड़ी साबित होता है।
—कृष्णमोहन
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 3rd
- Publication year
- 1984
- Weight
- 378 grams
- ISBN-13
- 9788126710461
- Pages
- 401
- Reading time
- ~13 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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