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Rinala Khurd

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‘रिनाला खुर्द’ लेखक ईशमधु तलवार का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें भारत विभाजन का दर्द है, जिसमें सरहद के इस पार की हूक सुनाई देती है तो उस पार की सिसकियाँ। लेखक ने लुप्त नदी सरस्वती की तलाश के माध्यम से स्मृतियों का एक ऐसा कोलाज रचा है जो बार-बार भारत विभाजन की निस्सारता की तरफ़ ध्यान दिलाता है। इसमें ‘चाईजी’ की कहानियाँ हैं जिनमें विभाजन से पहले का दर्द है तो मेवात के बगड़ गाँव की नर्गिस के दिल का टभकता दु:ख है जो शादी के बाद पाकिस्तान चली गई। वहाँ वह सलमा के नाम से एक प्रसिद्ध लोक गायिका बन गई लेकिन न अपने बचपन के गाँव को भूल पाई न ही अपने प्रेमी मधु को जिससे बरसों बाद पाकिस्तान में उसकी मुलाक़ात होती है। दोनों अपने खोये प्यार को याद करते हैं, भविष्य में एक साथ रहने के सपने देखते हैं लेकिन बीच में सरहद आ जाती है। जहाँ अपने-अपने दु:खों को समेटकर वे जुदा हो जाते हैं। उपन्यास में सूखी नदी के स्रोत की तलाश के माध्यम से प्रेम के उस विलुप्त होते स्रोत की तलाश की कोशिश भी बड़ी शिद्दत से दिखाई देती है जिसके ऊपर नफ़रत की दीवार खींच दी गई। उपन्यास में क़िस्सों के भी अनेक स्रोत हैं जो अन्‍त तक पढ़नेवाले का ध्यान नहीं हटने देते।     —प्रभात रंजन

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‘रिनाला खुर्द’ लेखक ईशमधु तलवार का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें भारत विभाजन का दर्द है, जिसमें सरहद के इस पार की हूक सुनाई देती है तो उस पार की सिसकियाँ। लेखक ने लुप्त नदी सरस्वती की तलाश के माध्यम से स्मृतियों का एक ऐसा कोलाज रचा है जो बार-बार भारत विभाजन की निस्सारता की तरफ़ ध्यान दिलाता है।

इसमें ‘चाईजी’ की कहानियाँ हैं जिनमें विभाजन से पहले का दर्द है तो मेवात के बगड़ गाँव की नर्गिस के दिल का टभकता दु:ख है जो शादी के बाद पाकिस्तान चली गई। वहाँ वह सलमा के नाम से एक प्रसिद्ध लोक गायिका बन गई लेकिन न अपने बचपन के गाँव को भूल पाई न ही अपने प्रेमी मधु को जिससे बरसों बाद पाकिस्तान में उसकी मुलाक़ात होती है। दोनों अपने खोये प्यार को याद करते हैं, भविष्य में एक साथ रहने के सपने देखते हैं लेकिन बीच में सरहद आ जाती है। जहाँ अपने-अपने दु:खों को समेटकर वे जुदा हो जाते हैं।

उपन्यास में सूखी नदी के स्रोत की तलाश के माध्यम से प्रेम के उस विलुप्त होते स्रोत की तलाश की कोशिश भी बड़ी शिद्दत से दिखाई देती है जिसके ऊपर नफ़रत की दीवार खींच दी गई। उपन्यास में क़िस्सों के भी अनेक स्रोत हैं जो अन्‍त तक पढ़नेवाले का ध्यान नहीं हटने देते।    

—प्रभात रंजन

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2019
Weight
182 grams
ISBN-13
9789388753401
Pages
160
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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