Bhartiya Kavyashastra Ke Nai Chhitij
About the book
...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं, लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के, सांस्कृतिक उथल–पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं, जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण–धारा है। डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है। लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है। आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
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About the Book
...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं, लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के, सांस्कृतिक उथल–पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं, जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण–धारा है।
डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है।
लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है।
आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 6th
- Publication year
- 1985
- Weight
- 622 grams
- ISBN-13
- 9788171788385
- Pages
- 403
- Reading time
- ~13 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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