Pali-Piyush
(0)
Author:
Vijaypal SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
125
100 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
भारतीय भाषाओं एवं भारतीय संस्कृति को समझने के लिए पालि-भाषा का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। इसी कारण पालि भाषा का पठन-पाठन तथा अनुसंधान भारतीय मनीषा शताब्दियों से करती चली आ रही है। विदेशों में भी जितना मान एवं ख्याति इस भाषा को मिली, उतनी संभवतः किसी अन्य भारतीय भाषा को नहीं। भगवान् बुद्ध के आदर्शों के मेरुदंड सत्य, अहिंसा, विश्व बन्धुत्व, दया, सहनशीलता तथा मानव कल्याण आदि इसी भाषा में अन्तर्निहित है। भारतीय साहित्य के अतिरिक्त भारतीय कला एवं भारतीय दर्शन के दर्शन करने के लिये भी इसी भाषा मन्दिर में आना पड़ेगा। पुस्तुत पुस्तक 'पालि-पियूष में सर्वांगीण भूमिका के साथ-साथ पालि-भाषा प्रेमियों को समस्त उपयोगी सामग्री उपलब्ध हो जायेगी। पुस्तक निःसन्देह पठनीय एवं संग्रहणीय है।
Read moreAbout the Book
भारतीय भाषाओं एवं भारतीय संस्कृति को समझने के लिए पालि-भाषा का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। इसी कारण पालि भाषा का पठन-पाठन तथा अनुसंधान भारतीय मनीषा शताब्दियों से करती चली आ रही है। विदेशों में भी जितना मान एवं ख्याति इस भाषा को मिली, उतनी संभवतः किसी अन्य भारतीय भाषा को नहीं। भगवान् बुद्ध के आदर्शों के मेरुदंड सत्य, अहिंसा, विश्व बन्धुत्व, दया, सहनशीलता तथा मानव कल्याण आदि इसी भाषा में अन्तर्निहित है। भारतीय साहित्य के अतिरिक्त भारतीय कला एवं भारतीय दर्शन के दर्शन करने के लिये भी इसी भाषा मन्दिर में आना पड़ेगा। पुस्तुत पुस्तक 'पालि-पियूष में सर्वांगीण भूमिका के साथ-साथ पालि-भाषा प्रेमियों को समस्त उपयोगी सामग्री उपलब्ध हो जायेगी। पुस्तक निःसन्देह पठनीय एवं संग्रहणीय है।
Book Details
-
ISBN9789392186547
-
Pages100
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Samvaad Anayas
- Author Name:
Govind Mishra +1
- Book Type:

- Description:
इस पुस्तक के रचनाक्रम के बारे में सुपरिचित कथाकार गोविन्द मिश्र के इन शब्दों को उद्धृत किया जाना चाहिए—'ऐसा शायद हमेशा रहा होगा जब एक समय में लिख रहे दो साहित्यकार पारस्परिक संवाद में लम्बे समय के लिए रहे हों—उनकी हर रचना में पारस्परिक साझेदारी रही हो। मुंशी अजमेरी और मैथिलीशरण गुप्त, गुलेरी जी और रामचन्द्र शुक्ल आदि में ऐसा कुछ सुना जाता है। ये वे दिन थे जब चीज़ें अपेक्षाकृत साफ़ थीं, आस्थाएँ भी सुनिश्चित थीं। आज जैसा आस्था का संकट तब नहीं था। इसलिए तब रचनाशीलता में साझेदारी फ़ॉर्म, भाषा, छन्द...इन तक सीमित रहती होगी। जो हमारा समय है, उसमें संवाद, साझेदारी रचना के पहले की...ये ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं...कि हम एक-दूसरे को भटकने से बचाए रख सकें, जो साहित्य में संघर्ष का रास्ता है, उसी पर चलने की अपनी ज़िद बनाए रख सकें। जो तकलीफ़ें, विषाद, संत्रास उपजे, उन्हें आपस में बाँटते हुए चल सकें—चलने की गरिमा महसूस करते हुए। बल्लभ और मेरा संवाद जो इधर अनायास हुआ, वह इसी कशिश को लेकर हुआ है।’
एक समय और एक ही विधा में लिख रहे दो संवेदनशील साहित्यकारों—गोविन्द मिश्र और बल्लभ सिद्धार्थ—के इस संवाद में प्रेरणा एक-दूसरे को तर्क से काटने की नहीं, बल्कि दूसरे की बात को कुरेदने और विस्तार करने की है। यह संवाद उन सभी सवालों से जूझता है, जिनसे आज का कोई भी रचनाकार किनारा नहीं कर सकता—दुःख, संत्रास, जीवन, संसार, आज का समय, लेखकीय कर्म, अध्यात्म और धर्म, समाज या व्यवस्था और लेखक का विरोध, उस विरोध का स्वरूप, साहित्य और कला की पहचान, कलाकार की मृत्यु...और, और भी जाने कितने सवाल। इन बड़े सवालों की तह में हमें दो लेखकों की कशमकश की झलक भी मिलती है। अगर लेखक की कार्यशाला जैसी कोई चीज़ हो सकती है तो यहाँ वह भी है।
संक्षेप में कहा जाए तो हिन्दी में अपनी तरह की यह पहली और दुर्लभ पुस्तक है।
Hindi Sahitya Ka Doosara Itihas
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

- Description:
‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ हिन्दी के मूर्द्धन्य आलोचक, चिन्तक डॉ. बच्चन सिंह की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
उन्होंने भूमिका में लिखा है : ‘‘न तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर। नए इतिहास के लिए शुक्ल जी का इतिहास एक चुनौती है...।’’ किन्तु उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारते हुए आगे लिखा : ‘‘रचनात्मक साहित्य पुराने पैटर्न को तोड़कर नया बनता है, तो साहित्य के इतिहास पर वह क्यों न लागू हो?’’ ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ साहित्येतिहास के लेखन के परिप्रेक्ष्य में यही नया पैटर्न ईजाद करने का साहसिक प्रयास है।
लेखक ने पुस्तक के पहले संस्करण की भूमिका में इस नए पैटर्न की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए लिखा : ‘‘शुक्ल जी के इतिहास का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण सन् 1940 में छपा था। उसके प्रकाशन के बाद 50 वर्ष से अधिक का समय निकल गया। इस अवधि में अनेकानेक शोध-ग्रन्थ छपे, नई पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुईं, ढेर-सा साहित्य लिखा गया। नया इतिहास लिखने के लिए यह सामग्री कम पर्याप्त और कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि शुक्ल जी का इतिहास औपनिवेशिक भारत में लिखा गया। अब देश स्वतंत्र है। उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की अपनी समस्याएँ हैं। सांस्कृतिक-सामाजिक संघर्ष हैं, इन्हें देखने-समझने का बदला हुआ नज़रिया है। इस नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा।’’
यह 'दूसरा इतिहास’ इसी अर्थ में कुछ दूसरे ढंग से लिखा हुआ इतिहास है।
यह ग्रन्थ इतिहास की धारावाहिक निरन्तरता के साथ ही हिन्दी के प्रमुख साहित्यकारों और साहित्यिक कृतियों का मौलिक दृष्टि से मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही डॉ. बच्चन सिंह ने अपने निजी दृष्टिकोण तथा साहित्यिक समझ के आधार पर इसमें बहुत कुछ नया जोड़ा है जो इस कृति को सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य का विशिष्ट इतिहास प्रमाणित करता है।
Dushyant Kumar Ki Ghazlon Ka Rachna Vidhan
- Author Name:
Mithilesh Wamankar
- Book Type:

- Description:
This book has no description
Nirala : Aatmhanta Astha
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
‘निराला : आत्महन्ता आस्था’ दरअसल एक नए कवि-कथाकार द्वारा एक-दूसरे कवि का आत्मीय विश्लेषण है। इसका एक नाम यह भी हो सकता था—‘एक लेखक की निजी नोट-बुक में एक दूसरा लेखक’। यह पुस्तक लेखक के उन्हीं ‘नोट्स’ का क्रमबद्ध रूपान्तरण है, उसके निजी आनन्द की अभिव्यक्ति है। लेकिन आनन्द की यह अभिव्यक्ति लेखक के श्रद्धा-विगलित क्षणों की उपज न होकर, उसके दिमाग़ की तार्किक रस-सिद्धि का परिणाम है; उसके सधे हुए सुर की झंकार है। अत: उसमें एक तर्कपूर्ण निजी शास्त्रीयता भी है। इसीलिए वह मात्र प्रशस्ति-वाचन या निन्दा नहीं है, बल्कि निराला की काव्य-ऊर्जा तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक नया और निजी द्वार है, जिससे जागरूक पाठक और नए आलोचक एक नई जगह से उस सिंह के दर्शन कर सकें। जब आप इस नए द्वार से प्रवेश करेंगे—तभी समझ सकेंगे कि क्यों निराला दूसरे छायावादी कवियों से विरोधी दिशा के कवि हैं? क्यों उनको बने-बनाए काव्य-सिद्धान्तों में 'फिट-इन' नहीं किया जा सकता? क्यों उनकी रचनात्मकता का अध्ययन करने के लिए काल-क्रम का आधार बेमानी ठहरता है? तब आप उस अँधेरी गुफा में बैठी, उन जलती आँखों के सान्द्र प्रकाश का साक्षात्कार कर पाएँगे। इसी साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत है यह पुस्तक—‘निराला : आत्महन्ता आस्था’।
Bhasha Vigyan Ki Bhumika
- Author Name:
Aacharya Devendranath Sharma
- Book Type:

- Description:
इस पुस्तक की उपादेयता, लोकप्रियता एवं सामयिकता का प्रमाण यह है कि गत चैंतीस वर्षों में इसके चार संस्करण और बीस से अधिक पुनर्मुद्रण हो चुके हैं। नवीन संस्करण में ग्रन्थ की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए संशोधन एवं परिवर्धन का प्रयास किया गया है।
‘भाषाविज्ञान का इतिहास’ नामक अध्याय में बीसवीं शताब्दी में भाषाविज्ञान के विकास का प्रकरण ग्रन्थ को समसामयिक बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त भाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान और संगणक भाषाविज्ञान का परिचय इस नवीन संस्करण की अन्यतम विशेषता है। इससे पाठकों को न केवल इन विषयों की जानकारी मिलेगी, अपितु भाषाविज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति को दिशा–चयन में भी सहायता मिलेगी।
Mitti Ki Oar
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description:
v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>प्रस्तुत निबन्ध-संग्रह में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चौदह आलोचनात्मक निबन्ध संगृहीत हैं जो वर्तमान हिन्दी साहित्य के विषय पर लिखे गए हैं।</p> <p>राष्ट्रकवि ने इस निबन्ध-संग्रह में ‘इतिहास के दृष्टिकोण से’, ‘दृश्य और अदृश्य का सेतु कला में सोद्देश्यता का प्रश्न’, ‘हिन्दी कविता पर अशक्तता का दोष’, ‘वर्तमान कविता की प्रेरक शक्तियाँ’, ‘समकालीन सत्य से कविता का वियोग’, ‘हिन्दी कविता और छन्द’, ‘प्रगतिवाद’, ‘समकालीनता की व्याख्या’, ‘काव्य समीक्षा का दिशा-निर्देश’, ‘साहित्य और राजनीति’, ‘खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि’, ‘बलिशाला ही हो मधुशाला’, ‘कवि श्री सियारामशरण गुप्त’, ‘तुम घर कब आओगे कवि’ इत्यादि विचारोत्तेजक निबन्ध संगृहीत हैं।</p> <p>आशा है नए कलेवर में यह संग्रह पाठकों को अवश्य पसन्द आएगा।</p>
Kavya Ki Aatma Aur Aatmiyakaran
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक गहन अध्ययन, चिंतन, मनन के उपरांत ठोस प्रमाणों और वैज्ञानिक समझ का समावेश करते हुए लिखी गई है। रागात्मक चेतना को काव्य की आत्मा सिद्ध करते हुए संस्कृत काल से चली आ रही रस, ध्वनि, अलंकार , औचित्य, रीति, सात्विक बुद्धि की काव्य के संदर्भ में इनके आत्मा होने के अस्तित्व मान्यताओं को खारिज कर, यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इन सबको आलोकित करने वाला एक ही प्राण तत्त्व है - रागात्मक चेतना। यही सच्चे अर्थों में काव्य की आत्मा है। इसी रागात्मक चेतना से रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य, रीति आदि की सत्ता प्रकाशमय होती है। इसी रागात्मक चेतना को आधार बनाकर अति प्राचीन और वर्तमान समय तक सर्वमान्य सिद्धांत साधारणीकरण को असत्य सिद्ध किया है। इस नाते पुस्तक - काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण एक शोधपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों से युक्त अद्भुत, मौलिक, और सुधी शोध कर्त्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृति है।
Rashtrabhasha Hindi Samasyaye Aur Samadhan
- Author Name:
Aacharya Devendranath Sharma
- Book Type:

- Description:
हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी पा गई, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ अन्दरूनी भी हैं और बाह्य भी। अन्दरूनी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है, किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा की राह में रोड़े आना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु जागरूक राष्ट्र के लिए उन्हें हल कर लेना भी कठिन नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक के विद्वान् लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सभी समस्याओं पर बड़ी गहराई से अध्ययन करके उनका समाधान खोजने का स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने समस्याओं पर चिन्तन करने के पूर्व भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अन्तर्सम्बन्ध पर गहन विचार करने के पश्चात् हिन्दी के महत्त्व का गहराई से विवेचन किया है, जिससे इस भाषा के राष्ट्रभाषा का स्वरूप और उसकी अनिवार्यता पूरी तरह स्थापित हो जाती है। इसी सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने हिन्दी भाषा की सरलता का विवेचन किया है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है। इस सम्बन्ध में विचार करते समय हिन्दी के और अधिक सरलीकरण पर भी विचार किया गया है।
Rashtrabhasha Hindi Samasyaye Aur Samadhan
Aacharya Devendranath Sharma
20% off₹ 400
₹ 320
Available
Samajik Vimarsh ke Aaine Mein 'Chaak'
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
- Book Type:

- Description:
रेशम विधवा थी—ज़माने के लिए, रीति-रिवाजों के लिए, शास्त्र-पुराणों के चलते घर और गाँव के लिए। विधवा सिर्फ़ विधवा होती है, वह औरत नहीं रहती—फिर यह बात पता नहीं उसे किसी ने समझाई कि नहीं? और रेशम ने, विधवा रेशम ने गर्भ धारण कर लिया। मगर जब सास ने कौड़ी-सी आँखें निकालकर उसे देखा, यह कहते हुए—‘मेरे बेटा की मौत से दगा करनेवाली, हरजाई, बदकार तेरा मुँह देखने से नरक मिलेगा’, तो रेशम ने कहा—‘आज को तुम्हारा बेटा मेरी जगह होता तो पूछती कि तू किसके संग सोया था?...तुम ख़ुश हो रही होतीं कि पूत की उजड़ी ज़िन्दगी बस गई। पर मेरा फजीता करने पर तुली हो।’
उपन्यास के शुरुआती पृष्ठों पर ही सास और गर्भवती विधवा बहू के बीच यह दृश्य खड़ा कर मैत्रेयी ने पहली बार स्त्री की निगाह से देखने की पहल की है। अन्तत: हिन्दी आलोचना का चला आता सामाजिक व्याकरण यहाँ अचकचा उठता है और आलोचकों को अपना परम्परागत सामाजिक ऑनर याद आने लगता है, जिन्होंने घर-परिवार के घिसे-पिटे और सामाजिक जीवन में लाई जानेवाली फ़ॉर्मूलाई तरक़़ीबों और क्रान्तिभ्रष्ट क्रान्तियों के यथार्थ को अपने किसी साफ़-सुथरे और दिखावटी सच की तरह अब तक पाल-पोस रखा था। मैत्रेयी का लेखन नए सिरे से पढ़ने की ज़मीन तैयार करता है। यह भी पूछने का मन बनाता है कि महादेवी, तुम नीर और भरी दु:ख की बदली क्यों हो? क्यों इस विस्तृत नभ का कोई एक कोना भी तुम्हारा अपना नहीं है? क्या किसी आलोचक ने इसके सामाजिक-आर्थिक आशयों और आधारभूत ज़मीनी सच्चाइयों पर बात करना ज़रूरी माना? मैत्रेयी इस अर्थ में एक समर्पणशील विनयी लेखिका नहीं हैं। उनकी बनावट में यह है ही नहीं। किसी भी क़दम पर वे गुड़िया बनने को तैयार नहीं हैं। ‘चाक’ इस सम्बन्ध में उनके लेखन का घोषणा-पत्र भी है और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी। यही इसका अन्तरंग चरित्र और औपन्यासिक शील भी है।
Gyan Aur Karm
- Author Name:
Vishnukant Shastri
- Book Type:

- Description:
...ईशावास्योपनिषद् अपने लघु कलेवर में अर्थ का विस्तृत आकाश समेटे हुए है।...सन्तों का आश्वासन है कि गुरु कृपा से पिपीलिका भी विहंगम मार्ग की अधिकारिणी हो जाती है। ईशावास्य को प्रवचन-यात्रा के प्रतिपाद में मुझे अपने गुरु ब्रह्मीभूत स्वामी अखंडानन्द सरस्वती की कृपा के सम्बल का अनुभव होता रहा, तभी तो यह वाचिक परिक्रमा पूरी हो सकी।...इस पुस्तक में जो भी है, वह गुरु जी की तथा शंकर, रामानुज, विनोबा सदृश अन्य पूर्वाचार्यों की कृपा का सुफल है...।
Premchand Ke Aayam
- Author Name:
A. Arvindakshan
- Book Type:

- Description:
प्रायः प्रेमचन्द के पाठक उन्हें यथार्थवाद के प्रवर्तक और किसानी जीवन के चितेरा मानते हैं। सही भी है। यह प्रेमचन्द का एक आयाम है। किन्तु प्रेमचन्द द्वारा प्रवर्तित यथार्थवाद सिर्फ़ एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं है। उनका यथार्थवाद भारतीय इतिहास के यथार्थ से उद् भूत एक विराट पहचान है, जिसको सरसरी दृष्टि से देखकर साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित करना इतिहास को अनदेखा करना है। अतः यह आवश्यक है कि उनकी यथार्थ-दृष्टि के मूल में स्थित इतिहास के विस्तृत फलक को देखें और परखें। प्रेमचन्द सम्बन्धी इस अध्ययन का मूल उद्देश्य यही है, जिसमें सिर्फ़ प्रेमचन्द को ही नहीं पहचाना गया है बल्कि उनके समय ने भी मूर्तरूप ले लिया है। इस अर्थ में प्रेमचन्द का आस्वादन समान्तरतः संस्कृति का गम्भीर विश्लेषण भी है।
प्रेमचन्द की विपुल सम्भावनाओं को दृष्टि में रखकर ही इस ग्रन्थ का शीर्षक ‘प्रेमचन्द के आयाम’ रखा गया है। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें भारत के विभिन्न गाँवों, क़स्बों, शहरों और महानगरों के लेखकों के आलेख हैं। इसमें हिन्दी के प्रतिष्ठित समीक्षकों के साथ-साथ उभरते लेखकों के विचार भी शामिल हैं। प्रेमचन्द के बहाने अपने समय का पुनर्मूल्यांकन इन आलेखों का अभीष्ट है।
Nirala Ki Sahitya Sadhana : Vol. 1-3
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

- Description:
कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का लोक-मांगल्य और रवीन्द्र का सौन्दर्यबोध की त्रयी निराला में न केवल विलीन होती है बल्कि उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को ऐसी ऊँचाइयाँ प्रदान करती है जिसका उदाहरण हिन्दी साहित्य में विरल है। यही स्थापना है ‘निराला की साहित्य साधना’ की। डॉ. रामविलास शर्मा की तीन खंडों में उपलब्ध ऐसी कृति है जिसमें हिन्दी आलोचना के विभिन्न आयामों का उद्घाटन हुआ है।
रामविलास शर्मा अरसे तक निराला के साथ रहे थे और वे उनकी रचना-प्रक्रिया तथा जीवन-शैली के तटस्थ द्रष्टा थे। उन्होंने अपना पहला निबन्ध निराला पर ही लिखा था और उनकी पहली आलोचनात्मक पुस्तक भी निराला पर केन्द्रित होकर आई, मगर इससे रामविलास शर्मा का जी नहीं भरा। अनवरत-शोध और अध्ययन के परिणामस्वरूप उनकी अविस्मरणीय कृति ‘निराला की साहित्य साधना’ हमारे सामने आई। यह कृति निराला का जीवन-चरित भी है और उनके साहित्य का मूल्यांकन भी।
‘निराला की साहित्य साधना’ में निराला के अनेक अल्पज्ञात अथवा अज्ञात तथ्यों का उद्घाटन हुआ है। निराला के व्यक्तित्व के जटिल और सूक्ष्म अन्तर्विरोधों से निःसृत कृतित्व का इस पुस्तक में मर्मस्पर्शी मूल्यांकन हुआ है जो अत्यन्त दुर्लभ तो है ही, बेमिसाल भी है।
Rashtrabhasha Aur Rashtriya Ekta
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description:
– ‘जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परम्पराओं को भूलकर दूसरों की परम्पराओं का अनुकरण करने लगती हैं। इस सांस्कृतिक दासता का भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा अपना लेती है। फल यह होता है कि वह जाति अपना व्यक्तित्व खो बैठती है। उसके स्वाभिमान का विनाश हो जाता है!' स्वाधीनता के सात वर्ष बाद राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा दी गई यह गम्भीर चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी।
दिनकर जी एक समर्थ कवि और ओजस्वी वक्ता ही नहीं, प्रखर चिन्तक भी थे। इस संग्रह में जो विचारोत्तेजक, सारगर्भित भाषण और लेख संगृहीत हैं, वे इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
'राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता' पुस्तक जिसका विषय प्राय: भाषा और संस्कृति है, देश की ज्वलन्त समस्याओं के प्रति दिनकर जैसे एक साहित्यकार का निर्भीक दृष्टिकोण भी है।
संस्कृति की रचना और अभिव्यक्ति कला के माध्यम से होती है और भारतीय कला का यह स्वाभाव है कि वह यूरोप की कलात्मक भंगिमाओं से सामंजस्य नहीं बिठा सकती। प्राचीन काल में, यूनानी कला का सम्मिश्रण भारतीय कला से हुआ था। परिणामस्वरूप, गांधार-कला का जन्म हुआ किन्तु वह भारत में टिक नहीं सकी, क्योंकि वह अभारतीय थी, क्योंकि भारत की आत्मा अपने को इस मिश्रित कला के भीतर से व्यक्त नहीं कर सकती थी ।
Zamane Se Do Do Hath
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

- Description:
प्रो. नामवर सिंह हिन्दी का चेहरा हैं। उनमें हिन्दी समाज, साहित्य-परम्परा और सर्जना की संवेदना रूपायित होती है। वे न सीमित अर्थों में साहित्यकार हैं और न आलोचक। वे हिन्दी में मानवतावादी, लोकतांत्रिक और समाजवादी विचारों की व्यापक स्वीकृति के लिए सतत संघर्षशील प्रगतिशील आन्दोलन के अग्रणी विचारक थे। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज और राजनीति की जनपक्षधर शक्तियों को उन्होंने अपनी वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोकसंवेदी-तर्कप्रवण वक्तृता से निरन्तर मज़बूत किया। वे देश में समतावादी समाज का सपना सँजोये रखनेवाली सामाजिक शक्तियों के पक्ष में सामन्तवादी-पुनरुत्थानवादी शक्तियों और पूँजीवादी शक्तियों से निरन्तर मुठभेड़ जारी रखनेवाले वैचारिक योद्धा थे। उन्होंने जहाँ एक ओर धर्म, लोक, परम्परा और संस्कृति के मानवीय मूल्यों पर ज़ोर देनेवाली विरासत की सटीक व्याख्या की है, वहीं इनको उपकरण बनाकर सामाजिक भेदों को स्वीकृत करानेवाले बौद्धिक प्रयत्नों के ख़िलाफ़ हमलावर तेवर भी अपनाए। उन्होंने परम्परा और आधुनिकता के मूल्यांकन की प्रगतिशील परम्परा को आगे बढ़ाया।
प्रस्तुत संग्रह में नामवर जी के विगत दो दशकों में दिए गए अनेक व्याख्यानों एवं वाचिक टिप्पणियों के साथ दो आलेख शामिल हैं, जिनमें भूमंडलीकरण, फासीवाद, साम्प्रदायिकता भाषा और संस्कृति के ज्वलन्त सवालों पर नामवर जी के विचार हिन्दी समाज की जड़ता को तोड़ने के क्रम में हमारे सामने आते हैं।
Samta Aur Sampannta
- Author Name:
Rammanohar Lohia
- Book Type:

- Description:
राजनीति के साधारण कार्यकर्ता को मात्र दर्शक नहीं होना चाहिए। उसे पढ़ना-लिखना चाहिए। देश-विदेश की जानकारी और छोटी-बड़ी सूचनाओं पर उसकी नज़र रहनी चाहिए। दरबारगीरी, चापलूसी और चुगलखोरी उसके सबसे बड़े दुश्मन हैं। इन्हीं के चलते भारतीय राजनीति पर यथास्थितिवाद का आवरण पड़ गया है।
बातें जो लोहिया ने 1967 में लिखे एक लेख में कही थीं, इस बात का सबूत हैं कि वे अपने देश की समस्याओं को कितनी गहराई से देख-समझ रहे थे। ‘गैरकांग्रेसवाद और समाजवाद’ शीर्षक इस आलेख में उन्होंने उन विसंगतियों की तरफ़ उसी समय इशारा कर दिया था जो आगे चलकर बहुत नुकसानदेह साबित होनेवाली थीं।
इसी पुस्तक में ‘अंग्रेज़ी हटाओ’ के मुद्दे पर विचार करते हुए वे लिखते हैं : ‘मेरी अपनी राय है कि एक दफ़ा अंग्रेज़ी को हटा करके सभी भाषाओं को मौक़ा दे दिया जाए।’ लोग अंग्रेज़ी में काम न करें, या तो हिन्दी में करें या फिर अपनी मातृभाषा में। इसी आलेख में हिन्दी और उर्दू के विषय में उनका कहना है कि ‘हिन्दुस्तानियों में हिम्मत रही तो हिन्दी-उर्दू एक ही भाषा के दो नाम, रूप और शैलियाँ होकर रहेंगी।’
इस पुस्तक में उनके ऐसे ही अनेक विचार हमें पढ़ने को मिलते हैं जो उनकी दूरदृष्टि और मौलिक सोच के परिचायक हैं। समाज में छोटी मशीनों की उपयोगिता, समता और सम्पन्नता के सम्बन्ध आदि सैद्धान्तिक विषयों के अलावा यहाँ ‘नक्सलबाड़ी’, ‘विद्यार्थी आन्दोलन’, ‘चाँद की यात्रा’ और ‘हिमालय बचाओ’ जैसी तात्कालिक घटनाओं और उनसे जुड़े मुद्दों पर भी उनकी टिप्पणियाँ शामिल हैं।
यह पुस्तक लोहिया के चिन्तन के आधारभूत तत्त्वों को रेखांकित करती हैं।
Aadhunik Kavita Ka Punarpath
- Author Name:
Karunashankar Upadhyay
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक भारतेन्दु से लेकर समसामयिक कविता तक में विद्यमान नए पाठ की सम्भावना का सन्धान करते हुए उसका वस्तुनिष्ठ एवं गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें ‘भारतेन्दु का काव्यदर्शन’, ‘शलाकापुरुष महावीर प्रसाद द्विवेदी की नारी चेतना’, ‘साकेत की उर्मिला का पुनर्पाठ’, ‘गुप्त जी की कैकेयी का नूतन पक्ष’, ‘जयशंकर प्रसाद के पुनर्मूल्यांकन के ठोस आयाम’, ‘प्रसाद साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप’, ‘कामायनी में प्रकृति-चित्रण का स्वरूप’, ‘कामायनी : एक उत्तर आधुनिक विमर्श’, ‘स्त्री-विमर्श और प्रसाद काव्य के शिखर नारी चरित्र’, ‘निराला की आलोचना-दृष्टि का विश्लेषण’, ‘दिनकर का कुरुक्षेत्र’, ‘रश्मिरथी का पुनर्पाठ’, ‘शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के काव्य में राष्ट्रीय चेतना’, ‘अज्ञेय के काव्य में संवेदनशीलता’, ‘भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में गांधीवादी चेतना’, ‘नरेश मेहता का संवेदनात्मक औदात्य’, ‘मुक्तककार बेकल’, ‘अन्तस् के स्वर : कवि मन की पारदर्शी अभिव्यक्ति’, ‘धूमिल अर्थात् कविता में लोकतंत्र’, ‘ग़ज़ल दुष्यन्त के बाद : एक विश्लेषण’, ‘कविता का समाजशास्त्र एवं शोभनाथ यादव की कविताएँ’, ‘कविताओं का सौन्दर्यशास्त्र और शोभनाथ की कविताएँ’, ‘रुद्रावतार : अद्भुत भाषा सामर्थ्य की विलक्षण कविता’, ‘संशयात्मा के ख़तरे से आगाह कराती कविताएँ’, ‘हिन्दी ग़ज़ल का दूसरा शिखर : दीक्षित दनकौरी’, ‘ग़ज़ल का अन्दाज़ ‘कुछ और तरह से भी’’, ‘चहचहाते प्यार की गन्ध से घर-बार महकाते गीत’, ‘सामाजिक प्रतिबद्धता का दलित-स्त्रीवादी वृत्त’, ‘समकालीन हिन्दी कविता : दशा एवं दिशा’ तथा ‘समकालीन कविता के सामाजिक सरोकार’ जैसे विषयों के अन्तर्गत इस युग के समूचे काव्य का विशद् विश्लेषण किया गया है। साथ ही परिशिष्ट के अन्तर्गत ‘जन अमरता के गायक विंदा करंदीकर’ तथा ‘परम्परा एवं आधुनिकता के समरस कवि अरुण कोलटकर’ जैसे शीर्षकों के अन्तर्गत मराठी के दो शिखर कवियों का सम्यक् विश्लेषण किया गया है।
छात्रों, मनीषियों, चिन्तकों तथा सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी यह पुस्तक आधुनिक काव्य पर विशिष्ट अध्ययन होने के साथ-साथ नवीन समीक्षात्मक प्रतिमानों के सन्धान द्वारा उसका पुनर्पाठ तैयार करने का एक गम्भीर और साहसिक प्रयास है।
Sahityalochan
- Author Name:
Shyam Sundar Das
- Book Type:

- Description:
‘साहित्यालोचन’ का प्रकाशन 1922 में हुआ था। हिन्दी भाषा के अध्ययन-अध्यापन और विकास के लिए बाबू श्यामसुन्दर दास ने जो प्रयास किए थे, उनमें इस पुस्तक का विशिष्ट स्थान है।
यह पुस्तक साहित्य और अन्यान्य कलाओं की मूल अवधारणाओं का निरूपण करते हुए, कला के भिन्न-भिन्न रूपों, और विशेष रूप से साहित्य की विभिन्न श्रेणियों के आस्वादन और तदनुरूप उनके विवेचन की आधारशिला रखनेवाली कृति है। ग़ौरतलब है कि बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में जब हिन्दी की रचनात्मकता अपने शास्त्र की खोज ही कर रही थी, इस पुस्तक की मूल प्रस्थापनाओं में इस बात को रेखांकित करना उन्हें आवश्यक लगा था कि आलोचना-समीक्षा अथवा शास्त्र का काम साहित्य-रचना के लिए नियमों का निर्धारण नहीं है, बल्कि उसके साथ चलते हुए अपनी भी दृष्टि का विस्तार करना है। लेकिन आज भी आलोचना अक्सर इस भ्रम में भटक जाती है कि वह रचना को रास्ता दिखानेवाली कोई मशाल है।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए हम जान पाते हैं कि हमारी भाषा का वह युग सत्य और तर्क को लेकर कितना सजग था और आज भी हमें उस दृष्टि की कितनी आवश्यकता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि गत लगभग एक सदी से यह पुस्तक अपनी उपयोगिता को बरकरार रखे हुए है, और आज भी न सिर्फ़ छात्रों के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उपादेय है जो हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति गम्भीर है।
Humsafaron Ke Darmiyan
- Author Name:
Shamim Hanfi
- Book Type:

- Description:
आधुनिक उर्दू कविता के बारे में यह छोटी-सी किताब मेरे कुछ निबन्धों पर आधारित है। समकालीन साहित्य और उससे सम्बन्धित समस्याएँ मेरी सोच और दिलचस्पी का ख़ास विषय रही हैं। पिछले पचास-साठ बरसों में मैंने इस विषय पर कम से कम साठ-सत्तर निबन्ध लिखे होंगे। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के बहुत से शायरों को मैंने अपने आलोचनात्मक अध्ययन का बहाना बनाया यानी कि ग़ालिब से लेकर आज तक की शायरी में मेरी गहरी दिलचस्पी रही है।
यहाँ आगे बढ़ने से पहले एक और सफ़ाई देना चाहता हूँ। पारम्परिक प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद में मेरा विश्वास बहुत कमज़ोर है। मैं समझता हूँ कि हमारी अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परम्परा के सन्दर्भ में ही हमारे अपने प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकता की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। हमारा जीवन हमारे समय के पश्चिमी जीवन और सोच-समझ की कार्बन कॉपी नहीं है। जिस तरह हमारा सौन्दर्यशास्त्र या Aesthetic Culture अलग है, उसी तरह हमारी प्रोग्रेसिविज़्म (Progressivism) और Modernity या ज़दीदियत भी अलग है। मैंने इसी दृष्टिकोण के साथ आधुनिक युग के अधिकतर शायरों को समझने की कोशिश की है।
ये निबन्ध मेरी दो किताबों—'हमसफ़रों के दरमियाँ’ (सह-यात्रियों के बीच) और 'हमनफ़सों की बज़्म में’ (यार-दोस्तों की सभा में) से लिए गए हैं। इनमें मेरा विषय बननेवाले शायरों का स्वभाव, चरित्र, चेतना और रूप-रंग अलग-अलग हैं। मैं समझता हूँ कि आधुनिकतावाद को इसी भिन्नता और बहुलता का प्रतीक होना चाहिए।
—शमीम हनफी (प्रस्तावना से)
''हालाँकि हिन्दी में उर्दू साहित्य के आधुनिक दौर के अधिकांश शायरों से ख़ासी वाक़िफ़यत रही है, उन पर स्वयं उर्दू में जो विचार और विश्लेषण हुआ है, उससे हमारा अधिक परिचय नहीं रहा है। शमीम हनफी स्वयं शायर होने के अलावा एक बड़े आलोचक के रूप में उर्दू में बहुमान्य हैं। उनके कुछ निबन्धों के इस संचयन के माध्यम से उर्दू की आधुनिक कविता की कई जटिलताओं, तनावों और सूक्ष्मताओं को जान सकेंगे और कई बड़े उर्दू शायरों की रचनाओं का हमारा रसास्वादन गहरा होगा। हमें यह संचयन प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता है।”
—अशोक वाजपेयी
Bhasha Vigyan : Saidhantik Chintan
- Author Name:
Ravindranath Shrivastava
- Book Type:

- Description:
प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव भारतीय भाषा-समुदायों, विशेषकर हिन्दी भाषा-समुदाय की संरचना को व्याख्यायित करनेवाले विद्वानों में एक प्रसिद्ध नाम है। प्रस्तुत पुस्तक प्रो. श्रीवास्तव के भाषावैज्ञानिक सैद्धान्तिक चिन्तन पर प्रकाश डालती है। रूसी, अमरीकी विभिन्न भाषा विश्लेषण पद्धतियों से परिचित होने के बावजूद उन्होंने भारतीय चिन्तन परम्परा को अपने विवेचन का आधार बनाया। इन लेखों के द्वारा जहाँ उनके चिन्तन की गहराई का पता चलता है, वहाँ संस्कृत वैज्ञानिक विश्लेषण के प्रति उनके लगाव का भी परिचय मिलता है। इस सामग्री से विद्यार्थियों में भाषाविज्ञान के प्रति रुचि उत्पन्न होगी, साथ ही भाषावैज्ञानिक सैद्धान्तिक चिन्तकों को दिशा-निर्देश भी प्राप्त होगा। विश्वास है, यह पुस्तक तथा इस शृंखला की अन्य पुस्तकें भी प्रो. श्रीवास्तव के भाषा-चिन्तन को प्रभावशाली ढंग से अध्येताओं तक पहुँचाएँगी।
Ritikavya: Mulyankan Ke Naye Ayam
- Author Name:
PRABHAKAR SINGH
- Book Type:

- Description:
रीतिकाव्य साहित्य और संवेदना का सौन्दर्यबोधीय और कलात्मक सृजन है। कोई भी जाति, सौन्दर्य और शृंगार से विलग होकर न तो जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर सकती है न विचारों में तेज। रीतिकाव्य मनुष्य की ऐहिकता को कला और सौन्दर्य के वैभव में सिरजने वाला काव्य है। हिन्दी- उर्दू कविता की साझा भाषायी संस्कृति भी इसी युग में प्रतिफलित हुई। साहित्येतिहास और आलोचना लेखन के विकास में 'रीतिकाव्य' को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से ही आकलित किया गया। आलोचना और इतिहास लेखन के आरम्भिक दौर में 'रीतिकाव्य' को औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता के चश्मे से ही देखा गया। द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी आलोचना का ऐसा अभियान चलाया कि हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचक भी मूल्यांकन की इस विरोधी परम्परा को पोषित-पल्लवित करते नजर आते हैं। ये आलोचक रीतिकालीन कवियों के काव्य मर्म की तो प्रशंसा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय रीतिकाव्य को दरबारी मानसिकता को पोषित करने वाला सामन्ती साहित्य कहकर उसे जनविरोधी कविता के खाँचे में डाल देते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा के वर्चस्ववादी और औपनिवेशिक नैतिकता के संश्लेष से निर्मित इस 'इतिहास दृष्टि' से उबरकर ही 'रीतिकाव्य' के साहित्य की सही पड़ताल की जा सकती है। यह पुस्तक रीतिकाव्य में विन्यस्त कला, सौन्दर्य और सृजन के वैभव को इतिहास की निरन्तरता में मूल्यांकित करने का प्रयास है। पुस्तक में रीतिकाव्य विषयक इतिहास, लेखन और आलोचना दृष्टि पर पुनर्विचार के साथ रीतिकाव्य के परिवेश, प्रवृत्ति और उसकी कविताई को साहित्य के नये विमर्शो और मूल्यों के साथ परखने की कोशिश है। पुस्तक में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय, नित्यानन्द तिवारी जैसे वरिष्ठ पीढ़ी के आलोचकों के साथ युवा पीढ़ी के आलोचकों में श्रीप्रकाश शुक्ल, कृष्णमोहन और आशीष त्रिपाठी के आलेख रीतिकाव्य को मूल्यांकित करने की नयी दृष्टि प्रदान करते हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book