Hindi Sahitya Ka Parichayatmak itihas
Author:
Bhagirath MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 556
₹
695
Available
जो साहित्य युगान्तर तक जीवित रहता है उसमें निश्चय ही कुछ जीवन्त तत्त्व रहते हैं, उनका विश्लेषण करना अभीष्ट होना चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए तीन कालखंडों में विभाजित ‘हिन्दी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास’ शीर्षक इस पुस्तक का प्रणयन किया गया है।</p>
<p>पुस्तक के प्रत्येक कालखंड में प्रचलित साहित्यिक धाराओं और युगों का अलग-अलग स्पष्ट परिचय दिया गया है तथा साहित्यकार और उसकी रचनाओं का तथ्यात्मक विवरण पूर्ण रूप से देने का प्रयत्न किया गया है। आधुनिक काल के अन्तर्गत काव्य और गद्य साहित्य की विविध विधाओं का अलग-अलग युगानुसार परिचय दिया गया है। गद्य साहित्य के साथ अन्त में हिन्दी पत्रकारिता के विकास का भी संक्षिप्त विवरण दे दिया गया है, क्योंकि हिन्दी गद्य की विविध विधाओं के विकास और प्रचार में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।</p>
<p>काव्य के इतिहास के प्रसंग में और विशेष रूप से</p>
<p>प्राचीन और मध्यकालीन काव्यधाराओं के परिचय में कवि-परिचय के साथ-साथ उसकी विशिष्टताओं को स्पष्ट करने के लिए काव्य की कुछ पंक्तियाँ भी उदाहरणस्वरूप दी गई हैं। इससे जहाँ एक ओर तथ्यात्मक विवरण की नीरसता दूर हो जाती है, वहीं दूसरी ओर काव्य-युगों को समझने में भी सुविधा होती है।</p>
<p>इस संक्षिप्त, किन्तु पूरे हिन्दी साहित्य के विवरण का अवलोकन करने से यह बात भली भाँति समझ में आ जाती है कि हिन्दी भाषा और उसके साहित्य में कितनी विविधता और व्यापकता है।
ISBN: 9788183614078
Pages: 180
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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एक ही अध्येता द्वारा उपन्यास-साहित्य के समग्र का परीक्षण कर विशिष्ट कृति के मूल्यांकन की परम्परा का प्रायः अभाव है। एकाध प्रयत्न को छोड़कर उपन्यास-आलोचना में बड़ा शून्य है। इसी शून्य को भरने का प्रयास सुप्रसिद्ध वरिष्ठ आलोचक डॉ. पुष्पपाल सिंह प्रणीत इस ग्रन्थ में हुआ है जिसमें 21वीं शती के उपन्यास-साहित्य की समग्रता में प्रवेश कर, 2013 (के मध्य तक) के प्रकाशित उपन्यासों पर गम्भीरता से विचार का सुचिन्तित निष्कर्ष प्रतिपादित किए गए हैं। उपन्यासों के कथ्य की विराट चेतना पर विचार करते हुए दर्शाया गया है कि आज उपन्यास का क्षितिज कितना विस्तृत हो चुका है। भूमंडल की कदाचित् कोई ही ऐसी समस्या होगी जिस पर हिन्दी उपन्यास में विचार नहीं हुआ हो। भूमंडलीकृत आर्थिकता (इकॉनमी) तथा अमेरिकी संस्कृति के वर्चस्व ने न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया में जो खलबली मचा रखी है, उस सबका सशक्त आकलन ‘21वीं शती का हिन्दी उपन्यास’ प्रस्तुत करता है। उपन्यास का चिन्तन और विमर्श-पक्ष इतना सशक्त है कि उस सबके चुनौतीपूर्ण अध्ययन में पुष्पपाल सिंह अपने पूरे आलोचकीय औज़ारों और पैनी भाषा-शैली के साथ प्रवृत्त होते हैं।
उपन्यास के ढाँचे, रूपाकार में भी इतने व्यापक प्रयोग इस काल-खंड के उपन्यास में हुए हैं जिन्होंने उपन्यास की धज ही पूरी तरह बदल दी है। उपन्यास की शैल्पिक संरचना पर हिन्दी में ‘न’ के बराबर विचार हुआ है। प्रस्ततु अध्ययन में विद्वान लेखक ने उपन्यास की शैल्पिक संरचना के परिवर्तनों का भी सोदाहरण विवेचन कर विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। लेखक ने उपन्यास के विपुल का अध्ययन कर उसके श्रेष्ठ के रेखांकन का प्रयास किया है किन्तु फिर भी अपने निष्कर्षों पर अड़े रहने का आग्रह उनमें नहीं है, वे सर्वत्र एक बहस को आहूत करते हैं। उपन्यास-आलोचना के सम्मुख जो चुनौतियाँ हैं, उन पर भी प्रकाश डालते हुए एक विचारोत्तेजक बहस का अवसर दिया गया है। पुस्तक के दूसरे खंड—विशिष्ठ उपन्यास खंड—में वर्षानुक्रम से अड़तीस विशिष्ट उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन उपन्यासों की समीक्षा-शैली में इतना वैविध्य है कि वह अपने ढंग से हिन्दी आलोचना की नई समृद्धि प्रदान करता हुआ लेखकीय गौरव की अभिवृद्धि करता है। पुष्पपाल सिंह की यह कृति निश्चय ही हिन्दी आलोचना के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवदान है।
Anuwad Ka Samkal
- Author Name:
Mohsin Khan
- Book Type:

- Description: अनुवाद केवल पुस्तकों, लेखों या रचनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसने कई क्षेत्रों में प्रवेश करते हुए उन्हें समृद्ध किया है और वर्तमान में हर दिशा में बड़ा लाभदायक सिद्ध हो रहा है। ‘अनुवाद का समकाल’ पुस्तक जहाँ अनुवाद की परिभाषा, अर्थ, स्वरूप, सिद्धान्त, प्रक्रिया, प्रविधि, उपयोगिता, महत्त्व, भेद और चुनौतियों की विशद चर्चा करते हुए उनके विविध पक्षों पर मौलिकता के साथ समेकित निष्कर्ष प्रदान करती है, वहीं अनुवाद विमर्श से अपनी मौलिकता में और आगे बढ़ते हुए वर्तमान में अनुवाद की वैश्विक धरातल पर नूतन भूमिका को तलाशती हुई अनुवाद की अनिवार्य स्थितियों को कई स्तरों पर उजागर करती है। इनमें अनुवाद पुस्तकें, पत्र, दस्तावेज़, शासन-प्रशासन, कूटनीति, विदेश नीति में अनुवाद, खेल और पर्यटन में अनुवाद, अनुवाद का शिक्षा संस्थानों से सम्बन्ध, अनुवाद और वर्तमान में कार्यरत संस्थाएँ, परिषद, अनुवाद तकनीक का प्रयोग, प्रसार और परिदृश्य, अनुवाद सूचना प्रौद्योगिकी और उसकी वस्तु-स्थितियाँ, कंप्यूटर आधारित अनुवाद की उपयोगिता, सीमाएँ और चुनौतियाँ, डबिंग और अनुवाद के विभिन्न रूप एवं प्रकार, अनुवाद की एजेंसियाँ तथा उनके कार्यक्षेत्र, वैश्विक स्तर पर अनुवाद के सम्बन्ध में विश्वविद्यालयों में उपयोगी कोर्स, अनुवाद के पत्र-पत्रिकाएँ, पुरस्कार, अनुवाद की वेबसाइट, रेडियो और अनुवाद, सरकारी, ग़ैरसरकारी उद्यम, शब्दकोश, मोबाइल अनुवाद, अनुवाद के ब्लॉग, अनुवाद और रोज़गार, अनुवाद समारोह, कार्यशालाएँ आदि का विस्तृत और बहु उपयोगी प्रामाणिक ब्योरा प्राप्त किया जा सकता है। अब तक के अनुवाद को केन्द्र में रखकर रची गई पुस्तकों के मध्य यह पुस्तक अपनी मौलिकता के साथ अनुवाद के वर्तमान परिदृश्य को व्यापक रूप में समेटने का भरसक प्रयास करती है।
Ghananad Ka Kavya
- Author Name:
Ramdev Shukla
- Book Type:

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घनानन्द के काव्य में भावस्थितियों के विकास का कोई क्रम बना-बनाया नहीं मिलता, किन्तु उनके शृंगार-काव्य में उसे ढूँढ़ना कठिन भी नहीं है। प्रिय के असाधारण रूप के प्रति आश्रय की रीझ, पूर्वराग की आवेगदशा, असाधारण सुख के अतिरेक के साथ रंकवत लालसा की सीत्कार और ‘शुद्ध सामीप्य’ जैसी तन्मयता वाला संयोग और उस संयोग के बाद स्वभावतः तीव्र विरहानुभूति, यह सब कुछ उनके काव्य में है।
घनानन्द में अतृप्ति है तो इस स्तर की है। इसके आधार पर इनको प्रेम का सुख न प्राप्त कर सकनेवाला भाग्यहीन नहीं घोषित किया जा सकता।
प्रेम के ऐसे विलक्षण अनुभव के बाद ही घनानन्द का विरह इतना तीव्र आवेगमय, इतना करुण और इतना गम्भीर हो सका है कि संसार की दृष्टि में प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मीन और पतंग इनके सामने कायर और कपूत होकर हर जाते हैं।
घनानन्द के काव्य के शिल्प-पक्ष के सम्बन्ध में भी ऐसे ही निष्कर्ष निकाले गए हैं : ‘कवि की प्रवृत्ति अपने हृदय की परत खोलने की अधिक होती है, अपनी उक्ति को सजाने-सँवारने की कम।’
Hindi Bhasha : Sanrachna Ke Vividh Aayam
- Author Name:
Ravindranath Shrivastava
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत पुस्तक हिन्दी भाषा की संरचना के विविध आयामों पर प्रकाश डालती है। विभिन्न व्याकरणाचार्यों के विचारों से सहमति-असहमति प्रकट करते हुए प्रो. श्रीवास्तव ने विभिन्न लेखों में तार्किक उक्तियों द्वारा अपने पक्ष को पुष्ट किया है। उनके चिन्तन की गहराई तथा साफ़-सुथरा विवेचन सर्वत्र विद्यमान है। हिन्दी भाषा की व्याकरणिक संरचना को आरेख के रूप में सम्भवतः पहली बार प्रो. श्रीवास्तव ने तैयार किया था, उसे भी इस पुस्तक में दे दिया गया है। पाठकों के सम्मुख यह पुस्तक रखते हुए दुःख और सन्तोष दोनों की मिली-जुली अनुभूति हो रही है। दुःख इस बात का कि यह पुस्तक उनके जीवनकाल में प्रकाशित न हो सकी, और सन्तोष यह है कि उनका यह महत्त्वपूर्ण अध्ययन पाठकों तक पहुँच पा रहा है।
आशा है, यह पुस्तक तथा इस शृंखला की अन्य पुस्तकें भी प्रो. श्रीवास्तव के भाषा-चिन्तन को प्रभावशाली ढंग से अध्येताओं तक पहुँचाएँगी और हिन्दी भाषा के प्रति स्नेह एवं लगाव रखनेवाले मनीषी भाषाविद् प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव की स्मृति को ताज़ा रखेंगे।
Vichar Ka Aina Kala Sahitya Sanskriti : Premchand
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

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Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
प्रेमचन्द ऐसे युगप्रवर्तक लेखक हैं जो हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य को एक मुकम्मल शुरुआत देते हैं। वे कहानी और उपन्यास को यथार्थवाद की जनपक्षधर जमीन पर ले आए जहाँ जनसाधारण को नायकत्व मिला। उनकी कहानियों और उपन्यासों ने न सिर्फ हिन्दी कथा साहित्य के विकास के लिए नए द्वार खोले बल्कि उनका गहरा असर समूचे भारतीय कथा साहित्य पर पड़ा। बतौर सम्पादक और चिन्तक उन्होंने जो निबन्ध लिखे, वे भारतीय समाज की बनावट और बुनावट की गहरी पड़ताल करते हैं। वे उन अनेक समस्याओं और विसंगतियों की सटीक पहचान करते हैं जिनसे भारतीय समाज आज तक जूझ रहा है। हमें उम्मीद है कि कठिन वर्तमान से जूझते हुए उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की इस किताब में हमें अनेक समकालीन सवालों के जवाब के साथ-साथ विचारणीय नए सवाल भी मिलेंगे।
Nirala Ki Kavityan Aur Kavyabhasha
- Author Name:
Rekha Khare
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में काव्यभाषा के संवेदनात्मक स्तर पर रचना-प्रक्रिया के जटिल और संश्लिष्ट स्वरूप के परीक्षण का प्रयत्न किया गया है। निराला की स्थिति सभी छायावादी कवियों में विशिष्ट रही है। उनका काव्य-व्यक्तित्व सबसे अधिक गत्यात्मक, प्रखर तथा अन्वेषी रहा है, जिसका जीवन्त साक्ष्य प्रस्तुत करती है उनकी काव्यभाषा। काव्यभाषा को लेकर निराला के मानस में रचनात्मक बेचैनी उनके विविध और गतिशील भाषा-स्वरों में देखी जा सकती है। व्यक्ति के रूप में तो एक लम्बे अरसे तक वे उपेक्षित रहे, कवि के रूप में भी उनकी प्रतिभा को सही रूप में बहुत समय तक नहीं पहचाना गया। बाहर मैं कर दिया गया हूँ। ‘भीतर, पर, भर दिया गया हूँ’, में कवि के इस मानसिक द्वन्द्व की ध्वनि सुनी जा सकती है।
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