Bhartiya Kavyashastra Ke Nai Chhitij
(0)
Author:
Rammurti TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
1295
1036 (20% off)
Unavailable
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...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं<strong>,</strong> लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के<strong>, </strong>सांस्कृतिक उथल<strong>–</strong>पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं<strong>, </strong>जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण<strong>–</strong>धारा है।</p> <p>डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है।</p> <p>लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है।</p> <p>आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
Read moreAbout the Book
...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं<strong>,</strong> लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के<strong>, </strong>सांस्कृतिक उथल<strong>–</strong>पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं<strong>, </strong>जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण<strong>–</strong>धारा है।</p>
<p>डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है।</p>
<p>लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है।</p>
<p>आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
Book Details
-
ISBN9788171788385
-
Pages403
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अशोक वाजपेयी की कविताओं से गुज़रते हुए यह एहसास बहुत शिद्दत से होता है कि हम ऐसे कवि से मुख़ातिब हैं जिसके यहाँ लौकिक और लोकोत्तर संवादरत हैं जिसके पास समकालीन यथार्थ की विकरालता को समझने की क्षमता ही नहीं, इस यथार्थ के समानान्तर जीवनपरक सम्भावनाएँ देखने और उनका उत्सव मनाने की भी क्षमता है जो कविता को किसी भी विचार का उपनिवेश बनाने के प्रयत्नों का सतत मुखर प्रतिवादी स्वर बनकर बहुत प्रसन्न है, और इन प्रयत्नों को विचार मात्र से विमुखता का पर्याय मान लिए जाने से बहुत उदास। जिसका मानना है कि कविता की प्रामाणिकता किसी विचार-विशेष का अनुगमन करने में नहीं, मानवीय वेदना और संवेदना को मुखरित करने में है। वैसे ही जैसे नारद भक्ति-सूत्रों का रचयिता मानता है कि भक्ति को कहीं बाहर से सर्टीफ़िकेट हासिल करने की ज़रूरत नहीं, यह स्वयं ही प्रमाण है : ‘प्रमाणान्तरस्यानपेक्षात्वात् स्वयं प्रमाणत्वात’!
Aadhunik Urdu Kahani Ka Safar
- Author Name:
Shamim Hanfi
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Description:
मुंशी प्रेमचन्द से सुरेन्द्र प्रकाश तक की उर्दू कहानी का यह विवरण २०वीं सदी के माहौल और समाज का विवरण भी है। मैं साहित्य की किसी भी विधा को उसकी ज़मीन और ज़माने से अलग करके देखने में असमर्थ हूँ ख़ासतौर पर कथा-कहानी को। सार्त्र ने १९४८ में साहित्य की प्रतिबद्धता पर अपनी धारणा व्यक्त करते हुए कविता के मुक़ाबले में कहानी को अपने समय और भौतिक वातावरण में ज़्यादा उलझा हुआ बताया था, ज़्यादा Committed, ज़्यादा Engaged यानी ज़्यादा प्रतिबद्ध और ज़्यादा व्यस्त। इस तरह हमारे कथा-साहित्य की हदें इतिहास से जा मिलती हैं। लेकिन साहित्य, बहरहाल, इतिहास नहीं होता। साहित्य इतिहास के समानान्तर अपनी एक अलग दुनिया बनाता है। यह दुनिया इतिहास से ज़्यादा रोचक, ज़्यादा सशक्त होती है, अपनी कलात्मकता और सौन्दर्य के कारण। इसीलिए इतिहास के किसी भी युग की सीमाओं के मुक़ाबले में साहित्य और कला की सीमाएँ ज़्यादा विस्तृत और ज़्यादा दिनों तक ज़िन्दा, रोचक और पायदार रहती हैं।
—प्रस्तावना से
Deshbhakti ke pavan teerth
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Soordas 'Brajeshwar Varma'
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Brajeshwar Verma
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- Description: प्रो. वर्मा द्वारा प्रणीत ‘सूरदास’ का यह संस्करण मध्ययुग के स्वर्णकाल के अन्यतम नायक सूरदास का प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन है। विगत कई वर्षों से यह ग्रन्थ सूर के अध्येताओं, विद्वानों और विद्यार्थियों के लिए प्रकाश स्तम्भ रहा है। इस ग्रन्थ से प्रेरणा लेकर सूर सम्बन्धी अनेक शोध और आलोचना ग्रन्थ लिखे गए हैं। सूरदास के जीवन और कृतित्व सम्बन्धी जो स्थापनाएँ प्रो. वर्मा ने इस ग्रन्थ में प्रतिपादित की हैं, उनकी प्रामाणिकता आज भी अक्षुण्ण हैं। प्रो. वर्मा की इस कृति की ख्याति देश और विदेश में समान रूप से है।
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