Nayi Kavita : Vols. 1-3
(0)
Author:
Ramswaroop ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
796 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘नयी कविता’ वाद-मुक्त धरातल को केन्द्र में मानकर सन् 54 में प्रकाशित हुई। प्रगतिवाद मार्क्सवाद से प्रेरित होकर हिन्दी साहित्य में स्थापित हुआ और प्रयोगवाद वैज्ञानिक चेतना को आधार मानकर अस्तित्व में आया। जबकि ‘नयी कविता’ विशुद्ध काव्य भूमि की नवीनता से उपजी है और 1954 से 67 तक आठ अंक उत्तरोत्तर समृद्ध के साथ प्रकाशित हुए। ‘नयी कविता’ के पहले अंक ने हिन्दी में अपनी क्रान्तिकारी उपस्थिति दर्ज की और विरोध की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से प्रखरतर होती गई। किंचित् कविता का विरोधात्मक आशय न समझकर उसे ही विरोध का आधार मान लिया गया।</p> <p>सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविताओं ने मुझे नयी कविता की शक्ति के प्रति आश्वस्त किया और अजित कुमार की चार पंक्तियों की कविता विरोध का प्रतीक बन गई और साथ ही नवीनता का उद्घोष भी।</p> <p>‘नयी कविता : नयी अभिरुचि’, ‘नयी कविता : सन्तुलन’ और ’नयी कविता : अर्थ की लय’ जैसे सम्पादकीय विचारोत्तेजक सिद्ध हुए। ‘नयी कविता’ के सैद्धान्तिक पक्ष को उजागर करने में मैंने व्यापक सहयोग प्राप्त किया और साहित्य में उसकी मान्यता निर्विवाद प्रमाणित हुई। जो युगान्तर कविता के भीतर घटित हुआ। वह कवियों को निरन्तर प्रेरित करता रहा और आज भी कीर्तिमान के रूप में स्थापित है।</p> <p>—जगदीश गुप्त
Read moreAbout the Book
‘नयी कविता’ वाद-मुक्त धरातल को केन्द्र में मानकर सन् 54 में प्रकाशित हुई। प्रगतिवाद मार्क्सवाद से प्रेरित होकर हिन्दी साहित्य में स्थापित हुआ और प्रयोगवाद वैज्ञानिक चेतना को आधार मानकर अस्तित्व में आया। जबकि ‘नयी कविता’ विशुद्ध काव्य भूमि की नवीनता से उपजी है और 1954 से 67 तक आठ अंक उत्तरोत्तर समृद्ध के साथ प्रकाशित हुए। ‘नयी कविता’ के पहले अंक ने हिन्दी में अपनी क्रान्तिकारी उपस्थिति दर्ज की और विरोध की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से प्रखरतर होती गई। किंचित् कविता का विरोधात्मक आशय न समझकर उसे ही विरोध का आधार मान लिया गया।</p>
<p>सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविताओं ने मुझे नयी कविता की शक्ति के प्रति आश्वस्त किया और अजित कुमार की चार पंक्तियों की कविता विरोध का प्रतीक बन गई और साथ ही नवीनता का उद्घोष भी।</p>
<p>‘नयी कविता : नयी अभिरुचि’, ‘नयी कविता : सन्तुलन’ और ’नयी कविता : अर्थ की लय’ जैसे सम्पादकीय विचारोत्तेजक सिद्ध हुए। ‘नयी कविता’ के सैद्धान्तिक पक्ष को उजागर करने में मैंने व्यापक सहयोग प्राप्त किया और साहित्य में उसकी मान्यता निर्विवाद प्रमाणित हुई। जो युगान्तर कविता के भीतर घटित हुआ। वह कवियों को निरन्तर प्रेरित करता रहा और आज भी कीर्तिमान के रूप में स्थापित है।</p>
<p>—जगदीश गुप्त
Book Details
-
ISBN9788180314759
-
Pages1183
-
Avg Reading Time39 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Sahitya Vidhaon Ki Prakriti
- Author Name:
Devishanker Awasthi
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक सृजनात्मक लेखन की सभी विधाओं के मूलभूत स्वरूप, उनके अन्तःतत्त्वों और उनकी प्रकृति का प्रामाणिक विवेचन प्रस्तुत करने के क्रम में विश्व के प्रमुख समीक्षकों के दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि प्रमुख साहित्यिक विधाओं ने किस प्रकार अपने स्वरूप का क्रमिक निर्माण किया है, उनकी प्रकृति में अन्तर्भूत सृजनात्मकता के आयाम किस प्रकार बदलते और जुड़ते रहे हैं तथा जातीय संस्कृति की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में—विधाएँ किस प्रकार प्रमुख या गौण भूमिका निभाती हैं—इन सारे प्रश्नों पर विश्व के प्रमुख चिन्तकों के बीच जो भी मतभेद और सहमति के बिन्दु उपलब्ध हैं, उन्हें एक ग्रन्थ में प्रस्तुत करने का यह एक ऐतिहासिक प्रयास है।
Shabdon Ka Safar : Vol. 3
- Author Name:
Ajit Wadnerkar
- Book Type:

-
Description:
शब्दों में ज्योति है...इंसान के पास शब्द ना होते तो इंसान का रिश्ता भी संसार के साथ वैसा ही होता जैसाकि जानवर का होता है। आचार्य दंडी को याद करें, ‘शब्दों की ज्योति न होती तो तीनों लोक अँधियारे होते’। शब्दों में ज्योति है क्योंकि उनका अपना एक जीवन है। कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाता है, एक-एक शब्द का सफ़र! कैसे-कैसे अर्थ भरते जाते हैं शब्द में!
हिन्दी की जीवन्तता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस भाषा ने संकीर्ण शुद्धतावाद को संस्कार कभी नहीं बनने दिया। न जाने कहाँ-कहाँ से आए शब्दों को हिन्दी ने अपनाया है। हिन्दी शब्दों के सफ़र को जानना हिन्दी भाषा के विकास के साथ-साथ हिन्दी समाज के मिज़ाज को भी जानना है।
अजित वडनेरकर कई वर्षों से शब्दों के इस रोमांचक सफ़र में हम सबको शामिल करते रहे हैं। कमाल की सूझ-बूझ है उनकी और कमाल की मेहनत। कहने का अन्दाज़ निराला। ‘शब्दों का सफ़र’ कितने रोचक, प्रामाणिक और विश्वसनीय ढंग से एक-एक शब्द के विकास-क्रम और अन्य शब्दों के साथ उसके सम्बन्ध को पाठक के सामने रखता है, यह पढ़कर ही जाना जा सकता है। सफ़र के इस तीसरे पड़ाव पर उन्हें बधाई और साथ ही शुक्रिया भी।
—डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल
Main Aryaputra Hoon
- Author Name:
Manoj Singh
- Book Type:

- Description: ‘‘हे आर्य! कोई बाहरी आक्रमणकारी जब किसी अन्य देश में प्रवेश करता है तो बाहर से भीतर आता है या भीतर से बाहर जाता है?’’ ‘‘यह कैसा प्रश्न हुआ, आर्या! स्वाभाविक रूप से बाहर से भीतर आता है।’’ ‘‘और इसी स्वाभाविक तर्क के आधार पर ही मैं भी एक प्रश्न पूछना चाहूँगी। अगर यह मान लिया जाए कि हम आर्य बाहर से आए थे तो पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सर्वप्रथम सिंधु के तट पर बसना चाहिए था और फिर पूरब दिशा की ओर बढ़ना चाहिए था। लेकिन वेद और पुरातत्त्व के प्रमाण कहते हैं कि हम आर्य पहले सरस्वती के तट पर बसे थे, फिर सिंधु की ओर बढ़े। यही नहीं, सरस्वती काल से भी पहले हम आर्यों का इतिहास विश्व की प्राचीनतम नगरी शिव की काशी और मनु की अयोध्या से संबंधित रहा है। और ये दोनों नगर भारत भूखंड के भीतर सरस्वती नदी की पूरब दिशा में हैं अर्थात् हम आर्य पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बढ़े थे।...तो फिर ये कैसे बाहरी (?) आर्य थे जो भीतर से बाहर (!!) की ओर बढ़े थे।...झूठ के पाँव नहीं होते हैं आर्य, ये झूठे इतिहासकार आपके प्रामाणिक प्रश्नों के उत्तर क्या ही देंगे, जब ये मेरे इस सरल तर्क और सामान्य तथ्य पर बात नहीं कर सकते।’’ ‘‘असाधारण तर्क आर्या!’’
Kavyatmakata Ka DikKal
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

-
Description:
काव्य पर विचार करना बहुत आसान भी हो सकता है और कठिन भी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस अयन में खड़े होकर काव्य को देख रहे हैं तथा उसके साथ हमारा अक्षांश-देशान्तर क्या है। यदि काव्य हमारे लिए केवल मनोरंजन, या तात्कालिक प्रतिक्रिया, या फतवेबाज़ी है तो काव्य की इस प्रकृति, स्वरूप और सत्ता को जानने में कोई ख़ास परेशानी नहीं होगी, लेकिन यदि वह हमारे लिए एक गम्भीर सृजनात्मक कर्म या रचनात्मक दायित्व तथा सत्ता है जिससे हम ग्रथित हैं तो हमारी जिज्ञासा और पड़ताल का दायरा शायद बहुत अधिक गहन और विशाल होगा।
सृष्ट जीवन को पुन: रचकर काव्य एक प्रतिजीवन बनकर अपनी सृजनात्मक उपस्थिति से जीवन पर देश और काल में प्रश्नचिह्न लगाता चलता है, इसीलिए काव्य का न तो कोई देश होता है और न ही कोई काल। जीवन की सार्वदेशिकता तथा शाश्वतता की तरह ही काव्य भी सार्वदेशिक और शाश्वत होता है।
यदि हम वास्तव में काव्य को जानना चाहते हैं तो सम्भव है, हमें साहित्य की अपनी क्षेत्रीय समझ और वर्तमानवादी आग्रही दृष्टि को विस्तृत करना होगा, अन्यथा वह बाधा बन जाएगी। वैसे सर्वथा अनाग्रही होना तो शायद सम्भव भी नहीं और कुछ होता भी नहीं, फिर भी यदि एक प्रकार का वैचारिक खुलापन देश और काल दोनों स्तरों पर बनाए रख सकें तो हम काव्य की दिशा में बढ़ सकते हैं। यह वैचारिक खुलापन ही कुतुबनुमा का काम करेगा।
इस पुस्तक में मनीषी कवि श्रीनरेश मेहता के उन व्याख्यानों को संकलित किया गया है जो उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ की ‘आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी व्याख्यानमाला’ के तहत दिए थे।
Nyay Ka Sangharsh
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

-
Description:
न्याय की धारणा और समाज की व्यवस्था के समान रूखे विषय की विवेचना को भी रंजक बना देना इन लेखों की सार्थकता है। भाषा प्रवाह के ऊपर तैरते हुए विद्रूप की तह में सिद्धान्तों की शिलाएँ मौजूद हैं। मनोरंजन और विद्रूप का अभिप्राय रूखे और गम्भीर विषय को रोचक बना देना ही है। इन लेखों को पढ़कर आपके होंठों पर जो मुस्कराहट आएगी, वह आत्म-विस्मृत और आनन्दोल्लास की न होकर क्षोभ, परिताप और करुणा की होगी।
इन लेखों में लेखक ने आत्म-विस्मृत समाज को क़लम की नोक से गुदगुदाकर जगाने की चेष्टा की है और समाज को करवट बदलते न देखकर कई जगह उसने क़लम की नोक समाज के शरीर में गड़ा दी है।
—नरेन्द्र देव
Bhakti Aur Sharnagati
- Author Name:
Vishnukant Shastri
- Book Type:

- Description: ‘तुलसिहिं बहुत भलो लागत’, जगजीवन राम ग़ुलाम को तुलसी की यह उक्ति आज के जीवन के कुहासे को काटकर ऊपर उठने की प्रेरणा देती रही है। राम के भक्त के समान मेरा जीवन हो सके, इसके लिए भक्ति और शरणागति को समझना अनिवार्य लगा। यह लेखन उसी समझ को प्रशस्त करने का उपक्रम है। भावुक पाठक इनको पढ़कर ‘भक्ति और शरणागति’ के गम्भीर अनुशीलन में प्रवृत्त होंगे।
Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

-
Description:
साहित्य की आलोचना केवल अन्तर्लक्ष्यी (Intrinsic) अथवा पाठ-केन्द्रित (Text Centered) आलोचना नहीं होती, अपितु वैसी बहिर्लक्ष्यी (Extrinsic) आलोचना भी होती है, जो पाठ से बाहर-पाठ के सम्यक् अवबोध के लिए रचनाकार के जीवनवृत्त, उसके जीवन-दृष्टिकोण, उसके युग, उसके सामाजिक यथार्थ, उसकी परम्परा, उसकी संस्कृति आदि को सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखती-परखती और साहित्य का मूल्यांकन करती है। ऐसी आलोचना शब्दों के जोड़-मात्र से बनी वैसी हर रचना को, जिसके पीछे ठोस वास्तविकता नहीं होती, वायवीय मानती है—‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:’ (योगसूत्र)।
हिन्दी में अब तक इसके सिद्धान्त पर तात्त्विक विवेचन और सार्थक बहस प्रस्तुत करनेवाली एक भी पुस्तक नहीं है। ऐसे में पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के प्रति डॉ. शीतांशु के वर्षों के गहरे लगाव, सम्यक् अध्ययन और अनवरत चिन्तन से परिणामित उनकी यह पुस्तक हिन्दी में पहली बार बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों का तथ्यपूर्ण, प्रामाणिक उप-स्थापन करती क्रमश: मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय, साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक और ऐतिहासिक आलोचना की स्वरूपगत मान्यताओं का समीचीन विवेचन प्रस्तुत करती है। पूर्वग्रहहीन सैद्धान्तिक निरूपण के साथ-साथ प्रतिमानों और निदर्शनों की बोध-व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है, जिससे बहुमुख अनुप्रयोग की दिशा भी सहज ही उजागर हो उठी है।
प्रस्तुत पुस्तक यदि एक ओर मार्क्सवादी आलोचनात्मक चिन्तन को रूढ़िवादी विवेचन-सीमा से आगे लाकर उसके उत्तरपक्षीय सैद्धान्तिक स्वरूप तक को निरूपित-व्यवस्थित करती है, तो दूसरी ओर समाज में साहित्य की स्थितिगत पहचानवाली चकाचौंध से निकलकर समाजशास्त्रीय आलोचना के बतौर साहित्य मे निरूपित समाज की पहचान-प्रक्रिया की भी गम्भीर विवेचना करती है; यदि एक ओर साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक आलोचना की प्रकृति, सैद्धान्तिकी और प्रकार्य-प्रक्रिया को आलोचित-प्रत्यालोचित करती है, तो दूसरी ओर उस ऐतिहासिक आलोचना को भी सावयव और सप्रमाण उपस्थापित करती है, जिसे कभी हिन्दी के एक वरिष्ठ आलोचक ने फतवा देते हुए आलोचना के क्षेत्र से ही ख़ारिज कर दिया था। तथ्यत: ‘बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों को जानने, पहचानने और मापने; साथ ही साहित्य को समझने और समझाने की दृष्टि से डॉ. शीतांशु की यह पुस्तक एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक है, जिससे हिन्दी के एक बड़े अभाव की महत्त्वपूर्ण पूर्ति हो जाती है।
Alochak Ka Dayitva
- Author Name:
Ramchandra Tiwari
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत कृति में आधुनिक हिन्दी-आलोचना की परिधि में आने वाले विविध सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रश्नों के विश्लेषण-क्रम में आलोचक के गहन दायित्व के आकलन की चेष्टा की गई है। लेखक ने आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह जैसे प्रख्यात् आलोचकों की सैद्धान्तिक मान्यताओं एवं व्यावहारिक समीक्षा-पद्धतियों के विश्लेषण द्वारा यह स्पष्ट करने की चेष्टा की है कि इन आलोचकों ने किस सीमा तक और किस रूप में एक आदर्श आलोचक के दायित्व का निर्वाह किया है। यह कृति हिन्दी के विवेकशील एवं आग्रहमुक्त सुधी पाठकों के बीच प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Premchand Ke Shreshth Nibandh
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

-
Description:
इस पुस्तक में संकलित निबन्धों और लेखों से प्रेमचन्द के दृष्टिकोण को समझने में, उनकी रचनाओं को विवेचित करने में न केवल मदद मिलेगी, बल्कि प्रेमचन्द के समय को भी परिभाषित करने में सुविधा होगी।
आज़ादी या स्वाधीनता का क्या अर्थ प्रेमचन्द समझते थे और राजनैतिक हलकों में उन्हें क्या दीख रहा था, इसमें काफ़ी फ़र्क़ है। लेखों को पढ़कर उस फ़र्क़ को पहचाना जा सकता है। उनकी रचनाओं से उनकी तुलना की जा सकती है।
नवजागरणकालीन अन्य रचनाकारों की तरह से वे समग्र चेतना के रचनाकार थे। उनकी भाषा का तेवर और वाक्य-विन्यास अंग्रेज़ी वाक्य-विन्यास का हिन्दी रूपान्तर नहीं है, बल्कि कौम के मानसिक विकास का कायान्तरण है। भाषा रुकी हुई या बाधा डालनेवाली अपारदर्शी नहीं, पारदर्शी है। वे अपरिचित को भी पारिवारिक और परिचित की तरह प्रस्तुत करते हैं। वस्तुपरक, विषय-प्रधान लेखों में भी गहरी आत्मीयता है, अलगाव नहीं है। इसलिए वे हमारे पूर्वज ही नहीं, समकालीन हैं।
Vichar Ka Aina Kala Sahitya Sanskriti : Mahatma Gandhi
- Author Name:
Mahatma Gandhi
- Rating:
- Book Type:

-
Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
मोहनदास करमचन्द गांधी ऐसे जननेता हैं जो वैश्विक उपस्थिति रखते हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के ऐसे नायक हैं जिन्होंने इसे जनता का आन्दोलन बना दिया। औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध करते हुए उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपनी लड़ाई का केन्द्रीय शिल्प बनाया। उन्होंने साध्य ही नहीं साधन की भी पवित्रता की बात की, बेलगाम उपभोग की संस्कृति का विरोध किया। सत्याग्रही के रूप में विरोधी के प्रति भी किसी तरह की कटुता न रखने की बात कही। अपने समय के शीर्ष लेखकों, चिन्तकों और कलाकारों पर गांधी के विचारों का गहरा असर रहा। वे लोगों से निरन्तर संवादरत रहे और अपने विचारों को मजबूती से रखते रहे। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए इस कठिन समकाल से जूझने की अनेक राहें रोशन होंगी।
Kabeer : Ek Nai Drishti
- Author Name:
Raghuvansh
- Book Type:

- Description: कबीर अपनी वाणी के विभिन्न अंगों के अन्तर्गत व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक-सामाजिक सम्बन्धों, आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों से धर्म, साधना और अध्यात्म क्षेत्र तक के मूल्य-बोध को अनेक स्तरों पर नाना रूपों तथा विभिन्न आयामों में अभिव्यक्त करते हैं। उन्होंने प्रचलित-परम्परित रूढ़ियों, मान्यताओं, विकृतियों-विडम्बनाओं तथा मूल्यहीनताओं का प्रभावी शैली में खंडन तथा विघटन किया है।
Hindi Kavya Chintan Ke Mooladhar
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

-
Description:
वैश्विक परिदृश्य की ओर बढ़ती हिन्दी भाषा के अपने काव्य-चिन्तन के मूलाधार का न होना स्वयं में चिन्ताजनक सन्दर्भ है। आठवीं शती में प्रारम्भ होनेवाली आज की इस राष्ट्रभाषा के रचनात्मक साहित्य का मूल्यांकन या तो भारतीय संस्कृत भाषा साहित्य के काव्यशास्त्रीय मानकों पर दृष्टि डालने के लिए विवश करता है या फिर विदेशी साहित्य सिद्धान्तों की ओर दृष्टि दौड़ते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी की कविता के लिए यह कितना लज्जाजनक है। देश-भर के विश्वविद्यालयों से जुडी भारतीय हिन्दी परिषद संस्था की राष्ट्रीय संगोष्ठियों में डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. नागेन्द्र, डॉ. भागीरथ मिश्र आदि विद्वान इस विषय पर बार-बार प्रश्न उठा चुके हैं किन्तु अभी तक इस दिशा में किए गए प्रयास सार्थक नहीं हो पाए।
इस प्रश्न के सन्दर्भ में यहाँ यदि यह कहा जाए कि ‘हिन्दी काव्य चिन्तन के मूलाधार’ शीर्षक ग्रन्थ हिन्दी की अपनी अस्मिता से जुड़े अपने नए मानकों की तलाश तथा हिन्दी भाषा की प्रकृति एवं उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ इतिहासबोध तथा संस्कृति को गहराई से देखने का एक मौलिक सन्दर्भ है। हिन्दी काव्य-चिन्तन की दिशा में निश्चित ही उसकी मौलिकता की प्रस्तुति को रखने, देखने, विश्लेषित करते हुए नए रूप में निष्कर्षबद्ध करने का यह सर्वथा नवीन प्रयास है।
Doosare Shabdon Mein
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
निर्मल वर्मा के लिए निबन्ध हमेशा ऐसी विधा रही जिसके माध्यम से उन्होंने सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और रचनात्मकता के मूलभूत प्रश्नों पर सोचते हुए जितनी बाहर, उतनी ही अपने भीतर भी यात्रा की। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से ज़्यादा सत्य के पीछे एक सजग यात्रा।
इस पुस्तक में शामिल निबन्ध इस लिहाज से और भी विशेष हैं। भाषा, अस्मिता, परम्परा और आधुनिकता के बार-बार चिह्नित प्रश्नों को यहाँ उन्होंने एक बार फिर से अपने चिन्तन का विषय बनाया है।
इसमें कुछ साक्षात्कार भी संकलित हैं जिनके प्रश्नों ने निर्मल वर्मा को पुन: एक अवसर दिया कि वे अपने सोचे और कहे गए को नए ढंग से व्यक्त करें। इस बहाने उनके कुछ अप्रत्याशित पहलू भी उजागर हुए।
स्वतंत्रता के समय देश को नए सिरे से रचने के जो स्वप्न हमने देखे, ख़ासकर सांस्कृतिक सन्दर्भ में, क्या वे हमारे साथ बने रहे या धीरे-धीरे हमारे हाथ से छूट गए? हमारी प्राथमिकताओं ने हमें क्या दिया, और अगर कोई नई शुरुआत करनी ज़रूरी है तो वह कहाँ से हो?
ऐसे अनेक प्रश्नों पर मनन-रत ये निबन्ध हमारी वर्तमान दुविधाओं और दुश्चिंताओं के लिए भी उपयोगी कहे जा सकते हैं।
Gandhi Aur Kala Tatha Anya Nibandh
- Author Name:
Raman Sinha
- Book Type:

- Description: भारतीय कलाओं, उनकी परम्पराओं और भाव-पक्ष पर सुनियोजित ढंग से विचार करने वाली ‘गांधी और कला तथा अन्य निबन्ध’ पुस्तक डॉ. रमण सिन्हा के समय-समय पर लिखे गए निबन्धों और व्याख्यानों का संकलन है। ‘गांधी और कला’ शीर्षक सुदीर्घ निबन्ध इसकी विशेष उपलब्धि है जिसमें कलाओं को लेकर गांधी की दृष्टि और विभिन्न कलाओं में गांधी व उनके विचारों के अंकन को अलग-अलग कोणों से देखा गया है। कलाओं की आन्तरिक परस्परता को भारतीय कला-दृष्टि की विशिष्टता बताते हुए यह पुस्तक उन कला-रूढ़ियों को भी रेखांकित करती चलती है जो वक़्त-वक़्त पर विदेशी लोगों के आगमन के साथ भारत की कला-धारा में समाहित होती रहीं, और उसे नया रूप देती रहीं। मध्यकालीन भारतीय कला और संस्कृति पर विचार करते हुए लेखक कहते हैं कि भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुग़ल शैली का उद्भव एक युगान्तरकारी घटना सिद्ध हुई, जिसमें दो संस्कृतियों ने एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान का सम्बन्ध कायम किया तथा देशी का विदेशी के साथ व परम्परा का नवाचार के साथ संवाद बना। ‘तुलसीदास का प्रतिमा-निरूपण’, ‘कविता और राग’ तथा ‘हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत : लौकिक या पारलौकिक?’ आदि निबन्धों के अलावा अभिनय के माध्यम से अपने आत्म का अन्वेषण करनेवाले फ़िल्मकार ऋतुपर्ण घोष पर केद्रित एक आलेख भी इसमें शामिल है जो इस कला-विवेचन को हमारे आज के कला-बोध से जोड़ता है।
Mahakavi Soordas
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
- Book Type:

- Description: भक्तिकाल के इस अप्रतिम कवि के जीवन और साहित्य पर जितना कुछ उल्लेखनीय अध्ययन अब तक हुआ है, उसमें आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की यह पुस्तक विशिष्ट स्थान रखती है। उपलब्ध स्रोत-सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन करके आचार्य वाजपेयी ने महाकवि के जीवन-तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में दी है, और साथ ही उनके कृतित्व और भक्ति के सिद्धान्त-पक्ष का विवेचन भी किया है। आकार में लघु होते हुए भी सूर-साहित्य का इतना समग्र अनुशीलन इस पुस्तक में है कि निस्संकोच भाव से इसे 'गागर में सागर' की संज्ञा दी जा सकती है।
Kavita Ke Aar Par
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी में कृति की राह से गुज़रने की बहुत बात की जाती है, लेकिन सच्चाई यह है कि उसमें आलोचना और रचना का आपसी सम्बन्ध काफी कुछ टूट चुका है। जहाँ तक कविता की बात है, ज़्यादा शक्ति उसके सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों को स्पष्ट करने में ख़र्च की जा रही है। जब कविता से अधिक उसके कारणों को महत्त्व दिया जाएगा, तो अनिवार्यतः उसके सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकाले जाएँगे, वे पूरी तरह से सही नहीं होंगे। कविता अन्ततः एक कलात्मक सृष्टि है, जिसमें उसके देश और कालगत सन्दर्भ स्वयं छिपे होते हैं। आलोचना का काम रचना से ही आरम्भ कर उन सन्दर्भों तक पहुँचना है, न कि उन सन्दर्भों को अलग से लाकर उनमें रचना को विलीन कर देना। प्रस्तुत पुस्तक में इस कठिन काम को अंजाम देने का भरसक प्रयास किया गया है।
निराला, शमशेर और मुक्तिबोध हिन्दी के ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता का पाठ अत्यधिक जटिल है। हिन्दी काव्यालोचन उस पाठ से उलझने से बचता रहा है, जबकि संज्ञान और सौन्दर्य दोनों का मूल स्रोत वही है। डॉ. नंदकिशोर नवल निराला और मुक्तिबोध के विशेष अध्येता हैं और शमशेर में उनकी गहरी दिलचस्पी है। स्वभावतः उन्होंने इस पुस्तक के लेखों में उक्त कवियों की कुछ प्रसिद्ध कविताओं का पाठ-विश्लेषण करते हुए उनके सौन्दर्योन्मीलन की चेष्टा की है। उनका कहना है कि पाठ-विश्लेषण काव्यालोचन का प्रस्थानबिन्दु है। निश्चय ही उससे शुरू करके वे वहीं तक नहीं रुके हैं।
अज्ञेय, केदार और नागार्जुन अपेक्षाकृत सरल कवि हैं, लेकिन चूँकि कविता-पात्र एक जटिल वस्तु है, इसलिए प्रस्तुत पुस्तक में उनकी कुछ कविताओं से भी आत्मिक साक्षात्कार किया गया है। नमूने के रूप में रघुवीर सहाय की एक कविता की भी पाठ-केन्द्रित आलोचना दी गई है। इस तरह की पुस्तक हिन्दी काव्य-प्रेमियों के लिए एक ज़रूरी पुस्तक है, जो उनकी आस्वादन क्षमता को विकसित करेगी।
Bharat Aur Europe : Pratishruti Ke Kshetra
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता।
‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...”
इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
Safdar : Vyaktitva aur krititva - Paper Back
- Author Name:
Safdar Hashmi
- Book Type:

-
Description:
‘जन नाट्य मंच’ के संस्थापक सदस्य और सुविख्यात युवा रंगकर्मी सफ़दर हाशमी की स्मृति से जुड़ी यह पुस्तक साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक अलग तरह का महत्त्व रखती है। एक ओर जहाँ इसमें सफ़दर के कुछ नुक्कड़ नाटक, नुक्कड़ नाटक सम्बन्धी कुछ आलेख, गीत, कविताएँ तथा उनसे किया गया एक साक्षात्कार शामिल हैं, वहीं दूसरी ओर साहित्य और रंगमंच से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की क़लम से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को विश्लेषित करनेवाले निबन्ध भी हैं।
सफ़दर एक जुझारू संस्कृतिकर्मी थे और इसके लिए उन्होंने नुक्कड़ नाटक को न सिर्फ़ एक विधा के तौर पर अपनाया, बल्कि जनवादी आन्दोलनों के पक्ष में एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया; उस पर सोचा, उसे रचा और फिर लाखों लोगों तक उसे ले गए। इसके माध्यम से उन्होंने वर्तमान दौर के अनेक ज्वलन्त सवालों और समस्याओं से सीधे-सीधे टकराते हुए उनके प्रति लाखों लोगों में एक नई वैचारिक जागरूकता और एक नया नज़रिया पैदा किया।
वे एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जो हर पल कर्म में घटित होते हैं और अपनी गतिशीलता से हर उस ठहराव को तोड़ते हैं जिसके कारण जीवन में कहीं भी सड़ाँध पैदा होती है। वस्तुतः सफ़दर का सम्पूर्ण जीवन, कर्म और कृतित्व वर्तमान जनवादी संघर्षों के सन्दर्भ में अपूर्व प्रेरणाओं से भरा हुआ रहा और यह कृति उनके प्रखर ऊर्जावान व्यक्तित्व तथा असमय समाप्त कर दी गई उनकी अकूत रचनात्मक क्षमता का संक्षिप्त, किन्तु दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत करती है।
Hindi Samiksha Aur Acharya Shukla
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को निर्विवाद रूप से हिन्दी आलोचना का शिखर-व्यक्तित्व स्वीकार किया जाता है। जब हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को कसौटी पर कसने के प्रतिमान निर्मित हो रहे थे, तब आचार्य शुक्ल ने अपनी अद्भुत योग्यता से उन्हें एक सार्थक स्वरूप प्रदान किया। इसका महत्त्व ऐसे भी समझा जा सकता है कि आज तक रचनाओं, प्रवृत्तियों व रचनाकारों को लेकर होनेवाली बहुतेरी बहसों की पृष्ठभूमि आचार्य शुक्ल द्वारा रेखांकित सूत्रों से ही आकार लेती है।
‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ पुस्तक में डॉ. नामवर सिंह द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेख संकलित हैं। पुस्तक के सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष के अनुसार, ‘निःसन्देह रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल की वास्तविक प्रासंगिकता और उनकी सीमाओं का सम्यक् सन्तुलित और चरम बौद्धिक आलोचनात्मक अध्ययन पहली बार नामवर सिह ने ही किया है।’
एक तरह से यह पुस्तक हिन्दी के दो दिग्गज आलोचकों का ‘समेकित विमर्श’ भी है। संकलित लेख ऐतिहासिक महत्त्व के तो हैं ही, इनमें निहित दृष्टि परम्परा व समकालीनता के विश्लेषण में भी सहायक है। सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष की भूमिका इन लेखों की प्रासंगिकता रेखांकित करते हुए नामवर सिंह के आलोचना-कर्म का मर्म भी उद्घाटित करती है।
Dhalan Se Utarate Hue
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
क्या हमारा ‘सेल्फ़’ संसार की विरोधी इकाई है? क्या किसी कलाकृति का काम केवल हमारे विश्वासों को पुष्ट करना होता है? उपन्यास विधा जिसका जन्म व्यक्ति की विशिष्ट अवधारणा से जुड़ा था, आज इतनी क्लान्त और थकी हुई क्यों दिखती है? कहानी और उपन्यास कहाँ अलग होते हैं? क्या भाषा की सामर्थ्य को रचना की अर्थवत्ता से अलग किया जा सकता है?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर निर्मल वर्मा के निबन्ध अकसर ठहरकर सोचते हैं। कभी ख़ुद के सामने बैठकर और कभी दूसरों के साथ संवाद करते हुए। ‘ढलान से उतरते हुए’ में शामिल निबन्धों में यह प्रक्रिया और सजग दिखाई देती है।
जिन प्रश्नों को ‘शब्द और स्मृति’ तथा ‘कला का जोखिम’ में उन्होंने बस छुआ-भर था, उन्हें यहाँ अधिक ठोस और व्यापक फलक पर जाँचने-परखने की कोशिश की गई है। निबन्धों के विषय विभिन्न हैं, लेकिन कला और कलाकृति, मनुष्य तथा उसके परिवेश से जुड़े मूलगामी प्रश्नों की विवेचना इन्हें एक सूत्र में भी जोड़ती है।
अंतिम खंड ‘रास्ते पर’ में निर्मल जी की डायरी के कुछ अंश भी इस पुस्तक का हिस्सा हैं जिनसे हम उनके उस ‘मन’ को समझ सकते हैं जो उन्हें अकसर यथार्थ के सूक्ष्मतर पक्षों तक लेकर जाता है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book