Surya Pranam
(0)
Author:
Bimal DeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
175
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र्य प्रणाम’ का स्थान-काल, पात्र तथा घटनाएँ सभी वास्तविक हैं। मैं पर्यटक हूँ वास्तविक घटनाओं का उल्लेख करना ही मेरा धर्म है। यथार्थ के वर्णन में एकरसता आ जाती है। मैं एक पथिक हूँ अपनी यात्राओं के दौरान जो भी मैं देखता हूँ मुझे जो अनुभव होता है, उसी को मैं अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयत्न करता हूँ। मैंने अपनी यात्राओं के दौरान बहुत से मन्दिर, मठ और पूजास्थल देखे हैं, बहुत से तीर्थों में जाकर शीश नवाया है। हिमालय के बहुतेरे तीर्थस्थलों में मैंने देव-स्पर्श पाया, हिमालय की पुण्यभूमि में ही पुण्यात्माओं का आविर्भाव सम्भव है। एंडीज की यात्रा ने मुझे तपस्या की अन्तिम सोपान पर पहुँच दिया था। एंडीज तथा मध्य व दक्षिणी अमरीका की प्राचीन सभ्यता में ज्यों सूर्य को मूल देवता का स्थान प्राप्त था, त्यों ही जापान का मूल देवता भी सूर्य है। जापान के सम्राट को सूर्य का प्रतिनिधि मानते हैं, जापानी पताका का प्रतीक चिह्न भी सूर्य है। सूर्य का प्रभाव जापानियों के चरित्र में भी दिखाई देता है। सूर्य शक्ति और ओज का प्रतीक है। ‘सूर्य प्रणाम’ ग्रन्थ सूर्य-देवता के प्रति मेरा अर्घ्य है। सूर्य को देवता माननेवाले जापान और एंडीज में मैंने जो कुछ देखा, सुना और जाना, उसी अनुभव को मैं इस लेखन के ज़रिए अपने पाठकों तक पहुँचा रहा हूँ। —इसी पुस्तक की भूमिका
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र्य प्रणाम’ का स्थान-काल, पात्र तथा घटनाएँ सभी वास्तविक हैं। मैं पर्यटक हूँ वास्तविक घटनाओं का उल्लेख करना ही मेरा धर्म है। यथार्थ के वर्णन में एकरसता आ जाती है। मैं एक पथिक हूँ अपनी यात्राओं के दौरान जो भी मैं देखता हूँ मुझे जो अनुभव होता है, उसी को मैं अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयत्न करता हूँ। मैंने अपनी यात्राओं के दौरान बहुत से मन्दिर, मठ और पूजास्थल देखे हैं, बहुत से तीर्थों में जाकर शीश नवाया है। हिमालय के बहुतेरे तीर्थस्थलों में मैंने देव-स्पर्श पाया, हिमालय की पुण्यभूमि में ही पुण्यात्माओं का आविर्भाव सम्भव है। एंडीज की यात्रा ने मुझे तपस्या की अन्तिम सोपान पर पहुँच दिया था। एंडीज तथा मध्य व दक्षिणी अमरीका की प्राचीन सभ्यता में ज्यों सूर्य को मूल देवता का स्थान प्राप्त था, त्यों ही जापान का मूल देवता भी सूर्य है। जापान के सम्राट को सूर्य का प्रतिनिधि मानते हैं, जापानी पताका का प्रतीक चिह्न भी सूर्य है। सूर्य का प्रभाव जापानियों के चरित्र में भी दिखाई देता है। सूर्य शक्ति और ओज का प्रतीक है। ‘सूर्य प्रणाम’ ग्रन्थ सूर्य-देवता के प्रति मेरा अर्घ्य है। सूर्य को देवता माननेवाले जापान और एंडीज में मैंने जो कुछ देखा, सुना और जाना, उसी अनुभव को मैं इस लेखन के ज़रिए अपने पाठकों तक पहुँचा रहा हूँ।
—इसी पुस्तक की भूमिका
Book Details
-
ISBN9788180317378
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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काव्य पर विचार करना बहुत आसान भी हो सकता है और कठिन भी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस अयन में खड़े होकर काव्य को देख रहे हैं तथा उसके साथ हमारा अक्षांश-देशान्तर क्या है। यदि काव्य हमारे लिए केवल मनोरंजन, या तात्कालिक प्रतिक्रिया, या फतवेबाज़ी है तो काव्य की इस प्रकृति, स्वरूप और सत्ता को जानने में कोई ख़ास परेशानी नहीं होगी, लेकिन यदि वह हमारे लिए एक गम्भीर सृजनात्मक कर्म या रचनात्मक दायित्व तथा सत्ता है जिससे हम ग्रथित हैं तो हमारी जिज्ञासा और पड़ताल का दायरा शायद बहुत अधिक गहन और विशाल होगा।
सृष्ट जीवन को पुन: रचकर काव्य एक प्रतिजीवन बनकर अपनी सृजनात्मक उपस्थिति से जीवन पर देश और काल में प्रश्नचिह्न लगाता चलता है, इसीलिए काव्य का न तो कोई देश होता है और न ही कोई काल। जीवन की सार्वदेशिकता तथा शाश्वतता की तरह ही काव्य भी सार्वदेशिक और शाश्वत होता है।
यदि हम वास्तव में काव्य को जानना चाहते हैं तो सम्भव है, हमें साहित्य की अपनी क्षेत्रीय समझ और वर्तमानवादी आग्रही दृष्टि को विस्तृत करना होगा, अन्यथा वह बाधा बन जाएगी। वैसे सर्वथा अनाग्रही होना तो शायद सम्भव भी नहीं और कुछ होता भी नहीं, फिर भी यदि एक प्रकार का वैचारिक खुलापन देश और काल दोनों स्तरों पर बनाए रख सकें तो हम काव्य की दिशा में बढ़ सकते हैं। यह वैचारिक खुलापन ही कुतुबनुमा का काम करेगा।
इस पुस्तक में मनीषी कवि श्रीनरेश मेहता के उन व्याख्यानों को संकलित किया गया है जो उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ की ‘आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी व्याख्यानमाला’ के तहत दिए थे।
Sarkari Karalayo Mein Hindi Ka Prayog
- Author Name:
Gopinath Srivastav
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक ‘सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त लेखन और मुद्रण-फलक-शोधन पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। दूसरे भाग में परिशिष्ट है जिसमें दोषयुक्त और शुद्ध टिप्पणी के नमूने, विभिन्न प्रकार के प्रालेखों के नमूने, संक्षिप्त-लेखन के नमूने, मुद्रण-शोधन के नमूने, कतिपय प्रतिमित प्रालेख, प्रपत्र और सन्देश आदि दिए गए हैं। तीसरे भाग में सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिए गए हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पुस्तक उपयोगी और राजकीय कार्यों में हिन्दी की प्रगति बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
The Book Of English Grammar Tenses
- Author Name:
Mamta Mehrotra
- Book Type:

- Description: English grammar can be challenging, but it is essential to effective communication. Whether you are writing an essay, sending an email, or engaging in a conversation, using correct grammar can make all the difference in how your message is received. This comprehensive grammar book of tenses for students is designed to help them master the English language. This book is intended to help students improve their grammar and communication skills. In this book, you will find clear explanations of grammar rules and numerous examples and practice exercises to help you reinforce your understanding. The book is organized in a logical and easy-to-follow manner, so you can learn at your own pace and track your progress. Hopefully, this book will be a valuable resource for you as you work to improve your grammar skills.
Sahitya Aur Samaj
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
‘साहित्य और समाज’ समर्थ साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता और प्रखर चिन्तक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के साहित्य की विभिन्न विधाओं और समस्याओं को समर्पित चिन्तनपूर्ण अठारह निबन्धों का संकलन है।
यह पुस्तक यहाँ एक तरफ़—‘परम्परा और भारतीय साहित्य’, ‘साहित्य पर विज्ञान का प्रभाव’, ‘साहित्य में आधुनिकता’, ‘समाजवाद के अन्दर साहित्य’, ‘साहित्य का नूतन ध्येय’, ‘कलाकार की सफलता’, ‘भविष्य के लिए लिखने की बात’, ‘लेखकों का कार्य-शिविर’, ‘हिन्दी साहित्य पर गांधी जी का प्रभाव’, ‘पाकिस्तान के पीछे साहित्य की प्रेरणा’, ‘श्री अरविन्द की साहित्यिक मान्यताएँ’, ‘जार्ज रसल का साहित्य-चिन्तन’ आदि निबन्धों द्वारा समाज और साहित्य पर प्रकाश डालती है तो दूसरी तरफ़ ‘अर्धनारीश्वर’, ‘कला’, ‘धर्म और विज्ञान’, ‘आउट-साइडर’, ‘रवीन्द्रनाथ की राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता’, ‘क्या रवीन्द्रनाथ अभारतीय हैं?’, ‘महात्मा टॉलस्टॉय’ जैसे विषयों पर दिनकर जी के गम्भीर चिन्तन को भी हमारे सम्मुख लाती है।
पठनीय और मननीय निबन्धों से सुसज्जित यह पुस्तक राष्ट्रकवि दिनकर के चिन्तक स्वरूप को उद्घाटित करनेवाली एक श्रेष्ठ बौद्धिक कृति है।
Kavita Ka Uttar Jiwan
- Author Name:
Parmanand Srivastav
- Book Type:

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Description:
‘कविता का उत्तर जीवन’ उत्तर समय में लिखी जा रही कविता का एक आलोचनात्मक पाठ-भर नहीं है, एक पूरे समय और काव्य-समय पर सघन विमर्श भी है। ‘शब्द और समय’ (1988) और ‘कविता का अर्थात्’ (1999) से जुड़कर अब वह एक त्रयी का हिस्सा भी है और फलश्रुति भी। (यद्यपि कोई भी फलश्रुति एक मिथ या यूटोपिया है)। परमानन्द श्रीवास्तव आधी सदी की कविता और आलोचना के संघर्ष के साक्षी ही नहीं रहे, उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप की विश्वसनीयता भी प्रायः असन्दिग्ध रही। उनका आलोचनात्मक गद्य ख़ास रचनात्मक चमक लिये हुए है, जिसकी छाप ‘कविता का उत्तर जीवन’ पर सबसे अधिक है।
‘कविता का उत्तर जीवन’ इस प्रमुख स्थापना के साथ पाठकों-लेखकों के बीच है कि किसी भी समय की महत्त्वपूर्ण कविता का एक वृहत्तर स्पेस होता है और वही दूसरे-तीसरे पाठ को दूसरे-तीसरे जीवन में फिर से घटित करता है। कविता का कोई भी नया पाठ एक पुनर्जीवन है, जो आस्वाद और मूल्यांकन के द्वन्द्व को अनिवार्य बनाता है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इसका साक्ष्य है कि कैसा भी प्रतिमानीकरण; (canonization) समूचे काव्यन्याय में अपने को असमर्थ पाता है; इसलिए भी कि ग़ालिब और कबीर हमारे लिए उतने ही समकालीन हो सकते हैं, जितने मुक्तिबोध और शमशेर। परमानन्द श्रीवास्तव की यह कृति शुद्ध स्वायत्त कविता की जगह अशुद्ध अनगढ़, पर जब-तब अथाह, कोशिश को महत्त्व देती है जिसमें आश्चर्य नहीं कि कभी डायरी, आत्मकथा तथा कॉलमनुमा लेख भी शामिल हैं। यह एक नई पहल है—इससे आलोचना, रचना—दोनों में समय की आहटों का पता चलता है।
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