Socha Na Tha
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सोचा न था उदासी, ऊब, सपनों और सपनों के नामालूम ढंग से टूट जाने की कहानी है। इस उपन्यास में लेखिका ने एक अत्यन्त सामान्य कथानक के भीतर छिपी असामान्य उत्सुकताओं की खोज की है। माया, जो इस उपन्यास की मुख्य चरित्र है, देखती आँखों उसकी ज़िन्दगी में किसी तरह का कोई अभाव नहीं, कोई दु:ख नहीं—सुन्दर, सुशिक्षित। कलकत्ता जैसे महानगर से बम्बई जैसे महानगर में आई एक संस्कारवान बांग्ला बहू। एक आधुनिक गृहिणी। रंजन मलिक जैसे अमेरिका-पलट बैंक अधिकारी की बीवी। फिर भी माया के दाम्पत्य जीवन में वह कौन-सी कमी थी, जिसे पूरा करने के लिए वह निखिल जैसे युवक की ओर आकर्षित होती है?</p> <p>अंग्रेज़ी की बहुचर्चित कथाकार शोभा डे अपने इस उपन्यास में स्त्री-जीवन के इसी प्रश्न को उठाती हैं। दाम्पत्य सम्बन्धों के व्यावहारिक पहलुओं और उसकी छोटी-बड़ी बारीकियों को खोलते हुए वे उक्त प्रश्न के सम्भावित उत्तर को भी संकेतित करती हैं। स्पष्टतया कहा जाए तो पति-पत्नी का सम्बन्ध मात्र सामाजिक, औपचारिक ही नहीं, वह एक गहन भावनात्मक और आत्मिक ज़िम्मेदारी भी है। इसका अभाव एक स्त्री को भटकाव का अवसर ही नहीं, तर्क भी देता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तर्क को सामने रखते हुए शोभा डे न तो नारी-मनोविज्ञान को अनदेखा करती हैं और न ही हमारे मध्यवर्गीय ढोंग तथा महत्त्वाकांक्षाओं को। ऐसे में स्त्री हो या पुरुष, उसका पाना और खोना जैसे एक-दूसरे का पर्याय बन जाता है।</p> <p>अपने कथ्य के साथ जीते हुए एक सिद्धहस्त रचनाकार अपने चरित्रों का अंकन किस कुशलता से करता है, यह देखने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना अनिवार्य है। छोटे-छोटे, हाशिये पर रहनेवाले पात्र भी आपको कहानी के भूगोल में अपने पूरे स्वायत्त व्यक्तित्व के साथ खड़े मिलेंगे।</p> <p>
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सोचा न था उदासी, ऊब, सपनों और सपनों के नामालूम ढंग से टूट जाने की कहानी है। इस उपन्यास में लेखिका ने एक अत्यन्त सामान्य कथानक के भीतर छिपी असामान्य उत्सुकताओं की खोज की है। माया, जो इस उपन्यास की मुख्य चरित्र है, देखती आँखों उसकी ज़िन्दगी में किसी तरह का कोई अभाव नहीं, कोई दु:ख नहीं—सुन्दर, सुशिक्षित। कलकत्ता जैसे महानगर से बम्बई जैसे महानगर में आई एक संस्कारवान बांग्ला बहू। एक आधुनिक गृहिणी। रंजन मलिक जैसे अमेरिका-पलट बैंक अधिकारी की बीवी। फिर भी माया के दाम्पत्य जीवन में वह कौन-सी कमी थी, जिसे पूरा करने के लिए वह निखिल जैसे युवक की ओर आकर्षित होती है?</p>
<p>अंग्रेज़ी की बहुचर्चित कथाकार शोभा डे अपने इस उपन्यास में स्त्री-जीवन के इसी प्रश्न को उठाती हैं। दाम्पत्य सम्बन्धों के व्यावहारिक पहलुओं और उसकी छोटी-बड़ी बारीकियों को खोलते हुए वे उक्त प्रश्न के सम्भावित उत्तर को भी संकेतित करती हैं। स्पष्टतया कहा जाए तो पति-पत्नी का सम्बन्ध मात्र सामाजिक, औपचारिक ही नहीं, वह एक गहन भावनात्मक और आत्मिक ज़िम्मेदारी भी है। इसका अभाव एक स्त्री को भटकाव का अवसर ही नहीं, तर्क भी देता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तर्क को सामने रखते हुए शोभा डे न तो नारी-मनोविज्ञान को अनदेखा करती हैं और न ही हमारे मध्यवर्गीय ढोंग तथा महत्त्वाकांक्षाओं को। ऐसे में स्त्री हो या पुरुष, उसका पाना और खोना जैसे एक-दूसरे का पर्याय बन जाता है।</p>
<p>अपने कथ्य के साथ जीते हुए एक सिद्धहस्त रचनाकार अपने चरित्रों का अंकन किस कुशलता से करता है, यह देखने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना अनिवार्य है। छोटे-छोटे, हाशिये पर रहनेवाले पात्र भी आपको कहानी के भूगोल में अपने पूरे स्वायत्त व्यक्तित्व के साथ खड़े मिलेंगे।</p>
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Book Details
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ISBN9788126725137
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Pages276
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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मन के भीतर जया और ज़ेहरा की छवियाँ लिये लेखक अपने मार्ग में साधुओं, नाविकों, इंजीनियरों, स्थानीय पत्रकारों, तवायफ़ों और दलालों से रू-ब-रू होता चलता है। काव्यात्मक गद्य और श्रेष्ठ पत्रकारिता के सहज संयोग का प्रतिफल यह पाठ उपन्यास भी है, आत्मकथात्मक यात्रावृत्त भी और रिपोर्ताज भी।
Mrityoramamritam Gamya
- Author Name:
Renu Rajvanshi Gupta
- Book Type:

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Kunto
- Author Name:
Bhisham Sahni
- Book Type:

- Description: भीष्म साहनी का यह उपन्यास ऐसे कालखंड की कहानी कहता है जब लगने लगा था कि हम इतिहास के किसी निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं, जब करवटें लेती ज़िन्दगी एक दिशा विशेष की ओर बढ़ती जान पड़ने लगी थी। आपसी रिश्ते, सामाजिक सरोकार, घटना-प्रवाह के उतार-चढ़ाव उपन्यास के विस्तृत फ़लक पर उसी कालखंड के जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं। केन्द्र में जयदेव-कुंतो-सुषमा-गिरीश के आपसी सन्बन्ध हैं—अपनी उत्कट भावनाओं और आशाओं-अपेक्षाओं को लिए हुए। लेकिन कुंतो-जयदेव और सुषमा-गिरीश के अन्तर सम्बन्धों के आस-पास जीवन के अनेक अन्य प्रसंग और पात्र उभरकर आते हैं। इनमें हैं प्रोफ़ेस्साब जो एक सन्तुलित जीवन को आदर्श मानते हैं और इसी ‘सुनहरी मध्यम मार्ग’ के अनुरूप जीवन को ढालने की सीख देते हैं; हीरालाल है जो मनादी करके अपनी जीविका कमाता है, पर उत्कट भावनाओं से उद्वेलित होकर मात्र मनादी करने पर ही संतुष्ट नहीं रह पाता; हीरालाल की विधवा माँ और युवा घरवाली हैं; सात वर्ष के बाद विदेश से लौटा धनराज और उसकी पत्नी हैं; सहदेव है। ऐसे अनेक पात्र उपन्यास के फ़लक पर अपनी भूमिका निभाते हुए, अपने भाग्य की कहानी कहते हुए प्रकट और लुप्त होते हैं। और रिश्तों और घटनाओं का यह ताना-बाना उन देशव्यापी लहरों और आन्दोलनों की पृष्ठभूमि के सामने होता है, जब लगता था कि हमारा देश इतिहास के किसी मोड़ पर खड़ा है।
Gora
- Author Name:
Rabindranath Thakur
- Rating:
- Book Type:

- Description: English Translation of Rabindranath Tagore's Bengali novel Gora. Gora consists of two parallel love stories of two pairs of lovers: Gora and Sucharita, Binoy and Lolita. Their emotional development is shown in the background of the social and political problems prevalent in India towards the end of the 19th-century. The novel is the longest novel written by Tagore. It deeply influences the Indian society and emerged as a debate between Brahmo Samaj and Hinduism.
Angoor
- Author Name:
Gulzar
- Book Type:

- Description: साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फ़ॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयान अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है। मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इजाफ़ा हो गया है। यह बेहद लोकप्रिय कॉमेडी ‘अंगूर’ का मंज़रनामा है। दो जुड़वाँ जोड़ियों के बीच बुनी घटनाओं की यह कहानी आज भी दर्शकों को उतना ही लुभाती है जितना अपने समय में लुभाती थी। शेक्सपीयर के नाटक ‘द कॉमेडी ऑफ़ एरर्स’ से प्रेरित इस फ़िल्म ने स्वस्थ और चुटीले हास्य का एक मानक फ़िल्म-उद्योग के सामने रखा था। विश्वास है, पुस्तक के रूप में इस फ़िल्म की यह प्रस्तुति पाठकों की स्मृति में रचे चित्रों को पुनः गतिमान करेगी और साथ ही एक उपन्यास का आनन्द भी देगी।
Voh Apana Chehra
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

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Description:
क़रीब-क़रीब अमानवीय और जड़ होता जाता संसार गोविन्द मिश्र के लेखन की मुख्य चिन्ताओं में से है। जहाँ वे एक परिवेश का केवल भीतरी-बाहरी कच्चा चिट्ठा-भर प्रस्तुत करते हैं, वहाँ भी सर्जनात्मक व्यथा मानवीयता और मूल्यों के न होने की ही होती है। गोविन्द मिश्र के लेखन का मूल स्वर सकारात्मक है जो उनकी रचनाओं में उत्तरोत्तर साफ़ होता चला गया है।
'वह अपना चेहरा’ एक तलाश है जो चेहरों से शुरू होकर जीवन-पद्धति एवं मान्यताओं से होती हुई नैतिकता और मूल्यों तक जाती है। नौकरशाही का परिवेश, दफ़्तरी मानसिकता, फ़ाइलों-इमारतों की दुनिया यहाँ एक ऐसे तनाव के माध्यम से उभारे गए हैं जो जितना उग्र है, उतना ही फ़िज़ूल—लालफीताशाही के अपने स्वभाव की तरह। यहाँ चेहरे भी फ़ाइलों की तरह घूम रहे हैं, 'अपना’ चेहरा 'वह’ हो जाता है, वही जिसके ख़िलाफ़ उसकी लड़ाई थी। चरित्रों की गहरी पकड़, कलात्मकता और भाषा का एक अपने ढंग का खुरदुरापन इस उपन्यास को विशिष्ट बनाते हैं।
Chintaghar
- Author Name:
Yashwant Vyas
- Book Type:

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Description:
‘चिन्ताघर’ कथा–साहित्य में ताज़गी-भरा सशक्त और सन्तुलित प्रयोग है। कथा–लेखन
में और व्यंग्य–लेखन में हमारे यहाँ जो कुछेक ऊबाऊ रूढ़ियाँ बन रही हैं, लेखक उनसे सर्वथा दूर है।
यशवंत व्यास शब्दों का सधा हुआ मितव्ययी प्रयोग करते हैं और ऐसा अकारण नहीं होता है कि वे
प्रत्यक्षत: कोई अनावश्यक प्रतीत होनेवाला वाक्य लिखें या अपने कथन को दोहराएँ। ऐसे स्थलों पर
प्राय: शैली की माँग का दबाव ही ज़िम्मेदार होता है। इस प्रकार का अनुशासित लेखन दुर्लभ–सा है,
ख़ास तौर से ऐसी शैली में जहाँ भाषाई चमत्कार और आधुनिक जीवन के विविध सन्दर्भ–संकेतों का
खुलकर उपयोग किया गया हो। कुछ अलग–अलग स्थितियों, घटनाओं और फंतासियों को लेकर ही
उपन्यास का ताना–बाना तैयार किया गया है, पर उनका अन्तर्गुम्फन ऐसा है जो सहज रूप से
उपन्यास को एकसूत्रता में बाँध लेता है।
Panchjanya
- Author Name:
Gajendra Kumar Mitra
- Book Type:

- Description: श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र-युद्ध के पूर्व कहा था—“यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” वही श्रीकृष्ण जब उस काल में जन्मे थे और एक प्रकार से कुरुक्षेत्र-युद्ध के मुख्य नायक थे, तो मानना होगा कि धर्म की ग्लानि और अधर्म का बढ़ाव बहुत अधिक हुआ था। पृथ्वी भर के मनुष्य अत्याचार, अन्याय, दुख, कष्ट से बेचैन हो उठे थे। राज-शक्ति तथा क्षात्र-शक्ति पर लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, शून्यगर्भी अहंकार और आत्मनाशा बुद्धि छा गई थी। उसकी मति विभ्रान्त हो गई थी। तब क्या श्रीकृष्ण ने भारत को, पंक-शैया से उठाना और नित्य अवमानना से उसका उद्धार करना चाहा था? संभोगमत्त, मदगर्वित, निर्बोध-विकृत क्षात्र-शक्ति के हाथ से शासन छीनकर सद्बुद्धियुक्त सत्पुरुषों के हाथ में देश का दायित्व देना चाहा था? दरिद्र, पीड़ित, मूढ़, मूक, साधारण मनुष्यों की संघ-शक्ति को ही शासन-शक्ति में रूपान्तरित करना चाहा था? क्या इसी कारण उनके विख्यात घोषक-शंख को कोई अन्य नाम न देकर, उसका नाम पाञ्चजन्य रखा गया? क्या उन्होंने इसीलिए राजसूय यज्ञ में साधारण-जन के पाद-प्रक्षालन का भार ग्रहण किया था? ‘पाञ्चजन्य’ ग्रन्थ की महाभारत-कथा में लेखक ने इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजा है।
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