Anamantrit Mehman
Author:
Anand Shankar MadhvanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Unavailable
‘‘मानवता और उसके इस संसार में जो सत्य अनादिकाल से क्रियाशील है, उसे समझने और पाने के लिए जितना दिमाग़ी परिश्रम इस भारतवर्ष के योगी-महात्माओं ने किया है, उतना कहीं के भी महापुरुषों ने नहीं किया है। इस ओर प्रत्येक ऋषि अपने-अपने तरीक़े से, स्वतंत्र रूप से, अनुसन्धान करते आए हैं। मगर वे सभी यही अनुभव करते रहे कि प्रत्येक मार्ग एक-दूसरे का पूरक है। इस तरह अन्त में वे एक ही सत्य पर पहुँचते भी थे। तुम बच्चे हो बेटा, तुमने कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं, वह भी अंग्रेज़ी पुस्तकों में वर्णित विचारों को पचाने का प्रयास मात्र किया है। इस तरह तुम न तो उन ऋषियों की घनघोर साधनाओं को समझोगे और न उनके अतुलनीय बुद्धि-वैभव को ही। तुम उनकी बुद्धि-शक्ति की कल्पना करो जिन्होंने अंक व्यवस्था का आविष्कार किया और शून्य का पता चलाया। तुम भारतीय ज्ञान-विद्या और अभिनय-शास्त्र को भी समझने का प्रयास करो। इस देश में धर्म सिर्फ़ राम जपना ही नहीं रहा है। मनुष्य का प्रत्येक आचरण परमेश्वर-प्राप्ति का एक साधन समझा जाता था। अतः वैद्य चिकित्सा करते समय, गायक गाते समय, गणितज्ञ किसी समस्या को हल करते समय, राजा राज्य-कार्य करते समय, पत्नी पति-सेवा करते समय, भंगी झाड़ू लगाते समय; इस तरह प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रत्येक आचरण को ही ईश्वर का एक क़दम समझता था। कम-से-कम विधि और व्यवस्था इसी ओर रही है।’’ ‘‘खैर, ऐसा ही सही; आखिर उन सब अनुष्ठानों से भारत ने क्या पाया? सैकड़ों बरस की ग़ुलामी जब मुसलमान आए तो उसका ग़ुलाम हुआ; जब अंग्रेज़ आए तो उसका ग़ुलाम हुआ। जातीय जीवन में कुछ भी शक्ति रहती तो वह इतनी जल्दी और इतने शौक से ग़ुलामी को स्वीकार नहीं करता। बाबा जी, यह सत्य है कि मैंने धर्म का अध्ययन नहीं किया, पर क्या वजह है कि हम इतने क्षीण चारित्र्य के हो गए कि अपनी स्त्रियों तक को आततायियों से बचा नहीं सके? बुरा नहीं मानिए। जानने की व्यग्रता में मेरी पवित्र वेदना सन्निहित है।’’</p>
<p>‘‘मैं मानता हूँ, जातीय जीवन गिर गया है। हज़ारों बरसों से गिरता आ रहा है।’’</p>
<p>‘‘कब बढ़ी हालत में थी? इतिहास में तो कुछ प्रमाण नहीं मिलता। सब आपस में लड़े-भिड़े हैं। सैकड़ों बार लड़कियों के लिए लड़ाइयाँ हुई हैं।’’ ‘‘यह तो ग़लत बात है। इतिहास सदा मात्र सच्ची और सही घटनाओं को प्रस्तुत नहीं करता।’’ ‘‘तो सही क्या है—आपकी प्रिय धारणाएँ? आपकी प्रिय विचारधाराएँ?’’ ‘‘तो तुम्हारा क्या कहना है?’’ ‘‘मेरा यह कहना है कि इन भौगोलिक प्रतिष्ठानों का कुछ भी अर्थ नहीं है। क्या अर्थ है भारत भूमि का; क्यों आप भारत को पुण्यभूमि और भगवान का प्रिय देश कहते हैं? चीनी लोगों ने कौन-सा अपराध किया कि उनके देश में कोई पुण्यभूमि की मान्यता नहीं मिलती? सच बात तो यह है कि मनुष्य जहाँ-जहाँ जमकर रहते गए, उन्होंने अपनी उसी जमाअत तथा भू-भाग को महत्त्वपूर्ण समझना प्रारम्भ किया। उसके ममत्व में जो बेमतलब और बेबुनियाद का एक भाव चढ़ता गया, उसे राष्ट्रीयता कहते हैं। जैसे-जैसे यातायात की सुगमताएँ बढ़ती जाएँगी और मानव एक-दूसरे के निकटतम सम्पर्क में आता जाएगा, वैसे-वैसे राष्ट्र और राष्ट्रीयता भी कम होती जाएगी, भाषाएँ कम होती चलेंगी, जातियाँ मिटती चलेंगी और धर्म भी घटता चलेगा। विज्ञान पूरी मानवता को एक धरातल पर खड़ा कर देगा; एक सत्य पर व्यवस्थित कर देगा। जो चीज़ भेद-भाव को प्रश्रय देती हुई उसे मान्यता प्रदान करती है, उसे मैं ग़लत, झूठ और अन्याय मानता हूँ। इससे मैं मानवता को बचाऊँगा।’’</p>
<p>अध्यात्म और साम्यवाद को केन्द्र में रखकर रचा गया आनन्द शंकर माधवन का विचारोत्तेजक उपन्यास है—‘अनामंत्रित मेहमान’। अपने इस पठनीय उपन्यास में लेखक ने जहाँ दो विपरीत धाराओं का अपनी तार्किक दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वहीं निश्छल प्रेम और उदारता के आगे कठोर से कठोर व्यक्ति भी किस तरह स्वयं को पराजित-सा महसूस करने लगता है, इसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है।</p>
<p><strong> </strong>
ISBN: 9788126714926
Pages: 484
Avg Reading Time: 16 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: बंगला की विख्यात लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी का यह उपन्यास अन्तर्विरोधी कर्तव्यों के आपसी द्वन्द्व और समाज के निचले तबक़े की दारुण जीवन-स्थितियों की कथा है। उन्तीसवीं धारा का अभिप्राय क़ानून के उस प्रावधान से है जो किसी अपराधी को अपनी सुरक्षा में ले जा रहे पुलिसकर्मी पर तब लागू होता है, जब अपराधी उससे बचकर भाग जाता है। इस उपन्यास का नायक अपने अपराधी को भाग जाने की स्वयं छूट देता है, और अपने आपको क़ानून का शिकार बना लेता है। यह अपराधी वही व्यक्ति था जिसने उसे सदियों से दलित-पीड़ित भूमि से उठाकर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, आदमी की पहचान दी, लेकिन वह ख़ुद अपने उसी रास्ते पर चलता रहा जिसे आख़िरकार क़ानून और सत्ता के निशाने पर आना था। समाज की तलछट में पलती आग और उद्वेलन का विश्लेषण करती महाश्वेता जी की एक और सशक्त रचना।
Bas Yu Hi
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Parul Tyagi
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- Description: Hindi Poetry Book
Epicurious: The Greatest Epics and Classics from India and around the World
- Author Name:
Sreelata Menon
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- Description: WHAT ARE THE WORLD'S MOST EXCITING STORIES MADE OF? Bloodthirsty demons and dragons snarling and spouting fire. Powerful gods swooping in to defend their fearsome heroes with blood-curdling ferocity. Ships being tossed about in terrible storms, perilous battles fought back-to-back, the rise and fall of cities and nations, and bouts of betrayal, war and tragedy. Now you can spin the wheel of time and be enchanted by more than 40 such famous ancient epics from Greece, England, France, Italy, Finland, Iran, Japan and many other cultures and countries, besides India, of course! From The Iliad, The Odyssey and The Argonautica to Beowulf, Paradise Lost and The Faerie Queene, from The Divine Comedy, The Aeneid and The Metamorphoses to The Shahnameh, The Kalevala and The Epic of Gilgamesh, and from the Ramayana, Mahabharata and Raghuvamsha to Silappadikaram, Kumarasambhavam and Jivaka Chintamani, these classic tales of super adventures take you to faraway lands of wonder where danger lurks round every bend, evil is a no-no, heroism a byword, duty a given and goodness a must. Retold with drama and humour for young readers, Epicurious breathes life into the longest-living and thrilling chronicles of the past. PLUS: Fun facts, trivia and much more!
Epicurious: The Greatest Epics and Classics from India and around the World
Sreelata Menon
₹ 499
₹ 389.22
Birbal Ki Kahaniyan
- Author Name:
Nirupma
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