Aalok Parv
(0)
Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
795
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आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ियाँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।
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आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ियाँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।
Book Details
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ISBN9788171786862
-
Pages221
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Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोजने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालिदास के लालित्य से रंगारंग है।
आठ अध्यायों वाली इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय का प्रस्थान-बिन्दु आचार्य द्विवेदी की कोई-न-कोई कृति है, किन्तु यह पुस्तक उन कृतियों की व्याख्या मात्र नहीं है और न उनके मूल्यांकन का प्रयास है बल्कि उनके माध्यम से उस मौलिक इतिहास-दृष्टि के उन्मेष को पकड़ने की कोशिश की गई है जिसके आलोक में समूची परम्परा एक नए अर्थ के साथ उद्भासित हो उठती है।
‘दूसरी परम्परा की खोज’ से एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो अपनी सहजता में मोहक है, अपने संघर्ष और पराजय में भी गरिमामय है और अपनी मानव-आस्था में परम्परा के सर्वोत्तम मूल्यों का साक्षात् विग्रह है—कुटज के समान साधारण होते हुए भी मनस्वी और देवदारु के समान मस्ती से झूलते हुए भी अभिजात तथा अपनी ऊँचाइयों में एकाकी। आलोचना कितनी सर्जनात्मक हो सकती है, इसका उदाहरण है—‘दूसरी परम्परा की खोज’।
Kuchh Sahitya Charcha Bhi
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

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Description:
श्रीलाल शुक्ल प्रसिद्ध व्यंग्य-लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने व्यंग्य का विपुल, विविध और बहुआयामी उपयोग किया है। वे उन थोड़े से भारतीय लेखकों में हैं, जिन्होंने गद्य को एक नया जीवन दिया है। उनके व्यंग्य से इतर गद्य की श्रेष्ठता का परिचय कराती है—‘कुछ साहित्य चर्चा भी’।
यह पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है, जिनमें श्रीलाल शुक्ल के समीक्षात्मक लेख, संभाषण, व्याख्यान और साक्षात्कार संगृहीत हैं। पढ़ीस, कबीर, निराला, यशपाल, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, निर्मल वर्मा, रमेशचन्द्र शाह, कुँवर नारायण, गिरिराज किशोर, श्रीराम वर्मा और नासिरा शर्मा के लेखन के बहाने श्रीलाल शुक्ल पूर्व और वर्तमान की सभ्यता-समीक्षा करते चलते हैं। समय और समाज के हर परिवर्तन-परिवर्द्धन पर उनकी दृष्टि जाती है।
श्रीलाल शुक्ल की रचनाशीलता आलोचनात्मक विवेक से प्रेरित, संचालित और संयमित रही है। वे ख़ूब पढ़नेवाले और पढ़े हुए पर अपनी राय बनानेवाले लेखकों में माने जाते थे। उन्हें सुनना भी एक अद्भुत अनुभव होता था। पुस्तक में शामिल संभाषणों और व्याख्यानों से यह अनुमान लगाया जा सकता है। पुस्तक में शामिल साक्षात्कार में श्रीलाल शुक्ल खुलकर सामने आते हैं और सामाजिक-राजनीतिक विमर्शकार सिद्ध होते हैं। गायिका गिरिजा देवी और कथावाचक पंडित राधेश्याम पर केन्द्रित लेखों में जहाँ लेखक की दूसरी रुचियाँ भी सामने आती हैं, वहीं ‘राग दरबारी संस्मरण’, ‘मेरी कथा यात्रा के कुछ मोड़’, ‘साहित्य के लिए मेरी कसौटी’ आदि आलेखों में श्रीलाल शुक्ल आत्मसमीक्षा करते प्रतीत होते हैं।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की तरह श्रीलाल शुक्ल साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखते हैं। यह पुस्तक उनकी सृजनात्मक दुनिया को भली-भाँति जानने और समझने का अवसर उपलब्ध कराती है।
Mahaveer Prasad Dwivedi Aur Hindi Navjagaran
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

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Description:
द्विवेदी जी ने अपने साहित्यिक जीवन में सबसे पहले अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया और बड़ी मेहनत से ‘सम्पत्ति शास्त्र’ नामक पुस्तक लिखी। इसीलिए द्विवेदी जी बहुत-से ऐसे विषयों पर टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर लेख लिखे।
राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिन्तन में कहाँ आगे बढ़े और कहाँ पिछड़े हैं। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। उनके कार्य का मूल्यांकन व्यापक हिन्दी नवजागरण के सन्दर्भ में ही सम्भव है।
डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित इस कालजयी पुस्तक के पाँच भाग हैं। पहले भाग में भारत और साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में द्विवेदी जी ने और ‘सरस्वती’ के लेखकों ने जो कुछ कहा है, उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। दूसरे भाग में रूढ़िवाद से संघर्ष, वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्राचीन दार्शनिक चिन्तन के मूल्यांकन का विवेचन है। तीसरे भाग में भाषा-समस्या को लेकर द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है, उसकी छानबीन की गई है। चौथे भाग में साहित्य-सम्बन्धी आलोचना का परिचय दिया गया है। पाँचवें भाग में द्विवेदी-युग के साहित्य की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।
बहुत-सी समस्याएँ जो द्विवेदी जी के समय में थीं, आज भी विद्यमान हैं। इसीलिए आज के सन्दर्भ में भी इस पुस्तक की सार्थकता और उपयोगिता अक्षुण्ण है।
Hindi Sahitya Aur Nari Samaj
- Author Name:
Nagratna Rao
- Book Type:

- Description: संसार के समस्त प्राणियों में 'स्त्री' मानव समाज की अपनी दुनिया है। यह जानने, समझने के बावजूद स्त्री घर के भीतर और बाहर समाज में उपेक्षित, अपमानित और प्रताड़ित होती रही है। कभी उसने प्रतिरोध किया तो कभी विरोध। हर हाल में झेलना स्त्री को ही पड़ा है। कभी परिस्थितियों की प्रतिकूलता ने उसे संघर्षमय बनाया तो कभी अपनों की अनाकुलता के कारण उसे विषमताओं को झेलना पड़ा। यदि वह उनसे उभरती तो कोई न कोई कलंक उसे कलुषित करता। मानो स्त्री कोई वस्तु है, जिसे प्रत्येक स्तर पर अपने आपको ढालना है। स्त्री, स्त्री है तभी वह ऐसा करने में सक्षम है। नारी मानव समाज का अभिन्न अंग है। समाज की ही भाँति साहित्य में भी नारी को लेकर कई विचारधाराएँ हैं। समय चाहे कोई भी रहा हो नारी के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। परिणामस्वरूप समय-समय पर नारी की स्थिति में परिवर्तन आया। सामाजिक रूप से नारी की स्थिति में आए परिवर्तन का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर भी पड़ा, क्योंकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। साहित्य मानव जीवन की ही प्रतिछाया है। समाज में नारी की गतिविधियों, चित्तवृत्तियों के अनुरूप हिन्दी साहित्य में भी नारी का चित्रण मिलता है। इस पुस्तक में नारी की सामाजिक और साहित्यिक स्वरूप को समझने और समझाने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक समाज और साहित्य दोनों दृष्टियों से नारी के स्वरूप को एकत्र करने का सत्प्रयत्न है।
Bharatiya Nepali Sahitya Ka Vaigyanik Itihas
- Author Name:
Dr. Goma Devi Sharma
- Book Type:

- Description: गोमा देवी शर्मा ने हिन्दी भाषा की साहित्येतिहास-परम्परा को एक गौरव-मणि दिया है, जिसके कारण वह नेपाल के नेपाली साहित्य से आगे बढ़कर भारतीय नेपाली साहित्य के इतिहास को अपनी सम्पदा का हिस्सा बना सकीं। उनका इतिहास-ग्रंथ हिन्दी में, भारतीय भाषाओं के पहले से उपलब्ध इतिहासों के परिवार का सदस्य बनकर हमें यह अनुभव कराएगा कि भारत की विविध भाषाओं के बहुरंगी भाषा-उद्यान के मनोज्ञ सौन्दर्य में नेपाली का भी बराबर का योगदान है। आगे बढ़कर, यह अनुभव हमारी उस देशज भारतीयता की चेतना का विस्तार करेगा, जो हमें अपनी मातृभाषाओं में विश्व को पुकारने की प्रेरणा देती है और जिससे हिन्दी जीवन-रस ग्रहण करते हुए इस महान राष्ट्र की समग्र-सम्पूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। किसी भी साहित्येतिहासकार को न तो पूरी तरह निर्दोष इतिहास लिखने का दावा करना चाहिए, न पूर्ण अथवा अन्तिम रूप से सही इतिहास लिखने का। ऐसा कोई भी दावा इतिहास के अध्येताओं पर अत्याचार से कम नहीं होता; क्योंकि इससे उनकी ज्ञान की लोकतांत्रिकता पर संकट मँडराने लगता है।...इतिहास के अध्येता स्वयं कुछ प्रश्नों—जिसने इतिहास लिखा है, क्या पहले उसने स्वयं इतिहासकार होने की पात्रता प्राप्त की है? क्या उसके पास इतिहास-दृष्टि है? क्या उसके भीतर इतिहासकार के लिए अनिवार्य नैतिकता-बोध है? क्या उसे इतिहास-दर्शन और इतिहास-लेखन के उद्देश्य की समझ है? क्या वह इतिहास-लेखन की वैज्ञानिक प्रक्रिया से परिचित है? क्या वह विचार-स्वातंत्र्य का पक्षधर है?—आदि पर विचार करने और निर्णय लेने को स्वतंत्र होते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर भी इतिहासकार को अनिवार्य रूप से अपने लिखे इतिहास की सामग्री के भीतर ही उसका स्वाभाविक अंग बना कर देने होते हैं...। यह साहित्येतिहास आश्वस्त करता है कि गोमा देवी शर्मा सवालों से भी परिचित हैं, चुनौतियों से भी और अपने दायित्व से भी। उन्होंने वैचारिक-आग्रहों को सूचनाओं के चयन अथवा विवेचन-विश्लेषण पर हावी नहीं होने दिया है।
Nirala Aur Muktibodh : Chaar Lambi Kavitayen
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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Description:
हिन्दी में लम्बी कविता का इतिहास नया नहीं है, भले उसे पारिभाषिक अभिधा मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं से प्राप्त हुई हो। पुराने कवियों को छोड़ दें, तो लम्बी कविता द्विवेदी-युग के कवियों से लेकर समवर्ती युग के कवियों तक ने लिखी है। हिन्दी के महत्त्वपूर्ण युवा आलोचक नंदकिशोर नवल ने अध्ययन के लिए चार लम्बी कविताएँ चुनी हैं। उनमें से दो निरालाकृत हैं और दो मुक्तिबोधकृत। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये चारों कविताएँ हिन्दी की चर्चित और विवादास्पद ही नहीं, महान कविताएँ भी हैं, जिनके सोपानों पर चरण रखते हुए हिन्दी कविता ने ऊँचाई प्राप्त की है।
लम्बी कविता का सम्बन्ध निश्चय ही केवल आकार से न होकर प्रकार से भी है। इसे संयोग ही कहेंगे कि लेखक द्वारा चुनी गई चारों कविताएँ चार तरह की हैं। ‘सरोज-स्मृति’ के चित्रों को यदि स्मृति का सूत्र गुम्फित करता है, तो 'राम की शक्ति-पूजा' कथा के सहारे आगे बढ़ती है। ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अँधेरे में’ दोनों ही फ़ैंटास्टिक कविताएँ हैं, लेकिन एक की फ़ैंटेसी जहाँ एक अखंड रूपक के रूप में है, वहीं दूसरे की फ़ैंटेसी एक पूरी चित्रशाला है। नवल ने बड़ी सूक्ष्मता से चारों लम्बी कविताओं के शिल्पगत वैशिष्ट्य को उद्घाटित करते हुए उनकी उस अन्तर्वस्तु पर प्रकाश डाला है, जो कि उससे अभिन्न है।
समकालीन हिन्दी आलोचना में रचना से साक्षात्कार की बहुत बात की जाती है, लेकिन उसका सामना होने पर प्राय: आलोचक बग़ल से निकल जाते हैं। नवल ने रचना के अन्तर्लोक में प्रवेश करते हुए उसके उस बृहत्तर सन्दर्भ को हमेशा याद रखा है, जिसमें ही कोई रचना अपनी सार्थकता अथवा प्रासंगिकता प्राप्त करती है। ‘निराला और मुक्तिबोध : चार लम्बी कविताएँ’ नामक उनकी यह आलोचना-पुस्तक हिन्दी कविता के मर्मग्राहियों के लिए निश्चय ही उपयोगी बनी रहेगी।
Prayojanmulak Hindi Ki Nai Bhumika
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
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Description:
भाषा किसी भी देश की संस्कृति का अक्षय कोष होती है। यही परम्परा से संस्कृति के विचारों को लेकर आधुनिकता से मिलाती है। वस्तुत: भाषा जुम्मा-जुम्मा कह चुकने का अमूर्त माध्यम ही नहीं होती है, बल्कि ख़ुद को अपने समाज और परम्परा से जोड़े रखने का प्रेम-बन्धन भी है। वह भटकाव और गुमनामी के अँधेरे में आस्था की अक्षत मशाल बन 'गाइड' की तरह आगे-आगे चल राह दिखाती है। सौभाग्य से, भारतीय सर्जनात्मकता का अपराजेय संकल्प हिन्दी उक्त सभी गुणों को जीती है। व्यक्ति द्वारा विचित्र रूपों में बरती जानेवाली इस हिन्दी भाषा को भाषा-विज्ञानियों ने स्थूल रूप से सामान्य और प्रयोजनमूलक इन दो भागों में विभक्त किया है।
सुखद सूचना यह है कि हिन्दी की इन नितान्त ताज़ा-टटकी और कई सन्दर्भों में बेहद नई भाषिक-संरचना या नवजात शिशु रूप को केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के साथ-साथ तक़रीबन हर प्रादेशिक विश्वविद्यालयों ने अपने-अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर इसे सम्मानित किया है। प्रयोजनमूलक हिन्दी आज इस देश में बहुत बड़े फलक और धरातल पर प्रयुक्त हो रही है। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच संवादों का पुल बनाने में आज इसकी महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज इसने एक ओर कम्प्यूटर, टेलेक्स, तार, इलेक्ट्रॉनिक, टेलीप्रिंटर, दूरदर्शन, रेडियो, अख़बार, डाक, फ़िल्म और विज्ञापन आदि जनसंचार के माध्यमों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है, तो वहीं दूसरी ओर शेयर बाज़ार, रेल, हवाई जहाज़, बीमा उद्योग, बैंक आदि औद्योगिक उपक्रमों, रक्षा, सेना, इंजीनियरिंग आदि प्रौद्योगिकी संस्थानों, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों, आयुर्विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, ए.एम.आई.ई. के साथ विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी-अर्द्धसरकारी कार्यालयों, चिट्ठी-पत्री, लेटर पैड, स्टॉक-रजिस्टर, लिफ़ाफ़े, मुहरें, नामपट्ट, स्टेशनरी के साथ-साथ कार्यालय-ज्ञापन, परिपत्र, आदेश, राजपत्र, अधिसूचना, अनुस्मारक, प्रेस-विज्ञप्ति, निविदा, नीलाम, अपील, केवलग्राम, मंजूरी पत्र तथा पावती आदि में प्रयुक्त होकर अपने महत्त्व को स्वत: सिद्ध कर दिया है।
कुल मिलाकर यह कि पर्यटन बाज़ार, तीर्थस्थल, कल-कारख़ाने, कचहरी आदि अब प्रयोजनमूलक हिन्दी की जद में आ गए हैं। हिन्दी के लिए यह शुभ है। अनेक विद्वानों के सहयोग से लिखी यह गम्भीर कृति अपने पाठकों को सन्तुष्ट अवश्य करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
Pali-Piyush
- Author Name:
Vijaypal Singh
- Book Type:

- Description: भारतीय भाषाओं एवं भारतीय संस्कृति को समझने के लिए पालि-भाषा का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। इसी कारण पालि भाषा का पठन-पाठन तथा अनुसंधान भारतीय मनीषा शताब्दियों से करती चली आ रही है। विदेशों में भी जितना मान एवं ख्याति इस भाषा को मिली, उतनी संभवतः किसी अन्य भारतीय भाषा को नहीं। भगवान् बुद्ध के आदर्शों के मेरुदंड सत्य, अहिंसा, विश्व बन्धुत्व, दया, सहनशीलता तथा मानव कल्याण आदि इसी भाषा में अन्तर्निहित है। भारतीय साहित्य के अतिरिक्त भारतीय कला एवं भारतीय दर्शन के दर्शन करने के लिये भी इसी भाषा मन्दिर में आना पड़ेगा। पुस्तुत पुस्तक 'पालि-पियूष में सर्वांगीण भूमिका के साथ-साथ पालि-भाषा प्रेमियों को समस्त उपयोगी सामग्री उपलब्ध हो जायेगी। पुस्तक निःसन्देह पठनीय एवं संग्रहणीय है।
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