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यशपाल की मूल पहचान भले ही एक कथाकार की हो, लेकिन कथा-साहित्य के बाहर भी उन्होंने बहुत-कुछ लिखा था। उनका यह लेखन उनके पर्याप्त लम्बे और व्यवस्थित रचनाकाल में समय की अपनी ज़रूरतों एवं दबावों के हिसाब से हुआ। ‘विप्लव’ के सम्पादकीय, क्रान्तिकारी जीवन के अपने संस्मरणों, यात्रावृत्त, प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों के सम्बन्ध में अभिभूत टिप्पणियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में उन्होंने राजनीतिक निबन्ध भी लिखे। यशपाल के बारे में एक आम धारणा यह है कि अपने वैचारिक आग्रहों के प्रति वे बहुत अनन्य और दृढ़ थे। इसी कारण अपने समय के साहित्यिक-राजनीतिक विवादों और बहसों में भी उनकी सक्रिय हिस्सेदारी रही। मार्क्सवादी और ग़ैर-मार्क्सवादी दोनों तरह के आलोचकों के विरोध के बीच उनका लेखन हुआ। जब-तब उन्हें अपने इन आलोचकों से भी उलझना होता था, भरसक सैद्धान्तिक रूप में वे अपना पक्ष रखते थे। अनुशासन, व्यवस्था और निरन्तरता सम्भवत: यशपाल के लेखन के केन्द्रीय सूत्र हैं। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर तो लिखा ही, व्यक्तिगत सन्दर्भों पर उनका आत्मगत लेखन भी काफ़ी मात्रा में है। यशपाल के असंकलित इन लेखों में बहुत-सी ऐसी सामग्री है जो आत्मगत प्रकृति की है। इस सामग्री को एक जगह देख और पढ़कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। यहाँ अपने लेखकीय जीवन के वैविध्यपूर्ण अनुभवों का खुलासा उन्होंने किया है—कभी अपनी इच्छा से और कभी दूसरों के अनुरोध पर। इस संकलन में उनके अनेक विवादास्पद लेख भी हैं जो इधर वर्षों से अप्राप्य थे। इस ढेर सारी सामग्री के एक जगह उपलब्ध हो जाने से यशपाल जैसे बड़े क़द-बुत के लेखक की रचना-प्रक्रिया और रचनात्मक सरोकारों की दृष्टि से भी इस सामग्री का अपना महत्त्व है।
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यशपाल की मूल पहचान भले ही एक कथाकार की हो, लेकिन कथा-साहित्य के बाहर भी उन्होंने बहुत-कुछ लिखा था। उनका यह लेखन उनके पर्याप्त लम्बे और व्यवस्थित रचनाकाल में समय की अपनी ज़रूरतों एवं दबावों के हिसाब से हुआ। ‘विप्लव’ के सम्पादकीय, क्रान्तिकारी जीवन के अपने संस्मरणों, यात्रावृत्त, प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों के सम्बन्ध में अभिभूत टिप्पणियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में उन्होंने राजनीतिक निबन्ध भी लिखे।
यशपाल के बारे में एक आम धारणा यह है कि अपने वैचारिक आग्रहों के प्रति वे बहुत अनन्य और दृढ़ थे। इसी कारण अपने समय के साहित्यिक-राजनीतिक विवादों और बहसों में भी उनकी सक्रिय हिस्सेदारी रही। मार्क्सवादी और ग़ैर-मार्क्सवादी दोनों तरह के आलोचकों के विरोध के बीच उनका लेखन हुआ। जब-तब उन्हें अपने इन आलोचकों से भी उलझना होता था, भरसक सैद्धान्तिक रूप में वे अपना पक्ष रखते थे। अनुशासन, व्यवस्था और निरन्तरता सम्भवत: यशपाल के लेखन के केन्द्रीय सूत्र हैं। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर तो लिखा ही, व्यक्तिगत सन्दर्भों पर उनका आत्मगत लेखन भी काफ़ी मात्रा में है।
यशपाल के असंकलित इन लेखों में बहुत-सी ऐसी सामग्री है जो आत्मगत प्रकृति की है। इस सामग्री को एक जगह देख और पढ़कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। यहाँ अपने लेखकीय जीवन के वैविध्यपूर्ण अनुभवों का खुलासा उन्होंने किया है—कभी अपनी इच्छा से और कभी दूसरों के अनुरोध पर। इस संकलन में उनके अनेक विवादास्पद लेख भी हैं जो इधर वर्षों से अप्राप्य थे। इस ढेर सारी सामग्री के एक जगह उपलब्ध हो जाने से यशपाल जैसे बड़े क़द-बुत के लेखक की रचना-प्रक्रिया और रचनात्मक सरोकारों की दृष्टि से भी इस सामग्री का अपना महत्त्व है।
Book Details
-
ISBN9788180318672
-
Pages343
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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—‘साहित्य’ शीर्षक निबन्ध से
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