Upanyas Aur Varchasva Ki Satta
Author:
Virendra YadavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 480
₹
600
Available
प्रायः उपन्यास को मात्र साहित्यिक संरचना मानकर आस्वादपरक दृष्टि से मूल्यांकन का चलन रहा है। वीरेन्द्र यादव हिन्दी की इस आलोचनात्मक रूढ़ि को तोड़ते हुए उपन्यास विधा की नई सामर्थ्य को उजागर करते हैं। अन्तर्वस्तु के सघन पाठ द्वारा वे उपन्यास की उस ‘सबाल्टर्न’ (निम्नवर्गीय) भूमिका को उद्घाटित करते हैं, जो प्रभुत्वशाली विमर्श द्वारा अधिगृहीत कर ली जाती है।</p>
<p>वीरेन्द्र यादव मानते हैं कि उपन्यास साहित्यिक रचना के साथ-साथ सामाजिक निर्मिति भी है और उसकी जनतान्त्रिकता केवल रचाव की कला से नहीं आती, औपन्यासिक विमर्श की सामाजिक दृष्टि से भी निर्मित होती है। इसीलिए वे ‘गोदान’, ‘झूठा सच’, ‘आधा गाँव’, ‘राग दरबारी’, ‘आग का दरिया’ व ‘उदास नस्लें’ सरीखे कालजयी उपन्यासों का विश्लेषण करते हुए सबाल्टर्न इतिहास-दृष्टि की मदद से इन उपन्यासों में किसानों, दलितों, स्त्रियों और अन्य अधीनस्थ वर्गों की उपस्थिति-अनुपस्थिति और उनकी यातना, सामाजिक सजगता तथा संघर्षशीलता की पहचान का आख्यान खोजते हैं। साथ ही वे प्रभुत्वशाली वर्गों से अधीनस्थ वर्गों के अन्तर्विरोधों और द्वन्द्वों का आख्यान रचनेवाली कथादृष्टि की सामाजिक पक्षधरता की भी जाँच-परख करते हैं। यह एक प्रकार से उपन्यास की आलोचना के माध्यम से भारतीय समाज और साहित्य के राष्ट्रवादी विमर्श से बहिष्कृत अधीनस्थ वर्गों की पहचान को विकसित करने के लिए वैचारिक संघर्ष भी है। वीरेन्द्र यादव के आलोचनात्मक निबन्धों में आज के भारतीय समाज के ज्वलन्त प्रश्नों, सामाजिक द्वन्द्वों और वैचारिक टकराहटों की प्रतिध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं। उनकी आलोचना दृष्टि की प्रखरता और विश्लेषण की नवीनता के कारण जानदार है और असरदार भी।</p>
<p>‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ के आलोचनात्मक निबन्ध समसामयिक उपन्यास विमर्श में वैचारिक हस्तक्षेप सरीखे हैं। इस पुस्तक के अधिकांश लेख पर्याप्त रूप से चर्चित और प्रशंसित रहे हैं। भारतीय अंग्रेज़ी औपन्यासिक लेखन पर केन्द्रित ‘दि इंडियन इंग्लिश नॉवेल और भारतीय यथार्थ’ शीर्षक लेख तो अंग्रेज़ी बौद्धिकों के बीच चर्चित होकर अन्तरराष्ट्रीय बहसों का हिस्सा बना। वीरेन्द्र यादव के आलोचनात्मक निबन्धों की प्रतीक्षा सुधी बौद्धिकों के बीच लम्बे समय से रही है। विश्वास है, यह पुस्तक उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति करने में सक्षम होगी।
ISBN: 9788126718207
Pages: 260
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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द्विवेदी-युग के उत्तरार्ध में आचार्य शुक्ल के रूप में पहली बार हिन्दी-आलोचना ने पारम्परिक भारतीय काव्य-चिन्तन की अन्तरवर्ती प्राणधारा और आधुनिक यूरोप के विज्ञानालोकित कला-चिन्तन के उल्लसित प्रवाह की संश्लिस्ट शक्ति का आधार लेकर अपने मौलिक व्यक्तित्व का निर्माण किया, उनका मूल स्वर रीति-विरोधी और लोक-मंगल की साधना के गत्यात्मक सौन्दर्य का पोषक है। छायावादकालीन सौन्दर्यबोध का प्रेरक तत्त्व स्वातंत्र्य चेतना है जो देश की अभिनव आकांक्षा और नवीन सांस्कृतिक मूल्यों के स्वीकार का द्योतक है रचना के कलावादी रुझान का नहीं। छायावादोत्तर प्रगतिशील आलोचना का प्रेरक-तत्त्व सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा की सात्त्विक आकांक्षा है। वैचारिक ग्रहजन्य सीमाओं के बावजूद हिन्दी-साहित्य में उसकी ऐतिहासिक भूमिका का महत्त्व सर्वमान्य है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. बच्चन सिंह तथा डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे महान समीक्षकों पर एक गवेषणात्मक दृष्टि डाली गई है।
Aadhunik Kavi
- Author Name:
Vishvambhar 'Manav'
- Book Type:

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Description:
बीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का काव्य इतना समृद्ध हो गया है कि उसे संसार के किसी भी सभ्य देश के काव्य की तुलना में रखा जा सकता है। इस युग में विभिन्न साहित्यिक वादों और आन्दोलनों का प्रचार हुआ, इस युग ने हमें प्रथम श्रेणी के अनेक महाकाव्य और खंड-काव्य दिए और इसी युग में एक ओर गीति-काव्य और दूसरी ओर मुक्त छंद का ऐसा प्रसार हुआ, जिसकी समता अतीत के सम्पूर्ण इतिहास में नहीं मिलती। अत: समय की माँग है कि आधुनिक काव्य के भावगत एवं कलागत सौन्दर्य का लेखा-जोखा अब लिया जाए।
औद्योगीकरण एवं उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव केवल निम्न वर्ग पर ही नहीं, बल्कि उसकी गिरफ़्त में सम्पूर्ण मानवीय समाज है। धर्म की अमानवीय व्याख्या स्वार्थपरकता, अर्थलोलुपता, विज्ञान के द्वारा विकसित विनाश के विभिन्न साधन आदि के कारण सम्पूर्ण मनुष्यता के लिए ही संकट पैदा हुआ। मनुष्य का बचना बहुत प्राथमिक है। अभी भी मनुष्य जीवन और मृत्यु के अनेक प्रश्नों से टकरा रहा है। परिवर्तन की गति इतनी तेज है कि यह आशंका होने लगती है कि मनुष्य की पहचान करानेवाले लक्षण ही न लुप्त हो जाएँ। अशोक वाजपेयी ऐसे रचनाकार हैं जो मनुष्यता के व्यापक प्रश्नों से टकराते हैं और नई परिस्थितियों में मानवीय सभ्यता को रचना के माध्यम से स्थापित करते हैं।
नयी कविता से जुड़े अनेक कवियों ने अपनी निजी अनुभूति और शिल्प के द्वारा रचनात्मक ऊँचाई हासिल की, उनकी रचनाधर्मिता को काव्यधारा के दायरे में पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता है, बल्कि उनका अलग-अलग विवेचन अपेक्षित है।
इस ग्रन्थ में भारतेन्दु से लेकर अरुण कमल तक ऐसे चौवालीस प्रतिनिधि कवियों के काव्य का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है जिनका साहित्य के इतिहास में विशेष महत्व है और जिन्होंने अपनी साधना से अपने व्यक्तित्व की छाप इस युग पर किसी न किसी रूप में छोड़ी है।
Vichar Prawah
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Hazariprasad Dwivedi
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‘विचार प्रवाह’ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्धों का महत्त्वपूर्ण संग्रह है। अपने निबन्धों के माध्यम से द्विवेदी जी मनुष्य जाति के प्रत्येक अनुभव, उसकी सांस्कृतिक उपलब्धि और प्रकृति के हर विवर्तन का रेखांकन करते हैं। मनुष्य के विकासमान परम्परा-बोध और देश-कालगत परिस्थितियों में उसके मूल्यांकन की आवश्यकता पर उनका बराबर आग्रह रहा है। लोक-विमुख धर्म, दर्शन, साहित्य और कला-संस्कृति उनके लिए मूल्यहीन हैं। जड़ शास्त्रीयता से उनका गहरा विरोध है। यही कारण है कि द्विवेदी जी के कितने ही शोधपरक निबन्ध हमारे चेतन-अवचेतन के वैचारिक कुहासे को छाँटने का कार्य करते हैं।
अपने ललित निबन्धों में द्विवेदी जी आद्यन्त कवि हैं। प्रकृति जैसे उनकी सहचरी बनकर आती है। अकुंठ भावोद्रेक और अप्रस्तुतों के भावोचित व्यंजक प्रयोग, सजीव बिम्बात्मकता और अपनी सहजता में बेजोड़ भाषा-शैली उनके इन निबन्धों को विश्वसाहित्य की अनमोल सम्पदा बना देती है। इनमें अवगाहन करता पाठक एक ओर आचार्य जी की कल्पनाशील भावप्रवणता से अभिभूत हो उठता है, तो दूसरी ओर ऐसे ज्ञान-कोश से परिचित होता है, जिसमें उदात्त जीवन-मूल्यों के राशि-राशि रत्न सुरक्षित हैं।
Hindi Web Sahitya
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Sunilkumar Lawate
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हिन्दी भाषा और साहित्य की विभिन्न वेबसाइट्स पर प्रकाशित साहित्य का यह पहला व्यवस्थित अनुसन्धान है। इसके अलावा इसमें कम्प्यूटर के उद्भव, वेबसाइटों के निर्माण और पोर्टल्स की बनावट आदि की बुनियादी जानकारी भी दी गई है। सीधे इंटरनेट पर प्रकाशित हिन्दी साहित्य का व्यापक परिचय देनेवाली यह पुस्तक ज्ञानभाषा के रूप में हिन्दी की क्षमता को भी रेखांकित करती है और इंटरनेट जैसे सर्वव्यापी मंच पर हिन्दी के नए उभरते भाषा-वैज्ञानिक स्वरूप को भी स्पष्ट करती है।
यह पुस्तक उन साहित्यकारों, समीक्षकों, अध्यापकों और रचनाकारों के लिए भी ‘आई ओपनर’ का काम करेगी जो अभी तक इंटरनेट से बचते आए हैं और उसकी क्षमता तथा उपयोगिता को नज़रअन्दाज़ करते रहे हैं। हिन्दी के प्रति उपयोजित प्रतिबद्धता (Applied Commitment) की भूमिका के प्रति आगाह कर यह पुस्तक हमें संगणकीय प्रयोग के लिए प्रोत्साहन भी देती है।
हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में चिन्हित करती यह पुस्तक इसलिए भी अनूठी है कि इसमें एक भी मुद्रित सन्दर्भ नहीं है, जो है, सब ऑनलाइन बिब्लियोग्राफ़ी है।
Bhakti Andolan Aur Bhakti Kavya
- Author Name:
Shivkumar Mishra
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प्रस्तुत पुस्तक का सम्बन्ध भक्ति-आन्दोलन और भक्ति-काव्य से है, भक्ति-आन्दोलन के मूल में जनता के दुःख-दर्द ही हैं और उन दुःख-दर्दों को बड़ी जीवन्त मानवीयता के साथ उभरने, उनसे एकमेक होकर सामने आने में ही भक्ति-आन्दोलन की शक्ति को देखा जा सकता है। अनुमान कर सकते है कि तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक अपने पूरे वेग के साथ गतिशील होनेवाले इस भक्ति-आन्दोलन में जनता के ये दुःख-दर्द कितनी गहरी संवेदनशीलता के सान्निध्य में उभरे होंगे। भक्तिकाव्य में, उसके रचनाकारों में, अन्तर्विरोध भी हैं, उनकी सीमाएँ भी हैं। पुस्तक में उनकी चर्चा भी की गई है।
हम भक्तिकाव्य जैसा काव्य आज नहीं चाहते, पर जिन मूलवर्ती गुणों के कारण भक्ति कविता कालजयी हुई, वे गुण ज़रूर उससे लेना चाहते हैं, और इन गुणों के नाते ही हम उसे साथ लेकर चलना भी चाहते हैं।
पुस्तक में निबन्धों में पुनरुक्ति भी मिल सकती है। अलग-अलग समय में लिखे गए निबन्ध ही मिल-जुलकर यह किताब बना रहे हैं। इनमें से कबीर, सूर तथा भक्ति-आन्दोलन से जुड़े निबन्ध प्रकाशित भी हो चुके हैं। यहाँ वे कुछ संशोधित परिवर्द्धित रूप में फिर से प्रकाशित हो रहे हैं। मलिक मुहम्मद जायसी, तुलसी, भक्ति-आन्दोलन का पहला निबन्ध अप्रकाशित है। वे यहाँ पहली बार ही प्रकाशित हो रहे हैं। नानकदेव तथा गुरु गोविन्द सिंह पर लिखे निबन्ध भी अप्रकाशित हैं। ये विशेष अवसर के लिए लिखे गए निबन्ध थे, किन्तु किताब के विषय की सीमा में आ सकने के नाते उन्हें भी समेट लिया गया है। भक्ति-आन्दोलन सम्बन्धी निबन्धों में प्रमुखतः के. दामोदरन, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारों को ही रेखांकित किया गया है।
Lok Sahitya Evam Sanskriti
- Author Name:
Prof. Radheyshyam Singh +1
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लोक-साहित्य एवं लोक-संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन एवं उन्नयन के प्रयास के अनुक्रम में ‘लोक साहित्य एवं संस्कृति’ पुस्तक के सृजन की योजना बनी है। इस आशा के साथ कि उच्च शिक्षा में अध्ययनरत छात्रों, शोधार्थियों एवं अकादमिक जगत् से जुड़े हुए विद्वत समाज के मनोविज्ञान में लोक साहित्य और संस्कृति के प्रति एक बौद्धिक व आत्मिक रिश्ते का अंकुरण प्रस्फुटित होगा। भारत की सामासिक संस्कृति, अक्षय सामाजिक-सांस्कृतिक लोक परम्परा, लोकाचार, लोक व्यवहार, लोक विश्वास और लोक मान्यताओं से बनी हुई इस सभ्यता के भीतर दाखिल हो कर हम लोकजीवन व लोक-संस्कृति के सापेक्ष जीवन मूल्यों व ‘जीवन जीने की कला’ के रहस्य सूत्र की तलाश कर सकेंगे। लोक साहित्य व संस्कृति में हमारी सांस्कृतिक विरासतों की गहरी जड़ें व गौरव के भाव सन्निहित हैं।
वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस दौर में जब हमारे मूल्य, संस्कृति, परम्परा और सरोकार तेजी से धराशायी हो रहे हैं, जब छद्म विकास, अपरिमित मुनाफा और दिखावे का मुखौटा लगाकर हमारी अस्मिता को विनष्ट करने का षड्यंत्र रचा जा रहा हो, जब हमारा जीवन बाजार के हाथों नियंत्रित और संचालित होने लगे, जब हमारी संवेदनाएँ छीजने लगे, जब एकल परिवार हमारी प्राथमिकता में अपनी जगह बनाने लगे, तब ऐसे समय में हमें लोक साहित्य और संस्कृति से वैचारिक ऊष्मा व प्रेरणा की असंख्य रोशनी मिलती है। यह रोशनी समय के तमाम धुंध और अन्धेरे को छांटने में सक्षम और कारगर है।
लोक साहित्य में लोक अन्तर्मन की अनुगूँज ध्वनित हैं। इस गूँज में सामूहिकता है। भावनात्मक एकता है। जीवन का राग और सौन्दर्य है। अधिकार, अस्तित्व, अस्मिता, अध्यात्म और जीजिविषा का प्रश्न है। वंचितों और पीड़ितों के जरूरी सवाल हैं। स्त्री स्वायत्तता और अधिकार के प्रश्न केन्द्र में हैं। इसमें निश्छल हँसी भी है और करुण चीत्कार भी है। इसमें सृजन और संहार दोनों का रंग समाहित है। लोक साहित्य की सभी विधाओं में जीवन के सारे अनिवार्य तत्वों का समावेश है। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से लोक साहित्य का अध्ययन अपेक्षित है। अतएव राष्ट्र निर्माण, सामाजिक भागीदारी व मानवीय विकास में लोक साहित्य की भूमिका अद्वितीय है। इसमें रंच मात्र भी संशय नहीं है।
Venuvan
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
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राष्ट्रकवि दिनकर के इस 'वेणुवन' में लेख भी हैं, निबन्ध भी और काल्पनिक संवाद भी। यह चिन्तन-मनन के अभयारण्य की तरह है जिसका आकर्षण और प्रभाव अन्त तक बना रहता है।
इसमें शामिल हर पाठ अपने रंग में रँगने की क्षमता रखता है। 'अर्धनारीश्वर' में दिनकर नर-नारी को एक द्रव्य की ढली दो प्रतिमाएँ मानते हुए रेखांकित करते हैं कि 'जिस पुरुष में नारीत्व नहीं, वह अधूरा है और जिस नारी में पुरुषत्व नहीं, वह भी अपूर्ण है।' वहीं 'कलाकार की सफलता' में कहते हैं कि कलाकार की सफलता की कसौटी केवल यह हो सकती है कि उसकी कृतियों से समाज आन्दोलित हुआ है या नहीं, और यदि हुआ है तो उसकी रचनाओं से प्रभावित होनेवाला सांस्कृतिक धरातल क्या है? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ में जन्मभूमि की महत्ता को तुलसीदास, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, इकबाल आदि के जरिए बहुत ही काव्यात्मक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। 'कबीर साहब से भेंट' काल्पनिक ही सही, लेकिन दिनकर ने अपने तात्कालीन समस्याओं के मद्देनजर अद्भुत और अविस्मरणीय संवाद को रचा है।
इसी तरह ‘मैथिल कोकिल विद्यापति’, ‘विद्यापति और ब्रजबुलि’, ‘महादेवी जी की वेदना’, ‘साहित्य का नूतन ध्येय’, ‘निर्गुण पन्थ की सामाजिक पृष्ठभूमि', 'बौद्धधर्म की विश्व-व्यापकता', 'आदर्श मानव राम', 'संस्कृति संगम–1, 2', 'शांति की समस्या' पाठों के जरिए दिनकर साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, स्वतंत्रता आदि के परिप्रेक्ष्य में मूल और मूल्यों से जुड़े कई सवालों से न सिर्फ टकराते हैं, बल्कि किसी न किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की सफल कोशिश भी करते हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह बुद्ध का वेणुवन उनकी तप-साधना का स्थल था, यह पुस्तक 'वेणुवन' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चिन्तन का विरल प्रतिफल है।
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