'Rag Darbari' Ka Mahatva
Author:
MadhureshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
श्रीलाल शुक्ल-कृत ‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत करता है। निसंग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँवों की ज़िन्दगी से है, जो वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है।</p>
<p>1968 में पहली बार प्रकाशित ‘राग दरबारी’ के विचार और मूल्यांकन की वस्तुपरकता के साथ देखना और परखना आवश्यक है। इस उपन्यास को पूरी तरह समझने के लिए पुस्तक के सभी पक्षों पर लेख बटोरे गए हैं। जिनके माध्यम से ‘राग दरबारी’ समूचे परिवेश में अधिक पूर्णता के साथ समझा जा सकेगा।
ISBN: 9788180319860
Pages: 231
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ियाँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।
Samkaleen Rang-Paridrishya
- Author Name:
Satyendra Kumar Taneja
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक के लेख और समीक्षाएँ लेखक की लम्बी यात्रा के दस्तावेज़ हैं। इनमें नाटक और रंगमंच से जुड़े हर पहलू पर न सिर्फ़ व्यापक रूप से चर्चा की गई है, बल्कि कई समकालीन सवालों और समस्याओं का हल भी तलाशने की कोशिश की गई है।
थियेटर के व्यावसायिक होने की चिन्ताओं पर विमर्श जहाँ कई ज़रूरी बातों को रेखांकित करता है, वहीं भारतीय रंगमंच-निर्देशन और अभिनय की दुनिया की विरल प्रतिभाओं के अप्रतिम योगदान के अतिरिक्त जिन विशिष्ट निर्देशकों-अभिनेताओं ने अपने अद्वितीय प्रस्तुतीकरण से रंग-जगत को अमिट स्मृतियों से समृद्ध किया—हबीब तनवीर, इब्राहिम अल्काज़ी, श्यामानन्द जालान, ब.व. कारन्त—उन पर भी पर्याप्त सामग्री दी गई है।
हिन्दी रंगमंच के विकास की दिशा बहुमुखी रही है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए कुछ लेख ऐसे हैं जो न केवल रंगमंच के इतिहास के कुछ पहलुओं या स्थितियों को जानने में मदद करते हैं, बल्कि उनके परवर्ती प्रभावों की महत्ता को भी स्पष्ट करते हैं; जैसे—'इच्छा-शक्ति का इतिहास और इप्टा की सीमाएँ’, 'जब्तशुदा साहित्य, पत्रकारिता और पारसी थियेटर’, 'विद्रोही वृत्ति का मंत्र बना नीलदर्पण का प्रकाशन’, 'पचास वर्षों में भी सामाजिकचर्या नहीं बना : दिल्ली का रंगकर्म’, 'दिल्ली का पंजाबी रंगमंच’।
पुस्तक के कुछ लेख संस्मरणात्मक हैं—'आपबीती के बहाने नाट्यालोचन पर एक विमर्श’, 'बुल्ला...की जाने...मैं कौन!’, 'कारन्त की समकालीनता’। 'क्रान्ति का विचार और संस्कृत नाटक’ इस लेख में प्रचलित छवि से हटकर, संस्कृत नाटक के एक अछूते पक्ष को लेखक ने नई दृष्टि के साथ उजागर किया है। वहीं नाट्य-पुस्तक हो या रंगकर्म सम्बन्धित कोई मुद्दा या गतिविधि, उसकी अन्तर्वस्तु से उठते या जुड़े इतर सवालों को, समीक्षा लिखते समय उसके शीर्षक के माध्यम से प्रतिध्वनित किया गया है—'विद्रोह के लुभावने स्वर’, 'युद्ध के निमित्त राष्ट्र-प्रेम और राजनीति’, 'औपनिवेशिक परिवेश में विदेशी भाषाओं के नाट्यानुवाद’, 'प्रासंगिकता के दबाव से घिरे कुछ नाटक’ आदि।
'समकालीन रंग-परिदृश्य’ लेखक के अपने विषय के प्रति वर्षों से लगाव, गहरी दिलचस्पी तथा अपने दृष्टिकोण की खोज का एक विशिष्ट परिणाम है।
Jeene Ka Udaatta Aashay
- Author Name:
Pankaj Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
युवा कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी की यह पुस्तक हमारे समय के वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण की कविता पर केन्द्रित है। किसी भी विचारधारा के प्रभुत्व को स्वीकार करते हुए उन्होंने सत्य को एक विस्तृत पटल पर एक द्वन्द्वात्मक तथा बहुस्तरीय अवधारणा के रूप में आत्मसात् किया है।
आदर्श और यथार्थ, ज्ञान और संवेदना, समय और इतिहास की द्वन्द्वात्मक संहति से कुँवर नारायण की कविता संश्लिष्ट, गहन और विचारोत्तेजक घटित हुई है। उससे हम अपनी आत्मा को आलोकित और समृद्ध कर सकते हैं; क्योंकि उसमें वाग्जाल नहीं, एक मार्मिक पारदर्शिता और जीवन-सत्य का दुर्लब विवेक है।
लेखक ने इस पुस्तक के पहले निबन्ध में कुँवर नारायण के विचारों और उनकी समग्र काव्य-यात्रा से चुनी हुई कविताओं के विश्लेषण के ज़रिए उनकी काव्य-दृष्टि को समझने और उसका एक स्वरूप निर्मित करने की चेष्टा की है। बाद के निबन्धों में क्रमशः उनकी सभी काव्य-कृतियों का गहन और व्यापक मूल्यांकन किया गया है। बकौल लेखक, ‘शायद इसकी कोई सार्थकता है तो यह रेखांकित करने में कि कुँवर नारायण विचारों की बहुलता, दार्शनिक बेचैनी, आत्मवत्ता, प्रेम, जीवन की समृद्धि, सौन्दर्य, अपरिग्रह और सत्य के प्रति अदम्य आस्था के कवि ही नहीं; ग़ुलामी और अन्याय के विभिन्न रूपों के प्रति युयुत्सा और प्रतिरोध से सम्पन्न, गहरे विडम्बना-बोध, करुणा, व्यंग्य और परिवर्तन एवं प्रगति की कामना के भी कवि हैं।’
Mahaveer Prasad Dwivedi Aur Hindi Navjagaran
- Author Name:
Ramvilas Sharma
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Description:
द्विवेदी जी ने अपने साहित्यिक जीवन में सबसे पहले अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया और बड़ी मेहनत से ‘सम्पत्ति शास्त्र’ नामक पुस्तक लिखी। इसीलिए द्विवेदी जी बहुत-से ऐसे विषयों पर टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर लेख लिखे।
राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिन्तन में कहाँ आगे बढ़े और कहाँ पिछड़े हैं। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। उनके कार्य का मूल्यांकन व्यापक हिन्दी नवजागरण के सन्दर्भ में ही सम्भव है।
डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित इस कालजयी पुस्तक के पाँच भाग हैं। पहले भाग में भारत और साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में द्विवेदी जी ने और ‘सरस्वती’ के लेखकों ने जो कुछ कहा है, उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। दूसरे भाग में रूढ़िवाद से संघर्ष, वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्राचीन दार्शनिक चिन्तन के मूल्यांकन का विवेचन है। तीसरे भाग में भाषा-समस्या को लेकर द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है, उसकी छानबीन की गई है। चौथे भाग में साहित्य-सम्बन्धी आलोचना का परिचय दिया गया है। पाँचवें भाग में द्विवेदी-युग के साहित्य की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।
बहुत-सी समस्याएँ जो द्विवेदी जी के समय में थीं, आज भी विद्यमान हैं। इसीलिए आज के सन्दर्भ में भी इस पुस्तक की सार्थकता और उपयोगिता अक्षुण्ण है।
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