Sadabahar Kahaniyan : Premchand
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मुंशी प्रेमचंद 1880-1936 प्रेमचंद हिंदी के विश्वप्रसिद्ध लेखक हैं। उनके उपन्यास- सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, ग़बन, कर्मभूमि, गोदान - भारतीय जन-जीवन का आईना और विश्वसाहित्य की अमूल्य निधियाँ हैं। उन्होंने हिंदी कहानी व उपन्यास को मनोरंजन और निरी उपदेशात्मकता से निकालकर सार्थक सामाजिक आधार दिया। उन्होंने अपने सम्पादन, सामायिक टिप्पणियों और वक्तव्यों के ज़रिए भी समाज को संस्कारित करने की कोशिश की। इस संकलन में उनकी शुरुआती कहानियों से लेकर अन्तिम कहानी - कफ़न तक को संकलित किया गया। इसमें उनकी हर तरह की कहानियाँ हैं। आशा है यह संकलन आपको पसंद आएगा ।
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मुंशी प्रेमचंद 1880-1936 प्रेमचंद हिंदी के विश्वप्रसिद्ध लेखक हैं। उनके उपन्यास- सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, ग़बन, कर्मभूमि, गोदान - भारतीय जन-जीवन का आईना और विश्वसाहित्य की अमूल्य निधियाँ हैं। उन्होंने हिंदी कहानी व उपन्यास को मनोरंजन और निरी उपदेशात्मकता से निकालकर सार्थक सामाजिक आधार दिया। उन्होंने अपने सम्पादन, सामायिक टिप्पणियों और वक्तव्यों के ज़रिए भी समाज को संस्कारित करने की कोशिश की। इस संकलन में उनकी शुरुआती कहानियों से लेकर अन्तिम कहानी - कफ़न तक को संकलित किया गया। इसमें उनकी हर तरह की कहानियाँ हैं। आशा है यह संकलन आपको पसंद आएगा ।
Book Details
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ISBN9789392088391
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Pages120
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Avg Reading Time4 hrs
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Age0-11 yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
रवीन्द्र भारती का उपन्यास ‘जगदम्बा’ हिन्दी कथा-साहित्य के मौजूदा ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ ‘हृदय की बात’ की मानिन्द है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर भारत का आँचलिक जनजीवन जिस गहरी आत्मीयता, सूक्ष्मता तथा संगीतमय भाषा के साथ इस उपन्यास में अभिव्यक्त हुआ है, वह इधर के दिनों में दुर्लभ से दुर्लभतर होता गया है। लेकिन जो बात इस उपन्यास को खास बनाती है वह है उन दारुण स्थितियों का विश्वसनीय उद्घाटन जिनकी टीस स्थानीय बोली-बानी, आस्था-अन्धविश्वास और तमाम चीज-बतुस के संक्रामक आकर्षण के बावजूद, पाठक गहरे महसूस करता है।
इस उपन्यास में ऐसी स्त्रियाँ आती हैं जो अपने बनाए आकाश में उड़ना चाहती हैं। लेकिन उन्हें उड़ना पड़ता है मर्द के बनाए आकाश में। उन्हें अपने आकाश में उड़ने की आज़ादी नहीं। उड़ेंगी तो पतुरिया कहलाएँगी। इससे बात न बने तो देवी कहकर, जगदम्बा करार देकर उनके पंख तोड़ दिए जाएँगे। उपन्यास सवाल उठाता है— इनसान कोई बाँधने की चीज है? और, जवाब भी देता है—दरअसल जानवर भी बाँधने की चीज नहीं है मगर, आदमी अपने स्वार्थ में क्या नहीं करता! न हाथ बाँधने की चीज है, न मन। जहाँ कहीं बन्धन की गाँठ पड़ेगी, वह दिखे न दिखे, इनसान कुम्हला जाता है।
यहाँ हम मर्द के साथ सोने से इनकार करने पर जगदम्बा बना दी जाने वाली एक स्त्री को, समाज और परिवार ने मुक्ति की जो स्थापना दी है, उससे अलग, नई राह पर कदम बढ़ाते देखते हैं जो उसने खुद चुनी है। वह किसी मिथ जैसी मालूम पड़ती है; लेकिन वह यथार्थ है, वर्तमान में भविष्य की दिशासूचक! उपन्यास में हमें ऐसे अनेक किरदार मिलते हैं। मसलन चटपट और खटपट जो भले ही अनगढ़, गंवार लगते हैं लेकिन अन्याय को समझने और उसका प्रतिकार करने की अपनी सहज वृत्ति के कारण अलग से ध्यान आकर्षित करते हैं। बागुन बाबा, नकछेदी, सिस्टर क्रेजी भी ऐसे ही अनूठे किरदार हैं।
वस्तुतः आँचलिक उपन्यास का यह नया आख्यान है जो न केवल बेहद पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है।
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