Nirmal Verma Aur Uttar Upniveshvad
About the book
निर्मल इस उत्तर-औपनिवेशिक दौर की ऐसी आहत भारतीय आत्मा है जो अपने आत्म-विभाजन से मुक्ति के लिए पचास साल से छटपटा रही है। निर्मल की कथा यूरोपीय आधुनिकता में खोए भारतीय मनुष्य की मुक्ति की दुर्धर्षता की गाथा है। उनके निबन्ध आधुनिकता से एक सुदीर्घ और अटूट जिरह है, उनकी कथाएँ उस जिरह की दृष्टान्त या कहें कि पलटकर उनके निबन्ध उनके वृत्तान्तों के ‘पूरक’ विमर्श हैं। उनकी हिन्दू तितिक्षा से इस सबका बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अपने लेखन में उन्होंने तर्क और अनुभव के बीच ही नहीं, भारतीय विमर्श के बीच भी एक सुसंगति पैदा करके यूरोपीय विभक्ति से निजात पाने का रास्ता भी सुझाया है। सरलीकृत प्रगतिशील आधुनिकता के वे सर्वाधिक कठिन प्रतिकार हैं, पश्चिम की आधुनिक योजनाओं के अचूक दुश्मन हैं और अपने स्वत्व की पहचान के लिए मँडराते एक भारतीय मन के आर्तनाद हैं। वे भारत के नीत्शे हैं : जितने ख़तरनाक उतने ही मनोहर और अनिवार। नीत्शे को महामानव का इन्तजार था, निर्मल को हर महामानव पर सन्देह है : वे उत्तर-उपनिवेशी भारत के रूपक हैं : अपने लुप्त ‘स्वत्व’, विदीर्णित ‘स्मृति’ और विकृत ‘प्रकृत स्वप्न’ की रक्षा करते। वे अपूर्ण और विभक्त कर दिए गए मनुष्य में पूर्णता का अहसास भरने का कलात्मक उपाय हैं। वे ‘पश्चिम के भारत’ हैं और ‘भारत के पश्चिम’ हैं। एक ‘पूरब’ उन्हें पश्चिम को टोकने-रोकने और ललकारने की ताक़त देता है। एक ‘पश्चिम’ उनके पूरब को समस्याग्रस्त करता है। यह विकट उत्तर-उपनिवेशी विमर्श है जो चालू पश्चिमी विकासमूलक हिन्दी समीक्षा और विमर्श के लिए आफ़त करता है। यूरोप के द्वारा दमित उनका हाशियाकृत हिन्दू-हाशिया एक नए उत्तर-औपनिवेशिक पाठ की माँग करता है। वे यूरोपीय आधुनिकता की जगह अपने क़िस्म की आधुनिकता की तलाश में एक नई सभ्यता-समीक्षा के सूत्र देते हैं। पश्चिम की समग्रता के बरक्स वे एक पूरब और उसमें भी भारत की पूर्वजता और भारतीयता को समग्र बनाना चाहते हैं। एडवर्ड सईद और तमाम उत्तर-उपनिवेशी विमर्शकार निर्मल में उत्तर-आधुनिकता के सीमान्त पर ज़िद भरे ‘स्थानीयतावादी अभिमान’ और ‘मूलवादी’ को ख़ूब पढ़ सकते हैं। यही उनकी समस्या नज़र आ सकती है।
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About the Book
निर्मल इस उत्तर-औपनिवेशिक दौर की ऐसी आहत भारतीय आत्मा है जो अपने आत्म-विभाजन से मुक्ति के लिए पचास साल से छटपटा रही है। निर्मल की कथा यूरोपीय आधुनिकता में खोए भारतीय मनुष्य की मुक्ति की दुर्धर्षता की गाथा है। उनके निबन्ध आधुनिकता से एक सुदीर्घ और अटूट जिरह है, उनकी कथाएँ उस जिरह की दृष्टान्त या कहें कि पलटकर उनके निबन्ध उनके वृत्तान्तों के ‘पूरक’ विमर्श हैं। उनकी हिन्दू तितिक्षा से इस सबका बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अपने लेखन में उन्होंने तर्क और अनुभव के बीच ही नहीं, भारतीय विमर्श के बीच भी एक सुसंगति पैदा करके यूरोपीय विभक्ति से निजात पाने का रास्ता भी सुझाया है। सरलीकृत प्रगतिशील आधुनिकता के वे सर्वाधिक कठिन प्रतिकार हैं, पश्चिम की आधुनिक योजनाओं के अचूक दुश्मन हैं और अपने स्वत्व की पहचान के लिए मँडराते एक भारतीय मन के आर्तनाद हैं।
वे भारत के नीत्शे हैं : जितने ख़तरनाक उतने ही मनोहर और अनिवार। नीत्शे को महामानव का इन्तजार था, निर्मल को हर महामानव पर सन्देह है : वे उत्तर-उपनिवेशी भारत के रूपक हैं : अपने लुप्त ‘स्वत्व’, विदीर्णित ‘स्मृति’ और विकृत ‘प्रकृत स्वप्न’ की रक्षा करते। वे अपूर्ण और विभक्त कर दिए गए मनुष्य में पूर्णता का अहसास भरने का कलात्मक उपाय हैं। वे ‘पश्चिम के भारत’ हैं और ‘भारत के पश्चिम’ हैं। एक ‘पूरब’ उन्हें पश्चिम को टोकने-रोकने और ललकारने की ताक़त देता है। एक ‘पश्चिम’ उनके पूरब को समस्याग्रस्त करता है। यह विकट उत्तर-उपनिवेशी विमर्श है जो चालू पश्चिमी विकासमूलक हिन्दी समीक्षा और विमर्श के लिए आफ़त करता है।
यूरोप के द्वारा दमित उनका हाशियाकृत हिन्दू-हाशिया एक नए उत्तर-औपनिवेशिक पाठ की माँग करता है। वे यूरोपीय आधुनिकता की जगह अपने क़िस्म की आधुनिकता की तलाश में एक नई सभ्यता-समीक्षा के सूत्र देते हैं। पश्चिम की समग्रता के बरक्स वे एक पूरब और उसमें भी भारत की पूर्वजता और भारतीयता को समग्र बनाना चाहते हैं। एडवर्ड सईद और तमाम उत्तर-उपनिवेशी विमर्शकार निर्मल में उत्तर-आधुनिकता के सीमान्त पर ज़िद भरे ‘स्थानीयतावादी अभिमान’ और ‘मूलवादी’ को ख़ूब पढ़ सकते हैं। यही उनकी समस्या नज़र आ सकती है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2003
- Weight
- 135 grams
- ISBN-13
- 9788171198207
- Pages
- 98
- Reading time
- ~3 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21 cm
- Language
- Hindi
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