Pashchatya Kavyashastra : Adhunatam Sandharbh
(0)
Author:
Satyadev MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
600
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Available
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आधुनिक हिन्दी समीक्षा के स्वरूप विश्व में पौर्वात्य से कहीं अधिक पाश्चात्य समीक्षा-दर्शन का अनुप्रभाव परिलक्षित हो रहा है। आज विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं में जिन समीक्षा-सिद्धान्तों, आलोचनात्मक प्रत्ययों, समीक्षा-आन्दोलनों की चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, प्रश्नांकनों की कसौटी पर कसा जा रहा है, उनमें से आधिकांश पाश्चात्य भाषा-विमर्श साहित्य-कला-दर्शन और अन्य साहित्येतर अनुशासनों से अनुस्यूत हैं। इन नवोन्मेषी सिद्धान्तों-वादों और समीक्षात्मक संकल्पनाओं, साहित्येतर अवधारणाओं का प्रामाणिक विमर्श इस ग्रन्थ में है।</p> <p>प्रस्तुत कृति संगोष्ठियों में विमर्श के अधुनातन सन्दर्भों से सम्पूक्त है। विश्वास है कि शिक्षकों-शिक्षार्थियों, प्रतियोगियों और जिज्ञासुओं के लिए यह उपादेय सिद्ध होगी।
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आधुनिक हिन्दी समीक्षा के स्वरूप विश्व में पौर्वात्य से कहीं अधिक पाश्चात्य समीक्षा-दर्शन का अनुप्रभाव परिलक्षित हो रहा है। आज विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं में जिन समीक्षा-सिद्धान्तों, आलोचनात्मक प्रत्ययों, समीक्षा-आन्दोलनों की चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, प्रश्नांकनों की कसौटी पर कसा जा रहा है, उनमें से आधिकांश पाश्चात्य भाषा-विमर्श साहित्य-कला-दर्शन और अन्य साहित्येतर अनुशासनों से अनुस्यूत हैं। इन नवोन्मेषी सिद्धान्तों-वादों और समीक्षात्मक संकल्पनाओं, साहित्येतर अवधारणाओं का प्रामाणिक विमर्श इस ग्रन्थ में है।</p>
<p>प्रस्तुत कृति संगोष्ठियों में विमर्श के अधुनातन सन्दर्भों से सम्पूक्त है। विश्वास है कि शिक्षकों-शिक्षार्थियों, प्रतियोगियों और जिज्ञासुओं के लिए यह उपादेय सिद्ध होगी।
Book Details
-
ISBN9788180312939
-
Pages374
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

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Description:
एक मानवीय इकाई के रूप में स्त्री और पुरुष, दोनों अपने समय व यथार्थ के साझे भोक्ता हैं लेकिन परिस्थितियाँ समान होने पर भी स्त्री-दृष्टि दमन के जिन अनुभवों व मन:स्थितियों से बन रही है, मुक्ति की आकांक्षा जिस तरह करवटें बदल रही है, उसमें यह स्वाभाविक है कि साहित्यिक संरचना तथा आलोचना, दोनों की प्रणालियाँ बदलें। स्त्री-लेखन स्त्री की चिन्तनशील मनीषा के विकास का ही ग्राफ़ है जिससे सामाजिक इतिहास का मानचित्र गढ़ा जाता है और जेंडर तथा साहित्य पर हमारा दिशा-बोध निर्धारित होता है। भारतीय समाज में जाति एवं वर्ग की संरचना जेंडर की अवधारणा और स्त्री-अस्मिता को कई स्तरों पर प्रभावित करती है।
स्त्री-कविता पर केन्द्रित प्रस्तुत अध्ययन जो कि तीन खंडों में संयोजित है, स्त्री-रचनाशीलता को समझने का उपक्रम है, उसका निष्कर्ष नहीं। पहले खंड, 'स्त्री-कविता : पक्ष और परिप्रेक्ष्य' में स्त्री-कविता की प्रस्तावना के साथ-साथ गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे पर विस्तृत लेख हैं। एक अर्थ में ये सभी वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में विविध स्त्री-स्वरों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी कविता में स्त्री-पक्ष के साथ-साथ अन्य सभी पक्षों को आलोचना के केन्द्र में रखा गया है, जिससे स्त्री-कविता का बहुआयामी रूप उभरता है। दूसरा खंड, 'स्त्री-कविता : पहचान और द्वन्द्व' स्त्री-कविता की अवधारणा को लेकर स्त्री-पुरुष रचनाकारों से बातचीत पर आधारित है। इन रचनाकारों की बातों से उनकी कविताओं का मिलान करने पर उनके रचना-जगत को समझने में तो सहायता मिलती ही है, स्त्री-कविता सम्बन्धी उनकी सोच भी स्पष्ट होती है। स्त्री-कविता को लेकर स्त्री-दृष्टि और पुरुष-दृष्टि में जो साम्य और अन्तर है, उसे भी इन साक्षात्कारों में पढ़ा जा सकता है। तीसरा खंड, 'स्त्री-कविता : संचयन' के रूप में प्रस्तावित है...।
इन सारे प्रयत्नों की सार्थकता इसी बात में है कि स्त्री-कविता के माध्यम से साहित्य और जेंडर के सम्बन्ध को समझते हुए मूल्यांकन की उदार कसौटियों का निर्माण हो सके जिसमें सबका स्वर शामिल हो।
Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi : Paath Ke Pare : Path Ke Paas
- Author Name:
Sanjeev Kumar
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Description:
लम्बे-लम्बे अन्तराल पर तीन-चार कहानियाँ ही मैं लिख पाया, पर लिखने की ललक बनी रही जिसने यह ग़ौर करनेवाली निगाह दी कि अच्छी कहानी में अच्छा क्या होता है, कहानियाँ कितने तरीक़ों से लिखी जाती हैं, वे कौन-कौन-सी युक्तियाँ हैं जिनसे विशिष्ट प्रभाव पैदा होते हैं, कोई सम्भावनाशाली कथा-विचार कैसे एक ख़राब कहानी में विकसित होता है और एक अति-साधारण कथा-विचार कैसे एक प्रभावशाली कहानी में ढल जाता है इत्यादि। लेकिन जब आप एक कहानीकार पर या किसी कथा-आन्दोलन पर समग्र रूप में टिप्पणी कर रहे होते हैं, तब ‘ज़ूम-आउट मोड’ में होने के कारण रचना-विशेष में इस्तेमाल की गई हिकमतों, आख्यान-तकनीकों, रचना के प्रभावशाली होने के अन्यान्य रहस्यों और इन सबके साथ जिनका परिपाक हुआ है, उन समय-समाज-सम्बन्धी सरोकारों के बारे में उस तरह से चर्चा नहीं हो पाती। कहीं समग्रता के आग्रह से विशिष्ट की विशिष्टता का उल्लेख टल जाता है तो कहीं साहित्यालोचन को प्रवृत्ति-निरूपक साहित्येतिहास का अनुषंगी बनना पड़ता है।
जब 'हंस' कथा मासिक की ओर से एक स्तम्भ शुरू करने का प्रस्ताव आया तो मैंने छूटते ही इस सदी की चुनिन्दा कहानियों पर लिखने की इच्छा जताई। मुझे लगा कि मैं जिन चीज़ों पर ग़ौर करता रहा हूँ, उनका सही इस्तेमाल करने का समय आ गया है। यह इस्तेमाल सर्वोत्तम न सही, द्वितियोत्तम यानी सेकंड बेस्ट तो कहा ही जा सकता है।
आगे जो लेख आप पढने जा रहे हैं, वे 'खरामा-खरामा' स्तम्भ की ही कड़ियाँ हैं। इन्हें इनके प्रकाशन-क्रम में ही इस संग्रह में भी रखा गया है। कई कड़ियाँ ऐसी हैं जो अपनी स्वतंत्र शृंखला बनाती हैं।
—भूमिका से
Rasraaj Virodh
- Author Name:
Rameshraaj
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- Description: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं - ‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है। ‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था। आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामर्थ्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120] अस्तु! नये काव्यरस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है।
Videshon Ke Mahakavya
- Author Name:
Gopikrishna Gopesh
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में अंग्रेज़ी लेखिका एच.ए. गुएरकर की ‘द बुक ऑ़फ एपिक’ से चुनकर विभिन्न भाषाओं के महाकाव्यों में से आठ कथाओं का हिन्दी अनुवाद संकलित है।
किसी भी भाषा की रचनात्मक समृद्धि का पता सिर्फ़ इतने से नहीं चलता कि उसमें मौलिक रचनाएँ कितनी हुर्इं। देश-विदेश की अन्यान्य भाषाओं की कृतियों के अनुवाद से भी भाषा-विशेष समृद्ध होती है। अनुवाद से हमारी भाषा की ग्रहणशीलता का प्रमाण भी मिलता है और उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की व्यापकता का भी।
इस दृष्टि से हिन्दी के सामर्थ्य को उजागर करने में अनुवादक के रूप में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका गोपीकृष्ण गोपेश ने निभाई, वह अविस्मरणीय है। उन्होंने कई भाषाओं की क्लासिक कृतियों का हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दी के प्रबुद्ध पाठकों और साहित्यानुरागियों को यह अवसर उपलब्ध कराया कि जिन भाषाओं में उनकी गति नहीं है, उन भाषाओं की भी कालजयी कृतियों का आस्वादन वे कर सके।
Rachna Ka Garbhgriha
- Author Name:
Krishna Sobti
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कृष्णा सोबती का हर क्षण सामान्यत: लेखक का ही क्षण होता था; लेखक होने को उन्होंने जीने की एक शैली के रूप में विकसित किया। लेकिन रचना के आत्यंतिक क्षण की अनायासता और उसके रहस्य को उन्होंने कभी भंग नहीं होने दिया। उस अनुभव की सम्पूर्णता उनके लिए एक बड़ी चीज़ थी। उस कौंध की आभा को जिससे रचना की पहली पंक्ति फूटती है, उन्होंने किसी ऐहिक उतावलेपन का शिकार नहीं होने दिया।
इसीलिए उनकी हर कृति एक घटना की तरह प्रकट हुई। साहित्य समाज के लिए भी, और ख़ुद उनके लिए भी।
इस किताब में उनकी वे टीपें ली गई हैं जो उन्होंने अपनी कुछ कृतियों की रचना-प्रक्रिया के तौर पर लिखी थीं। लेखन तथा रचनात्मकता के विषय में उनके ऐसे आलेख भी इसमें शामिल हैं, जो उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया के साथ-साथ लेखकीय अस्मिता सम्बन्धी उनकी धारणाओं पर भी प्रकाश डालते हैं।
नई पीढ़ी के लेखकों के लिए अपनी एक महत्त्वपूर्ण पूर्वज के रचना-कक्ष की यह यात्रा नि:सन्देह उपयोगी सिद्ध होगी है।
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