🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Khwab Sa Kuchh

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

उपन्यास पढ़ना शुरू करते ही, यह महसूस होने लगता है कि यह एक कवि की गद्यकथा है। बेशक इसकी लय गति थोड़ी तीव्र है, और आँखों के सामने उपस्थित होने वाले दृश्य, तुरन्त कथा प्रवाह में बिला जाते हुए लगते हैं। लेकिन इसकी गति में मौजूद सहज घुलनशीलता स्मृति में बहुत कुछ बचाए रखती है, कि हम उसे अपने अनुभवों के आईने में अपने अंतरंग और आत्मीय की तरह सजीवता में देख सकें और तब 'ख्वाब सा कुछ' में 'सच सा कुछ' देखते हुए हम जान पाते हैं, कि शायद सच से बढ़कर दूसरा कोई सपना है भी नहीं। गाँव और कस्बे के यथार्थ जीवन को उपन्यासकार, कुछ इस तरह से लिखता है कि, वह ब्यौरों के चित्रण में सिमटने और सीमित हो जाने के बदले, विडम्बना और आत्म-व्यंग्य से समृद्ध रूपकीय विन्यास जैसा लगने लगता है। चरित्र, कथानक या सामाजिक परिवेश, इस व्यापक व्यंजकता में एकदम घुले मिले लगते हैं। ऐंठबहार, घुमनाहा और बुतरू के परिवार का अतीत और वर्तमान, लेखक की लिखत में कुछ इस तरह विन्यस्त हो सका है कि हम उन्हें उनसे भिन्न किसी भी परिवार और परिवेश में देख और पा सकते हैं। उपन्यास में यौन वर्जना ग्रस्त भारतीय समाज के जो रूप उभरते हैं, वे भी केवल यथार्थ निर्देश नहीं करते, बल्कि पूरे समाज की आत्मरुद्धता की ओर सार्थक संकेत करते प्रतीत होते हैं। लेकिन उपन्यास के पाठ में सबसे महत्त्वपूर्ण उसकी पठनीयता है जो विविध मानसिकता के पाठकों को भी बाँधे रखने की अजब किस्सागोई से सम्पन्न है।  —प्रभात त्रिपाठी

Read more

₹ 350

₹ 280 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Khwab Sa Kuchh This book ₹280
Khwahishon Ki Dhar Se Sanjay Manharan Singh ₹250
Zindagi - Story of Life Vastvik Amera ₹175
3 books selected ₹775 ₹705
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

उपन्यास पढ़ना शुरू करते ही, यह महसूस होने लगता है कि यह एक कवि की गद्यकथा है। बेशक इसकी लय गति थोड़ी तीव्र है, और आँखों के सामने उपस्थित होने वाले दृश्य, तुरन्त कथा प्रवाह में बिला जाते हुए लगते हैं। लेकिन इसकी गति में मौजूद सहज घुलनशीलता स्मृति में बहुत कुछ बचाए रखती है, कि हम उसे अपने अनुभवों के आईने में अपने अंतरंग और आत्मीय की तरह सजीवता में देख सकें और तब 'ख्वाब सा कुछ' में 'सच सा कुछ' देखते हुए हम जान पाते हैं, कि शायद सच से बढ़कर दूसरा कोई सपना है भी नहीं।

गाँव और कस्बे के यथार्थ जीवन को उपन्यासकार, कुछ इस तरह से लिखता है कि, वह ब्यौरों के चित्रण में सिमटने और सीमित हो जाने के बदले, विडम्बना और आत्म-व्यंग्य से समृद्ध रूपकीय विन्यास जैसा लगने लगता है। चरित्र, कथानक या सामाजिक परिवेश, इस व्यापक व्यंजकता में एकदम घुले मिले लगते हैं। ऐंठबहार, घुमनाहा और बुतरू के परिवार का अतीत और वर्तमान, लेखक की लिखत में कुछ इस तरह विन्यस्त हो सका है कि हम उन्हें उनसे भिन्न किसी भी परिवार और परिवेश में देख और पा सकते हैं।

उपन्यास में यौन वर्जना ग्रस्त भारतीय समाज के जो रूप उभरते हैं, वे भी केवल यथार्थ निर्देश नहीं करते, बल्कि पूरे समाज की आत्मरुद्धता की ओर सार्थक संकेत करते प्रतीत होते हैं। लेकिन उपन्यास के पाठ में सबसे महत्त्वपूर्ण उसकी पठनीयता है जो विविध मानसिकता के पाठकों को भी बाँधे रखने की अजब किस्सागोई से सम्पन्न है। 

—प्रभात त्रिपाठी

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2024
Weight
230 grams
ISBN-13
9788119996773
Pages
256
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp