Hiroshima Ke Phool
Author:
Edita MorrisPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
हिरोशिमा के फूल एक मार्मिक उपन्यास है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बमों का आघात सहना पड़ा था। यह आघात जापान के सिर्फ़ दो शहरों की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यता की त्रासदी था। इसने स्पष्ट किया कि मनुष्य यदि अपनी बुनियादी सृजनात्मक नैतिकता को भूल जाए तो वह कितना संहारक हो सकता है! यह आघात और ख़तरा ही युद्धोत्तर जापान की पृष्ठभूमि में रचे गए इस उपन्यास का प्रेरणा-बिन्दु है। इस उपन्यास के पात्र निहायत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानवीय संसार के लिए गरिमा और करुणा की अपरिहार्यता की लगातार याद दिलाते हैं।
ISBN: 9789360865740
Pages: 128
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: Should I enter this ward? Should | tend to the sick? Or should I succumb to the stark reality that surrounds us? Can a doctor have such thoughts? Does a doctor’s heart have the right to feel Low after choosing his profession? Aarav is equipped with knowledge and compassion, two qualities that make him an outstanding doctor. Hailing from Chandigarh, he is employed at the Medict Health Care Hospital as Assistant Clinical Coordinator, where he is trusted and loved by both his seniors and peers for his dedication to his work. He is engaged to Ishika, who is the cynosure of his life. But before they can marry, a catastrophic disease storms into their lives and turns it upside- down. Does Aarav handle this catastrophe, both at professional and personal levels? Or does he break down? What goes on in a doctor’s head when he pushes aside his personal life to give his all to his patients? This book is not a mere story; it’s an unforgettable journey into a doctor’s heart
Jhool
- Author Name:
Bhalchandra Nemade
- Book Type:

-
Description:
झूल उस दारुण परिणति का वृत्तान्त है जहाँ स्वातंत्र्योत्तर भारत की युवा पीढ़ी अपने व्यक्तिगत सपनों तथा जातीय आदर्शों और आकांक्षाओं के बीच के अन्तर को पाटने की कोशिश में पहुँची है। उपन्यास का नायक चांगदेव पाटील अपने अस्तित्व के उद्देश्य और नैतिक आदर्शों को समाज में व्याप्त संकीर्णताओं के बीच एकदम असंगत पाता है। यह अनुभव उस समय और प्रगाढ़ हो जाते हैं जब वह एक नए कॉलेज में प्रोफेसर बनकर आता है। पिछले कॉलेज के कटु अनुभव अभी भी उसके साथ हैं लेकिन जिस भावात्मक औदात्य को उसने अपनी जीवन-दृष्टि का आधार बनाया है, उसे भी उसने छोड़ा नहीं है। अपने एकाकी मन को वह समाज की बड़ी संरचना में विलय कर देना चाहता है लेकिन आसपास के जीवन और लोगों में कोई ऐसी मूल्य-चेतना उसे नहीं दिखती जो उन्हें उनकी तुच्छताओं से ऊपर उठा सके। समाज की यह असफलता उसके व्यक्ति को घोर निराशा से भर देती है। लगातार जगह बदलते हुए उसने जो पाया है, वह यही कि जीवन अन्ततः अर्थहीन ही है।
तीक्ष्ण दृष्टि और उतनी ही तीक्ष्ण शब्दावली के साथ भारतीय समाज की पड़ताल करने वाले नेमाड़े इस उपन्यास में ‘होने’ और ‘नहीं होने’ के द्वन्द्व को इतनी गहराई से अंकित करते हैं कि इस शृंखला के अन्य उपन्यासों की तरह यह उपन्यास भी कथा से अधिक एक अध्ययन हो जाता है।
झूल स्वतंत्र रूप से भी उतना ही दिलचस्प और पूर्ण पाठ है, जितना कि शृंखला की एक कड़ी के रूप में। यह एक बड़ी विशेषता है।
Madhya Pradesh Ki Lokkathayen
- Author Name:
Vasant Nirgune
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में मध्य प्रदेश की चार संस्कृतियों और बोलियों की लोककथाओं का संकलन है। ये संस्कृतियाँ और बोलियाँ अपने-अपने वाचिक परंपरागत साहित्य का अकूत भंडार हैं। निमाड़ी, मालवी, बुंदेली और बघेली बोलियाँ अपनी-अपनी संस्कृति और साहित्य का संचरण तथा संरक्षण करती आई हैं। इनमें गीत, कथा, गाथा, लोकोक्ति, नृत्य, नाट्य, शिल्प आदि सभी शामिल हैं, जो वाचिक हैं। कथाएँ ज्ञान का सागर हैं। उनमें मानव जिज्ञासा के हर प्रश्न के उत्तर मिल जाते हैं। इसलिए कथारस को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, पर इस रस को पाने के लिए अपने मस्तिष्क में वैसा ही निर्मल भाव उत्पन्न करने की जरूरत होगी। निमाड़ी लोककथाएँ विंध्य और सत्पुड़ा की मध्यभूमि की ऊष्म जलवायु की तपती कहानियाँ हैं, जो नर्मदा के दोनों तटों के पवित्र जल में बारहों महीने डुबकियाँ लगाती हैं। मालवी लोककथाएँ मालवा की शस्य-श्यामला भूमि की वार्त्ताएँ हैं। बुंदेली लोककथाएँ बुंदेलखंड के शौर्य, साहस और शृंगार की भूमि की पारदर्शी कथाएँ हैं। बघेली लोककथाएँ एक अर्थ में रिमही, यानी नर्मदा संस्कृति की ही बघेलखंडी कथाएँ हैं। रीवा का नाम भी रेवा के ‘रव’ से बना है। इन लोककथाओं में प्रदेश के जनजातीय जीवन के आदिम स्वर और छवियाँ अंकित हैं, क्योंकि लोककथाओं का मूल उत्स तो आदिम कथाएँ ही हैं।
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