Kavita Kya Hai
Author:
Vishwanath Prasad TiwariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
कविता क्या है?—इस प्रश्न के उत्तर में कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा दे पाना कठिन है। जैसे हर मनुष्य का अपना एक रूप, स्वभाव और अन्दाज़ होता है, वैसे ही हर भाषा और हर कविता का भी अपना रूप, स्वभाव और अन्दाज़ होता है। इसलिए कविता के बारे में कोई सर्वमान्य निष्कर्ष, कोई ऐसी कसौटी, जिस पर हर काल और हर भाषा की कविता शत-प्रतिशत खरी उतरे, प्रस्तुत करना, और भी कठिन हो जाता है।</p>
<p>अलग-अलग कालों में और अलग-अलग देशों में कविता के प्रतिमान भी बदलते रहे हैं। फिर भी, जिस प्रकार कुछ ऐसे सामान्य धर्म होते हैं जहाँ विविध आकृति-प्रकृति के मनुष्य मिलते हैं और मनुष्य के रूप में अपनी पहचान सुरक्षित रखते हैं, उसी प्रकार कविता के भी कुछ बुनियादी तत्त्व होते हैं जिनके कारण विविध कालों, विविध भाषाओं में लिखी गई विविध भंगिमाओं वाली कविताएँ कविता के एक विशिष्ट रूप में पहचान ली जाती हैं। कविता के इन्हीं बुनियादी लक्षणों की चर्चा इस पुस्तक में हुई है।</p>
<p>इस पुस्तक की सीमाओं में ज़्यादा विस्तार की गुंजाइश न थी। पाठक केवल संकेत ग्रहण करेंगे और मानवता की महान कविता-परम्परा और काव्य-चिन्तन के सूक्ष्म इतिहास में ख़ुद घुसने और उसमें फ़ुरसत से रमने की कोशिश करेंगे।</p>
<p>—भूमिका से
ISBN: 9788171787050
Pages: 95
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Shuddha Kavita Ki Khoj
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक 19वीं सदी में यूरोप में नई कविता का जो प्रवर्तन हुआ, उस पर विचार-विमर्श की एक व्यापक ज़मीन तैयार करती है। साथ ही, उसके परिप्रेक्ष्य में भारतीय कविता के विकास-क्रम में शुद्धता का पैमाना क्या रहा, और क्या होना चाहिए, इस पर भी अपना गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करती है। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि यह पुस्तक शुद्धतावादी आन्दोलन का एक दुर्लभ शोधपूर्ण इतिहास भी है और दस्तावेज़ भी।
दिनकर जी का मानना है कि नई कविता हमेशा शुद्ध कविता नहीं होती, न सभी श्रेष्ठ काव्य शुद्ध काव्य के उदाहरण होते हैं। फिर भी उन्हें लगता है कि शुद्धता को लक्ष्य मानकर चलने से काव्य का नया आन्दोलन समझ में कुछ ज़्यादा आता है। इसलिए उन्होंने ‘कविता और शुद्ध कविता’, ‘शुद्ध कविता का इतिहास—1’, ‘शुद्ध कविता का इतिहास—2’, ‘कविता में दुरूहता’, ‘शुद्ध काव्य की सीमाएँ’, ‘परिभाषाहीन विद्रोह’, ‘मनीषी और समाज’, ‘कला में व्यक्तित्व और चरित्र’, ‘कला का संन्यास’ और ‘साहित्य में आधुनिक बोध’ पाठों के ज़रिए जहाँ-तहाँ से सामग्रियाँ बटोरकर शुद्धतावादी आन्दोलन का इतिहास खड़ा किया है और कविता की अनेक समस्याओं पर अपने दृष्टिकोण से विचार किया है।
दिनकर जी ने अपनी यह किताब बीसवीं सदी के सातवें दशक में इस उद्देश्य से लिखी थी कि हिन्दी के जो लेखक, कवि और पाठक अंग्रेज़ी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा के द्वारा पाश्चात्य साहित्य के सीधे सम्पर्क में नहीं हैं, वे इसका लाभ उठा सकें, उनसे बातचीत का एक ठोस ज़रिया बनाया जा सके।
शुद्धतावाद के केन्द्र में लिखी गई यह पुस्तक अपने विशद विवेचन के कारण पचास साल बाद भी वही महत्त्व रखती है, जो उस समय रखती थी।
Lekin
- Author Name:
Gulzar
- Book Type:

- Description: साहित्य में ‘मंज़रनामा’ एक मुकम्मिल फ़ार्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयाँ अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इंटरप्रेटेशन हो जाता है। मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ार्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफ़ा हो गया है। ‘लेकिन’...ठोस यक़ीन, पार्थिव सबूतों और तर्क के आधुनिक आत्मविश्वास पर प्रश्नचिह्न की तरह खड़ा एक ‘लेकिन’, जिसे गुलज़ार ने इतनी ख़ूबसूरती से तराशा है कि वैसी किसी बहस में पड़ने की इच्छा ही शेष नहीं रह जाती जो आत्मा और भूत-प्रेत को लेकर अक्सर होती रहती है। इस फ़िल्म और इसकी कथा की लोमहर्षक कलात्मकता हमें देर तक वापस अपनी वास्तविक और बदरंग दुनिया में नहीं आने देती जिसे अपने उद् दंड तर्कों से हम और बदरंग कर दिया करते हैं। यह पुस्तक इसी फ़िल्म का मंज़रनामा है...पठनीय भी दर्शनीय भी।
Muktibodh Ki Kavya Srishti
- Author Name:
Suresh Rituparna
- Book Type:

-
Description:
आधुनिक हिन्दी काव्य-साहित्य के इतिहास में निराला के बाद मुक्तिबोध एक ऐसे कवि के रूप में सदैव याद किए जाएँगे जिनका जीवन ही उनकी कविता होती है। जिसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता है।
मुक्तिबोध के काव्य का निर्माण चेतना को झकझोर देनेवाले अन्तःसंघर्ष, उनके अभिशप्त युग तथा व्यक्तित्व के सन्धान से उपजा है। वस्तुत: उनकी कविताओं का पेचीदापन इसी अन्तःसंघर्ष की उपज है। लेकिन अपने युग को अर्थ और वाणी देने से अधिक और क्या सार्थक कार्य कोई कवि कर सकता है!
मुक्तिबोध का काव्य इस चुनौती को स्वीकार करता है तथा अपने युग की भयावहता को पूर्णता के साथ रूपायित भी करता है।
यह सच है कि मुक्तिबोध एक प्रतिबद्ध कवि हैं लेकिन उनकी प्रतिबद्धता को किसी वाद-विशेष से जोड़कर ही यदि देखा जाता रहा तो यह उनकी काव्य-प्रतिभा के साथ अन्याय ही होगा। वस्तुत: उनकी प्रतिबद्धता तो वैश्विक स्तर पर श्रमशील मानव के प्रति ही रही है। प्रस्तुत पुस्तक मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना को इसी दृष्टिकोण से समझने का प्रयास है।
Agyeya Ka Kavya
- Author Name:
Pranay Krishna
- Book Type:

- Description: अज्ञेय को बहुधा व्यक्तिवादी या अस्तित्ववादी कहा जाता है। यह तय है कि अज्ञेय व्यक्तित्व को मूलगामी मानते थे, न कि सामाजिक सम्बन्धों का उत्पाद; व्यक्तित्व को अनन्यता, अद्वितीयता, मौलिकता वगैरह को उन्होंने भारी महत्त्व दिया। अस्तित्वाद की भी इसमें एक भूमिका थी। महत्त्व की बात लेकिन यह है कि उनका व्यक्तित्ववाद भी प्रबुद्ध बुर्जुआ व्यक्तिवाद ही था जिसमें लोकतंत्र, आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता निहित थी। सांस्कृतिक व्यक्तित्व होने के नाते ही व्यक्तिगत सम्बन्धों में भारत के बड़े पूँजी घरानों से जुड़ने के बावजूद वे एक अकेलापन भी भोगते हैं। यह अकेलापन दुतरफ़ा है। समाज के जिस तबके में उनका जीवन बसर होता है, उसके सम्बन्ध कृत्रिम हैं। दूसरी ओर उनकी दृष्टि में व्यापक जनसमाज की ‘भीड़’ और कोलाहल में व्यक्ति की निजता का कोई मोल नहीं।
Kavi Nirala
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
- Book Type:

- Description: ‘कवि निराला’ पुस्तक हिन्दी आलोचना में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी भी एक बहुमूल्य देन हैं। आचार्य वाजपेयी ने निराला को ‘शताब्दी का कवि’ और उनके काव्य को ‘शताब्दी काव्य’ कहा था। उन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से निराला के उस महाकवि को खोज लिया था जो गत, आगत और अनागत सभी को एकाकार कर लेता है। टी.एस. इलियट ने भी महान कवि के परिचय में यही कहा था कि महान कवि वह होता है जो आत्मसात् कर, वर्तमान सन्दर्भों में जीता हुआ भावी की पदचाप भी सुन लेता है। आधुनिक हिन्दी कविता का उद्गम भारतेन्दु-द्विवेदी युग से प्रारम्भ होकर छायावाद युग में पहुँचकर नई करवट लेता है और इस युग की कवि चतुष्टयी प्रसाद, निराला, पन्त और महादेवी के चार स्तम्भों पर उस काव्य को गढ़ता है जिसको सांस्कृतिक प्रौढ़ता आगामी कवियों के लिए न केवल आधार बनती है बल्कि उनके अनुकरण और विकास में स्वयं को धन्य मानती है।
Relevance of Savarkar Today
- Author Name:
Ashok Modak
- Book Type:

- Description: Swatantryaveer Vinayak Damodar Savarkar (1883-1966) was a multidimensional personality - a freedom fighter, social reformer, writer, poet, historian, political leader and philosopher all combined into one. Savarkar's ideas of modernity, social and religious reforms, cultivation of scientific temper and embracing technological tools continue to be relevant in the 21st century. "Relevance of Savarkar Today", 25 pearls of visionary wisdom by Veer Sawarkar, is the product of deep study and research by Dr Ashok Modak. Savarkar's quotations, the author's expert comments and nearly 60 supportive comments by senior political leaders, social reformers, and intellectuals in 25 chapters illustrate the relevance of following the visionary messages of Savarkar for a new India of the 21st century. Bring out a solid, cohesive social fabric through unity Hindutva embraces the whole being of the Hindu race Brave foreign policies for the total defence of India Strong India for the real happiness of humanity.
Bhasha Evam Bhasha Vigyan
- Author Name:
Mahavir Saran Jain
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन
Hindi Kahani Ka Itihas : Vol. 2 (1951-1975)
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

-
Description:
यह किताब हिन्दी कहानी का इतिहास का दूसरा खंड है। पहले खंड में 1900-1950 अवधि की हिन्दी कहानी का इतिहास प्रस्तुत किया गया था। इस खंड में 1951-75 का इतिहास पेश किया जा रहा है। पहले इरादा था कि दूसरे खंड में 1951-2000 की हिन्दी कहानी का इतिहास लिखा जाए। पर सामग्री की अधिकता के कारण यह इरादा बदलना पड़ा। यह भी महसूस हुआ कि 1975 का वर्ष हिन्दी कहानी में एक पड़ाव की तरह है। मोटामोटी रूप से इस वर्ष के आसपास अनेक पुराने और नए लेखकों का कहानी-लेखन या तो समाप्त हो गया या उसकी चमक समाप्त हो गई। जो हो, दूसरे खंड की अन्तिम सीमा के लिए एक बहाना तो मिल ही गया! कहने की जरूरत नहीं कि तीसरे खंड में 1976-2000 की कहानी का इतिहास प्रस्तुत करना अभिप्रेत है।
इस पुस्तक में उर्दू-हिन्दी और मैथिली-भोजपुरी-राजस्थानी के लगभग 300 कहानी लेखकों और 5000 से अधिक कहानियों का कमोबेश विस्तार के साथ विवेचन या उल्लेख किया गया है। कहानीकारों और किसी भी कारण चर्चित, उल्लेखनीय और श्रेष्ठ कहानियों की अक्षरानुक्रम सूची अनुक्रमणिका में दे दी गई है। हमारा यह दावा निराधार नहीं है कि इसके पहले किसी इतिहास-ग्रन्थ में इतनी संख्या में कहानीकारों और कहानियों का उल्लेख उपलब्ध नहीं है।
–भूमिका से
Bharatiya Kavyashastra
- Author Name:
Mahendra Madhukar
- Book Type:

-
Description:
भारतीय काव्यशास्त्र की पृष्ठभूमि में संस्कृत काव्य की अनेक विशेषताओं का योगदान रहा है।... भारतीय काव्यशास्त्र के मूल प्रेरक बिन्दुओं में संस्कृत साहित्य की प्रधानता रही है। प्रायः 12 सौ वर्षों से कुछ अधिक समय तक संस्कृत साहित्य की अबाध धारा प्रवाहित होती रही है।... कई विचारक संस्कृत साहित्य की एकरूपता को उसकी सीमा बताते हैं, लेकिन ध्यानपूर्वक देखने से यह तर्क निरस्त हो जाता है।... कहने के लिए संस्कृत के महाकाव्य का विषय प्रचलित परम्परा का अनुगमन करता है, पर उनमें भी भाषा की मौलिकता, सौन्दर्यशास्त्रीय तत्त्वों जैसे बिम्बों, प्रतीकों, मिथकों और कल्पनाओं का अपूर्व विन्यास देखते ही बनता है।
संस्कृत साहित्य की एक अन्य मुख्य विशेषता है उसकी आशावादी दृष्टि, जो आत्मा की अमरता और पूर्वजन्म के सिद्धान्त से प्रेरित है।... इसी बिन्दु पर भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र में एक मौलिक अन्तर मिलता है। यहाँ मुख्यतः कॉमेडी प्रधान रचनाओं का सृजन हुआ है तो पाश्चात्य देशों में त्रासदी या ‘ट्रेजेडी’ का—यह मौलिक अन्तर भारतीय काव्य और काव्य के आनन्दवादी लक्ष्य तक हमें पहुँचाने में सहायक सिद्ध होता है।
संस्कृत आलोचना-शास्त्र की एक अन्य विशेषता है कि वह मुख्यतः सिद्धान्तवादी है। उसका ध्यान इस बात पर है कि काव्य कैसा होना चाहिए, उसकी विशेषताएँ क्या हों, पर किसी काव्य की व्यावहारिक आलोचना का वहाँ प्रायः अभाव दीखता है। आचार्यों ने काव्य की आत्मा की खोज पर ध्यान दिया है। कविता क्या है, इसकी पड़ताल की है, पर कोई अमुक कविता कैसी है—इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी गई है।
‘भारतीय काव्यशास्त्र’ में काव्यशास्त्र विषयक चिन्तन, भारतीय काव्यशास्त्र के बीज-भाव का संकेत और परम्परा का प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है जिसमें प्राचीनता, विवेचन-प्रभाव की दृष्टि से संस्कृत काव्यशास्त्र को भारतीय काव्यशास्त्र के प्रतिनिधि के रूप में लिया गया है।
Hindi Bhasha Ka Vikas
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। पुस्तक IAS/PCS के हिन्दी साहित्य प्रथम प्रश्न-पत्र(वैकल्पिक विषय) के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी भाषा एवं नागरी लिपि के इतिहास सम्बन्धी प्रत्येक बिन्दु का सुव्यवस्थित अध्ययन इस किताब में शामिल है।
Kavita Ka Janpad
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
इस संचयन में कविता के समाज के साथ अन्तर्सम्बन्ध, उसका आत्म-संघर्ष, अमानवीयीकरण, मध्यवर्गीय चेतना, एशियाई अस्मिता, शब्दप्रयोग, बिम्ब आदि पर विचार है। इसके अतिरिक्त अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध, त्रिलोचन, कुँवर नारायण, विजय देव नारायण साही, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, धूमिल, कमलेश और विनोद कुमार शुक्ल की कविता का विश्लेषण है।
हमारा विश्वास है कि यह सामग्री और इसके लेखक पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो गम्भीर और विचारोत्तेजक हुआ है, उसमें शामिल हैं। उनके माध्यम से हमारी कविता की समझ और कवियों के संघर्ष की हमारी पहचान और परख गहरी होती है। हम उन अकारथ हो रहे पदों और अवधारणाओं से मुक्त होकर, जिनसे आज की ज़्यादातर आलोचना ग्रस्त है, नई ताज़गी और विचारोत्तेजना से अपने समय की मूल्यवान कविता, उसकी अपने समाज में जगह और शब्द के विराट् अवमूल्यन के इस क्रूर समय में कविता की भाषा के अनेकार्थी और बहु-स्तरीय जीवट और संघर्ष को समझ सकते हैं। यह आलोचना कविता के साथ है...उससे युगपत है। जैसे हमारी कविता में जीवन, अनुभव और भाषा को समझने और विन्यस्त करने के अनेक स्तर और प्रक्रियाएँ हैं, हमारी आलोचना में भी कविता और उसके माध्यम से अपने समय और उसकी उलझनों तक पहुँचने और उन्हें परिप्रेक्ष्य देने के अनेक स्तर और दृष्टियाँ सक्रिय हैं। जैसे कि कविता में वैसे ही, सौभाग्य से, आलोचना में रुचि और दृष्टि का प्रजातंत्र है।
हम इस प्रसन्न विश्वास के साथ यह संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं कि यहाँ एकत्र आलोचना कवितादर्शी और जीवनदर्शी है : अख़बारी सतहीपन और सनसनीखेजी, वैचारिक एकरसता के आत्मतुष्ट समय में वह हमें अपनी सूक्ष्मता और जटिलता से विचलित कर कविता की अर्थसमृद्ध और गहरी समझ की ओर ले जाने में समर्थ आलोचना है।
—भमिका से
Adhunik Hindi Alochana: Sandarbh Evam Drishti
- Author Name:
Ramchandra Verma
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में भारतेन्दु-युग से लेकर आज तक की हिन्दी-समीक्षा के सामाजिक सन्दर्भ और उसके प्रभाव में निर्मित और प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली का ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचना किया गया है। इस क्रम में प्रमुख समीक्षकों द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली को उनकी समीक्षा-दृष्टि के आलोक में देखने की चेष्टा की गई है। पुस्तक में लक्षित किया गया है कि भारतेन्दु-युग में एक ओर परम्परागत शास्त्रीय शब्दावली की जटिलता को शिथिल करने की कोशिश की गई दूसरी ओर नए सामाजिक सन्दर्भ के अनुकूल देश-भक्ति और सामाजिक सुधार जैसे मूल्यों को समीक्षा के केन्द्र में प्रतिष्ठित किया गया।
Aacharya Ramchandra Shukla Aur Hindi Aalochana
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी के उन गिने-चुने आलोचकों में हैं जिन्होंने साहित्य का मूल्यांकन एक सुनिश्चित जनवादी दृष्टिकोण के आधार पर किया है। बहुत स्पष्ट, सुलझे हुए विचारों के सहारे अपने विश्लेषण में वे कहीं भी भटकते नहीं हैं और आदि से अन्त तक तटस्थता को अपने हाथ से नहीं जाने देते। इसीलिए चाहे उनके सबसे प्रिय कवि निराला हों या आदर्श आलोचक रामचन्द्र शुक्ल, जहाँ भी उन्हें कोई दोष दिखाई दिया है, उसकी दो-टूक आलोचना करने से वे नहीं चूके हैं।
प्रस्तुत कृति रामविलास जी द्वारा की गई आलोचना की आलोचना है, और इसलिए कुछ लोगों के विचार से यह केवल एक छात्रोपयोगी चीज़ है; लेकिन स्वयं रामविलास जी के शब्दों में, ‘‘शुक्लजी ने न तो भारत के रूढ़िवाद को स्वीकार किया, न पच्छिम के व्यक्तिवाद को। उन्होंने बाह्य-जगत् और मानव-जीवन की वास्तविकता के आधार पर नए साहित्य-सिद्धांतों की स्थापना की और उनके आधार पर सामन्ती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और जनतंत्र की साहित्यिक परम्परा का समर्थन किया। उनका यह कार्य हर देश-प्रेमी और जनवादी लेखक तथा पाठक के लिए दिलचस्प होना चाहिए। शुक्ल जी पर पुस्तक लिखने का यही कारण है।’’
एक लम्बे अन्तराल के बाद इस महत्त्वपूर्ण आलोचना-कृति का यह संशोधित-परिवर्धित संस्करण शुक्लजी के अध्ययन के लिए एक नई दृष्टि देता है, जिससे स्पष्ट हो सकेगा कि ‘शुक्लजी अपने युग के हिन्दी-अहिन्दी विचारकों से कितना आगे थे और उनकी विचारधारा कितनी वैज्ञानिक है।’
Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

-
Description:
साहित्य की आलोचना केवल अन्तर्लक्ष्यी (Intrinsic) अथवा पाठ-केन्द्रित (Text Centered) आलोचना नहीं होती, अपितु वैसी बहिर्लक्ष्यी (Extrinsic) आलोचना भी होती है, जो पाठ से बाहर-पाठ के सम्यक् अवबोध के लिए रचनाकार के जीवनवृत्त, उसके जीवन-दृष्टिकोण, उसके युग, उसके सामाजिक यथार्थ, उसकी परम्परा, उसकी संस्कृति आदि को सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखती-परखती और साहित्य का मूल्यांकन करती है। ऐसी आलोचना शब्दों के जोड़-मात्र से बनी वैसी हर रचना को, जिसके पीछे ठोस वास्तविकता नहीं होती, वायवीय मानती है—‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:’ (योगसूत्र)।
हिन्दी में अब तक इसके सिद्धान्त पर तात्त्विक विवेचन और सार्थक बहस प्रस्तुत करनेवाली एक भी पुस्तक नहीं है। ऐसे में पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के प्रति डॉ. शीतांशु के वर्षों के गहरे लगाव, सम्यक् अध्ययन और अनवरत चिन्तन से परिणामित उनकी यह पुस्तक हिन्दी में पहली बार बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों का तथ्यपूर्ण, प्रामाणिक उप-स्थापन करती क्रमश: मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय, साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक और ऐतिहासिक आलोचना की स्वरूपगत मान्यताओं का समीचीन विवेचन प्रस्तुत करती है। पूर्वग्रहहीन सैद्धान्तिक निरूपण के साथ-साथ प्रतिमानों और निदर्शनों की बोध-व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है, जिससे बहुमुख अनुप्रयोग की दिशा भी सहज ही उजागर हो उठी है।
प्रस्तुत पुस्तक यदि एक ओर मार्क्सवादी आलोचनात्मक चिन्तन को रूढ़िवादी विवेचन-सीमा से आगे लाकर उसके उत्तरपक्षीय सैद्धान्तिक स्वरूप तक को निरूपित-व्यवस्थित करती है, तो दूसरी ओर समाज में साहित्य की स्थितिगत पहचानवाली चकाचौंध से निकलकर समाजशास्त्रीय आलोचना के बतौर साहित्य मे निरूपित समाज की पहचान-प्रक्रिया की भी गम्भीर विवेचना करती है; यदि एक ओर साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक आलोचना की प्रकृति, सैद्धान्तिकी और प्रकार्य-प्रक्रिया को आलोचित-प्रत्यालोचित करती है, तो दूसरी ओर उस ऐतिहासिक आलोचना को भी सावयव और सप्रमाण उपस्थापित करती है, जिसे कभी हिन्दी के एक वरिष्ठ आलोचक ने फतवा देते हुए आलोचना के क्षेत्र से ही ख़ारिज कर दिया था। तथ्यत: ‘बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों को जानने, पहचानने और मापने; साथ ही साहित्य को समझने और समझाने की दृष्टि से डॉ. शीतांशु की यह पुस्तक एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक है, जिससे हिन्दी के एक बड़े अभाव की महत्त्वपूर्ण पूर्ति हो जाती है।
Akbar Allahabadi Par Ek Aur Nazar
- Author Name:
Shamsurrahman Farooqui
- Book Type:

-
Description:
उर्दू के विख्यात आलोचक, उपन्यासकार, कवि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के ये तीन आलेख अकबर इलाहाबादी को एक नए ढंग से देखते हैं और अकबर की कविता और उनके चिन्तन को बिलकुल नए मायने देते हैं। आमतौर पर व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहा जाता रहा है। यह इस कारण भी हुआ कि अंग्रेज़ी साम्राज्य शिक्षण की रोशनी में अकबर के विचार पुराने, और पुराने ही नहीं पीछे की तरफ़ लौट जाने का तक़ाज़ा करते मालूम होते थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने पहली बार इस भ्रम को तोड़ा है और इन आलेखों में बताया है कि व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहना बहुत बड़ी भूल है। वे अकबर इलाहाबादी को उर्दू के छह सबसे बड़े शायरों में मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि अकबर नई चीज़ों के ख़िलाफ़ नहीं थे, मगर वो यह भी जानते थे कि अंग्रेज़ों ने ये नई चीज़ें हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि अपनी उपनिवेशीय शक्तियों को फैलाने और बढ़ाने के लिए स्थापित की थीं। फ़ारूक़ी इन आलेखों में बताते हैं कि कल्चर भी उपनिवेशीय आक्रमण का प्रतीक और माध्यम बन जाता है।
अकबर कहते हैं कि अंग्रेज़ पहले तो तोप लगाकर साम्राज्य को क़ायम करते हैं, फिर ग़ुलामों की ज़हनियत को अपने अनुकूल बनाने के लिए उन्हें अपने ढंग की तालीम देते हैं। फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि तथाकथित उन्नति लानेवाली चीज़ों के पीछे दरअसल उपनिवेश और साम्राज्य को फैलाने की पॉलिसी थी। उनका कहना है कि अकबर इलाहाबादी पहले हिन्दुस्तानी हैं, जिन्होंने इस बात को पूरी तरह महसूस किया और साफ़–साफ़ बयान किया।
फ़ारूक़ी पहले आलोचक हैं जिन्होंने इन आलेखों में अकबर इलाहाबादी और उनके व्यंग्य को, पोस्ट कोलोनियल दृष्टिकोण से देखने की भरपूर कोशिश की है।
फ़ज़्ले हसनैन और ताहिरा परवीन ने उर्दू से हिन्दी में अनुवाद करते समय ग्राह्यता व भाषिक प्रवाह का विशेष ध्यान रखा है ।
Acharya Mahaveerprasad Dwivedi Ke Shreshth Nibandh
- Author Name:
Acharya Mahaveerprasad Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं के बनाए हुए है। यदि पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती, समुन्नति की इस सीमा तक आने का अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का भी काम किया। हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है जो हिन्दी-साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के उन्नायक बने, हिन्दी-साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया; दर्जनों कवि, लेखक और सम्पादक बनाए। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है।
—प्रेमचन्द
अंग्रेज़ी भाषा में जो स्थान डॉ. जॉनसन का है वर्तमान में वही स्थान द्विवेदी जी का है। जिस प्रकार अंग्रेज़ी भाषा का वर्तमान स्वरूप बहुत दूर तक डॉ. जॉनसन का दिया हुआ है, उसी प्रकार हिन्दी का वर्तमान स्वरूप द्विवेदी जी का।
—सेठ गोविन्द दास
द्विवेदी जी ने समाजशास्त्र और इतिहास के बारे में जो कुछ लिखा है, उससे समाज-विज्ञान और इतिहास लेखन के विज्ञान की नवीन रूप-रेखाएँ निश्चित होती हैं। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का नवीन मूल्यांकन किया। एक ओर उन्होंने इस देश के प्राचीन दर्शन, विज्ञान, साहित्य तथा संस्कृति के अन्य अंगों पर हमें गर्व करना सिखाया, एशिया के सांस्कृतिक मानचित्र में भारत के गौरवपूर्ण स्थान पर ध्यान केन्द्रित किया, दूसरी ओर उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक रूढ़ियों का तीव्र खंडन किया और उस विवेक परम्परा का उल्लेख सहानुभूतिपूर्वक किया जिसका सम्बन्ध चार्वाक और बृहस्पति से जोड़ा जाता है। अध्यात्मवादी मान्यताओं, धर्मशास्त्र की स्थापनाओं को उन्होंने नई विवेक दृष्टि से परखना सिखाया।
—रामविलास शर्मा
उल्लेखनीय है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी की 'सरस्वती' ज्ञान की पत्रिका कही गई है और उनका गद्य हिन्दी साहित्य का ज्ञानकांड। इस प्रकार, भारत का उन्नीसवीं शताब्दी का नवजागरण यूरोप के 'एनलाइटेनमेंट' अथवा 'ज्ञानोदय' की चेतना के अधिक निटक प्रतीत होता है और पन्द्रहवीं शताब्दी का नवजागरण 'रेनेसां' के तुल्य।
—नामवर सिंह
Shabd Aur Deshkal
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

-
Description:
कवि और चिन्तक के रूप में कुँवर नारायण का हस्तक्षेप हिन्दी साहित्य में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः वे कविर्मनीषी के रूप में सर्वसमादृत हैं।
‘शब्द और देशकाल’ पुस्तक कुँवर नारायण की विचार-सम्पदा का एक अनूठा उदाहरण है। इसमें विभिन्न विशिष्ट अवसरों पर दिए गए उनके व्याख्यानों के साथ कुछ लेख भी उपस्थित हैं। भाषा, साहित्य, समाज, मीडिया, अनुवाद और अन्य प्रश्नों पर केन्द्रित उनके विचार ध्यानपूर्वक पढ़े जाने की माँग करते हैं। कुँवर जी की केन्द्रीय चिन्ता जीवन को समरस बनाने की है। इस क्रम में शाश्वत सन्दर्भों के साक्ष्य उभरते हैं। साथ ही, वर्तमान विश्व जिस अन्याय-अनाचार से त्रस्त है, उसके मानवीय समाधान की दिशाएँ भी प्रशस्त होती हैं।
‘साहित्य के सामाजिक सरोकार के माने’ में कुँवर जी कहते हैं, ‘इतना ही काफ़ी नहीं कि साहित्य जीवन के दैनिक और व्यावहारिक पक्ष से ही अपनी पहचान बनाए। अगर समाज का आत्मिक और नैतिक पक्ष भी नहीं उभरता तो साहित्य का काम अधूरा रह जाएगा।’
कुँवर नारायण बहुअधीत रचनाकार हैं। यही कारण है कि उनका लेखन देश और काल की सीमित और सुविदित परिधियों का विस्तार करता है। ‘विश्व विवेक’ के साथ चिन्तन करनेवाले कुँवर नारायण के ये आलेख पाठक को तात्त्विक रूप से बसंशोधित और समृद्ध करते हैं। स्मृति, विचार, रचना और बोध के विरुद्ध खड़े समय-समाज के सम्मुख कुँवर जी एक मानवीय पक्ष उद्घाटित करते हैं। पढ़े और गुने जाने योग्य एक संग्रहणीय पुस्तक।
Jo Gopi Madhu Ban Gayi
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम को लेकर, यमक अलंकार से युक्त एक अद्भुत दोहा-शतक
Rasraaj Virodh
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं - ‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है। ‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था। आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामर्थ्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120] अस्तु! नये काव्यरस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है।
Adyatan Bhasha Vigyan : Pratham Pramanik Vimarsh
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

- Description: भाषाविज्ञान पर अब तक लिखित सभी पुस्तकों से अलग एवं विशिष्ट। प्रगामी चरण—अद्यतन भाषाविज्ञान—को व्यापकता-गहनता में विवेचित करनेवाली तथा संक्षेप में भाषाविज्ञान के विकास-क्रम को निरूपित करनेवाली प्रथम प्रामाणिक पुस्तक। यह पुस्तक एक ओर सामान्य भाषाविज्ञान से वर्णनात्मक, संरचनात्मक भाषाविज्ञान तक, मनोभाषाविज्ञान से तंत्रिका-भाषाविज्ञान तक, व्यवहारवादी भाषाविज्ञान से विकासात्मक भाषाविज्ञान तक, समाज-भाषाविज्ञान से संभाव्यतापरक भाषाविज्ञान तक, विवेचनात्मक भाषाविज्ञान से पाठात्मक भाषाविज्ञान तक, डेकार्टवादी भाषाविज्ञान से संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान तक, अदालती भाषाविज्ञान से गाणितिक और बीज-गाणितिक भाषाविज्ञान तक, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान तक, संगणक भाषा विज्ञान से कॉपर्स भाषाविज्ञान तक बीस प्रकार के भाषाविज्ञान के निरूपण और युक्तियुक्त विवेचन को अपने में समाविष्ट करती है; तो दूसरी ओर इसे नृतत्त्व-विज्ञान, प्राणि-विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, पर्यावरण-विज्ञान, प्रजाति-विज्ञान, शान्ति-अध्ययन, आनुपातिक अध्ययन, सांख्यिकी, धर्म, शिक्षा और दर्शन से जोड़कर स्वरूपित करती है। यह पुस्तक डी. 'शीतांशु' के वर्षों लम्बे भाषाविज्ञान-विषयक गहन अध्ययन-मनन और अध्यापन का सुपरिणाम है। निश्चय ही यह पुस्तक हिन्दी में भाषावैज्ञानिक चिन्तन और लेखन के एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है तथा हिन्दी संसार को अद्यतन भाषाविज्ञान से परिचित कराने का श्रेय प्राप्त करती है। अद्यतन भाषाविज्ञान के विभित्र प्रकारों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हिन्दी में अकेली पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book