Tarang
About the book
देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं के उत्स की तलाश है ‘तरंग’। यह तलाश इतिहास के जिस कालखंड (1934-42 ) में ले जाती है उसकी धड़कनें स्वातंत्र्योत्तर भारत की बुनियाद में अन्तर्भुक्त हैं और उसकी यात्रा को लगातार विचलित-आलोड़ित करती रही हैं। उस कालखंड में इन विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं को जिस तरह बरता गया, उसका फलित हमें आज भी उद्भ्रान्त किए हुए है। उपन्यास के रूप में ‘तरंग’ उसी कालखंड की गहन पड़ताल करती एक बहुआयामी कथा है जिसकी जड़ों के रेशे पिछली सदी के आरम्भ तक जाते हैं। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के बलिदान के साथ ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ की क्रान्तिकारी धारा का अवसान नहीं हो गया था, उसमें बिखराव ज़रूर आया था। ‘तरंग’ एक औपन्यासिक कृति के रूप में उसी अवशिष्ट धारा के एक विच्छिन्न समूह के गुमनाम क्रान्तिकारियों के अन्तरंग से साक्षात्कार कराती है। उसी धारा को केन्द्र में रखकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रत आन्दोलन की मुख्यधारा का प्रतिपाठ भी रचती है और इतिहास के कई मिथकों का भेदन करती है। इस अर्थ में ‘तरंग’ भारतीय और विश्व इतिहास के एक अहम अध्याय में उपन्यासकार का सुचिन्तित सृजनात्मक हस्तक्षेप है। गांधी-नेहरू-पटेल की अन्तर्विरोधी धारा के बरअक्स उपन्यास का विशाल फलक स्वामी सहजानन्द, डॉ. अम्बेडकर, एम.एन. रॉय और सुभाषचन्द्र बोस के गिर्द घूमता है और अकादमिक इतिहास-लेखन के कुहासे को भेदकर उसके उपेक्षित या अल्पज्ञात पक्ष को निर्मम यथार्थ की रोशनी में उद्घाटित करता है। इस अर्थ में उपन्यास उस कालखंड के ज़मीनी, अन्तरंग और ज़रूरी दस्तावेज़ की निर्मिति भी है। अकादमिक रिक्ति को भरने का एक श्रमसाध्य, निष्ठावान और सृजनात्मक उपक्रम। उस कालखंड में किसान आन्दोलन की एक उत्कट क्रान्तिकारी धारा भी प्रवाहित है जो जमींदारों, ताल्लुकेदारों के विरुद्ध किसान-संघर्ष की नई प्रविधि ईजाद करती है। क्रान्तिकारियों का उक्त समूह स्वामी सहजानन्द के उत्प्रेरण में इस ईजाद के केन्द्र में है। इस ब्याज से उपन्यास सबाल्टर्न इतिहास के एक अँधेरे कोने को दीप्त करता है। क्रान्ति-पथ को स्खलित करने की ओर प्रवृत्त ऐन्द्रिक स्त्री-पुरुष सम्बन्ध का कलात्मक अतिक्रमण भी ‘तरंग’ का एक अहम उपजीव्य है।
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About the Book
देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं के उत्स की तलाश है ‘तरंग’। यह तलाश इतिहास के जिस कालखंड (1934-42 ) में ले जाती है उसकी धड़कनें स्वातंत्र्योत्तर भारत की बुनियाद में अन्तर्भुक्त हैं और उसकी यात्रा को लगातार विचलित-आलोड़ित करती रही हैं। उस कालखंड में इन विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं को जिस तरह बरता गया, उसका फलित हमें आज भी उद्भ्रान्त किए हुए है। उपन्यास के रूप में ‘तरंग’ उसी कालखंड की गहन पड़ताल करती एक बहुआयामी कथा है जिसकी जड़ों के रेशे पिछली सदी के आरम्भ तक जाते हैं।
भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के बलिदान के साथ ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ की क्रान्तिकारी धारा का अवसान नहीं हो गया था, उसमें बिखराव ज़रूर आया था। ‘तरंग’ एक औपन्यासिक कृति के रूप में उसी अवशिष्ट धारा के एक विच्छिन्न समूह के गुमनाम क्रान्तिकारियों के अन्तरंग से साक्षात्कार कराती है। उसी धारा को केन्द्र में रखकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रत आन्दोलन की मुख्यधारा का प्रतिपाठ भी रचती है और इतिहास के कई मिथकों का भेदन करती है। इस अर्थ में ‘तरंग’ भारतीय और विश्व इतिहास के एक अहम अध्याय में उपन्यासकार का सुचिन्तित सृजनात्मक हस्तक्षेप है। गांधी-नेहरू-पटेल की अन्तर्विरोधी धारा के बरअक्स उपन्यास का विशाल फलक स्वामी सहजानन्द, डॉ. अम्बेडकर, एम.एन. रॉय और सुभाषचन्द्र बोस के गिर्द घूमता है और अकादमिक इतिहास-लेखन के कुहासे को भेदकर उसके उपेक्षित या अल्पज्ञात पक्ष को निर्मम यथार्थ की रोशनी में उद्घाटित करता है। इस अर्थ में उपन्यास उस कालखंड के ज़मीनी, अन्तरंग और ज़रूरी दस्तावेज़ की निर्मिति भी है। अकादमिक रिक्ति को भरने का एक श्रमसाध्य, निष्ठावान और सृजनात्मक उपक्रम।
उस कालखंड में किसान आन्दोलन की एक उत्कट क्रान्तिकारी धारा भी प्रवाहित है जो जमींदारों, ताल्लुकेदारों के विरुद्ध किसान-संघर्ष की नई प्रविधि ईजाद करती है। क्रान्तिकारियों का उक्त समूह स्वामी सहजानन्द के उत्प्रेरण में इस ईजाद के केन्द्र में है। इस ब्याज से उपन्यास सबाल्टर्न इतिहास के एक अँधेरे कोने को दीप्त करता है। क्रान्ति-पथ को स्खलित करने की ओर प्रवृत्त ऐन्द्रिक स्त्री-पुरुष सम्बन्ध का कलात्मक अतिक्रमण भी ‘तरंग’ का एक अहम उपजीव्य है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2020
- Weight
- 572 grams
- ISBN-13
- 9789389742077
- Pages
- 560
- Reading time
- ~19 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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