Chhattisgarh Ke Vivekanand
(0)
₹
695
556 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
आधुनिक भारतीय मनीषा के अग्रणी उन्नायकों में से एक स्वामी विवेकानन्द विषयक इस पुस्तक का आधार उनके जीवन का वह समय है जो उन्होंने छत्तीसगढ़ की भूमि पर रायपुर में बिताया। उनकी ओजस्वी चेतना के जो स्फुलिंग 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो में विस्फोटक ढंग से दुनिया के सामने आए, उनके कुछ बीज निश्चय ही किशोरावस्था के उन ढाई वर्षों में भी पड़े होंगे जब उन्नीसवीं सदी के छत्तीसगढ़ के अभावों का साक्षात्कार उनके आकार लेते मानस से हुआ होगा।</p> <p>यह आश्चर्यजनक है और दुर्भाग्यपूर्ण भी कि विवेकानन्द के अधिकतर जीवनीकारों ने उनके इस छत्तीसगढ़ प्रवास को अनदेखा किया है। इसलिए ऐसे तथ्य भी सामने नहीं आ सके जिनसे उनके जीवन में 1875 से 1877 के इस कालखंड के महत्त्व को रेखांकित किया जा सके। लेकिन क्या ये सच नहीं है कि व्यक्ति के जीवन में किशोरावस्था के अनुभवों की भूमिका निर्णायक होती है। ज्ञात हो कि विवेकानन्द उस समय 12 वर्ष के थे, जब उनके पिता उन्हें रायपुर लेकर आए और दो वर्ष से ज़्यादा वे यहाँ पर रहे। लोक विश्वास है कि जबलपुर से रायपुर बैलगाड़ी से आते हुए ही उन्हें माँ की गोद में लेटे हुए दिव्य ज्योति के दर्शन हुए थे। यह भी माना जा सकता है कि इसी दौरान उनका परिचय हिन्दी और छत्तीसगढ़ी से हुआ और यहाँ पर उन्हें भारत की ग़ुरबत की वह झलक भी मिली जो उनके व्याकुल चिन्तन का आधार बनी।</p> <p>यह पुस्तक विवेकानन्द के छत्तीसगढ़ से सम्बन्ध के साथ-साथ उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व और वैचारिक सम्पदा को एक जिल्द में समेटने का प्रयास है। विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा लिखे आलेखों के अलावा पुस्तक में विवेकानन्द का चर्चित शिकागो व्याख्यान भी प्रस्तुत किया गया है और कुछ अन्य सामग्री भी जो उन्हें समग्रता में समझने में सहायक होगी।
Read moreAbout the Book
आधुनिक भारतीय मनीषा के अग्रणी उन्नायकों में से एक स्वामी विवेकानन्द विषयक इस पुस्तक का आधार उनके जीवन का वह समय है जो उन्होंने छत्तीसगढ़ की भूमि पर रायपुर में बिताया। उनकी ओजस्वी चेतना के जो स्फुलिंग 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो में विस्फोटक ढंग से दुनिया के सामने आए, उनके कुछ बीज निश्चय ही किशोरावस्था के उन ढाई वर्षों में भी पड़े होंगे जब उन्नीसवीं सदी के छत्तीसगढ़ के अभावों का साक्षात्कार उनके आकार लेते मानस से हुआ होगा।</p>
<p>यह आश्चर्यजनक है और दुर्भाग्यपूर्ण भी कि विवेकानन्द के अधिकतर जीवनीकारों ने उनके इस छत्तीसगढ़ प्रवास को अनदेखा किया है। इसलिए ऐसे तथ्य भी सामने नहीं आ सके जिनसे उनके जीवन में 1875 से 1877 के इस कालखंड के महत्त्व को रेखांकित किया जा सके। लेकिन क्या ये सच नहीं है कि व्यक्ति के जीवन में किशोरावस्था के अनुभवों की भूमिका निर्णायक होती है। ज्ञात हो कि विवेकानन्द उस समय 12 वर्ष के थे, जब उनके पिता उन्हें रायपुर लेकर आए और दो वर्ष से ज़्यादा वे यहाँ पर रहे। लोक विश्वास है कि जबलपुर से रायपुर बैलगाड़ी से आते हुए ही उन्हें माँ की गोद में लेटे हुए दिव्य ज्योति के दर्शन हुए थे। यह भी माना जा सकता है कि इसी दौरान उनका परिचय हिन्दी और छत्तीसगढ़ी से हुआ और यहाँ पर उन्हें भारत की ग़ुरबत की वह झलक भी मिली जो उनके व्याकुल चिन्तन का आधार बनी।</p>
<p>यह पुस्तक विवेकानन्द के छत्तीसगढ़ से सम्बन्ध के साथ-साथ उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व और वैचारिक सम्पदा को एक जिल्द में समेटने का प्रयास है। विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा लिखे आलेखों के अलावा पुस्तक में विवेकानन्द का चर्चित शिकागो व्याख्यान भी प्रस्तुत किया गया है और कुछ अन्य सामग्री भी जो उन्हें समग्रता में समझने में सहायक होगी।
Book Details
-
ISBN9788126727681
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Balgandharva : Aadhunik Marathi Rangmach Ke Ek Mithak Ki Talash
- Author Name:
Abhiram Bhadkamkar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Kadambari
- Author Name:
Banbhatt
- Book Type:

- Description: संस्कृत के प्रख्यात गद्यकार बाणभट्ट सातवीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के समय में हुए। उनकी दो कृतियाँ ‘हर्षचरितम्’ तथा ‘कादम्बरी’ संस्कृत गद्य का अपार वैभव और सौन्दर्य ही नहीं, भारतीय कथा का अद्भुत संसार भी हमारे सामने खोलती हैं। बाणभट्ट की ‘कादम्बरी’ पारम्परिक कथा की विधा को अद्वितीय योगदान भी है और आधुनिक उपन्यास की विधा का एक भारतीय मानक भी प्रस्तुत करती है। इसके औपन्यासिक कलेवर और विस्तार के कारण ही मराठी में उपन्यास के अर्थ में ‘कादम्बरी’ शब्द एक जातिवाचक संज्ञा भी बन गया। प्रस्तुत उपन्यास बाणभट्ट की ‘कादम्बरी’ का एक साहसिक और नवीन रूपान्तर है, जिसे संस्कृत के जाने-माने विद्वान् तथा साहित्यकार राधावल्लभ त्रिपाठी ने रचा है। यह ‘कादम्बरी’ पर आधारित एक मौलिक नई कृति होने के कारण भारतीय कथा के आस्वाद के नए धरातल प्रस्तुत करता है।
Hindu Khatik Jati
- Author Name:
Dr. Bizay Sonkar Shastri
- Book Type:

- Description: "हिंदू खटिक जाति की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन की ऐतिहासिक घटनाओं एवं विभिन्न कालखंडों का इस कृति में सजीव चित्रण है। वैदिक काल के बलि देने वाले खट्टिक (ब्राह्मण) त्रेता युग के पहले भगवान् श्रीराम के कुल के पूर्वज राजा खट्वाग (क्षत्रिय), द्वापर युग यानी महाभारत काल के पूर्व काशी अथवा मिथिलांचल में मांस का व्यवसाय करने वाले ऋषि व्याघ्र (वैश्य) और मुगलकाल में महाराष्ट्र के संत उपासराव एवं ब्रिटिश काल में राजस्थान के संत दुर्बल नाथ (दलित) को अपना पूर्वज मानने वाले हिंदू आज खटिक जाति के लगभग 1871 गोत्रों, उपनामों एवं उपजातियों के रूप में पहचाने जाते हैं। तैमूर लंग के लूटपाट एवं अत्याचार का मुहतोड़ प्रत्युत्तर कठोर राज्य के कठिकों (खटिक) ने दिया था। सिकंदर के विश्व विजय के स्वप्न को भी खटिक जाति ने ही चूर-चूर किया था। विदेशी मुगल, तुर्क एवं मुसलिम आक्रांता शासकों के हिंदू उत्पीड़न तथा हिंदुस्थान में हिंदुओं को हिंदू होने का यानी हिंदू टैक्स अथवा जजिया कर का खुलकर विरोध महान् हिंदू खटिक जाति ने किया था। विदेशी मुसलिम आक्रांताओं के हिंदुस्थान में प्रवेश से लेकर उनके शासन तक लगातार डटकर यदि किसी ने उनका विरोध किया तो खटिक जाति ने किया। अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मेरठ के ‘तितौरिया’ भी खटिक ही थे। सामाजिक समरसता दर्शन की दिशा में चिंतन के लिए बाध्य करती इस कृति से संपूर्ण हिंदू समाज को सकारात्मक चिंतन की एक दिशा प्राप्त होगी।
Jagdish Chandra Mathur Rachanawali : Vol. 1-4
- Author Name:
Jagdish Chandra Mathur
- Book Type:

- Description: जगदीशचन्द्र माथुर सृजनात्मक प्रतिभा के धनी थे। वे 14–15 वर्ष की आयु से ही लिखने लगे थे। नाटककार के रूप में विख्यात माथुर जी ने अपनी विशिष्ट शैली में चरित लेख, ललित निबन्ध और नाट्य–निबन्ध भी लिखे हैं। लेखन में उनकी इतनी रुचि थी कि जिन विभागों में उन्होंने काम किया उनकी समस्याओं के सम्बन्ध में भी बराबर लिखा। उनकी आरम्भिक रचनाएँ उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं—‘चाँद’, ‘भारत’, ‘माधुरी’, ‘सरस्वती’ और ‘रूपाभ’ में छपती थीं। बिहार में शिक्षा सचिव के पद पर काम करते हुए उन्होंने कई सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना की और उनमें गहरी रुचि ली। अपने विचारों और मूल्यों में श्री माथुर ग्रामीण और नागर, लोक और शास्त्रीय संस्कारों व परम्पराओं के समन्वय के पक्षधर थे। इस पक्षधरता का स्वर उनके साहित्य में पूर्णत: मुखर है। उन्होंने अपनी रचनाओं की प्रकृति, रचना–प्रक्रिया और अपने विचारों एवं विश्वासों के बारे में पुस्तकों की भूमिकाओं में बहुत–कुछ लिखा है, जो उनके साहित्य को समझने में सहायक है। प्रस्तुत रचनावली उनके सम्पूर्ण रचनाकर्म को एक स्थान पर समेटने का प्रयास है। जगदीशचन्द्र माथुर रचनावली के इस खंड को चार भागों में बाँटा गया है। इसमें उनके एकांकी तथा दो कठपुतली नाटक संकलित हैं। पहले भाग में ‘मेरे सर्वश्रेष्ठ रंग एकांकी’, दूसरे में उनके दो एकांकी ‘भोर का तारा’ और ‘ओ मेरे सपने’, तथा तीसरे भाग में पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित स्फुट एकांकी हैं, इनमें ‘मेरी बाँसुरी’ और ‘लव–कुश’ जैसी आरम्भिक रचनाएँ हैं। चौथे व अन्तिम भाग में ‘कुँवर सिंह की टेक’ और ‘गगन सवारी’ दो कठपुतली नाटकों को रखा गया है।
Mataa-E-Dard
- Author Name:
Razia Fasih Ahamad
- Book Type:

-
Description:
‘मता-ए-दर्द’, यानी पीड़ा की पूँजी, जो उसके खाते में जमा होना शुरू हुई तो फिर बढ़ती ही चली गई। ख़ुशी के कुछ पल जो तय थे, वे ज़िन्दगी की शुरुआत में ही ख़र्च हो गए, जब उसने पहले प्यार का पहला सपना देखा था। जल्दी ही वह सपना टूटा और नासूर बनकर रूह के क़रीब बैठ गया। फिर प्यार उसके लिए प्यार न रहा, या तो उस नासूर को ढकने के लिए मरहम बना या वक़्तन-ब-वक़्तन उससे फूटनेवाली ठंडी आग की पलट, जिसका मक़सद मर्दों को अगर झुलसा देना नहीं तो सुलगाकर छोड़ देना ज़रूरी था। फिर भी यह उसकी जीत हरगिज़ न थी, दिल के हाथों वह बार-बार मजबूर हुई, अपने ऊपर से क़ाबू खो बैठी, और फिर पीड़ा की अपनी पूँजी समेटने में जुट गई। जहाँ यह उपन्यास ख़त्म होता है, वहाँ भी वह एक दोराहे पर ही खड़ी है।
पाकिस्तान की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह उपन्यास स्त्री को लेकर लिखी जानेवाली उन फ़ार्मूलाबद्ध कथाओं में से नहीं है जिसमें लेखक अपनी वैचारिक मान्यताओं को अपने पात्रों के ऊपर थोप देते हैं। यहाँ एक स्त्री है जो अपनी स्वाभाविक गति में बनती हुई अपनी ऊँचाई की तरफ़ बढ़ रही है। वह समझौते करती है, प्रतिकार करती है, हताश होती है, लेकिन अपनी ज़िन्दगी में जो ख़ूबसूरत है, महसूस करने लायक़ है, उसके प्रति आँखें बन्द नहीं करती।
Dhara Ankurai
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description: प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत की उपन्यास-त्रयी का अन्तिम भाग 'धरा अँकुराई' एक बहुआयामी कथानक को जीवन की सच्चाइयों तक पहुँचाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ और ‘बरखा रचाई’ शीर्षक से त्रयी के दो भाग पूर्व में प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। अनेक विवरणों, वृत्तान्तों, परिस्थितियों और अन्त:संघर्षों से गुज़रती यह कथा-यात्रा ‘जीवन के अर्थ’ का आईना बन जाती है। एक दीगर प्रसंग में आया वाक्य है, ‘...यह यात्रा संसार के हर आदमी को जीवन में एक बार तो करनी ही चाहिए।’ यह अन्त:यात्रा है। इससे व्यक्ति जहाँ पहुँचता है, वहाँ एक प्रश्न गूँज रहा है कि आख़िर इस जीवन की सार्थकता व प्रासंगिकता क्या है? उपन्यास-त्रयी के तीन प्रमुख पात्रों में से एक सैयद साजिद अली, जिन्होंने पत्रकारिता की कामयाब ज़िन्दगी जी है, महसूस करते हैं कि उनके भीतर एक ख़ालीपन फैलता जा रहा है। लगता है कि अब तक जिया सब बेमक़सद रहा। सैयद साजिद अली ‘ज़िन्दगी का अर्थ’ समझने के लिए उसी छोटी-सी जगह लौटते हैं, जहाँ से निकलकर वे जाने कहाँ-कहाँ गए थे। उपन्यासकार ने छोटी-छोटी घटनाओं के ज़रिए व्यक्ति और समाज की कशमकश को शब्द दिए हैं। प्रवाहपूर्ण भाषा ने पठनीयता में इज़ाफ़ा किया है। मौक़े-ब-मौक़े उपन्यास में वर्तमान की समीक्षा भी है, ‘‘जनता का पैसा किसी का पैसा नहीं है। यह माले-मुफ़्त है जो हमारे देश में बेदर्दी से बहाया जाता है और इसकी बारिश में अफ़सर, नेता और ठेकेदार नहाते हैं। हमने लोकतंत्र के साथ-साथ ‘विकास’ का भी एक विरला स्वरूप विकसित किया है जो कम ही देशों में देखने को मिलेगा। एक पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास।
The Scarlet Letter
- Author Name:
Nathaniel Hawthorne
- Book Type:

- Description: “No man, for any considerable period, can wear one face to himself, and another to the multitude, without finally getting bewildered as to which may be the true…” - Nathaniel Hawthorne, The Scarlet Letter The Scarlet Letter is a historical fiction, first published in 1850 by American author Nathaniel Hawthorne. It is considered his "masterwork". Set in 17th-century Puritan Massachusetts Bay Colony, during the years 1642 to 1649, it tells the story of a “fallen” woman, her vengeful and incognito husband, and a charismatic young minister harbouring a terrible secret. The female protagonist, Hester Prynne, conceives a daughter through an affair and is publicly shamed for adultery. She wears the titular red “A” on her breast, marking her as an adulteress. In her arms she bears Pearl, the daughter born of sin. The book explores the theme of sin, repentance, dignity, honour and courage.
Odisha Ki Lokkathayen
- Author Name:
Dr. Shankar Lal Purohit
- Book Type:

- Description: ओड़ीशा की कला, साहित्य और संस्कृति में शास्त्रीय (वैदिक परंपरा) देव श्रीजगन्नाथजी के तत्त्व और कथानक भी जुड़े हैं। श्रीजगन्नाथ के लोकतात्त्विक स्वरूप से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। ओड़ीशा में राज-परिवारों का शासन रहा है। अतः लोकजीवन उनसे पर्याप्त रूप में जुड़ा रहा है। कुछ अंशों को छोड़ दें तो इस लोकजीवन में राजघरानों या राज परिवारों का अत्यंत उत्कृष्ट रूप मिलता है। वे समृद्ध करते हैं, उन्हें सताते नहीं। वैसे वाणिज्य और व्यवसायी वर्ग भी अत्यंत उज्ज्वल रूप में रहे हैं। विदेशी वाणिज्य से उत्कल की समृद्धि संभव हुई। जीवन का यह अभिन्न अंग भी रहा है। इन लोककथाओं में उनका चरित्र उभरकर आ रहा है। उत्कल की लोककथाओं का भंडार विराट् है। उसके एक बहुत छोटे से अंश का संकलन यहाँ प्रस्तुत है, जिससे ओड़ीशा की समृद्ध लोकसंस्कृति और लोकजीवन की झाँकी मिल पाएगी।
Narvanar
- Author Name:
Sharankumar Limbale
- Book Type:

-
Description:
‘नरवानर’ 1956 से 1996 तक के समय पर आधारित यह उपन्यास दरअसल आत्मचिन्तन है। दलित-विमर्श के संवेदनशील विस्फोटक सन्दर्भ का एक साहित्यिक विश्लेषण। लेखक के अनुसार इस आत्मचिंतन या विश्लेषण के मूल में हैं कुछ स्मृतियाँ, कुछ बहसें, कुछ समाचार, कुछ साहित्य-पाठ, समाज की गतिविधियाँ और उनसे उत्पन्न प्रतिक्रियाएँ, बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार और व्यभिचार की ओर उन्मुख दैनंदिन नैतिकता, दंगे और हिंसा, राजनीति का अपराधीकरण, अपराधियों को प्राप्त प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय नेतृत्व का भ्रष्टाचार, बढ़ती हुई बेरोज़गारी, महँगाई, ग़रीबी और आबादी।
लेकिन मराठी में ‘उपल्या’ नाम से प्रकाशित और चर्चित इस उपन्यास की केन्द्रीय चिन्ता समकालीन दलित आन्दोलन है। पहले अध्याय में एक सनातनी ब्राह्मण परिवार के दलितीकरण का चित्रण है तो तीसरे अध्याय में एक ब्राह्मण परिवार की ही बेटी एक दलित से विवाह करके नया जीवन शुरू करती है। बाकी दो अध्यायों में दलित आन्दोलन के उभार, संघर्ष और विखंडन पर दृष्टिपात किया गया है।
कहना न होगा कि हिन्दी और मराठी में समान रूप से लोकप्रिय लेखक शरणकुमार लिंबाले का यह उपन्यास समकालीन दलित विमर्श के सन्दर्भ में एक ज़रूरी पुस्तक है।
Paon Ka Sanichar
- Author Name:
Akhilesh Mishra
- Book Type:

-
Description:
अपने समय के चर्चित पत्रकार और लेखक अखिलेश मिश्र के इस पहले उपन्यास में आज़ादी से पूर्व के उत्तर भारत के ग्रामीण परिवेश के सौहार्दपूर्ण सामाजिक जीवन का जीवन्त चित्रण हुआ है।
बटोहियों की बतकही के अद् भुत कथारस से आप्लावित यह आख्यान ग्रामीण जीवन के कई अनछुए पहलुओं से साक्षात्कार कराता है।
इसमें एक बच्चे के युवा होने तक के जीवनानुभव की कथा के माध्यम से देश-काल के हरेक छोटे-बड़े विडम्बनापूर्ण क्रिया-व्यवहारों, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों पर मारक व्यंग्य किया गया है। पूरा उपन्यास इस विद्रोही ‘जनमदागी’ नायक की शरारतों (और शरारतें भी कैसी-कैसी—नुसरत की नानी की अँगनई में बैठकर चोटइया काट डालने, छुआछूत नहीं मानने की ज़िद में नीच जाति से रोटी लेकर खाने, उसी की गगरी से पानी पीने, गुलेल से निशाना साधने, तालाब में तैरने आदि की पूरी कथा) से भरा पड़ा है। यही विद्रोही मानसिकता आगे चलकर धार्मिक कर्मकांडों और अंग्रेज़ों की सत्ता के विरुद्ध संघर्ष में तब्दील हो जाती है।
इसमें तत्कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति-नियति का जिस संवेदनापूर्ण ढंग से चित्रण हुआ है और उस स्थिति के ख़िलाफ़ लेखकीय व्यंग्य की त्वरा जिस रूप में उभरकर सामने आई है, वह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस उपन्यास को विरल कथ्य के साथ-साथ शैली लाघव और कहन की भंगिमा के लिए भी लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।
Bachpan
- Author Name:
Leo Tolstoy
- Book Type:

-
Description:
तोल्स्तोय विश्व-स्तर पर पढ़े जाने वाले रूसी लेखक हैं। वे दुनिया के उन कुछ लेखकों में शामिल है, जिन्हें हर भाषा और हर देश में अपना मानकर पढ़ा जाता है, जो सम्पूर्ण मानवता की सम्पत्ति हैं।
यह छोटा-सा उपन्यास उनकी आरम्भिक रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु के बाद के कुछ वर्षों का वर्णन किया है। इसकी रचना उन्होंने तब की थी जब वे सत्ताईस वर्ष के थे। इस आत्मकथात्मक रचना में उन्होंने बालपन की सादगी, भोलेपन और दैनन्दिन जीवन की नाटकीयता को ख़ासतौर पर पकड़ा है। वय:संधि के मोड़ पर खड़े एक किशोर के मन की उथल-पुथल भी इसमें अभिव्यक्त हुई है और एक लेखक के रूप में तोल्स्तोय की प्रतिभा की संभावनाएँ भी उनकी इस रचना में सामने आई थीं जिन्हें उस समय के लेखकों ने विशिष्ट माना था।
निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
Marichika
- Author Name:
Gyan Chaturvedi
- Book Type:

-
Description:
‘नरकयात्रा’ और ‘बारामासी’ के बाद ‘मरीचिका’ हमें नितांत नए ज्ञान चतुर्वेदी से परिचित कराता है।
इस पौराणिक फैंटेसी में वे भाषा, शैली, कथन तथा कहन के स्तर पर एकदम निराली तथा नई ज़मीन पर खड़े दीखते हैं। यहाँ वे व्यंग्य को एक सार्वभौमिक चिंता में तब्दील करते हुए ‘पादुकाराज’ के मेटाफर के माध्यम से समकालीन भारतीय आमजन और दरिद्र समाज की व्यथा-कथा को अपने बेजोड़ व्यंग्यात्मक लहजे में कुछ इस प्रकार कहते हैं कि पाठक के समक्ष निरंकुश सत्ता का भ्रष्ट तथा जनविरोधी तंत्र, राजकवि तथा राज्याश्रयी आश्रमों के रूप में सत्ता से जुड़े भोगवादी बुद्धिजीवी और पादुकामंत्री, सेनापति-पादुका राजसभा आदि के ज़रिए तथाकथित श्रेष्ठिजनों के बीच जारी सत्ता-संघर्ष का मायावी परंतु भयानक सत्य–सब कुछ अपनी संपूर्ण नग्नता में निरावृत हो जाता है। ‘पादुकाराज’, ‘अयोध्या’ तथा ‘रामराज’ के बहाने ज्ञान चतुर्वेदी मात्र सत्ता के खेल और उसके चालाक कारकों का ही व्यंग्यात्मक विश्लेषण नहीं करते हैं, वे मूलतः इस क्रूर खेल में फँसे भारतीय दरिद्र प्रजा के मन में रचे-बसे उस यूटोपिया की भी बेहद निर्मम पड़ताल करते हैं, जो उस ‘रामराज’ के स्थापित होने के भ्रम में ‘पादुका-राज’ को सहन करती रहती है, जो सदैव ही मरीचिका बनकर उसके सपनों को छलता रहा है।
स्वर्ग तथा देवता की एक समांतर कथा भी उपन्यास में चलती रहती है, जो भारत के आला अफ़सरों की समांतर परन्तु मानो धरती से अलग ही बसी दुनिया पर बेजोड़ टिप्पणी बन गई है। आधुनिक भारत के इन ‘देवताओं’ का यह स्वर्ग ज्ञान के चुस्त फिकरों, अद्भुत विट और निर्मल हास्य के प्रसंगों के जरिए पाठकों के समक्ष ऐसा अवतरित होता है कि वह एक साथ ही वितृष्णा भी उत्पन्न करता है और करुणा भी। और शायद क्रोध भी।
हिन्दी में फैंटेसी गिनी-चुनी ही है। विशेष तौर पर हिन्दी व्यंग्य में पौराणिक फैंटेसी जो लिखी भी गई है, वे प्रायः फूहड़ तथा सतही निर्वाह में भटक गई हैं। इस लिहाज से भी ‘मरीचिका’ एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है।
A Rogue's Love Diary
- Author Name:
Krish Gangadharan
- Book Type:

- Description: Staring at more than ten years of prison time for attempted manslaughter, Dr Chandran Ramachandran’s life was all but finished. At least, the victim and the witnesses were sure about that. They hoped that the monster would get beaten up by the prison inmates and die in there, like the street mongrel that he was. Chandru was doing himself no favours by choosing to remain silent in court. Awaiting his sentence, he reflected on the verses of Kahlil Gibran: “The river cannot go back. Nobody can go back. To go back is impossible in existence. ” The son of docile, orthodox, middle-class parents, and the grandson of a holy priest, Chandru did not lead the life that was expected of him, nor was he meant for the end that loomed large. Sixteen years ago, he was a University topper, a champion chess player, an expert swimmer, and a Bravery Award recipient. But all that had been frittered away in hurt, grief, anger, jealousy, and debauchery. A spurned love had turned him into a selfish, deceitful, immoral and ruthless rogue. He connived his way to money, success, sex, and a marriage, only to lose everything in his chosen path of self-destruction. But every loss is a harbinger of a gain, and Chandru was redeemed by the grace of the divine. Yet, the paths to redemption are seldom smooth. The demons from the past return to haunt Chandru. What if everything he had believed turned out to be lies? What if the truths that were buried are more dangerous than the lies that had ruined him? What if it all unravels? Will Chandru be able to save those who love him? Will Chandru unleash the rogue in him, one last time, for love? In the ending, will the beginning lie? Join the rogue in his incredible journey of love, guilt, deviousness, duplicity, and unbridled perversion as it unveils in the pages of his stolen diary – A Rogue’s Love Diary.
Where Has My Gulla Gone
- Author Name:
Padma Sachdev
- Book Type:

- Description: No Description Available for this Book
Mahapath
- Author Name:
Sudhakar Adeeb
- Book Type:

- Description: आदि शंकराचार्य अपने युग की महानतम विभूति थे। यह उपन्यास 'महापथ' उन्हीं के असाधारण, अद्वितीय चरित्र और कृतित्व पर आधारित है। शंकराचार्य के बारे में यह प्रसिद्ध है कि मात्र आठ वर्ष की आयु में उन्होंने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया। बारह वर्ष तक सर्व शास्त्रवेत्ता बन गए। सोलह वर्ष में उन्होंने भाष्य रचना कर डाली और बत्तीस वर्ष की आयु में उनका महाप्रयाण हुआ। उनके अनेक अनुयायी उन्हें शिव का अवतार भी मानते हैं। यह उपन्यास तथ्यों के साथ रेखांकित करता है कि शंकराचार्य के सबसे प्रबल विरोधी प्रायः बौद्ध थे जो वैदिक धर्म के समस्त रूपों का विरोध करते थे। जबकि बौद्धधर्म का सार तत्त्वतः वेदान्त दर्शन से भिन्न नहीं है। ऐसे में आचार्य शंकर ने अपनी दिव्य वाग्मिता से बौद्धों और अन्य वेद-विरोधी सम्प्रदायों के लोगों को जिस तरह पराभूत किया, वह एक मिसाल है। अद्वैत वेदान्त की महिमा और श्रेष्ठता प्रतिष्ठापित कर देने के बाद आचार्य शंकर ने भारत की चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किए। उत्तर में हिमालय बदरिकाश्रम में ज्योतिर्मठ, दक्षिण में कर्नाटक राज्य के अन्तर्गत शृंगेरी मठ, पश्चिम में द्वारका में शारदा मठ और पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन मठ। आज भी उनके स्थापित ये मठ वैदिक विद्या के केन्द्र हैं जिनका मनोरम वर्णन इस उपन्यास में किया गया है। आचार्य शंकर के काल-निर्धारण में काफ़ी मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उन्हें सातवीं या आठवीं शताब्दी का व्यक्तित्व मानते हैं लेकिन लेखक ने अपने अन्वेषण के आधार पर प्रस्तावित किया है कि आद्य शंकराचार्य का जन्म आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ था। यह उपन्यास जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के जीवन के तमाम आयामों से गुज़रते उनकी धर्म-दिग्विजय यात्रा को जिस तरह विस्तार एवं रोचकता के साथ प्रस्तुत करता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
Choti Ki Pakar
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी कथा-साहित्य की यथार्थवादी परम्परा में निराला की कथाकृतियों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी प्रायः हर कथाकृति का परिवेश सामाजिक यथार्थ से अनुप्राणित है। यही कारण है कि उनके कतिपय ऐतिहासिक पात्रों को भी हम एक सुस्पष्ट सामाजिक भूमिका में देखते हैं।
‘चोटी की पकड़’ यद्यपि ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इतिहास के खँडहर इसमें पूरी तरह मौजूद हैं। इन्हीं खँडहरों के बीच नया इतिहास लिखा जा रहा है। बदलते समाज में टूटने और जुड़ने की प्रक्रिया चल रही है। स्वाधीनता की देवी जनता के हाथों अभिषिक्त होने जा रही है। स्वदेशी आन्दोलन की अनुगूँजें हर ओर सुनाई पड़ रही हैं, जिससे कुछ राजा और सामन्त भी उसका समर्थन करने को विवश हैं। लेकिन इस कथा-परिवेश में जितने भी चरित्र हैं, उनमें एक मुन्ना बाँदी भी है। अविस्मरणीय चरित्र है यह, जिसे निराला ने गहरी सहानुभूति से गढ़ा है।
Its My Love Story
- Author Name:
Ajitabha Bose
- Rating:
- Book Type:

- Description: India's most popular pocket book writer brings to you his first novel. It's a story inspired from real life incidents. A story based on the college life of 6 friends. It's a love story of Aditya and janvi. Aditya is from Jamshedpur and moves to Delhi for his graduation. He aspires to become a successful filmmaker. Janvi is a delhiite and loves travelling. She dreams to settle in Italy someday. Life takes a different turn when love brought them together. What lies ahead? Where will destiny lead them? Bestselling author ajitabha Bose brings to you another heartwarming tale of love, friendship and dreams.
Ration Card Ka Dukh
- Author Name:
Jugnu Shardey
- Book Type:

- Description: "एक युग से आँसुओं, नारों, माँगों और फोटू कमेटी की बरसात हो रही थी। कल गरमी के बावजूद संसद् के एयरकंडीशन से कलेजे में ठंडक लिये वैसे ही मुसकराई देश की संसदीय महिलाएँ, जैसे कभी मुसकराती थीं टूथपेस्ट बेचनेवाली महिलाएँ। आखिर पेश हो गया राज्यसभा में संविधान संशोधन 108वाँ विधेयक। इसमें संसद् और विधानसभा में आबादी के 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत रिजर्वेशन मिल सकेगा। चाणक्य कहते हैं, कहते हैं या नहीं पता नहीं, क्योंकि स्तंभकार ने चाणक्य का अर्थशास्त्र नहीं पढ़ा है, लेकिन छोटी बात को बड़ी बनाने के लिए बड़े लोगों का नाम लेना चाहिए। इसीलिए चाणक्य कहते हैं कि कुछ भी लिखने के पहले सोचसमझ लेना चाहिए। सोचसमझ के लेखन का मतलब होता है कि लिखने के पहले सोचा ही न जाए। जन्म बीत जाए सोचतेसोचते। लेखन तो बस साप्ताहिक मुद्रास्फीति लेखन है कि बस प्रतिशत बढ़ाते या घटाते जाना लिखना भर होता है। फिर भी इस स्तंभकार ने बाकायदा खोजबीन की। ब्रेकिंगन्यूज के बकवासी खतरों और टीवीयाना बहसों की सिरदर्द के बावजूद खबरिया चैनलों को देख गया। रंगीन विज्ञापनों से भरे अगरमगरलेकिनपरंतु वाले प्रिंट मीडिया को पढ़कर चश्मे का नंबर बढ़ गया। इंटरनेटीय सर्च इंजनों को झाँक गया, जहाँ एक विषय पर लाखों भड़ासी जानकारियाँ होती हैं। तब जाकर समझ में आया कि शोधअनुसंधान के लिए विषय का होना जरूरी होता है। अब तक सारी खोजबीन बिना विषय के हो रही थी। विषय भी तय कर लिया गया—देश और गांधीजी के तीन बंदर का व्यावहारिक संबंध।"
Rays & Ripples
- Author Name:
Carlos Luis
- Book Type:

- Description: When was the last time you spoke to nature, as our forefathers did? Receiving thus graces in abundance from it. When was the last time you helped your neighbour in need or was a Ray of hope? Consequently, turn yourself into a good Samaritan, spreading ripples of your goodness and love to people around you. This book assures you a ride through a dialogue with nature, motivating you to be a friend and inspiring you to love unconditionally. This collection entertains one while also giving a hint to a better living through poems and short stories.
Bheemcharit Mahakavya
- Author Name:
Shailesh Bharati
- Book Type:

- Description: भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजीराव अंबेडकर, जिन्हें आज लोग श्रद्धा से बाबा साहब कहकर पुकारते हैं। उनका व्यक्तित्व इतना वृहद् और बहुआयामी है, जिसका विस्तार आकाश के समान विस्तृत और समुद्र की भाँति गहन है। उनके विषय में लिखना बड़ा दुष्कर कार्य है, जिसने युग के प्रवाह को मोड़ दिया, रूढिय़ों को तोड़ दिया और जब हिंदू धर्म में कोई सुधार न हुआ तो हिंदू धर्म ही छोड़ दिया। देवी, देवता, ऋषि-मुनि, महात्मा, शंकराचार्य आदि यहाँ तक कि अवतार भी शूद्र को समता तो क्या मानवता का दर्जा भी न दिला सके, उन्हें डॉ. भीमराव ने पूर्ण मानवता का दर्जा ही नहीं दिलाया अपितु समता का अधिकार भी दिलाया। इतनी महान् विभूति के बारे में लिख पाना मेरे सामथ्र्य के बाहर है, फिर भी मैंने उन पर लिखने का प्रयास किया है, क्योंकि अभी तक बाबा साहब पर जो भी लिखा गया है, भले ही वह हिंदी, मराठी, अंग्रेजी अथवा अन्य किसी भारतीय भाषा में लिखा गया हो, वह सबका सब गद्य में लिखा गया है। किंतु मैंने सर्वप्रथम उनके संपूर्ण संघर्षमय जीवन को ‘भीमचरित महाकाव्य’ शीर्षक के अंतर्गत काव्यबद्ध करने का प्रयास किया है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book