Vikas Ke Path
Author:
Nitin GadkariPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 560
₹
700
Available
Awating description for this book
ISBN: 9788173159138
Pages: 376
Avg Reading Time: 13 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Hindi Ki Shabd Sampada
- Author Name:
Vidhyaniwas Mishra
- Book Type:

-
Description:
ललित निबन्ध की शैली में लिखी गई भाषाविज्ञान की यह पुस्तक अपने आपमें अनोखी है। इस नए संशोधित-संवर्द्धित संस्करण में 12 नए अध्याय शामिल किए गए हैं और कुछ पुराने अध्यायों में भी छूटे हुए पारिभाषिक शब्दों को जोड़ दिया गया है। जजमानी, भेड़-बकरी पालन, पर्व-त्योहार और मेले, राजगीर और संगतरास आदि से लेकर वनौषधि तथा कारख़ाना शब्दावली जैसे ज़रूरी विषयों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। अनुक्रमणिका में भी शब्दों की संख्या बढ़ा दी गई है।
बकौल लेखक : “यह साहित्यिक दृष्टि से हिन्दी की विभिन्न अर्थच्छटाओं को अभिव्यक्त करने की क्षमता की मनमौजी पैमाइश है : न यह पूरी है, न सर्वांगीण। यह एक दिङ्मात्र दिग्दर्शन है। इससे किसी अध्येता को हिन्दी की आंचलिक भाषाओं की शब्द-समृद्धि की वैज्ञानिक खोज की प्रेरणा मिले, किसी साहित्यकार को अपने अंचल से रस ग्रहण करके अपनी भाषा और पैनी बनाने के लिए उपालम्भ मिले, देहात के रहनेवाले पाठक को हिन्दी के भदेसी शब्दों के प्रयोग की सम्भावना से हार्दिक प्रसन्नता हो, मुझे बड़ी खुशी होगी।’’
Nirala Kriti Se Sakshatkar
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी आलोचना में डॉ. नंदकिशोर नवल का मुख्य कार्य-भार रहा है पाठ से हटी हुई आलोचना को पाठाधारित करना। यह काम उन्होंने इस तरह किया है कि आलोचना पाठ-केन्द्रित भी हो और वह अपने भीतर रचना के अदृश्य विस्तार को भी समेट सके। वे निराला-काव्य के समर्पित अध्येता रहे हैं और उन्होंने निराला पर शोध करने के साथ विश्वविद्यालय में लम्बे समय तक निराला-काव्य का अध्यापन भी किया है। हिन्दी संसार उनके द्वारा सम्पादित ‘निराला रचनावली’ के आठ खंडों में उनका श्रम और निष्ठा देख चुका है। प्रस्तुत पुस्तक के दो खंडों में उन्होंने निराला की महत्त्वपूर्ण काव्य-कृतियों का ऐसा पाठाधारित विश्लेषण किया है, जो जितना ही पांडित्य के पाखंड से शून्य है, उतना ही सरस और रचनात्मक। उचित ही उन्होंने कहा है कि उन्होंने निराला की कविता की पंखुड़ियाँ छिन्न-भिन्न नहीं कीं, सिर्फ़ इसके लिए प्रयास किया है कि वह अपनी नाल पर प्रस्फुटित हो जाए।
‘कृति से साक्षात्कार’ के प्रथम खंड में निराला की कालजयी पूर्ववर्ती कविताओं का विवेचन है और द्वितीय खंड में गीतों के साथ उनकी मध्यवर्ती और परवर्ती उन कविताओं का, जिन्होंने हिन्दी कविता में नए-नए वाग्द्वार खोले। 1936 में निराला ऐसा मानते थे कि उनकी शमा पूरी-पूरी नहीं जली, उसमें हज़ार-दो हज़ार बत्तियों की ताक़त नहीं आई। उनके पूर्ववर्ती कृतित्व के साथ मध्यवर्ती और परवर्ती कृतित्व को भी दृष्टि में रखने पर वह अपनी रोशनी से आँखें चौंधियाती दिखलाई पड़ती हैं।
डॉ. नवल के इस अध्ययन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह परवर्ती पीढ़ी के एक आलोचक द्वारा किया गया अध्ययन है, जिसमें दृष्टि की वस्तुपरकता तो है ही, नई काव्य-संवेदना की दीप्ति भी है।
Shreshth Nibandh : Aacharya Ramchandra Shukla
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘श्रेष्ठ निबन्ध’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के चुने हुए निबन्धों का संग्रह है—ऐसे निबन्ध जो उनके सभी प्रकार के निबन्धों का सही प्रतिनिधित्व करते हैं, साथ ही उनकी आचार्यसुलभ गरिमा को उद्भाषित भी करते हैं। इन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि आचार्य शुक्ल ने बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भारतीय रस-सिद्धान्त को पुनराख्यायित करते हुए काव्य की जिस विश्लेषणात्मक पद्धति का विकास किया, वह प्रासंगिकता की दृष्टि से आज भी कितनी महत्त्वपूर्ण है। उनकी निबन्ध-शैली की प्रायः सभी विशिष्टताओं की झलक इनमें मिल जाती है—चाहे वह उनकी विचारात्मकता हो या भावात्मकता अथवा व्यंग्यात्मकता। निबन्ध-रचना की दृष्टि से वह एक विचारक ही नहीं, बल्कि एक सहृदय रचनाकार के रूप में भी हमारे सामने प्रत्यक्ष हो उठते हैं।
ये श्रेष्ठ निबन्ध प्रस्तुत करते हुए डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने इसके आरम्भ में एक उपयोगी भूमिका दी है जिसमें आग्रह-मुक्त भाव से उन्होंने आचार्य शुक्ल की वैचारिकता का विवेचन और रचना-दृष्टि का विश्लेषण किया है।
Ekta Ki Brahmmurti Sardar Vallabhbhai Patel
- Author Name:
Baldev Vanshi
- Book Type:

- Description: सरदार वल्लभभाई पटेल को पहले से जानता था। जब वह भारतीय संविधान परिषद् के सदस्य थे तो मेरा उनसे परिचय बढ़ गया। वहाँ दिए हुए उनके भाषणों को मुझे अच्छी तरह स्मरण है। उनकी वाणी राष्ट्र की आवाज होती थी, जिसके संबंध में न तो कोई अशुद्धि कर सकता था और न भ्रांति हो सकती थी। जब वह बंबई के बिड़ला भवन में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे तो मुझे स्मरण है कि मैं सोवियत संघ जाते समय उनसे विदा लेने गया था। उन्होंने मुझे चेतावनी दी थी कि यह कार्य बड़े-बड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों को असफलता दे चुका है, किंतु साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ‘‘जहाँ अन्य व्यक्ति असफल हो चुके हैं, वहाँ आप सफल होंगे।’’ वास्तव में सरदार के उक्त शब्द मास्को में मेरे राजदूत काल भर मेरी स्मृति में रहे। मैं आपको यह बतला रहा हूँ कि वह किस प्रकार परिस्थिति के निर्णायक, भावी रूप के विधाता तथा सुदूर भविष्य को ठीक-ठीक देख लेने की क्षमता रखते थे। जब तक वर्तमान भारत जीवित है, उनका नाम वर्तमान भारत के ऐसे राष्ट्र-निर्माता के रूप में सदा स्मरण किया जाता रहेगा, जिन्होंने 600 भारतीय देशी राज्यों का एकमात्र संघ बनाया। उनका यह कार्य हमारे देश के एकीकरण की दिशा में अत्यधिक स्थायी कार्य था। इस विषय में उनके कार्य को हम कभी नहीं भूल सकते। जैसा कि मैंने कहा है, जब तक भारत जीवित है, वर्तमान भारत के निर्माता के रूप में उनका नाम सदा स्मरण किया जाता रहेगा। —आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री की पुस्तक ‘राष्ट्रनिर्माता सरदार पटेल’ से
Samkalin Hindi Upanyas : Samay Se Sakshatkar
- Author Name:
Dr. Alangvam Vijayalaxmi
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी उपन्यास और साठोत्तरी भारतीय जीवन–सन्दर्भ विशिष्ट संवाद–सूत्रों के सहारे आपस में जुड़े हुए हैं। इस जुड़ाव का विस्तार जिन कृतियों में ख़ास तौर पर विद्यमान हैं, उनमें ‘राग दरबारी’, ‘महाभोज’ और ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ की पहचान सबसे अलग है। साठोत्तरी भारत का कड़वा और नंगा सच इन रचनाओं की विषयवस्तु का जनक है। अपने देश और समाज के साथ–साथ अपने समय की परख करने के लिए इन उपन्यासों तथा इनके जैसी आँच रखनेवाले कुछेक अन्य उपन्यासों का अध्ययन विश्लेषण अनिवार्य है।
डॉ. ई. विजयलक्ष्मी ने अपनी इस समीक्षा–पुस्तक में मुख्यत: दस साठोत्तरी उपन्यासों को अध्ययन का आधार बनाया है और उनके सहारे अपने समय से साक्षात्कार का प्रयास किया है। उनके द्वारा चुने गए सभी उपन्यास महत्त्वपूर्ण लेखकों के हैं तथा लम्बे समय से चर्चा में रहे हैं। लेखिका ने उनके विश्लेषण व मूल्यांकन में उपलब्ध सामग्री का सदुपयोग किया है और अपने निजी अध्ययन से प्राप्त नवीन निष्कर्ष पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है। डॉ. विजयलक्ष्मी का यह समीक्षा–ग्रन्थ अध्ययन की स्वस्थ एवं तटस्थ परम्परा की पहचान कराने वाला है।
Surya Pranam
- Author Name:
Bimal Dey
- Book Type:

- Description: र्य प्रणाम’ का स्थान-काल, पात्र तथा घटनाएँ सभी वास्तविक हैं। मैं पर्यटक हूँ वास्तविक घटनाओं का उल्लेख करना ही मेरा धर्म है। यथार्थ के वर्णन में एकरसता आ जाती है। मैं एक पथिक हूँ अपनी यात्राओं के दौरान जो भी मैं देखता हूँ मुझे जो अनुभव होता है, उसी को मैं अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयत्न करता हूँ। मैंने अपनी यात्राओं के दौरान बहुत से मन्दिर, मठ और पूजास्थल देखे हैं, बहुत से तीर्थों में जाकर शीश नवाया है। हिमालय के बहुतेरे तीर्थस्थलों में मैंने देव-स्पर्श पाया, हिमालय की पुण्यभूमि में ही पुण्यात्माओं का आविर्भाव सम्भव है। एंडीज की यात्रा ने मुझे तपस्या की अन्तिम सोपान पर पहुँच दिया था। एंडीज तथा मध्य व दक्षिणी अमरीका की प्राचीन सभ्यता में ज्यों सूर्य को मूल देवता का स्थान प्राप्त था, त्यों ही जापान का मूल देवता भी सूर्य है। जापान के सम्राट को सूर्य का प्रतिनिधि मानते हैं, जापानी पताका का प्रतीक चिह्न भी सूर्य है। सूर्य का प्रभाव जापानियों के चरित्र में भी दिखाई देता है। सूर्य शक्ति और ओज का प्रतीक है। ‘सूर्य प्रणाम’ ग्रन्थ सूर्य-देवता के प्रति मेरा अर्घ्य है। सूर्य को देवता माननेवाले जापान और एंडीज में मैंने जो कुछ देखा, सुना और जाना, उसी अनुभव को मैं इस लेखन के ज़रिए अपने पाठकों तक पहुँचा रहा हूँ। —इसी पुस्तक की भूमिका
Madhyakaleen Kavita Ka Punarpaath
- Author Name:
Karunashankar Upadhyay
- Book Type:

-
Description:
मध्यकालीन साहित्य अपने व्यापक सन्दर्भों और उदात्त मूल्यबोध के कारण निरन्तर प्रासंगिक रहा है। दलितों, वंचितों, पीड़ितों, उपेक्षितों और स्त्रियों समेत जीवमात्र के प्रति गहरी सहानुभूति और संवेदनशीलता के रूप में लोकमंगल की जो भावना इसमें दिखाई पड़ती है, उसने इसको आज और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। लेकिन मध्यकालीन साहित्य शास्त्रीय रूढ़ियों, सामाजिक वर्जनाओं, धार्मिक संकीर्णताओं आदि के विरुद्ध लोकचेतना के उन्मेष से उपजे इस साहित्य की अर्थवत्ता को वर्तमान सन्दर्भों में समझने-समझाने के लिए इस पर नए सिरे से दृष्टि डालना आवश्यक है। यह पुस्तक यही काम करती है।
पाठ केन्द्रित आलोचना पर ज़ोर देते हुए यह पुस्तक मध्यकालीन साहित्य को समाज, वस्तु, घटना, विचार, परिवर्तन, अन्तर्वृत्तियों और व्यक्तियों की सापेक्षता में विश्लेषित-मूल्यांकित करती है, ताकि उसका वस्तुनिष्ठ और मानक पाठ तैयार किया जा सके। यह सप्रमाण दिखलाती है कि सतर्क पाठ-विश्लेषण न केवल इस साहित्य के बहुस्तरीय और गहन अर्थ को उद्घाटित कर सकता है, बल्कि युग सापेक्ष दृष्टिबोध भी प्रस्तुत कर सकता है।
इसमें भक्ति साहित्य और रीति साहित्य, दोनों पर विचार किया गया है। मध्यकालीन साहित्य के कवियों की निजी अनुभूति के ‘स्व’ से ‘पर’ और ‘पर’ से ‘सर्व’ में रूपान्तरण और लोकसत्ता से एकाकार होकर सार्वभौम होने की प्रक्रिया का उद्घाटन इस पुस्तक की उल्लेखनीय विशेषता है।
निश्चय ही, यह पुस्तक मध्यकालीन साहित्य के अध्येताओं के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी पठनीय और संग्रहणीय सिद्ध होगी।
Acharya Shukla : Pratinidhi Nibandha
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के अनन्य निबन्धकार हैं। साहित्यिक, शास्त्रीय और शैक्षिक दृष्टि से उनके निबन्धों का अध्ययन अनिवार्य है, पर उनके प्रतिनिधि निबन्धों का एक भी संकलन ऐसा नहीं है जो उनकी विधायिनी प्रतिभा का सम्यक् परिचय दे सके। इस परिप्रेक्ष्य में ‘आचार्य शुक्ल : प्रतिनिधि निबन्ध’ बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शुक्ल जी की प्राय: सभी उपलब्ध और अनुपलब्ध कृतियों का प्रतिनिधित्व करती है यह पुस्तक।
पुस्तक में शुक्ल जी के प्रतिनिधि निबन्धों को तीन भागों में बाँटा गया है—वैचारिक निबन्ध, सैद्धान्तिक निबन्ध और व्यावहारिक निबन्ध। संकलन के आधार हैं—‘बुद्ध चरित’, ‘विश्व प्रपंच’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘रस-मीमांसा’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘हिन्दी निबन्ध माला’, ‘भारतेन्दु साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘चिन्तामणि’ (भाग—दो), ‘सूरदास’ आदि। संकलन का प्रारम्भिक निबन्ध उनके ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से संगृहित है। यह लेख उनकी दृष्टि से निबन्ध का मानदंड प्रस्तुत करता है। इसे संग्रह की प्रस्तावना के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। काव्य-क्रम की दृष्टि से भी प्रारम्भ से लेकर उनके जीवन के अन्तिम समय तक लिखे गए निबन्धों का पुस्तक में समावेश किया गया है। भाषा, साहित्य शास्त्र तथा हिन्दी के भक्ति साहित्य से लेकर ‘कामायनी’ तक इन निबन्धों के विषय हैं। इसलिए उनकी व्यापक मान्यताओं और भेद में अभेद देखनेवाली तत्वग्राही दृष्टि का सम्यक् ये निबन्ध देते हैं। इस दृष्टि से इनकी परिधि बड़ी व्यापक है।
शुक्ल जी का सर्वोत्तम लेखन ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का प्रकाशन है और आजन्म वे उससे सम्बद्ध भी रहे। इसलिए ‘सभा’ के वर्तनी सिद्धान्त का ही व्यवहार किया गया है, यथा—पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग और दो से अधिक सामासिक शब्दों में ही समास चिन्ह का प्रयोग। शुक्ल जी रखा न लिखकर ‘रक्खा’ लिखते थे ताकि देवनागरी के उच्चारण की वैज्ञानिकता—जो लिखा जाए, वही पढ़ा जाए—सुरक्षित रह सके, उसका भी पालन किया गया है।
परिशिष्टों में आचार्य शुक्ल का जीवन-वृत्त और कृतियों के संकेत-सूत्र दे दिए गए हैं और उनके निबन्धों का संक्षिप्त मूल्यांकन हिन्दी निबन्ध-परम्परा के परिवेश में कर दिया गया है। शोधार्थियों, अध्येताओं आदि के लिए संग्रहणीय और महत्त्वपूर्ण कृति।
Samkaleenta Aur Sahitya
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

-
Description:
जब मैं बैंक में काम करता था, एक भिखारी था जो थोड़े अन्तराल से बैंक आता और रोकड़िया के काउंटर पर जाकर बहुत सारी चिल्लर अपनी थैली से उलट देता, फिर अपनी अंटी से, कभी अपनी आस्तीन से तुड़े-मुड़े नोट निकालकर एक छोटी-सी ढेरी लगा देता। कहता, इसे जमा कर लीजिए। उसके आने से मज़ा आता, आश्चर्य भी होता और एक क़िस्म की खीज भी होती—उन नोटों और गन्दी-सी चिल्लर को गिनने में। उस रोकड़िया जैसी ही स्थिति मेरी भी होती है जब समय-समय पर लिखी गई, छोटी-बड़ी टिप्पणियों को जमा कर उनकी किताब बनाने लगता हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में लेकिन भिखारी भी मैं ही हूँ और रोकड़िया भी। सारी चिल्लर और नोट गिन लिए जाते तब पता लगता कि राशि कम नहीं हैं—कुल जमा काफ़ी अच्छा-ख़ासा है। ऐसा आश्चर्य कभी-कभी मुझे भी होता है। पृष्ठ गिनने लगता हूँ तो लगता है कि बहुत कुछ जमा हो गया है। सब कुछ चोखा नहीं है, कुछ खोटे सिक्के और फटे हुए नोट भी हैं।
इस दूसरी नोटबुक में इतना ही फ़र्क़ है कि इसमें गद्य की कुछ किताबों पर गाहे-बगाहे लिखी गई टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है। पहली नोटबुक के फ़्लैप पर मैंने कहा था कि लिखने के सारे कौशल सिर्फ़ रचनाकार की क्षमताओं से ही पैदा नहीं होते हैं, कई बार वह अक्षमताओं से भी जन्म लेते हैं। ये नोट्स और टिप्पणियाँ मेरी क्षमताओं के बनिस्बत मेरी अक्षमताओं से ज़्यादा पैदा हुई हैं।
मुझे लगता था कि बाज़ार हिन्दी की कविता का कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि न तो इस क्षेत्र में अधिक पैसा है, न ही कीर्ति के कोई बहुत बड़े अवसर ही हैं। पर मैं ग़लत था। बाज़ार एक प्रवृत्ति है। इसका ताल्लुक़ अवसर, पैसे या कीर्ति से नहीं है। हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य जिस तरह के घमासान और निरर्थक विवादों से भरा नज़र आ रहा है, वह बाज़ार के ही प्रभाव का परिणाम है। विगत तीन दशकों की कविता का जैसा मूल्यांकन होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। ‘आलोचना’ से यह उम्मीद तब तक निरर्थक ही होगी जब तक कि कवि स्वयं इस दृश्य के मूल्यांकन की कोशिश नहीं करेंगे। यही हालत गद्य की भी है, विशेष रूप से कहानी और उपन्यास की। उसमें हल्ला अधिक है, सार्थक विमर्श और साफ़ बोलनेवाली आलोचना कम। आलोचना का एक बड़ा हिस्सा या तो उजड्डता और अहंकार से भरा है या ‘अहो रूपम् अहो ध्वनि’ के शोर से। एक कवि और कथाकार ही इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उसी की ज़रूरत है।
—राजेश जोशी
Bhasha Aur Samaj
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
भाषा और समाज सरीखे अत्यन्त गहन विषय पर डॉ. रामविलास शर्मा का यह एक महत्त्वपूर्ण मौलिक ग्रन्थ है। इसमें सामाजिक विकास के सन्दर्भ में भाषा के विकास का अध्ययन करते हुए भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र की अनेक मान्यताओं का गहन विद्वत्ता के साथ खंडन-मंडन किया गया है। सैद्धान्तिक विवेचन के अलावा इसमें भाषा-सम्बन्धी अनेक व्यावहारिक समस्याओं का भी विवेचन है। उदाहरण के लिए, भारत की राजभाषा और राष्ट्रभाषा की समस्या, अहिन्दीभाषी प्रदेशों में असन्तोष के कारण, क्या भारत की सभी भाषाएँ राजभाषा बनेंगी? क्या अंग्रेज़ी विश्वभाषा है और उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता?—आदि प्रश्नों पर भी इसमें प्रकाश डाला गया है।
यह पुस्तक न केवल भाषाविज्ञान का शास्त्रीय अध्ययन करनेवालों के लिए, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी है, जो इन समस्याओं में गहरी दिलचस्पी रखते हैं।
Kavya Ki Bhumika
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिन्दी के महान कवि तो हैं ही, वे बहुत बड़े निबन्ध लेखक भी हैं। उनके निबन्ध अपने भाष्य में सिर्फ़ पाठ के लिए आकर्षित नहीं करते, बल्कि अपने युग के साहित्य, समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास आदि को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि भी देते हैं; और इस बात का एक सशक्त उदाहरण है यह पुस्तक ‘काव्य की भूमिका’।
इस संग्रह में दिनकर के ग्यारह विचारोत्तेजक निबन्ध शामिल हैं। ‘रीतिकाल का नया मूल्यांकन’, ‘छायावाद की भूमिका’, ‘छायावादोत्तर काल’, ‘प्रयोगवाद’, ‘कोमलता से कठोरता की ओर’ नामक आरम्भिक निबन्धों में रीतिकाल से लेकर प्रयोगवाद तक की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन किया गया है। ‘भविष्य की कविता’ निबन्ध में यह समझाने की चेष्टा की गई है कि वैज्ञानिक युग में कविता अपने किन गुणों पर जोर देकर अपना अस्तित्व कायम रख सकती है। ‘कविता ज्ञान है या आनन्द?’, ‘रूपकाव्य और विचारकाव्य’, ‘प्रेरणा का स्वरूप’, ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’, ‘कविता की परख’ निबन्ध युवाशक्ति के नाम कवि का सन्देश हैं।
कविता और काव्य-समीक्षा से सम्बन्धित दो-तीन विचार ऐसे हैं जो दिनकर के अन्य निबन्धों में दिख जाते हैं। पुनरावृत्ति का दोष सुधी पाठकों को पहली नज़र में भले ही खटकेगा, लेकिन वे इस तथ्य को भी रेखांकित करने से नहीं चूकेंगे कि यहाँ निबन्धों की केन्द्रीय चेतना में उनकी अपनी एक अलग अनिवार्यता और भूमिका है।
उच्चकोटि के साहित्य के विद्यार्थियों तथा काव्य-प्रेमियों के लिए कवि दिनकर की यह कृति एक ऐसी रोशनी की तरह है जिसमें बहुत कुछ अनदेखा देखा जा सकता है, बहुत कुछ अनसुलझा सुलझाया जा सकता है।
Bharat Aur Europe : Pratishruti Ke Kshetra
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता।
‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...”
इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
BHARAT-CHINA LAC TAKRAV
- Author Name:
Mukesh Kaushik
- Book Type:

- Description: भारत और चीन के बीच अप्रैल 2020 से लेकर फरवरी 2021 के बीच एल.ए.सी. पर सैनिकों का आमना-सामना हुआ। करीब 10 महीने तक जंग जैसे हालात बने रहे। यह पुस्तक इस तनातनी का सबसे प्रामाणिक ब्योरा लेकर आई है। यह आधिकारिक स्तर पर दिए गए वक्तव्यों, सैन्य तैनाती से जुड़े शीर्ष अधिकारियों और संसद् से लेकर राजनीतिक बैठकों तक के विचार-विमर्श का विवरण पेश करती है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर.के.एस. भदौरिया के अलावा चीनी समकालीन अध्ययन केंद्र के प्रमुख ले. जनरल एस. एल. नरसिंहन ने इस पुस्तक में योगदान दिया है। यह पुस्तक एल.ए.सी. पर तनातनी शुरू होने से पहले की सच्चाई, गलवान की खूनी रात और कैलाश रेंज पर भारतीय सेना की तैनाती का बहुत सटीक विवरण देती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा विदेश मंत्री एस. जयशंकर की कूटनीति और सैन्य नीति को भी इसमें बेबाकी से पेश किया गया है। कई मायनों में यह पुस्तक भारत-चीन के बीच सैन्य संबंधों का संग्रहणीय दस्तावेज है।
Hindi Sahitya Ka Samikshatmak Itihas
- Author Name:
Vijaypal Singh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य में रीति काव्य, ख़ासतौर से केशव पर डॉ. विजयपाल सिंह की पुस्तकें अत्यन्त लोकप्रिय रही हैं। इस पुस्तक में उन्होंने असाधारण प्रवाह के साथ हिन्दी साहित्य के विभिन्न चरणों और प्रवृत्तियों का समीक्षात्मक अध्ययन किया है।
अभी तक उपलब्ध विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहासों को ध्यान में रखते हुए तथा नए तथ्यों को समाहित करते हुए इस पुस्तक में उन्होंने प्रयास किया है कि आरम्भिक काल से लेकर आधुनिक साहित्य तक का विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत किया जा सके।
लेखक ने इस कृति को ग्यारह खंडों में विभाजित किया है। खंडों का विभाजन साहित्येतिहास के आलोचकों, समीक्षकों तथा साहित्येतिहासकारों, अनुसन्धानों तथा टिप्पणियों के विश्लेषण और पुनर्मूल्यांकन के आधार पर किया गया है।
लेखक ने डॉ. ग्रियर्सन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, मिश्र-बन्धुओं, रामकुमार वर्मा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, इडविन ग्रिब्ज जैसे विद्वानों द्वारा किए काल खंडों का भी पुनर्मूल्यांकन और विश्लेषण किया है।
पुस्तक के लेखन में विद्वान आलोचक ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि विद्वज्जनों के साथ-साथ यह पुस्तक छात्रों, शोधार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए भी सहज ग्राह्य हो।
Chintamani : Vol. 3
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
चिन्तामणि का यह तीसरा भाग आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अब तक असंकलित ऐसे इक्कीस निबन्धों का अनूठा संग्रह है जो पुरानी पत्रिकाओं में बिखरे रहने और अप्राप्य पुस्तकों की भूमिका के रूप में प्रकाशित होने के कारण प्राय: दुर्लभ रहे हैं। इन निबन्धों में गोरखपुर के ‘स्वदेश’ में प्रकाशित ‘क्षात्रधर्म का सौन्दर्य’ और ‘प्रेमा’ में प्रकाशित ‘प्रेम आनन्द–स्वरूप है’ ऐसे निबन्ध हैं जिनकी जानकारी भी लोगों को नहीं है। ‘हंस’ के आत्मकथा अंक में प्रकाशित ‘प्रेमघन की छाया स्मृति’ भी ऐसा ही निबन्ध है जो लगभग अचर्चित रहा है, जबकि आचार्य के आरम्भिक जीवन की झाँकी के लिए वह अनमोल दस्तावेज़ है। ‘साहित्य’ और ‘उपन्यास’ शीर्षक आरम्भिक निबन्धों से जहाँ शुक्ल जी के एतद्विषयक अनुपलब्ध विचार पहली बार प्रकाश में आते हैं, वहाँ 1909 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘कविता क्या है’ इसी शीर्षक के सर्वविदित परवर्ती निबन्ध के प्रथम प्रारूप की हैसियत से ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। इसी प्रकार ‘कल्पना का आनन्द’ यद्यपि हाईस्कूल के एक छात्र का अनुवाद है, फिर भी आचार्य शुक्ल के ‘काव्य में प्राकृतिक दृश्य’ तथा ‘रसात्मक बोध के विविध रूप’ जैसे प्रौढ़ निबन्धों के लिए वह नींव का पत्थर है।
भूमिकाओं में यदि ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका आचार्य शुक्ल के जीवन–दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को जानने के लिए अनिवार्य दस्तावेज़ है तो ‘शेष स्मृतियाँ’ की ‘प्रवेशिका’ उनकी ऐतिहासिक अनुसन्धान में रुचि तथा गति के लिए। साहित्य–चिन्तक शुक्ल जी हिन्दी भाषा—मुख्यत: काव्यभाषा की भाषावैज्ञानिक तथा व्याकरणिक समस्याओं में कितनी अन्तर्दृष्टि रखते थे, इसका प्रमाण है ‘बुद्धचरित की भूमिका’ में ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली के स्वरूप का व्यतिरेकी विश्लेषण। इन भूमिकाओं के अतिरिक्त दो ऐतिहासिक भाषण भी संकलित हैं जिनसे आचार्य के व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने आता है। इस प्रकार यह पुस्तक एक चिरकांक्षित आवश्यकता की पूर्ति का सारस्वत प्रयास है, जिसके महत्त्व का आभास सम्पादक की शोधपूर्ण भूमिका से हो सकता है।
Sanskriti Ke Chaar Adhyay
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
...यह सम्भव है कि संसार में जो बड़ी-बड़ी ताक़तें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना ही चाहिए कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामाजिक व्यक्तित्व का विकास किया गया है। उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुदृढ़ एकता कहाँ छिपी हुई है। भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो फिर हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे। और यदि भारत को हम नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब-के-सब अधूरे रह जाएँगे और हम देश की ऐसी कोई सेवा नहीं कर सकेंगे, जो ठोस और प्रभावपूर्ण हों।
मेरा विचार है कि दिनकर की पुस्तक इन बातों को समझने में, एक हद तक, सहायक होगी। इसलिए, मैं इसकी सराहना करता हूँ और आशा करता हूँ कि इसे पढ़कर अनेक लोग लाभान्वित होंगे।
Doosare Shabdon Mein
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
निर्मल वर्मा के लिए निबन्ध हमेशा ऐसी विधा रही जिसके माध्यम से उन्होंने सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और रचनात्मकता के मूलभूत प्रश्नों पर सोचते हुए जितनी बाहर, उतनी ही अपने भीतर भी यात्रा की। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से ज़्यादा सत्य के पीछे एक सजग यात्रा।
इस पुस्तक में शामिल निबन्ध इस लिहाज से और भी विशेष हैं। भाषा, अस्मिता, परम्परा और आधुनिकता के बार-बार चिह्नित प्रश्नों को यहाँ उन्होंने एक बार फिर से अपने चिन्तन का विषय बनाया है।
इसमें कुछ साक्षात्कार भी संकलित हैं जिनके प्रश्नों ने निर्मल वर्मा को पुन: एक अवसर दिया कि वे अपने सोचे और कहे गए को नए ढंग से व्यक्त करें। इस बहाने उनके कुछ अप्रत्याशित पहलू भी उजागर हुए।
स्वतंत्रता के समय देश को नए सिरे से रचने के जो स्वप्न हमने देखे, ख़ासकर सांस्कृतिक सन्दर्भ में, क्या वे हमारे साथ बने रहे या धीरे-धीरे हमारे हाथ से छूट गए? हमारी प्राथमिकताओं ने हमें क्या दिया, और अगर कोई नई शुरुआत करनी ज़रूरी है तो वह कहाँ से हो?
ऐसे अनेक प्रश्नों पर मनन-रत ये निबन्ध हमारी वर्तमान दुविधाओं और दुश्चिंताओं के लिए भी उपयोगी कहे जा सकते हैं।
Nirgun Santon Ke Swapana
- Author Name:
David N. Lorenzen
- Book Type:

-
Description:
साहित्यिक बिरादरी से बाहर निकलकर व्यापक भारतीय समाज को देखें तो कबीर, तुकाराम, तुलसी, मीरा, अखा, नरसी मेहता आज भी समकालीन हैं। भक्त कवि हिन्दी समाज के रोज़मर्रा के जीवन में किसी भी अन्य कवि से अधिक उपस्थित हैं। ‘निरक्षर’ हिन्दीभाषी भी कबीर के चार-छह दोहों और तुलसी की दो-चार चौपाइयों से तो वाक़िफ़ हैं ही। हिन्दी समाज नियतिबद्ध है—भक्त कवियों से सतत संवाद करने के लिए। सवाल यह है कि क्या हिन्दी की समकालीन साहित्यिक चिन्ताओं में यह नियति प्रतिबिम्बित होती है?
भारत और अन्य समाजों की देशज आधुनिकता और उसमें औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा उत्पन्न किए गए व्यवधान को समझना अतीत, वर्तमान और भविष्य का सच्चा बोध प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है। साहित्य को इतिहास-लेखन का स्रोत मात्र (सो भी दूसरे दर्जे का!) और किसी विचारधारात्मक प्रस्ताव का भोंपू मानकर नहीं, बल्कि उसकी स्वायत्तता का सम्मान करते हुए पढ़ने की पद्धति पर चलते हुए भक्ति-काव्य को पढ़ें तो कैसे नतीजे हासिल होते हैं?
भक्ति साहित्य के विख्यात अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल के सम्पादन में नियोजित ‘भक्ति मीमांसा’ पुस्तक-शृंखला ऐसी ही पढ़त की दिशा में एक कोशिश है। विभिन्न भक्त कवियों, रचनाओं और प्रवृत्तियों के अध्ययन इसमें प्रकाशित किए जाएँगे।
इस शृंखला की यह पहली पुस्तक अग्रणी इतिहासकार डेविड लॉरेंजन के निबन्धों का संकलन है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित इन शोध-निबन्धों में ‘निर्गुण सन्तों के स्वप्न’ और उनकी परिणतियों के अनेक पहलू अत्यन्त विचारोत्तेजक और प्रमाणपुष्ट ढंग से पाठक के सामने आते हैं। ‘गोरखनाथ और कबीर की धार्मिक अस्मिता’ निबन्ध अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने के पहले ही इस संकलन के ज़रिए हिन्दी पाठकों के सामने आ रहा है। डेविड लॉरेंजन द्वारा प्रस्तावित ‘जाति-निरपेक्ष’ या अवर्णाश्रमधर्मी’ हिन्दी परम्परा की अवधारणा से गुज़रते हुए, पाठक को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह का ‘लोकधर्म’ विषयक विचार-विमर्श स्वाभाविक रूप से याद आएगा।
कबीरपंथ के सांस्कृतिक इतिहास और स्वरूप में निहित सामाजिक प्रतिरोध का विवेचन करते हुए डेविड कबीरपंथ के सामाजिक आधार की व्यापकता रेखांकित करते हैं। वे बताते हैं कि कबीरपंथी ‘भगत’ कबीरपंथ को आदिवासी समुदायों तक भी ले गए; और इस तरह उन्होंने ब्राह्मण वर्चस्व से स्वायत्त समुदाय की रचना में योगदान किया।
इन निबन्धों में निहित अन्तर्दृष्टियों से निर्गुणपंथी परम्परा के बारे में ही नहीं, भारतीय इतिहास मात्र के बारे में भी आगे शोध के लिए प्रस्थानबिन्दु प्राप्त होते हैं।
Uttar Aupniveshikata Ke Srot Aur Hindi Sahitya
- Author Name:
Pranay Krishna
- Book Type:

-
Description:
उपनिवेशवादी विमर्शों को चुनौती अनेक विचारधाराओं, ज्ञानमीमांसाओं से मिलती रही है, लेकिन सर्वाधिक चुनौती उन वास्तविक उपनिवेशवाद- विरोधी जनसंघर्षों से मिली है, जिनके बगैर कोई भी विमर्श संभव नहीं था। ऐसे में उत्तर-औपनिवेशिकता कोई एक व्यवस्थित सिद्धांत या अनुशासन नहीं है। तेज़ी से बदलती दुनिया में विभिन्न किस्म के विचारों और व्यवहारों के बीच, विभिन्न किस्म की संस्कृतियों और लोगों के बीच बदलते रिश्तों के सन्दर्भ में ही उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शों ने आकार ग्रहण किया है। मार्क्सवाद से लेकर नारीवाद तक के राजनीतिक सिद्धांत, उत्तर-संरचनावाद और उत्तर-आधुनिकता के साथ मार्क्सवादी ज्ञानमीमांसा का संघर्ष, संस्कृतिवादियों और भौतिकवादियों के बीच विवाद, पाठकेन्द्रित और यथार्थवादी साहित्य सिद्धान्तों की आपसी बहस उत्तर- औपनिवेशिक विमर्शों में संचरित है। ‘औपनिवेशिक’ का रेखांकन, विश्लेषण और सैद्धांतीकरण अनेक सन्दर्भों और विविध विमर्शों के परिक्षेत्र में होता रहा है। ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ सैद्धांतिकी जितनी अधिक योरोपीय भाषाओं और सांस्कृतिक रूपों से बाहर निकलकर अन्य सांस्कृतिक अनुभवों को समेटने की कोशिश करती है, उतनी ही अधिक समस्याग्रस्त होती चली जाती है। भारतीय भाषाओं के साहित्य पर काम करने वाले आलोचकों ने ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ सैद्धांतिकी की तमाम कठिनाइयों की ओर इंगित किया है।
विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया ने औपनिवेशिक परिस्थिति और अनुभव के प्रति जिस आलोचनात्मक दृष्टिपात को संभव किया, वह एक वैश्विक परिघटना उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना सिद्धांत ने संस्कृति और राजनीति के पुराने कलावादी द्वैत का तो अन्त कर दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में उसके कुछ महत्त्वपूर्ण आलोचकों ने राजनीति को ही कला या पाठ में बदल दिया है।
उत्तर-औपनिवेशिक सांस्कृतिक विश्लेषण ने एक ऐसे लेखन को जन्म दिया है जो कि पश्चिमी और गैर-पश्चिमी लोगों और दुनियाओं को देखने के अब तक के वर्चस्वशाली नज़रिए को चुनौती देता है। वह एक ऐसे सैद्धांतिक ढाँचे को खड़ा करने का प्रयास है जो कि पश्चिमी, यूरो-केन्द्रिक ढाँचे का विकल्प बन सकें।
Renu Ka Hai Andaze Bayan Aur
- Author Name:
Bharat Yayawar
- Book Type:

-
Description:
फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन और साहित्य जितना बहुआयामी है उतना ही रसग्राही। रेणु के व्यक्तित्व-कृतित्व के विविध पक्षों की गहन खोज करने में भारत यायावर ने अपने जीवन के कई वर्ष लगा दिए हैं। उनके सम्पादन में अब तक रेणु की लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से 'रेणु रचनावली' का सम्पादन किया है, जो बेहद प्रशंसित हुआ है। रेणु पर अपनी लम्बी खोज-यात्रा के उपरान्त उन्होंने 'रेणु का है अन्दाज़े-बयाँ और' लिखी है। इस पुस्तक में रेणु के जीवन और साहित्य के नए और अनछुए पहलुओं की तलाश की गई है। रेणु पर यह पहली पुस्तक है जिसमें विस्तार से उनकी रचनाओं की पड़ताल की गई है। रेणु के साहित्य में उपन्यास एवं कहानी के साथ ही रिपोर्ताज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विधा है, जिस पर विस्तार से विवेचन किया गया है।
भारत यायावर की इस पुस्तक में रेणु के जीवन और साहित्य के गहन अनुसंधानपरक विवेचन के बावजूद सबसे महत्त्वपूर्ण है एक जीवन्त यानी हँसती-बतियाती हुई रचनात्मक भाषा। इस भाषा का एक अपना ही स्वाद है, साथ ही अपना ही रंग है। इसके कारण यह पुस्तक रोचक, दिलचस्प और बेहद पठनीय है। इस पुस्तक के परिशिष्ट में भारत यायावर ने फणीश्वरनाथ रेणु का संक्षिप्त जीवन-परिचय जोड़ दिया है एवं दो असंकलित रचनाओं ‘जै गंगा’ एवं ‘डायन कोशी’ को भी संकलित कर दिया है, इससे इस पुस्तक की महत्ता और अधिक बढ़ गई है। कुल मिलाकर, रेणु के अन्दाज़े-बयाँ को अपने ही ढंग से प्रस्तुत करनेवाली यह अनोखी पुस्तक है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book