Chhappar
(0)
Author:
Jaiprakash KardamPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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सामाजिक विचार के व्यावहारिक चिन्तक एवं रचनाकार जयप्रकाश कर्दम का यह उपन्यास दलित साहित्य का क्रान्तिधर्मी दस्तावेज़ है। उपन्यास की कथा से गुज़रते हुए महसूस होता है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी संवैधानिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक संरचना के सर्जनात्मक साहित्य की ज़मीन की तलाश ज़रूरी है, ताकि आत्मीय और भावनात्मक प्रसंगों की पृष्ठभूमि में अपनी समझ के तीखे से तीखे सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों के समाधान खोजने का उपक्रम किया जा सके। जयप्रकाश कर्दम ने डॉ. अम्बेडकर के जीवन-दर्शन और विचारों को क्रियान्वित करने के लिए कथानायक चन्दन की सृष्टि की है, जो सदियों से अज्ञान और पिछड़ेपन की गति में पड़े हुए दलित समाज को जगाना चाहता है। वह कॉलेज में पढ़ते हुए भी स्कूल चलाता है और बच्चों को स्वयं पढ़ाता है; क्योंकि वह जानता है कि जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जीतने के लिए शिक्षा सबसे ज़्यादा मारक और शक्तिशाली शस्त्र है।</p> <p>‘छप्पर’ की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है—दलित समाज का वैचारिक आधार पर संगठित होना तथा सामन्ती-ब्राह्मणी शोषण-उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव से मुक्ति के लिए अनथक संघर्ष की प्रेरणा। साथ ही सामाजिक सम्मान की भावना जाग्रत कर स्वाभिमान से जीने की ललक पैदा करना।</p> <p>उपन्यासकार ने शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए सामाजिक क्रान्ति पर ज़ोर दिया है, क्योंकि सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना सामाजिक क्रान्ति अधूरी है और इसके बिना दलित समाज का उत्थान और विकास सम्भव नहीं।
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सामाजिक विचार के व्यावहारिक चिन्तक एवं रचनाकार जयप्रकाश कर्दम का यह उपन्यास दलित साहित्य का क्रान्तिधर्मी दस्तावेज़ है। उपन्यास की कथा से गुज़रते हुए महसूस होता है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी संवैधानिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक संरचना के सर्जनात्मक साहित्य की ज़मीन की तलाश ज़रूरी है, ताकि आत्मीय और भावनात्मक प्रसंगों की पृष्ठभूमि में अपनी समझ के तीखे से तीखे सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों के समाधान खोजने का उपक्रम किया जा सके। जयप्रकाश कर्दम ने डॉ. अम्बेडकर के जीवन-दर्शन और विचारों को क्रियान्वित करने के लिए कथानायक चन्दन की सृष्टि की है, जो सदियों से अज्ञान और पिछड़ेपन की गति में पड़े हुए दलित समाज को जगाना चाहता है। वह कॉलेज में पढ़ते हुए भी स्कूल चलाता है और बच्चों को स्वयं पढ़ाता है; क्योंकि वह जानता है कि जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जीतने के लिए शिक्षा सबसे ज़्यादा मारक और शक्तिशाली शस्त्र है।</p>
<p>‘छप्पर’ की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है—दलित समाज का वैचारिक आधार पर संगठित होना तथा सामन्ती-ब्राह्मणी शोषण-उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव से मुक्ति के लिए अनथक संघर्ष की प्रेरणा। साथ ही सामाजिक सम्मान की भावना जाग्रत कर स्वाभिमान से जीने की ललक पैदा करना।</p>
<p>उपन्यासकार ने शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए सामाजिक क्रान्ति पर ज़ोर दिया है, क्योंकि सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना सामाजिक क्रान्ति अधूरी है और इसके बिना दलित समाज का उत्थान और विकास सम्भव नहीं।
Book Details
-
ISBNChhapparPaperBack
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पद्मिनी नायिकाओं-सी अगाधमना लड़कियाँ जब महानगर के गली-कूचों में जन्मे और अपने मायकों की खटर-पटर से निजात पाने के लिए उस पहले रोमियो को ही ‘हाँ’ कर दें जिसने उन्हें देखकर पहली ‘आह’ भरी तो जीवन मिनी-त्रासदियों का मेगा-सिलसिला बन ही जाता है और उससे निबटने के दो ही तरीक़े बच जाते हैं—पहला, ख़ुद को दो हिस्सों में फाड़ना। जैसे सलवार-कुरते का कपड़ा अलग किया जाता है, वैसे शरीर से मन अलग करना। मन को बौद्ध भिक्षुणियों या भक्त कवयित्रियों की राह भेजकर शरीरेण घर-बाहर के सब दायित्व निभाए चले जाना! दूसरे उपाय में भी बाक़ी दोनों घटक यही रहते हैं पर भक्ति का स्थानापन्न प्रेम हो जाता है—प्रकृति से, जीव-मात्र से, संसार के सब परितप्त जनों से और एक हमदर्द पुरुष से भी जो उन्हें ‘आत्मा का सहचर’ होने का आभास देता है।
स्वयं से बाहर निकलकर ख़ुद को द्रष्टा-भाव में देखना और फिर अपने से या अपनों से मीठी चुटकियाँ लिए चलना भी स्त्री-लेखन की वह बड़ी विशेषता है जिसकी कई बानगियाँ गुच्छा-गुच्छा फूली हुई आपको हर क़दम पर इस उपन्यास में दिखाई देंगी! हर कवि के गद्य में एक विशेष चित्रात्मकता, एक विशेष यति-गति होती है, पर यह उपन्यास प्रमाण है इस बात का कि स्त्री-कवि के गद्य में रुक-रुककर मुहल्ले की हर टहनी के फूल लोढ़ते चली जानेवाली क़स्बाई औरतों की चाल का एक विशेष छंद होता है। अब हिन्दी में स्त्री उपन्यासकारों की एक लम्बी और पुष्ट परम्परा बन गई है। सुजाता का यह उपन्यास उसे एक सुखद समृद्धि देता है और ज़रूरी विस्तार भी।
—अनामिका
Raag Darbari (Deluxe Edition)
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

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Description:
वर्ष 1968 में प्रकाशित 'राग दरबारी' आज भी हिन्दी का 'बेस्ट सेलर' है।
इन पचपन सालों में इस उपन्यास ने हर दिन नए पाठक जोड़े हैं। इस किताब के कारण दुनिया के अनेक भाषाभाषियों ने हिन्दी की रचनात्मकता का लोहा माना।
साहित्य के अलावा अन्य अनुशासनों के अध्येताओं में भी यह उपन्यास अपनी भाषा और समाजशास्त्रीय अहमियत के कारण लोकप्रिय रहा है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हर पीढ़ी का नया पाठक सबसे पहले 'राग दरबारी' पढ़ने की इच्छा रखता है।
यह 'राग दरबारी' का विशेष एवं संग्रहणीय संस्करण है जिसे आप अपनी बुकशेल्फ में जरूर रखना चाहेंगे और अपने प्रियजनों को उपहार में भी देना चाहेंगे।
Saat Paheliyaan
- Author Name:
Rajeev Pundir
- Book Type:

- Description: हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो हमें समझ नहीं आतीं और हमेशा के लिए एक पहेली बनकर हमारे दिल और दिमाग़ के किसी कोने में सुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं । मौका मिलते ही वो फिर से हमारे सामने अपनी बिसात बिछाकर हमें चुनौती देती हैं हल करने के लिए । लेकिन हल फिर भी नहीं निकलता । ऐसी ही कुछ सोती-जागती, हंसती-खेलती, कुछ उदास और कुछ गुमसुम बैठी कहानियों का ये संग्रह आपके सामने प्रस्तुत है – सात पहेलियाँ ।.
Mere Bete Ki Kahani
- Author Name:
Nadine Gordimer
- Book Type:

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Description:
‘नोबेल पुरस्कार’ सम्मानित लेखिका नादिन गोर्डाइमर का उपन्यास ‘मेरे बेटे की कहानी’ दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी, रंगभेदवादी निरंकुश, अमानवीय शासन के निषेध-दर-निषेध की चक्की में पीसे जाते उन 87 प्रतिशत बहुसंख्य कालों, अश्वेतों तथा अन्यवर्णी जनों पर 13 प्रतिशत विशेष सुविधाभोगी गोरों के संवेदनहीन अत्याचार और शोषण-चक्र की स्मृतियाँ जगानेवाली कृति है। यहाँ से गुज़रना अँधेरी सुरंग की कष्टकर किन्तु अनिवार्य यात्रा की तरह है—एक ऐसी लम्बी, काली रात जिसकी कोई सुबह नहीं है। जैसे-जैसे हम पृष्ठ पलटते हैं एक भयानक बेचैनी जकड़ती चलती है, लेकिन हम उससे भाग नहीं सकते। हमारे अन्दर बैठा मनुष्य अपने नियतिचक्र का यह उद्वेलन अपनी हर शिरा में महसूस करना चाहता है—अगले संघर्ष की तैयारी के लिए, जो कहीं, कभी शुरू हो सकता है।
‘मेरे बेटे की कहानी’ एक ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ मनुष्य होने के हर अधिकार को निषेधों और वर्जनाओं के बुलडोज़रों के नीचे कुचल दिया गया है। लेकिन इस दमनचक्र में पीसे जाने के बावजूद संघर्ष जीवित है।
उपन्यास में कथा कई स्तरों पर चलती है। पीड़ा भोगते अधिसंख्य जन, उन्हीं के बीच से उभरकर संघर्ष करनेवाले क्रान्तिबिन्दु किशोर और युवक, जो बड़ी बेरहमी से भून दिए जाते हैं। उनकी क़ब्रों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जुटी भीड़ पर फिर गोलियाँ बरसाई जाती हैं। हर रोज़, हर कहीं यही होता है। कथा का आरम्भ ऐसा आभास कराता है जैसे यह विवाहेतर अवैध काम सम्बन्धों की चटपटी कथा है। ‘दूसरी औरत’ के साथ अपने क्रान्तिकारी पिता को, जो हाल ही में जेल से छूटकर आया है, देखनेवाली किशोर बेटे की आँख इस सन्दर्भ को नए आयाम देती है। एक भयानक, विद्रूपित कंट्रास्ट की क्षणिक आश्वस्ति—और पाठक को लगता है वह क्षण-भर को खुलकर साँस ले सकता है। लेकिन अन्ततः यह किंचित् रोमानी स्थिति भी हमें बेमालूम तौर पर बहुत ऊँचाई से इस संघर्ष के भँवर में फेंक देती है, और हम अन्दर ही अन्दर उतरते चले जाते हैं। स्थितियों का यह प्रतिगामी विचलन एक नए शिल्प के तहत रचना के समग्र प्रभाव को और भी धारदार बना देता है।
Lankeshwar
- Author Name:
Madanmohan Sharma ‘Shahi’
- Book Type:

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Description:
‘लंकेश्वर’ उपन्यास में लेखक ने राम-रावण की कथा को पौराणिक कथाओं, पुराख्यानों तथा विभिन्न रामकथाओं का अध्ययन कर उन्हें मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक विश्लेषणों के माध्यम से उकेरा है। रावण इस बृहद् कथा का केन्द्रीय पात्र है। उपन्यास में रावण को बहुमुखी प्रतिभा का धनी के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक और व्यावहारिक व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है।
तीन खंडों में विभाजित—‘दिग्विजय’ खंड में राक्षसराज रावण के आदर्शों, मानवीय मूल्यों, उसकी विराट सत्ता व धार्मिक सहिष्णुता की, तो ‘वाग्धारा’ खंड में राम के विराट, सहृदय, मर्यादा और त्याग-भरे आदर्श जीवन की व्याख्या है। 'मुक्ति’ खंड में राम-रावण युद्ध है जिसका आधार वैमनस्य नहीं, बल्कि वैचारिक अन्तर्विरोध तथा दो भिन्न संस्कृतियों का आमना-सामना है।
लेखक ने उपन्यास में इस बृहद् कथा के परिवेश को जीवन्त रखने के लिए पौराणिक शब्द-सम्पदा का भरपूर उपयोग किया है तथा एक सुपरिचित कथा को रोचक व पठनीय बनाए रखने में सफलता हासिल की है।
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