Aaj Ki Kavita
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Author:
Vinay VishwasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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'आज की कविता’ आलोचना के नए दर खोलती है और समकालीन कविता के तज़ुर्बों को मुख़्तलिफ़ ढंग से विश्लेषित करती है। समकालीन कविता के लिए, जिस विनम्र और बाशऊर नज़रिए की ज़रूरत थी, वो यहाँ मौजूद है। पूरी किताब विनम्र लेकिन सचेत नज़रिए का प्रतिफल है। ...इस आलोचना-पुस्तक में कविता का होना, जीवन के होने जैसा है। विनय विश्वास इतने शालीन और एकाग्र ढंग से हिन्दी-उर्दू कविता को ज़िन्दगी के तत्त्वों से जोड़ते चलते हैं कि आलोचना-पुस्तक सिर्फ़ विनय की नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी के तमाम कवियों और उर्दू के शायरों की हो जाती है। ...आलोचना में जो उखाड़-पछाड़ (और गुटबाज़ी) चल रही है, यह आलोचना उससे कोसों दूर है। यहाँ मक़सद, बड़ी दयानतदारी के साथ समकालीन कविता को परखना है। उसकी सामाजिकता को पहचानना है। सच मायने में 'आज की कविता’ महज़ आलोचना का नहीं, बल्कि मौजूदा कविता का पर्यावरण रचती है। यही इस आलोचना की विशेषता है और मौलिकता भी। ...इस आलोचना में लोकतांत्रिक छवियाँ हैं। कमज़र्फ़ आग्रह, फ़रेब और छल का नकार है। ...विनय विश्वास ने कविताओं को अपनी आलोचना-पुस्तक में 'भर’ नहीं दिया, उन्हें माकूल और मुस्तकिल स्थान दिया है। संवेदनशील आलोचक यही करते हैं। ...विनय विश्वास के सरोकार स्पष्ट हैं। वो आज की कविता में जीवन की लय तलाश करते हैं। यहाँ एक सादगी है। यही आलोचकीय शक्ति भी है। वो इसी शक्ति के सहारे, समकालीन कविता के जिस्म तक नहीं बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचते हैं।</p> <p>—ज्ञान प्रकाश विवेक, ‘वागर्थ’, अक्तूबर, 2009
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'आज की कविता’ आलोचना के नए दर खोलती है और समकालीन कविता के तज़ुर्बों को मुख़्तलिफ़ ढंग से विश्लेषित करती है। समकालीन कविता के लिए, जिस विनम्र और बाशऊर नज़रिए की ज़रूरत थी, वो यहाँ मौजूद है। पूरी किताब विनम्र लेकिन सचेत नज़रिए का प्रतिफल है। ...इस आलोचना-पुस्तक में कविता का होना, जीवन के होने जैसा है। विनय विश्वास इतने शालीन और एकाग्र ढंग से हिन्दी-उर्दू कविता को ज़िन्दगी के तत्त्वों से जोड़ते चलते हैं कि आलोचना-पुस्तक सिर्फ़ विनय की नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी के तमाम कवियों और उर्दू के शायरों की हो जाती है। ...आलोचना में जो उखाड़-पछाड़ (और गुटबाज़ी) चल रही है, यह आलोचना उससे कोसों दूर है। यहाँ मक़सद, बड़ी दयानतदारी के साथ समकालीन कविता को परखना है। उसकी सामाजिकता को पहचानना है। सच मायने में 'आज की कविता’ महज़ आलोचना का नहीं, बल्कि मौजूदा कविता का पर्यावरण रचती है। यही इस आलोचना की विशेषता है और मौलिकता भी। ...इस आलोचना में लोकतांत्रिक छवियाँ हैं। कमज़र्फ़ आग्रह, फ़रेब और छल का नकार है। ...विनय विश्वास ने कविताओं को अपनी आलोचना-पुस्तक में 'भर’ नहीं दिया, उन्हें माकूल और मुस्तकिल स्थान दिया है। संवेदनशील आलोचक यही करते हैं। ...विनय विश्वास के सरोकार स्पष्ट हैं। वो आज की कविता में जीवन की लय तलाश करते हैं। यहाँ एक सादगी है। यही आलोचकीय शक्ति भी है। वो इसी शक्ति के सहारे, समकालीन कविता के जिस्म तक नहीं बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचते हैं।</p>
<p>—ज्ञान प्रकाश विवेक, ‘वागर्थ’, अक्तूबर, 2009
Book Details
-
ISBN9788126716715
-
Pages472
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सवाल उठता है कि क्या महादेवी वर्मा का रचनात्मक व्यक्तित्व विभाजित है जो इनकी गद्य-रचनाओं में सामाजिक चेतना को आत्मसात् किए हुए है और काव्य-रचनाओं में पलटा खाकर असामाजिक या आध्यात्मिक रूप धारण कर लेता है? क्या इनका व्यक्तित्व अद्वैतवाद और बौद्धमत के परस्पर-विरोधी तत्त्वों से निर्मित है? क्या महादेवी की सृजन-प्रक्रिया इन विपरीत स्थितियों के तनाव में गतिशील है? इन तमाम सवालों, भ्रान्तियों आदि का सार्थक निराकरण करने की दिशा में पहला और प्रमुख कदम है यह पुस्तक।
इनकी कविता के रूढ़िगत मूल्यांकन से छुटकारा पाना इसलिए भी आवश्यक है कि युगबोध बदल चुका है और इसके बदलने पर हर कृति या हर कृतिकार को फिर से आँकने की आवश्यकता अनुभव होने लगती है।
‘राधाकृष्ण मूल्यांकन माला’ की इस पुस्तक में अधिकारी सम्पादक ने ऐसी अमूल्य सामग्री का संयोजन किया है जो अलग-अलग आलोचना-पुस्तकों, पत्रिकाओं तथा शोध-ग्रन्थों में बिखरी हुई थी और जिसे एकत्र पाना दुर्लभ था। इसमें विद्वान रचनाकारों ने महादेवी वर्मा के रचनात्मक व्यक्तित्व, उनके चिन्तन व कला पक्षों का समग्रता से आत्मीयतापूर्वक मूल्यांकन किया है।
Alakshit Gaurav : Renu
- Author Name:
Surendra Narayan Yadav
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'भाषा की जड़ों को हरियानेवाला रसायन जो उसे ज़िन्दा रखता है, उसे सम्पन्न करता है, वह 'लोक' का स्रोत है। इस स्रोत की राह दिखाने के लिए हम रेणु के ऋणी हैं।' हमारे समय की वरिष्ठतम गद्यकार कृष्णा सोबती ने अपने साक्षात्कारों आदि में अनेक बार इस बात का उल्लेख किया है। उन्हें लगता है कि रेणु ने सभ्य भाषाओं और नागरिकताओं के इकहरे वैभव के बीच भारत के उस बहुस्तरीय वाक् को स्थापित किया जो अनेक समयों की अर्थच्छटाओं को सोखकर सन्तृप्त ध्वनियों में स्थित हुआ है और वास्तव में वही है जो भारत के असली विट और सघन अर्थ-सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है।
रेणु ने अपने लोक के आनन्द और अवसाद इन्हीं ध्वनियों, इन्हीं भंगिमाओं में व्यक्त किए। दुर्भाग्य से देश के किसी और हिस्से से ऐसा साहस करनेवाले लेखक न आ सके, और सिर्फ़ यही नहीं, रेणु को और उनकी वाक्-भंगिमाओं को समझनेवाले लोगों की भी कमी महसूस की गई। परिणाम यह कि उनको बड़ा तो मान लिया गया लेकिन उनका बहुत कुछ ऐसा रह गया जिसे न समझा गया, न समझा जा सका।
यह पुस्तक रेणु के उसी अलक्षित को लक्षित है। लेखक का कहना है कि 'इसके पूर्व रेणु पर जो कहा गया है, वह तो कहा ही जा चुका है। यह पुस्तक उन सबके अतिरिक्त है, उनके खंडन-मंडन में नहीं है...सतह पर की अर्थ-चर्वणा बहुत हो चुकी। रेणु का अलक्षित ही रेणु के गौरव का आधार है।' अर्थात् वह अर्थ-लोक जो सुशिक्षित भावक के ज्यामितिक भाषा-बोध की पकड़ में आने से या तो रह जाता है, या ग़लत ढंग से पकड़ लिया जाता है। उम्मीद है, पढ़नेवाले इससे न सिर्फ़ रेणु को नए सिरे से पढ़ने को उत्सुक होंगे, बल्कि अपने समय की अस्पष्ट ध्वनियों को सुनने-समझने की सामर्थ्य भी जुटा पाएँगे।
Kavita Ka Shahar : Ek Kavi Ki Notebook
- Author Name:
Rajesh Joshi
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कविता का नगर चाहे बहुत भिन्न हो, उसमें कल्पना का तत्त्व बहुत अधिक या कम हो, लेकिन बाहर स्थित नगर से उसकी शक्ल थोड़ी-बहुत तो मिलती है। पर हर बार मेरी शक्ल को वास्तविक नगर की शक्ल से मिला-जुलाकर देखने की क़वायद फ़िज़ूल है। कई बार कवियों को भी यह भ्रम हो जाता है कि वे अपनी कविता में वास्तविक शहर के यथार्थ को समेट रहे हैं। उन्हें लगता है कि वो कविता में शब्दों से वो ही शहर बना सकते हैं जो वास्तविक शहर है। लेकिन दोनों के निर्माण में लगनेवाली सामग्री ही भिन्न है। जब भी वास्तविक शहर शब्दों में रूपान्तरित होता है, उसका चेहरा-मोहरा वही नहीं रहता जो उसका वास्तविक चेहरा है। यह शहर का पुनर्रचित चेहरा है। यह कविता का नगर है। लेकिन मुझे बसाना या बनाना भी कोई आसान काम नहीं है। मेरे भवनों, सड़कों, गलियों, नदियों और सरोवरों को बनाने के लिए एक कवि को भी जाने कितने शब्द, कितने वाक्य, बिम्ब, प्रतीक, छन्द, लय, मिथक-कथाओं और कल्पनाओं की ज़रूरत होती है। कवि का श्रम किसी वास्तुशिल्पी या नगरशिल्पी से किसी बात में कम नहीं होता। मेरा इतिहास उतना ही पुराना है जितना मनुष्य द्वारा किए गए नगरीकरण का। इसे मेरा दम्भ न समझा जाए तो कई बार तो मुझे लगता है कि मनुष्य द्वारा बसाए गए शहर से भी पहले मैं अस्तित्व में आया होऊँगा। एक शहर में जैसे हमेशा ही कुछ न कुछ जुड़ता रहता है, कुछ टूटता रहता है, इसी तरह मुझमें भी कुछ न कुछ बदलता रहता है। प्राचीन कविता का नगर और आज की कविता का नगर एक-सा तो नहीं है। आधुनिक शहरों की तरह मुझमें भी भीड़ है, शोर है और तेज़ गतियाँ हैं, परिचित और अपरिचित चेहरे हैं। आख़िरकार मैं भी एक नगर हूँ और भीड़ और शोर से मैं भी कैसे बच सकता हूँ। तो आइए, मैं आपको वास्तविक नगर की भीड़ और शोर से निकालकर कविता के नगर की भीड़ और शोर के बीच लिए चलता हूँ।
Civil Seva Pariksha Ke Liye Nibandh
- Author Name:
Ganga Singh Rajpurohit +1
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IAS/PCS परीक्षाओं के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक। अन्तिम रूप से चयनित होने में निबन्ध लेखन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। निबन्ध लेखन के सही तरीक़े क्या हैं? निबन्ध लेखन की सही रणनीति क्या होती है? निबन्ध के पेपर में ज़्यादा से ज़्यादा मार्क्स कैसे स्कोर किए जाएँ? टॉपर्स, कैसे लिखते हैं निबन्ध आदि कई सफल रणनीतियों की जानकारी देती है यह पुस्तक।
Chhayawad : Sau Sal Baad
- Author Name:
P. Ravi
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यह सच है कि इस सामाजिक यथार्थ से प्रारम्भिक दौर की छायावादी कविता तालमेल नहीं रखती है। रचना और आलोचना का प्राथमिक सरोकार मानव जीवन और समय से होता है। लेकिन काव्य-भाषा के रूप में खड़ीबोली को समृद्ध करना तत्कालीन चुनौती रही थी, जिसे नजरअन्दाज नहीं कर सकते थे। जहाँ जीवन की समग्रता का सवाल उठता है, वहाँ भी प्राथमिकता पर ध्यान देना होगा। अपने समय और समाज से छायावादी कवि पलायन नहीं करना चाहते थे इसलिए वे जल्दी समय की माँग की पहचान करने लगे, और धीरे-धीरे नवजागरण और स्वतंत्रता आन्दोलन पर ही नहीं बल्कि मानव-जीवन और सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति पर मारक आघात करनेवाली आधुनिक सभ्यता तथा प्रभुवर्ग के सत्तामोह पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे। इस तरह छायावादी कवि अपने ही इतिहास तथा परम्परा से सांस्कृतिक एवं नैतिक बल प्रदान करते रहें जिससे समाज आत्मसम्मान से भर उठे। छायावाद का प्रकृति चित्रण कहीं-कहीं आधुनिक पारिस्थितिक विमर्श की भी नींव डाल रहा था।
Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi : Paath Ke Pare : Path Ke Paas
- Author Name:
Sanjeev Kumar
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लम्बे-लम्बे अन्तराल पर तीन-चार कहानियाँ ही मैं लिख पाया, पर लिखने की ललक बनी रही जिसने यह ग़ौर करनेवाली निगाह दी कि अच्छी कहानी में अच्छा क्या होता है, कहानियाँ कितने तरीक़ों से लिखी जाती हैं, वे कौन-कौन-सी युक्तियाँ हैं जिनसे विशिष्ट प्रभाव पैदा होते हैं, कोई सम्भावनाशाली कथा-विचार कैसे एक ख़राब कहानी में विकसित होता है और एक अति-साधारण कथा-विचार कैसे एक प्रभावशाली कहानी में ढल जाता है इत्यादि। लेकिन जब आप एक कहानीकार पर या किसी कथा-आन्दोलन पर समग्र रूप में टिप्पणी कर रहे होते हैं, तब ‘ज़ूम-आउट मोड’ में होने के कारण रचना-विशेष में इस्तेमाल की गई हिकमतों, आख्यान-तकनीकों, रचना के प्रभावशाली होने के अन्यान्य रहस्यों और इन सबके साथ जिनका परिपाक हुआ है, उन समय-समाज-सम्बन्धी सरोकारों के बारे में उस तरह से चर्चा नहीं हो पाती। कहीं समग्रता के आग्रह से विशिष्ट की विशिष्टता का उल्लेख टल जाता है तो कहीं साहित्यालोचन को प्रवृत्ति-निरूपक साहित्येतिहास का अनुषंगी बनना पड़ता है।
जब 'हंस' कथा मासिक की ओर से एक स्तम्भ शुरू करने का प्रस्ताव आया तो मैंने छूटते ही इस सदी की चुनिन्दा कहानियों पर लिखने की इच्छा जताई। मुझे लगा कि मैं जिन चीज़ों पर ग़ौर करता रहा हूँ, उनका सही इस्तेमाल करने का समय आ गया है। यह इस्तेमाल सर्वोत्तम न सही, द्वितियोत्तम यानी सेकंड बेस्ट तो कहा ही जा सकता है।
आगे जो लेख आप पढने जा रहे हैं, वे 'खरामा-खरामा' स्तम्भ की ही कड़ियाँ हैं। इन्हें इनके प्रकाशन-क्रम में ही इस संग्रह में भी रखा गया है। कई कड़ियाँ ऐसी हैं जो अपनी स्वतंत्र शृंखला बनाती हैं।
—भूमिका से
Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi : Paath Ke Pare : Path Ke Paas
Sanjeev Kumar
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₹ 200
Available
Kuchh Purvgrah
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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वर्षों से हिन्दी आलोचना में जो नाम छाए रहे हैं, उनमें एक नाम निश्चय ही अशोक वाजपेयी का है। कविता के लिए उनका पूर्वग्रह अब कुख्यात ही है। उन्होंने उसकी आलोचना, प्रकाशन और प्रसार के लिए जितने व्यापक और सुचिन्तित रूप से काम किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो।
1970 में उनकी पहली आलोचना-पुस्तक ‘फिलहाल’ ने हिन्दी आलोचना को तेज़ी और सार्थक आलोचना-भाषा दी थी जिसका व्यापक प्रभाव आज तक देखा जा सकता है। ‘फिलहाल’ के कई संस्करण निकलना इस बात का प्रमाण है कि समकालीन कविता की आलोचना में उसे एक उद्गम-ग्रन्थ की मान्यता मिली है।
इस बीच अशोक वाजपेयी ने 1974 से भोपाल से बहुचर्चित आलोचना पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ का सम्पादन और प्रकाशन आरम्भ किया। हिन्दी की समकालीन साहित्य-संस्कृति में इस प्रयत्न का ऐतिहासिक महत्त्व है। इस पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘पूर्वग्रह’ में ही प्रकाशित हुई है। कम लिखकर भी कारगर हस्तक्षेप कर पाने में वे सक्षम हैं, यह इसका प्रमाण है।
कविता, साहित्य और संस्कृति के लिए अपनी गहरी आसक्ति को अशोक वाजपेयी असाधारण स्पष्टता और सूक्ष्म संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करते हैं। हालाँकि हर हालत में अपने को ही सही मानने का उन्हें कोई मुग़ालता नहीं है। उनकी आलोचना आज की सृजनात्मकता को समझने और आगे बढ़ाने का एक उत्कट और विचारसम्पन्न प्रयत्न है। वे जो प्रश्न उठाते हैं या चुनौतियाँ सामने रखते हैं, वे आज की परिस्थितियों में केन्द्रीय हैं और उन्हें नज़रअन्दाज़ करना सम्भव नहीं है।
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