Apni Gawahi
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जब कृष्णा पत्रकार बनने का फ़ैसला करती है तो अपना औरत होना और हिन्दी समाचार एजेंसी में काम करना, यही दो परेशानियाँ उसके सामने हैं। जैसाकि उसके मुन्नू चाचा कहते हैं उसका यह फ़ैसला भले ही उसे उसकी निराशा से क्षणिक मुक्ति दे, लेकिन आख़िरकार यह उसे बर्बाद कर देगा। मुन्नू ’चा के मन में इस बारे में कोई शक नहीं था।</p> <p>सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी मीडिया में आए उफान में अंग्रेज़ी और उसके पत्रकार सातवें आसमान पर पहुँच गए, जबकि भाषायी पत्र-पत्रिकाओं पर उनके मालिक कुंडली मारे बैठे रहे—ख़ासकर अब के दौर में मीडिया साम्राज्यों का संचालन करनेवाले मालिक-सम्पादकों की फ़ौज। पुरानी बिल्डिंग के अंधे और तंग दफ़्तर से शुरुआत करनेवाली कृष्णा नई बिल्डिंग के अंग्रेज़ी सम्पादकों और पत्रकारों के नाज़-नखरों को कुछ ईर्ष्या से, कुछ क्रोध से और कुछ मज़े लेकर देखती है। लगभग बेमतलब विषयों के रिपोर्टर से बढ़ते-बढ़ते एक राष्ट्रीय दैनिक की पहली महिला सम्पादक, देश के सबसे लोकप्रिय टीवी चैनलों में से एक की न्यूज़ एंकर बनने तक वह मीडिया के बदलते स्वरूप को बहुत पास से देखती है। वह देखती है कि राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदों की लड़ाई मीडिया के सहारे कैसे लड़ी जाती है। और वह पाती है कि इन अधिकांश मामलों में सच्चाई ही बलि चढ़ती है।</p> <p>समकालीन भारतीय परिदृश्य में सत्ता के पीछे भागनेवालों और दलालों की करतूतों के दिलचस्प और गुदगुदानेवाले विवरणों से भरा यह उपन्यास अपनी सचबयानी और समाचार रिपोर्टिंग की चकाचौंध-भरी दुनिया की वास्तविकताओं पर केन्द्रित है।
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जब कृष्णा पत्रकार बनने का फ़ैसला करती है तो अपना औरत होना और हिन्दी समाचार एजेंसी में काम करना, यही दो परेशानियाँ उसके सामने हैं। जैसाकि उसके मुन्नू चाचा कहते हैं उसका यह फ़ैसला भले ही उसे उसकी निराशा से क्षणिक मुक्ति दे, लेकिन आख़िरकार यह उसे बर्बाद कर देगा। मुन्नू ’चा के मन में इस बारे में कोई शक नहीं था।</p>
<p>सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी मीडिया में आए उफान में अंग्रेज़ी और उसके पत्रकार सातवें आसमान पर पहुँच गए, जबकि भाषायी पत्र-पत्रिकाओं पर उनके मालिक कुंडली मारे बैठे रहे—ख़ासकर अब के दौर में मीडिया साम्राज्यों का संचालन करनेवाले मालिक-सम्पादकों की फ़ौज। पुरानी बिल्डिंग के अंधे और तंग दफ़्तर से शुरुआत करनेवाली कृष्णा नई बिल्डिंग के अंग्रेज़ी सम्पादकों और पत्रकारों के नाज़-नखरों को कुछ ईर्ष्या से, कुछ क्रोध से और कुछ मज़े लेकर देखती है। लगभग बेमतलब विषयों के रिपोर्टर से बढ़ते-बढ़ते एक राष्ट्रीय दैनिक की पहली महिला सम्पादक, देश के सबसे लोकप्रिय टीवी चैनलों में से एक की न्यूज़ एंकर बनने तक वह मीडिया के बदलते स्वरूप को बहुत पास से देखती है। वह देखती है कि राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदों की लड़ाई मीडिया के सहारे कैसे लड़ी जाती है। और वह पाती है कि इन अधिकांश मामलों में सच्चाई ही बलि चढ़ती है।</p>
<p>समकालीन भारतीय परिदृश्य में सत्ता के पीछे भागनेवालों और दलालों की करतूतों के दिलचस्प और गुदगुदानेवाले विवरणों से भरा यह उपन्यास अपनी सचबयानी और समाचार रिपोर्टिंग की चकाचौंध-भरी दुनिया की वास्तविकताओं पर केन्द्रित है।
Book Details
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ISBN9788183614023
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Pages196
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Mahashweta Devi
- Book Type:

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Description:
वरिष्ठ बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी का यह लघु उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रचा गया है, लेकिन कवि वन्द्यघटी गाईं के जन्म और मृत्यु का इतिहास पूर्णतः लेखिका की अपनी मानस-कथा है। कोई ऐतिहासिक कथा नहीं। लेखिका ने इसके माध्यम से एक ऐसे युवक के प्रेम और जिजीविषा की अनूठी कहानी रचने की कोशिश की है जो अपने जन्म और जीवन को लाँघकर एक नई दुनिया का सृजन करना चाहता है, लेकिन उसके हर प्रयास को तत्कालीन समाज ने मात दी। चुयाड़ वंश में जन्मा युवक एक ब्राह्मण कन्या से प्यार करने लगता है लेकिन अन्ततः उसके हिस्से में आता है दु:ख और अपमान।
निश्चय ही तरल संवेदना और प्रवाहमयी शिल्प में रची यह कृति एक बार फिर पाठकों को महाश्वेता देवी की रचनात्मक विशिष्टता से रू-ब-रू कराएगी।
When Life Gives You Another Chance
- Author Name:
Maninder Singh
- Book Type:

- Description: "Life is full of suprises. Sometimes everything happens as per your plans but in few cases, you have no idea about what life might be cooking for you. Lucky are those who get a second chance in their lives to redeem their love."
Mitro Marjani
- Author Name:
Krishna Sobti
- Book Type:

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Description:
रघुवीर सहाय की पंक्ति है—जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है।
चरित्र की दृष्टि से मित्रो हिन्दी कहानी की अभूतपूर्व पात्र है। इस गृहस्थी में पता नहीं कहाँ से टपक पड़ी है, उसने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। ऐसा सजीव, सदेह पात्र किसी परिवार को तोड़ देता, पति को पागल कर देता, हत्या हो जाती। लेकिन मित्रो को ऐसे धर्मभीरु, मध्यवर्गीय, परिवार में डालकर कृष्णा सोबती ने बेलौस टक्कर की योजना की है। यह टक्कर बहुत तेज़ है लेकिन ख़तम नहीं होती। विरोधी स्थितियाँ पूरी कथा-अवधि में सक्रिय रहती हैं अनेक दाँव-पेंच करती हुई। पूरी कहानी इस टक्कर से स्पन्दित है।
मित्रो इसलिए भी अभूतपूर्व है कि बहुत सहज है। यह अभूतपूर्वता असामान्यता नहीं, वास्तविकता से उपजी है। मित्रो जैसे व्यक्ति समाज में थे, उन्हें साहित्य में नहीं लाया गया था—हिन्दी कहानी में नहीं लाया गया था। मित्रो कोई मनोविश्लेषणात्मक या असामान्य पात्र नहीं।
हिन्दी में उस जैसी स्त्री का प्रवेश पहली बार हुआ। कृष्णा सोबती ने ऐसे भरपूर पात्र को केन्द्र में रखकर यह कहानी लिखी, यह नई बात है। इसके लिए बहुत साहस, निर्ममता और ममता की ज़रूरत पड़ी होगी। यह सब बहुत-बहुत आत्मीय परिचय, पात्र से तादात्म्य के बिना सम्भव नहीं था।
—विश्वनाथ त्रिपाठी
कुछ कहानियाँ : कुछ विचार पुस्तक से
Kankal
- Author Name:
Jaishankar Prasad
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Description:
‘कंकाल’ भारतीय समाज के विभिन्न संस्थानों के भीतरी यथार्थ का उद्घाटन करता है। समाज की सतह पर दिखाई पड़नेवाले धर्माचार्यों, समाज-सेवकों, सेवा-संगठनों के द्वारा विधवा और बेबस स्त्रियों के शोषण का एक प्रकार से यह सांकेतिक दस्तावेज़ है। आकस्मिकता और कौतूहल के साथ-साथ मानव-मन के भीतरी परतों पर होनेवाली हलचल इस उपन्यास को गहराई प्रदान करती है। हदय-परिवर्तन और सेवा-भावना स्वतंत्रताकालीन मूल्यों से जुड़कर इस उपन्यास में संघर्ष और अनुकूलन को भी सामाजिक कल्याण की दृष्टि का माध्यम बना देते हैं।
उपन्यास अपने समय के नेताओं और स्वयंसेवकों के चरित्रांकन के माध्यम से एक दोहरे चरित्रवाली जिस संस्कृति का संकेत करता और बनते हुए जिन मानव-सम्बन्धों पर घंटी और मंगल के माध्यम से जो रोशनी फेंकता है वह आधुनिक यथार्थ की पृष्ठभूमि बन जाता है। सर्जनात्मकता की इस सांकेतिक क्षमता के कारण यह उपन्यास यथार्थ के भीतर विद्यमान उन शक्तियों को भी अभिव्यक्त कर सका है जो मनुष्य की जय-यात्रा पर विश्वास दिलाती है।
Rukogi Nahin Radhika
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

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Description:
यह लघु उपन्यास प्रवासी भारतीयों की मानसिकता में गहरे उतरकर बड़ी संवेदनशीलता से परत-दर-परत उनके असमंजस को पकड़ने का सार्थक प्रयास है। ऐसे लोग, जो जानते हैं कि कुछ साल विदेश में रहने पर भारत में लौटना सम्भव नहीं होता, पर यह भी जानते हैं कि सुख न वहाँ था न यहाँ है। स्वदेश में अनिश्चितता और सारहीनता का एहसास, वापसी पर परिवार के बीच होनेवाले अनुभव, जैसे मुँह में ‘कड़वा-सा स्वाद’ छोड़ देते हैं। यह अनुभव विदेश में पहले ‘कल्चरल शॉक’ और स्वदेश में लौटने पर ‘रिवर्स कल्चरल शॉक’ से गुज़रती नायिका को कुछ ऐसा महसूस करने पर बाध्य कर देता है : ‘‘मेरा परिवार, मेरा परिवेश, मेरे जीवन की अर्थहीनता, और मैं स्वयं जो होती जा रही हूँ, एक भावनाहीन पुतली-सी।’’
पर यह उपन्यास सिर्फ़ अकेली स्त्री के अनुभवों की नहीं, आधुनिक समाज में बदलते रिश्तों की प्रकृति से तालमेल न बैठा पानेवाले अनेक व्यक्तियों और सम्बन्धों की बारीकी से पड़ताल करता है। एक असामान्य पिता की सामान्य सन्तानों के साथ असहज सम्बन्धों की कथा है यह उपन्यास। ऐसे लोग जिनके पारिवारिक सीमान्तों पर बाहरी पात्रों की सहज दस्तक इन रिश्तों को ऐसे आयाम देती है, जो ठेठ आधुनिक समाज की देन हैं।
Do Upanyas
- Author Name:
Krishna Sobti
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- Book Type:

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Description:
‘वह समय’—कृष्णा जी ने इस टुकड़े को यही नाम दिया था, जिसे ‘ज़िन्दगीनामा’ के दूसरे भाग का हिस्सा होना था। सम्बन्धों के सामाजिक तर्कों और नैतिक आग्रहों के ऊपर चलती दिलों की यह कहानी शाह जी और राबयाँ की है। शाह जी अपने आधे को पार कर चुके हैं और राबयाँ जवानी की सीढ़ियाँ चढ़ रही है—तुकें मिलाती है, कवित्त लिखती है, शाह जी उसके लिखे को दुरुस्त करते हैं, उसे पढ़ाते-सिखाते हैं। इसी में उम्र, मज़हब और परिवारों की हदों से ऊपर उठ दोनों कहीं जुड़ जाते हैं...और उस दिन जब कचहरी से लौटते हुए शाह जी बाढ़ में घिर जाते हैं, राबयाँ अपनी छत से उन्हें देखती है और उन्हें बचाने पानी में कूद जाती है...दोनों को ढूँढ़ लिया जाता है, लेकिन शाह जी फिर लौट नहीं पाते, चले ही जाते हैं, और राबयाँ उनके पीछे...यह कहानी इश्क़ की है, इश्क़ की रूहानियत की,...कृष्णा सोबती की क़लम ही इसकी पवित्रता को इतने सुच्चेपन से आँक सकती थी!
इस जिल्द में मौजूद दूसरी कृति का सम्बन्ध इस समय से है—आज की दिल्ली से। रियल एस्टेट के मगरमच्छों के हत्थे चढ़े एक युवक की यह कहानी पैसे के उथले दलदल में छपछपाते उस तबके के बारे में बताती है, जिसके लिए सबसे पहला और सबसे आख़िरी मूल्य पैसा ही है। यह भी कि गाँवो-क़स्बों से रोटी-रोजगार की तलाश में आए लोगों को यह दलदल कैसी सफ़ाई से अपनी गिरफ़्त में ले लेता है!
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