Reti Ke Phool
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
‘रेती के फूल' युवा पीढ़ी के लिए एक युगदृष्टा साहित्यकार का उद्बोधन है। इसमें शामिल प्रत्येक निबन्ध ओजस्वी और प्रेरणा का पुंज है।</p>
<p>'हिम्मत और ज़िन्दगी', 'ईर्ष्या, तू न गई मन से', 'कर्म और वाणी', 'खड्ग और वीणा', 'कला, धर्म और विज्ञान' और 'संस्कृति है क्या?' जैसे शाश्वत विषयों के अतिरिक्त 'भविष्य के लिए लिखने की बात', 'राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता', 'हिन्दी कविता में एकता का प्रवाह', 'नेता नहीं, नागरिक चाहिए' जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर समर्थ कवि का मौलिक चिन्तन है जो आज भी उतना ही सार्थक है, जितना साठ वर्षों पूर्व था।</p>
<p>वस्तुतः 'रेती के फूल' ऐसे निबन्धों का संग्रह है जिसमें कलाकारिता तो है ही, जो विचारोत्तेजक भी हैं।
ISBN: 9789389243840
Pages: 112
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Sun Mere Bandhu re
- Author Name:
Narayan Singh
- Book Type:

- Description: 'सुन मेरे बंधु रे' नारायण सिंह की नव्यतम कृति है। यहाँ उपस्थित अलग-अलग आलेख आपस में गुम्फित हैं, एक-दूसरे के साथ आबद्ध हैं। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है; क्योंकि लेखक किसी कहानी-उपन्यास में उपस्थित घटना, रंग-ढंग और दृष्टि को महज आलोचकीय दृष्टि से नहीं देख रहा, बल्कि तत्कालीन समय में उनकी उपस्थिति को, कहानी के पीछे मौजूद जीवन को भी देखना-दिखाना चाहता है। ये आलेख किसी कहानी, उपन्यास के ज़रिये शुरू तो होते हैं लेकिन उक्त कहानी उपन्यास या सिनेमा से बाहर आकर हमारी दृष्टि का आयतन विस्तारित करते मिलते हैं। एक दृष्टि सम्पन्न कथाकार अपने पूर्वज कथाकारों, सृजनशील व्यक्तित्वों के जीवन, उनके अन्तर्विरोध और मनुष्य के दुख को, सामाजिक विभेदकारी दृष्टि की जाँच-पड़ताल करते हुए उन मूल्यों को सामने लाने की कोशिश करता है जिन वजहों ने रचना को रचना बनाये रखा है। नारायण सिंह स्वयं एक कथाकार-उपन्यासकार हैं लेकिन यहाँ कथाकार अपने कथा प्रतिमान के आलोक में किसी रचना की व्याख्या नहीं करता, बल्कि रचना की केन्द्रीय समस्या को उठाते हुए सिंहावलोकन और विहंगावलोकन दोनों आयामों का भरपूर इस्तेमाल करता है। यह सिफत ही इन आलेखों को परंपरागत समीक्षकीय पद्धति से इतर पहचान लिये पाठकों से मुखातिब है। चेखव की कहानी के ज़रिये प्रेम को पुनर्परिभाषित करती बात हो या 'सुजाता' में उपस्थित अकुंठ प्रेम गीत में उपस्थित पुरुष बोध को सामने लाती आलोचकीय निगाह हो; हर जगह लेखक कलात्मकता, बुनावट और ध्वनि सौंदर्य के पीछे दबे जा रहे या दबाये जा रहे मनुष्य की पीड़ा से सहानुभूति प्रकट करता मिलता है। इसीलिए यहाँ उपस्थित रचनाओं का पाठ नये सिरे से पढ़े जाने की माँग करता मिलता है। —आशीष सिंह
Prarambhik Awadhi
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

-
Description:
जिन रचनाओं के आधार पर प्रस्तुत अध्ययन किया गया है, वे मोटे तौर पर 1000 ई. से लेकर 1600 ई. तक की हैं। राउरबेल का रचनाकाल 11वीं शती है। इसलिए यदि राउरबेल के प्रथम नखशिख की भाषा को, जिसमें अवधी के पूर्व रूपों की स्थिति मानी गई है, भाषा का प्रतिनिधि मान लिया जाए जिससे अवधी विकसित हुई तो अनुचित नहीं होगा।
इस पुस्तक में 'अवधी की निकटतम पूर्वजा भाषा’ नामक अध्याय में प्राकृत पैंगलम् के छन्दों, राउरबेल और उक्तिव्यक्तिप्रकरण में से ऐसे रूपों को ढूँढ़ने का प्रयास है जो अवधी में मिलते हैं या जिनका विकास उस भाषा में हुआ है। अगले अध्याय अर्थात् ‘प्रारम्भिक अवधी के अध्ययन की सामग्री’ में प्रकाशित और अप्रकाशित वे रचनाएँ विचार के केन्द्र में हैं जिनके आधार पर प्रारम्भिक अवधी का भाषा सम्बन्धी विवेचन किया गया है।
‘ध्वनि विचार’ के अन्तर्गत प्रारम्भिक अवधी के व्यंजनों और स्वरों को निर्धारित करने का प्रयत्न किया गया है। प्रारम्भिक अवधी की ध्वनियों को ठीक-ठीक निरूपित करने के लिए आज हमारे पास कोई प्रामाणिक साधन नहीं है। इसलिए इन पर प्राचीन वैयाकरणों तथा अन्य विद्वानों के मतों के प्रकाश में विचार किया गया है।
प्रारम्भिक अवधी की क्रियाओं का अध्ययन प्रस्तुत प्रबन्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश समझा जाना चाहिए, क्योंकि प्रारम्भिक अवधी में ऐसे कई क्रिया-रूपों का पता चला है जो परवर्ती अवधी में या तो बहुत कम प्रयुक्त हैं या अप्रयुक्त हैं। ‘उपसंहार’ के अन्तर्गत प्रारम्भिक अवधी की कुछ विशेषताओं को ध्यान में रखकर अवधी काव्यों की भाषा से उसका अन्तर स्पष्ट कर दिया गया है। आशा है, पाठक इस पुस्तक को सार्थक पाएँगे।
Kali Mitti Par Pare Ki Rekha
- Author Name:
Kanhaiya Singh
- Book Type:

-
Description:
डॉ. कन्हैया सिंह जी अपने यशस्वी जीवन के 85वें वर्ष पूर्ण कर 86वें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर प्रकाशित यह ग्रन्थ पूरे देश के विद्वानों से प्राप्त पत्र-पुष्प है। अल्प समय में इतनी बड़ी संख्या में विद्वानों ने अपने आलेख भेजे हैं जो डॉ. कन्हैया सिंह जी की कीर्ति और साहित्यिक सक्रियता का परिणाम है। राजस्थान के माननीय राज्यपाल
श्री कलराज मिश्र, उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गोवा की पूर्व राज्यपाल माननीय मृदुला सिन्हा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष, डॉ. कमल किशोर गोयनका के आलेख ने इस ग्रन्थ की गरिमा को बढ़ाया है। हिन्दी के अनेक यशस्वी साहित्यकारों और आलोचकों के साथ ही युवा लेखकों की भागीदारी ने भी इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है।डॉ. कन्हैया सिंह जी का जीवन और उनके द्वारा रचित समस्त साहित्य को केन्द्र में रखते हुए इस पुस्तक को पाँच खंडों में संयोजित किया गया है—‘जीवन पर्व : संघर्ष एवं साधना का उज्ज्वल इतिहास’ पहला खंड है। जिसमें विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गए संस्मरण और
डॉ. कन्हैया सिंह जी के जीवन सम्बन्धी आलेख हैं। पुस्तक का द्वितीय खंड ‘सृजन पर्व : विचार एवं वैभव का ताना-बाना’ है, जिसमें डॉ. सिंह के सृजनात्मक साहित्य को केन्द्र में रखकर लिखे गए आलोचनात्मक लेखों का संकलन किया गया है। इस पुस्तक के तृतीय खंड ‘भाषा पर्व : अक्षर-अक्षर भेद’ में डॉ. कन्हैया सिंह जी के पाठ-सम्पादन एवं भाषाविज्ञान सम्बन्धी कार्यों पर लिखे गए समीक्षात्मक लेखों को संयोजित किया गया है। ‘संस्कृति पर्व : समष्टि का रचनात्मक उछाह’ जो कि पुस्तक का चतुर्थ खंड है, में डॉ. कन्हैया सिंह जी द्वारा किए गए सूफ़ी साहित्य, सन्त साहित्य तथा इतिहास लेखन विषयक कार्यों की समीक्षा है। पुस्तक का पाँचवाँ और अन्तिम खंड ‘चिट्ठी-विट्ठी : हाल-ए-ज़ुबानी और’ है। इसमें हिन्दी जगत के विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यकारों, समाजसेवियों और प्रमुख राजनेताओं का डॉ. कन्हैया सिंह जी के साथ पत्र-व्यवहार एवं उन पर लिखित आलेख सम्मिलित हैं। साथ ही डॉ. कन्हैया सिंह जी का साक्षत्कार भी इसी खंड में संगृहीत है।यह पुस्तक हिन्दी के अध्येताओं के लिए हिन्दी पाठानुसन्धान, सूफ़ी साहित्य, सन्त साहित्य, भाषाविज्ञान तथा डॉ. कन्हैया सिंह जी के सम्पूर्ण रचना-संसार को एक साथ समझने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होती है।
Sahitya Aur Bhartiya Ekta
- Author Name:
Shivshankari
- Book Type:

- Description: साहित्य और भारतीय एकता’ (निट् इंडिया थ्रू लिटरेचर) एक वृहत् आयोजन है। यह पुस्तक इस आयोजन का प्रथम खंड है, जिसे तमिल और अंग्रेज़ी के बाद अब हिन्दी में अनूदित किया गया है। ‘साहित्य और भारतीय एकता’ के माध्यम से लेखिका शिवशंकरी भारतीय संस्कृति तथा साहित्य के आधार पर देशवासियों को आपस में जोड़ना चाहती हैं। इस महान उद्यम की सफलता के लिए उन्होंने देश के अनेक प्रान्तों का भ्रमण किया, अनेक कलात्मक और सांस्कृतिक रूपों का अध्ययन किया, सम्बद्ध भारतीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य का गहन अनुसंधान भी किया; साथ ही प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध अनेक प्रमुख लेखक-लेखिकाओं के साथ साक्षात्कार भी किए, हर भाषा की उत्कृष्ट प्रतिनिधि साहित्यिक रचनाओं का चयन किया और इनका अति उत्तम भाषान्तर भी करवाया। लेखिका के यात्रा-संस्मरणों, साक्षात्कारों और प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध साहित्यिक विचारों के इस समायोजन से प्रकट होती है एक अखंड एकता, साथ ही हमारे लेखकों और कवियों के द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किए जानेवाले वह विचार भी इसमें शामिल हैं जो हमारे देश के सामने स्थित उग्र समस्याओं को रेखांकित करते हैं, जैसे—ग़रीबी, अज्ञान, वर्ग, वर्ण एवं स्त्री-पुरुष का भेदभाव, आधुनिकता की चुनौतियाँ, धार्मिक पुनरुत्थान, कट्टरवाद, अन्धविश्वास तथा असहिष्णुता, नैतिकता के प्रति अनादर, हिंसा एवं गांधी जी के मूल्यों का क्षरण। लेखिका का विश्वास है कि इस आयोजन के द्वारा लेखक अपनी रचनाओं के साथ बृहत् पाठक-समुदाय तक पहुँचकर इन समस्याओं के उन्मूलन में अपना योगदान कर पाएँगे। इस खंड में शिवशंकरी ने दक्षिण भारत पर ध्यान केन्द्रित करते हुए केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों एवं उनके साहित्य का अवलोकन किया है। इस खंड में समाहित 27 साक्षात्कार, लेखकों की साहित्यिक कृतियों के 25 उत्कृष्ट उद्धरण और उनमें व्यक्त विचार दक्षिण भारत में सृजनरत मनीषा का एक विश्वसनीय ब्योरा हिन्दी पाठकों के सम्मुख उपलब्ध कराएँगे।
Constitution, Culture and Nation
- Author Name:
Kalraj Mishra
- Book Type:

- Description: Through this book, I am handing over the articles which I had written from time to time on the issues related to the Constitution, Indian Culture, and the nation to the readers out there. The Constitution of the country that was written after the independence of the country has the echo of this very culture of the nation. The Indian Constitution is based on the values of equality and liberty to all irrespective of caste, religion, class, etc. This is our culture. The Constitution, the culture, and nation are actually intertwined. I believe that the nation becomes stronger only when its people are committed to following the values associated with the Constitution and culture. Even though we got freedom from the British in 1947, the real freedom of the country means writing our own destiny. It is also important to uphold freedom. Upholding freedom means committing to fulfilling one’s duties towards its nation and enjoying the rights written in our Constitution. I like to call the ‘Indian Constitution’ a ‘global document of human rights’. The reason being the perfect blend of rights and duties consisting the lofty values allied with life on which the development of humanity is founded.
Anuwad Ka Samkal
- Author Name:
Mohsin Khan
- Book Type:

- Description: अनुवाद केवल पुस्तकों, लेखों या रचनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसने कई क्षेत्रों में प्रवेश करते हुए उन्हें समृद्ध किया है और वर्तमान में हर दिशा में बड़ा लाभदायक सिद्ध हो रहा है। ‘अनुवाद का समकाल’ पुस्तक जहाँ अनुवाद की परिभाषा, अर्थ, स्वरूप, सिद्धान्त, प्रक्रिया, प्रविधि, उपयोगिता, महत्त्व, भेद और चुनौतियों की विशद चर्चा करते हुए उनके विविध पक्षों पर मौलिकता के साथ समेकित निष्कर्ष प्रदान करती है, वहीं अनुवाद विमर्श से अपनी मौलिकता में और आगे बढ़ते हुए वर्तमान में अनुवाद की वैश्विक धरातल पर नूतन भूमिका को तलाशती हुई अनुवाद की अनिवार्य स्थितियों को कई स्तरों पर उजागर करती है। इनमें अनुवाद पुस्तकें, पत्र, दस्तावेज़, शासन-प्रशासन, कूटनीति, विदेश नीति में अनुवाद, खेल और पर्यटन में अनुवाद, अनुवाद का शिक्षा संस्थानों से सम्बन्ध, अनुवाद और वर्तमान में कार्यरत संस्थाएँ, परिषद, अनुवाद तकनीक का प्रयोग, प्रसार और परिदृश्य, अनुवाद सूचना प्रौद्योगिकी और उसकी वस्तु-स्थितियाँ, कंप्यूटर आधारित अनुवाद की उपयोगिता, सीमाएँ और चुनौतियाँ, डबिंग और अनुवाद के विभिन्न रूप एवं प्रकार, अनुवाद की एजेंसियाँ तथा उनके कार्यक्षेत्र, वैश्विक स्तर पर अनुवाद के सम्बन्ध में विश्वविद्यालयों में उपयोगी कोर्स, अनुवाद के पत्र-पत्रिकाएँ, पुरस्कार, अनुवाद की वेबसाइट, रेडियो और अनुवाद, सरकारी, ग़ैरसरकारी उद्यम, शब्दकोश, मोबाइल अनुवाद, अनुवाद के ब्लॉग, अनुवाद और रोज़गार, अनुवाद समारोह, कार्यशालाएँ आदि का विस्तृत और बहु उपयोगी प्रामाणिक ब्योरा प्राप्त किया जा सकता है। अब तक के अनुवाद को केन्द्र में रखकर रची गई पुस्तकों के मध्य यह पुस्तक अपनी मौलिकता के साथ अनुवाद के वर्तमान परिदृश्य को व्यापक रूप में समेटने का भरसक प्रयास करती है।
Adhunik Hindi Alochana: Sandarbh Evam Drishti
- Author Name:
Ramchandra Verma
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में भारतेन्दु-युग से लेकर आज तक की हिन्दी-समीक्षा के सामाजिक सन्दर्भ और उसके प्रभाव में निर्मित और प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली का ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचना किया गया है। इस क्रम में प्रमुख समीक्षकों द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली को उनकी समीक्षा-दृष्टि के आलोक में देखने की चेष्टा की गई है। पुस्तक में लक्षित किया गया है कि भारतेन्दु-युग में एक ओर परम्परागत शास्त्रीय शब्दावली की जटिलता को शिथिल करने की कोशिश की गई दूसरी ओर नए सामाजिक सन्दर्भ के अनुकूल देश-भक्ति और सामाजिक सुधार जैसे मूल्यों को समीक्षा के केन्द्र में प्रतिष्ठित किया गया।
Bharat Mein Bhakti
- Author Name:
Sujit Kumar Singh +1
- Book Type:

-
Description:
प्राणि मात्र के कल्याण की कामना भारतीय साहित्य और संस्कृति की अद्वितीय विशेषता रही है। इस जगत् में जो कुछ भी शुभ है, सात्विक है, श्रेष्ठ है; उनमें प्रेम तत्व सर्वोपरि है। इसके अंतर्गत तत्वज्ञान का सत्य और भावना की उपलब्धि भक्ति अन्तर्भुक्त है। भारतीय जनता की साहित्यिक साधना का सर्वोच्च निदर्शन भक्ति साहित्य में प्राप्त होता है। इसके अंतर्गत मानवीय मूल्यों पर आधारित प्रेम की दिव्यता और समस्त प्रकार के शोषण व अन्याय का विरोध करने की जीवटता मुख्यतः शामिल है। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन से पहले यहाँ वैदिक काल से भक्ति की अंतःसलिला भारतीय प्रज्ञा व हृदय का संस्कार करती आई है। यहाँ एक ओर भागवत पुराण, नारद भक्ति सूत्र, शाण्डिल्य भक्ति सूत्र, भक्ति रसामृतसिन्धु जैसे ग्रंथ रचे गये तो दूसरी तरफ कबीर, नानक, जायसी, सूर, तुलसी और मीरां जैसे संत भक्त कवियों की अटूट श्रृंखला अखिल भारतीय स्तर पर दिखाई देती है। जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए हृदय और मस्तिष्क का सामंजस्य जरूरी है। उद्दाम कर्म भावना के पीछे विवेक एवं श्रद्धा का संबल जरूरी है। और यही कारण है कि यह कालजयी साहित्य आज भी अपनी अमृत स्स्रोतस्विनी से भारत ही नहीं मानव मात्र को अभिसिंचित करता आ रहा है।
यह पुस्तक इसी भक्ति को विभिन्न गवाक्षों से देखने का एक विनम्र प्रयास है।
Pragatisheel Aalochana Aur Namvar Singh
- Author Name:
Vijay Kumar Bharti
- Book Type:

-
Description:
प्रगतिशील आलोचना के सन्दर्भ में नामवर सिंह का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने प्रगतिशील आलोचना को विस्तार दिया और उसे नयी ऊर्जा व जीवन्तता प्रदान की। नवीन विचारों, सिद्धान्तों और मूल्यों को आत्मसात करते हुए वे सदैव प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करते रहे, साथ ही प्रगतिशीलता की राह में बाधक तत्त्वों से हिन्दी-समाज को सावधान भी करते रहे।
उनकी प्रगतिशील दृष्टि में वाद, विवाद और संवाद के जरिए ही कोई विमर्श अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। इसे ही मार्क्सवाद में थीसिस, एंटी-थीसिस और सिंथेसिस कहा जाता है। लेकिन मार्क्सवादी विचार को वे अनुकरणमूलक ढंग से नहीं स्वीकारते, वे उसे साहित्यिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं जिसका एक व्यापक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य है।
उनकी प्रगतिशील आलोचना-दृष्टि विभिन्न वादों, सिद्धान्तों और विचारधाराओं से मुठभेड़ करते हुए प्रगतिशीलता की रक्षा करती है। वर्तमान परिस्थितियों में मार्क्सवाद को जीवन्त बनाए रखने के लिए उन्होंने उन जड़ताओं पर भी प्रहार किया जो प्रगतिशील मूल्यों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकती थीं। नए प्रतिमान तलाशते हुए वे परम्परा की खोज करते हैं और आधुनिक प्रवृत्तियों की पड़ताल भी करते रहते हैं।
नामवर सिंह की प्रगतिशील आलोचना जितनी भारतीय सन्दर्भ से जुड़ी है, उतनी ही पाश्चात्य सन्दर्भ से भी। प्रगतिवादी कवियों को प्रयोगवादी शिल्प के खतरों से सचेत करते हुए वे विदेश से आयातित ह्रासोन्मुख भावनाओं, युद्धजनित अनास्था, वैयक्तिक असन्तोष तथा कुंठाओं के खतरे से भी रचनाकारों को सतर्क करते हैं। आलोचना के अन्तर्गत परम्परा के स्वाभाविक विकास के साथ-साथ द्वन्द्वात्मक विकास को महत्व देते हुए वे स्थापित करते हैं कि विकास विरोध से निर्मित होता है, परिपाटी-पालन से नहीं। उनके अनुसार प्रगतिशीलता अपने युग की प्रगतिशील शक्तियों की पहचान पर निर्भर होती है। इसीलिए वे मार्क्सवाद के नाम पर छद्म क्रान्तिकारिता का विरोध करते हैं, परम्परा-पूजा से सावधान करते हैं और सांस्कृतिक विरासत को आलोचनात्मक ढंग से देखने की अपील करते हैं।
यह शोध-ग्रन्थ उनकी प्रगतिशील सोच और उससे उत्पन्न उनकी आलोचना-दृष्टि की जड़ों की खोज है जो नामवर-साहित्य के अलावा उससे सम्बन्धित व्यापक संदर्भ-सामग्री के अध्ययन से संभव हुई है।
Soor-Sahitya
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
“श्री हजारीप्रसाद भक्ति-तत्त्व, प्रेम-तत्त्व, राधाकृष्ण-मतवाद आदि के सम्बन्ध में जो भी उल्लेख-योग्य, जहाँ कहीं से पा सके हैं, उसे उन्होंने इस ग्रन्थ में संग्रह किया है और उस पर भली-भाँति विचार किया है, विचार का फलाफल उन्होंने स्पष्ट भाषा में ही लिखा है, इसका फल यह हुआ कि पुस्तक आराम के साथ, निश्चित, और आलस भाव से पढ़ने लायक़ नहीं हुई है। पद-पद पर चिन्ता और विचार करने की ज़रूरत है।
भारतीय धर्ममत के इतिवृत्त की आलोचना भी एक विपद है। एक, सब कुछ को अति प्राचीन सिद्ध करने की प्रवृत्ति और दूसरी, सब कुछ को अति अर्वाचीन सिद्ध करने की ज़िद। दोनों तरफ़ के इन दो पाषाण-संकटों के भीतर तरंग संकुल खर-स्रोत धरा में से भी द्विवेदी जी जो नैया खेकर घाट पर भिड़ा सके हैं, यह उनके लिए कम प्रशंसा की बात नहीं है।...”
—भूमिका से
Bhramar Geet : Saundaryashastriya Anushilan
- Author Name:
Rajendra Prasad Singh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी में जिस समय आधुनिक काल से पहले की साहित्यिक घटनाओं पर शोध कार्य अत्यन्त अल्प हो चुका है, उस समय श्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भ्रमरगीत : सौन्दर्यशास्त्रीय अनुशीलन’ का प्रकाशन आश्वस्तिकारक है। शोध और आलोचना के क्षेत्र में यह पुस्तक विज्ञ जन और आम पाठक दोनों के लिए उपादेय होगी, ऐसा विश्वास है। हिन्दी में भ्रमरगीत की सुदीर्घ परम्परा का अवगाहन कर लेखक ने उसे समझने और उसमें निमग्न होने के विस्तृत आधार प्रस्तुत किए हैं। मध्य युग से लेकर आधुनिक समय तक चली आती इस वैभवशाली काव्य-परम्परा का सौन्दर्यशास्त्रीय मान-मूल्यों के आलोक में अनुशीलन जिस गम्भीर अध्यवसाय की माँग करता है, उसका प्रमाण पुस्तक के हरेक अध्याय में मिलता है। आशा है यह पुस्तक हिन्दी साहित्य के रिक्थ को और समृद्ध करेगी।
—प्रो. प्रणय कृष्ण
विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज
Nai Kahani Aur Amarkant
- Author Name:
Nirmal Singhal
- Book Type:

-
Description:
प्रेमचंद की कहानी-परंपरा के वाहक के रूप में ख्यात अमरकांत नई कहानी के भी प्रमुख रचनाकार हैं। उनकी कहानियों के निम्न मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय पात्र ‘क़फ़न’ के घीसू-माधव के वंशज प्रतीत होते हैं। साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत के मोहभंग और निराशा को भी उन्होंने अपनी कहानियों में समेटा है। बल्कि कहना चाहिए कि धीरे-धीरे यही तत्व उनकी कहानियों में केंद्रीय होते चले गए हैं। साथ ही आया व्यंग्य और एक तीखा कटाक्ष जो स्वतंत्रता-बाद के सफेद-पोश भारतीय समाज की निर्ममतापूर्वक पोल खोलता है। इसी व्यंग्य के सहारे उन्होंने हमारे भीतर स्थायी भाव की तरह जड़ जमाते संत्रास, ऊब, घुटन, अकेलेपन और भीतरी-बाहरी हिंसा को भी बड़ी कुशलता के साथ रेखांकित किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में अमरकांत के लगभग संपूर्ण कथा-जगत पर एक गहन दृष्टि के साथ-साथ नई कहानी-आंदोलन में उनकी अवस्थिति को तलाशने की भी कोशिश की गई है। इस प्रयास में एक तरफ जहाँ अमरकांत की रचनात्मकता के विभिन्न पहलुओं और उनकी कहानियों में आए पात्रों और अनेक शिल्प व कथ्यगत तत्वों का खुलासा हुआ है, वहीं नई कहानी आंदोलन के विशिष्ट पक्षों और अन्य समकालीन रचनाकारों के योगदान पर भी व्यापक प्रकाश पड़ा है।
Ramvilas Sharma
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के कृतित्व की विकास-यात्रा में एक-दूसरे की अपरिहार्य भूमिका और उपस्थिति को महसूस किया जा सकता है। यदि नामवर सिंह नहीं होते तो सम्भवतः रामविलास शर्मा के कृतित्व की विशिष्टता, उनकी उपलब्धि और मूल्यांकन कुछ और प्रतीत होते। उसी तरह रामविलास शर्मा की अनुपस्थिति में नामवर सिंह का व्यक्तित्व और कृतित्व शायद कुछ और प्रतीत होता।
रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जीवन, संस्कृति, साहित्य और राजनीति से जुड़ी यात्रा में ‘हमराही' से हैं। दोनों एक-दूसरे के चिन्तन और समालोचना को गहराई से प्रभावित करते प्रतीत होते हैं। शीर्षस्थ समीक्षकों ने एक-दूसरे को प्रभावित करने के साथ-साथ एक-दूसरे का मूल्यांकन भी किया है।
सच तो यही है कि रामविलास शर्मा के कृतित्व, उपलब्धि, प्रासंगिकता और सीमाओं का बोध साहित्य-जगत को लगभग उतना ही है, जितना नामवर सिह ने अपनी समीक्षा से प्रस्तुत किया है। तथ्य है कि आज भी हम रामविलास शर्मा के कृतित्व को ‘...केवल जलती मशाल’ और ‘इतिहास की शव-साधना’ के दो ध्रुवान्तों के मध्य ही विश्लेषित करने को मजबूर हैं। रामविलास शर्मा के सन्दर्भ में यह नामवर सिह की समीक्षा की अपरिहार्यता और केन्द्रीयता का दुर्निवार तथ्य और प्रमाण हैं।
रामविलास शर्मा को समीक्षित करने के क्रम में यह संस्कृति, भारतीयता, साहित्य, आलोचना, विचारधारा और अन्ततः जीवन को समीक्षित करनेवाली अपरिहार्य एवं अविस्मरणीय समालोचना पुस्तक प्रतीत होती है।
Bilhana: Makers of Indian Literature
- Author Name:
P N Kawthekar
- Book Type:

- Description: A monograph in English by P.N. Kawthekar on the 11th century Kashmiri poet.
Rashtrabhasha Aur Rashtriya Ekta
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
– ‘जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परम्पराओं को भूलकर दूसरों की परम्पराओं का अनुकरण करने लगती हैं। इस सांस्कृतिक दासता का भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा अपना लेती है। फल यह होता है कि वह जाति अपना व्यक्तित्व खो बैठती है। उसके स्वाभिमान का विनाश हो जाता है!' स्वाधीनता के सात वर्ष बाद राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा दी गई यह गम्भीर चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी।
दिनकर जी एक समर्थ कवि और ओजस्वी वक्ता ही नहीं, प्रखर चिन्तक भी थे। इस संग्रह में जो विचारोत्तेजक, सारगर्भित भाषण और लेख संगृहीत हैं, वे इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
'राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता' पुस्तक जिसका विषय प्राय: भाषा और संस्कृति है, देश की ज्वलन्त समस्याओं के प्रति दिनकर जैसे एक साहित्यकार का निर्भीक दृष्टिकोण भी है।
संस्कृति की रचना और अभिव्यक्ति कला के माध्यम से होती है और भारतीय कला का यह स्वाभाव है कि वह यूरोप की कलात्मक भंगिमाओं से सामंजस्य नहीं बिठा सकती। प्राचीन काल में, यूनानी कला का सम्मिश्रण भारतीय कला से हुआ था। परिणामस्वरूप, गांधार-कला का जन्म हुआ किन्तु वह भारत में टिक नहीं सकी, क्योंकि वह अभारतीय थी, क्योंकि भारत की आत्मा अपने को इस मिश्रित कला के भीतर से व्यक्त नहीं कर सकती थी ।
Mere Samay Ke Shabda
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
केदारनाथ सिंह हमारे समय के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उन्होंने समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक विषयों पर विश्लेषणपूर्ण लेख लिखे हैं। कई बार तर्कपूर्ण विचारप्रवण टिप्पणियाँ की हैं। एक शीर्षस्थ कवि का यह गद्य-लेखन संवेदना व संरचना की दृष्टि से अनूठा है। ‘मेरे समय के शब्द’ में केदारनाथ सिंह की रचनाशीलता का यह सुखद आयाम उद्घाटित हुआ है।
प्रस्तुत पुस्तक में कविता की केन्द्रीय उपस्थिति है। हिन्दी आधुनिकता का अर्थ तलाशते हुए सुमित्रानन्दन पंत ज्ञेय, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रामविलास शर्मा और श्रीकान्त वर्मा आदि के कविता-जगत की थाह लगाई गई है। इस सन्दर्भ में ‘आचार्य शुक्ल की काव्य-दृष्टि और आधुनिक कविता’ लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
इसके अनन्तर पाँच खंड हैं—‘पाश्चात्य आधुनिकता के कुछ रंग’, ‘कुछ टिप्पणियाँ’, ‘व्यक्ति-प्रसंग’, ‘स्मृतियाँ’ और ‘परिशिष्ट’। पहले खंड में एजरा पाउंड, रिल्के और रेने शा की कविता पर विचार करने के साथ समकालीन अंग्रेज़ी कविता का मर्मान्वेषण किया गया है। दूसरे खंड में विभिन्न विषयों पर की गई टिप्पणियाँ लघु लेख सरीखी हैं।
‘व्यक्ति-प्रसंग’ के दो लेख त्रिलोचन और नामवर सिंह का आत्मीय आकलन हैं। अज्ञेय, श्रीकान्त वर्मा
और सोमदत्त की ‘स्मृतियाँ’ समानधर्मिता की ऊष्मा से भरी हैं। ‘परिशिष्ट’ में तीन साक्षात्कार हैं। एक उत्तर में केदारनाथ सिंह कहते हैं, ‘...नई पीढ़ी को एक नई मुक्ति के एहसास के साथ लिखना चाहिए और अपने रचनाकर्म में सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए अपनी संवेदना और अपने विवेक पर।’
यह पुस्तक शब्द की समकालीन सक्रियता में निहित संवेदना और विवेक को भलीभाँति प्रकाशित करती है।
Aacharya Ramchandra Shukla ke Itihas ki Rachna Prakriya
- Author Name:
Sameeksha Thakur
- Book Type:

-
Description:
* आचार्य शुक्ल का "हिंदी साहित्य का इतिहास" उनकी साहित्य साधना की चरम परिणति है। अपने वर्तमान रूप में उनका यह अंतिम ग्रंथ भी है और अन्यतम भी। हिंदी साहित्य के ज्ञान कोश के रूप में यह आज भी सबसे विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ है। एक साथ ही यह इतिहास भी है और आलोचना भी, समालोचना का सिद्धान्त भी और प्रमुख हिंदी साहित्यकारों का तारतमिक मूल्यांकन भी, हिंदी जाति की चित्तवृत्ति का 'संचित प्रतिबिम्ब' भी और हिंदी भाषा की मूल प्रकृति का मानक भी। 'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्त्रेहास्ति न तत क्वचित्' (जो यहाँ है वही अन्यत्र है, जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है) की उक्ति बहुत कुछ इस कालजयी कृति के विषय में भी चरितार्थ होती है।
* "हिंदी साहित्य का इतिहास" का भी एक इतिहास है। आलोचना की यह एक ऐसी विकासशील कृति है जिसने अनेक चरणों में पूर्णता प्राप्त की है। सौभाग्य से इनमें से प्रत्येक चरण के आलेख प्रकाशित रूप में सुरक्षित हैं। यह और बात है कि वे सभी दस्तावेज सरलता से सुलभ नहीं हैं। किन्तु इतना निश्चित है कि इस 'इतिहास' का इतिहास इन आलेखों में ही छिपा है। उस इतिहास की निर्माण-प्रक्रिया का अनावरण उन सभी आलेखों के तुलनात्मक अनुशीलन से ही सम्भव है।
Alochak Ka Dayitva
- Author Name:
Ramchandra Tiwari
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत कृति में आधुनिक हिन्दी-आलोचना की परिधि में आने वाले विविध सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रश्नों के विश्लेषण-क्रम में आलोचक के गहन दायित्व के आकलन की चेष्टा की गई है। लेखक ने आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह जैसे प्रख्यात् आलोचकों की सैद्धान्तिक मान्यताओं एवं व्यावहारिक समीक्षा-पद्धतियों के विश्लेषण द्वारा यह स्पष्ट करने की चेष्टा की है कि इन आलोचकों ने किस सीमा तक और किस रूप में एक आदर्श आलोचक के दायित्व का निर्वाह किया है। यह कृति हिन्दी के विवेकशील एवं आग्रहमुक्त सुधी पाठकों के बीच प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Hindi Kahani Vaya Alochana
- Author Name:
Neeraj Khare
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं शताब्दी की समय-गाथा हिन्दी कहानी की गौरवमयी विरासत और विस्मयकारी विस्तार में मौजूद है। उसके विभिन्न मुकाम, उपलब्धियों और कहानीकारों के मूल्यांकन पर अनेक पुस्तकें हैं। लोकप्रिय विधा कहानी की आलोचना परम्परा भी विकसित हुई। ऐसे प्रयासों से कहानी आलोचना का नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित हुआ। प्रायः उनमें कथा प्रवृत्तियों, कहानियों के उल्लेख और कहानीकारों पर सघन विवेचन तो हैं, पर कहानियों के एकल पाठ यानी उन पर एकाग्र आलोचनाएँ कम ही हैं। नीरज खरे द्वारा सम्पादित ‘हिन्दी कहानी वाया आलोचना’ कहानी आलोचना की ऐसी पहली किताब है, जिसमें बीसवीं सदी की सत्तर प्रतिनिधि कहानियों पर अलग-अलग आलोचनाएँ एक साथ हैं। हिन्दी कहानी के आरम्भिक काल, विभिन्न पड़ाव, नई कहानी, साठोत्तरी आन्दोलन और उत्तर सदी में मुक्त प्रवाह के मुताबिक़ किताब के तीन खंड हैं—‘बढ़ते क़दमों के निशान’, ‘कहानी : नई होने की डगर’ तथा ‘कहानी : साठोत्तरी और उत्तर सदी’। इन खंडों में क्रमशः रखी गई आलोचनाएँ पैंतालीस लेखकों की विचार-दृष्टि और लेखन दक्षता का प्रतिफल हैं—जिनमें कहानियों के नए मूल्यांकन और आलोचना-पद्धतियों के बदलाव भी परिलक्षित हैं।
सम्पादक ने लम्बी भूमिका में विधागत प्रवाह पर अत्यन्त सतर्क नज़र रखी है—जिससे ‘बीसवीं सदी की हिन्दी कहानी परम्परा’ का सुव्यवस्थित संज्ञान, प्रवृत्तियों की पहचान या संकलित आलोचनाओं तक जाने का कोई रास्ता या सूत्र भी हासिल हो जाता है। पिछले दो दशकों से कथालोचना में नीरज खरे की सक्रिय उपस्थिति रही है। इस पूरे उपक्रम में उनकी आलोचकीय समझदारी और सम्पादकीय अभिरुचि प्रतिबिम्बित है। आलोच्य कहानियाँ एक सदी के सफ़र की नुमाइंदगी करती हैं और अनेक विश्वविद्यालयों के स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में भी शामिल हैं। आलोचना की ऐसी किताब का अभाव लम्बे समय से महसूस किया जा रहा था; जिसमें परम्परा की प्रतिनिधि कहानियों पर मुकम्मल विचार हो। बीसवीं सदी की यात्रा में कहानी की रचना मुद्रा, संरचना के बदलाव और संवेदना के परिवर्तन ग़ौरतलब हैं। इसीलिए बेहतर और बोधगम्य आलोचनाओं का यह सुविचारित चयन समावेशी है। कहानी के पाठकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए उनकी ज़रूरतों, रुचियों और उद्देश्यों के मुताबिक़ यह किताब बहुउपयोगी ही नहीं; अत्यन्त सार्थक और स्थायी महत्त्व की है।
Hindi Upanyas Ka Stree-Path
- Author Name:
Rohini Agrawal
- Book Type:

-
Description:
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है।
मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं।
पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book