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Hindi Samiksha Aur Acharya Shukla

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को निर्विवाद रूप से हिन्दी आलोचना का शिखर-व्यक्तित्व स्वीकार किया जाता है। जब हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को कसौटी पर कसने के प्रतिमान निर्मित हो रहे थे, तब आचार्य शुक्‍ल ने अपनी अद्‌भुत योग्यता से उन्हें एक सार्थक स्वरूप प्रदान किया। इसका महत्त्व ऐसे भी समझा जा सकता है कि आज तक रचनाओं, प्रवृत्तियों व रचनाकारों को लेकर होनेवाली बहुतेरी बहसों की पृष्ठभूमि आचार्य शुक्ल द्वारा रेखांकित सूत्रों से ही आकार लेती है। ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ पुस्तक में डॉ. नामवर सिंह द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेख संकलित हैं। पुस्तक के सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष के अनुसार, ‘निःसन्देह रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल की वास्तविक प्रासंगिकता और उनकी सीमाओं का सम्यक् सन्तुलित और चरम बौद्धिक आलोचनात्मक अध्ययन पहली बार नामवर सिह ने ही किया है।’ एक तरह से यह पुस्तक हिन्दी के दो दिग्गज आलोचकों का ‘समेकित विमर्श’ भी है। संकलित लेख ऐतिहासिक महत्त्व के तो हैं ही, इनमें निहित दृष्टि परम्परा व समकालीनता के विश्लेषण में भी सहायक है। सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष की भूमिका इन लेखों की प्रासंगिकता रेखांकित करते हुए नामवर सिंह के आलोचना-कर्म का मर्म भी उद्‌घाटित करती है।

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About the Book

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को निर्विवाद रूप से हिन्दी आलोचना का शिखर-व्यक्तित्व स्वीकार किया जाता है। जब हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को कसौटी पर कसने के प्रतिमान निर्मित हो रहे थे, तब आचार्य शुक्‍ल ने अपनी अद्‌भुत योग्यता से उन्हें एक सार्थक स्वरूप प्रदान किया। इसका महत्त्व ऐसे भी समझा जा सकता है कि आज तक रचनाओं, प्रवृत्तियों व रचनाकारों को लेकर होनेवाली बहुतेरी बहसों की पृष्ठभूमि आचार्य शुक्ल द्वारा रेखांकित सूत्रों से ही आकार लेती है।

‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ पुस्तक में डॉ. नामवर सिंह द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेख संकलित हैं। पुस्तक के सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष के अनुसार, ‘निःसन्देह रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल की वास्तविक प्रासंगिकता और उनकी सीमाओं का सम्यक् सन्तुलित और चरम बौद्धिक आलोचनात्मक अध्ययन पहली बार नामवर सिह ने ही किया है।’

एक तरह से यह पुस्तक हिन्दी के दो दिग्गज आलोचकों का ‘समेकित विमर्श’ भी है। संकलित लेख ऐतिहासिक महत्त्व के तो हैं ही, इनमें निहित दृष्टि परम्परा व समकालीनता के विश्लेषण में भी सहायक है। सम्पादक ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष की भूमिका इन लेखों की प्रासंगिकता रेखांकित करते हुए नामवर सिंह के आलोचना-कर्म का मर्म भी उद्‌घाटित करती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2013
Weight
380 grams
ISBN-13
9788126724529
Pages
232
Reading time
~8 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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