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Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Nirala

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विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।      हिन्दी कविता के सौन्दर्यशास्त्र को हमेशा के लिए बदल देनेवाले सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ऐसे कवि-दार्शनिक हैं जिन्होंने कविता को न सिर्फ एक नए सौन्दर्य-बोध के साथ सड़क पर उतार दिया अपितु छायावाद को प्रगति की कामना और श्रम के मूल्यों से जोड़ने का भी काम किया। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास हों या निबन्ध हों, उनके लेखन और चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता के बीच एक द्वन्द्वात्मक रिश्ता सदा बना रहा जिसने उनके लेखन में विलक्षण रूप से नए-नए अर्थ सम्भव किए। उनकी “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” जैसी पंक्ति अन्यायी सत्ता और उसके प्रतिरोध में खड़े जन का एक कालजयी रूपक बन गई। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब पाठकों के समक्ष निराला के चिन्तन की एक मुकम्मल तसवीर पेश कर सकेगी।

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विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।     

हिन्दी कविता के सौन्दर्यशास्त्र को हमेशा के लिए बदल देनेवाले सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ऐसे कवि-दार्शनिक हैं जिन्होंने कविता को न सिर्फ एक नए सौन्दर्य-बोध के साथ सड़क पर उतार दिया अपितु छायावाद को प्रगति की कामना और श्रम के मूल्यों से जोड़ने का भी काम किया। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास हों या निबन्ध हों, उनके लेखन और चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता के बीच एक द्वन्द्वात्मक रिश्ता सदा बना रहा जिसने उनके लेखन में विलक्षण रूप से नए-नए अर्थ सम्भव किए। उनकी “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” जैसी पंक्ति अन्यायी सत्ता और उसके प्रतिरोध में खड़े जन का एक कालजयी रूपक बन गई। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब पाठकों के समक्ष निराला के चिन्तन की एक मुकम्मल तसवीर पेश कर सकेगी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
162 grams
ISBN-13
9789392186424
Pages
168
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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