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Arya-Dravid Bhashaon Ki Moolbhoot Ekta

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आमतौर पर माना जाता है कि आर्य और द्रविड़ भाषाओं का सम्बन्ध दो अलग-अलग भाषा परिवारों से है। ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ पुस्तक इसी धारणा का खंडन करती है और यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि आर्य और भारोपीय भाषाओं का स्रोत वही है जो द्रविड़ भाषाओं का। जिन तथ्यों को आधार मानकर यह प्रबन्ध अपनी इस धारणा को स्पष्ट करता है, उनमें सबसे प्रमुख यह है कि भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में तात्विक विभेद नहीं है और यह कि इन भाषाओं का विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ था। विभिन्न भाषाओं की शब्दावली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह पुस्तक भाषा की आदिम अवस्था और विकास क्रम का विश्लेषण भी करती है तथा वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन बोलियों के स्वरूप को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन्हें अलग मानकर चलेंगे। लेखक के अपने शब्दों में इस ‘कृति का गम्भीरता से अध्ययन करने के बाद इतना तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य कुतूहल उत्पन्न करना नहीं है।’ यह एक बेहद उलझी हुई समस्या को समझने और उसका कोई समाधान ढूँढ़ने का एक जिम्मेदार प्रयास है। भाषा के गम्भीर अध्येताओं के लिए एक विचारोत्तेजक कृति।

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आमतौर पर माना जाता है कि आर्य और द्रविड़ भाषाओं का सम्बन्ध दो अलग-अलग भाषा परिवारों से है। ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ पुस्तक इसी धारणा का खंडन करती है और यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि आर्य और भारोपीय भाषाओं का स्रोत वही है जो द्रविड़ भाषाओं का।

जिन तथ्यों को आधार मानकर यह प्रबन्ध अपनी इस धारणा को स्पष्ट करता है, उनमें सबसे प्रमुख यह है कि भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में तात्विक विभेद नहीं है और यह कि इन भाषाओं का विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ था।

विभिन्न भाषाओं की शब्दावली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह पुस्तक भाषा की आदिम अवस्था और विकास क्रम का विश्लेषण भी करती है तथा वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन बोलियों के स्वरूप को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन्हें अलग मानकर चलेंगे।

लेखक के अपने शब्दों में इस ‘कृति का गम्भीरता से अध्ययन करने के बाद इतना तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य कुतूहल उत्पन्न करना नहीं है।’ यह एक बेहद उलझी हुई समस्या को समझने और उसका कोई समाधान ढूँढ़ने का एक जिम्मेदार प्रयास है।

भाषा के गम्भीर अध्येताओं के लिए एक विचारोत्तेजक कृति।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2025
Weight
260 grams
ISBN-13
9789360860462
Pages
252
Reading time
~8 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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