Premchand : Vigat Mahtta Aur Vartman Arthvatta
(0)
Author:
Murli Manohar Prasad SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
796 (20% off)
Available
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भारत के मौजूदा यथार्थ के सर्वग्रासी संकट के समय प्रेमचन्द का कृतित्व आलोचना से पुनर्पाठ की माँग करता रहा है। इसीलिए कथाकार, चिन्तक और सम्पादक-पत्रकार प्रेमचन्द पर एक ऐसी समालोचनात्मक पुस्तक की ज़रूरत महसूस की जाती रही है जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण देशी-विदेशी आलोचकों, राजनीतिक विचारकों तथा समाज वैज्ञानिकों के आलेखों का संचयन सम्भव हो। यह पुस्तक उसी अभाव की पूर्ति है और प्रेमचन्द की 125वीं वर्षगाँठ के समारोहों की शृंखला की एक कड़ी है।</p> <p>इसमें पाँच उर्दू, दो चीनी, एक जर्मन, तीन अंग्रेज़ी, एक रूसी और लगभग 35 हिन्दी में प्रकाशित आलोचनात्मक आलेख सम्मिलित किए गए हैं—जनार्दन झा ‘द्विज’ से लेकर अरुण कमल तक। इसके अलावा ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद तथा बी.टी. रणदिवे जैसे राजनीतिक-सांस्कृतिक चिन्तकों, ए.आर. देसाई और पूरनचन्द जोशी जैसे समाज वैज्ञानिकों तथा सव्यसाची भट्टाचार्य जैसे इतिहासकार के आलेख भी शामिल किए गए हैं।</p> <p>प्रेमचन्द के बाद वाली पीढ़ियों के सृजनकर्मियों की आलोचना-दृष्टियों से भी आलोचनाकर्म समृद्ध हुआ है। प्रेमचन्द को अज्ञेय, अमृतलाल नागर, निर्मल वर्मा, कुँवर नारायण आदि किस तरह देखते हैं, उनकी कृतियों में अन्तर्भूत राग-संवेदना और यथार्थ की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को सृजन-प्रक्रिया के स्तर पर किस तरह परखते हैं—इन बातों को ध्यान में रखकर ही उल्लिखित सभी कृतिकारों के आलेख इसमें सम्मिलित कर लिए गए हैं।</p> <p>सम्पादकों ने अपनी भूमिका में संचयन के आलेखों के प्रति सारसंग्रहवादी रुख़ अपनाने के बजाय आलोचनाकर्म के उन मूलभूत प्रश्नों को उठाया है जो अभी भी उलझन, मतभेद और वाग्युद्ध के लिए पर्याप्त छूट देते हैं। परम्परा के मूल्यांकन के क्रम में उठनेवाले गम्भीर सवालों की रोशनी में भूमिका के अन्तर्गत विचारोत्तेजक विश्लेषण का लचीला साँचा प्रस्तुत किया गया है। दस्तावेज़ी महत्त्व के साथ-साथ यह पुस्तक प्रेमचन्द के पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।
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भारत के मौजूदा यथार्थ के सर्वग्रासी संकट के समय प्रेमचन्द का कृतित्व आलोचना से पुनर्पाठ की माँग करता रहा है। इसीलिए कथाकार, चिन्तक और सम्पादक-पत्रकार प्रेमचन्द पर एक ऐसी समालोचनात्मक पुस्तक की ज़रूरत महसूस की जाती रही है जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण देशी-विदेशी आलोचकों, राजनीतिक विचारकों तथा समाज वैज्ञानिकों के आलेखों का संचयन सम्भव हो। यह पुस्तक उसी अभाव की पूर्ति है और प्रेमचन्द की 125वीं वर्षगाँठ के समारोहों की शृंखला की एक कड़ी है।</p>
<p>इसमें पाँच उर्दू, दो चीनी, एक जर्मन, तीन अंग्रेज़ी, एक रूसी और लगभग 35 हिन्दी में प्रकाशित आलोचनात्मक आलेख सम्मिलित किए गए हैं—जनार्दन झा ‘द्विज’ से लेकर अरुण कमल तक। इसके अलावा ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद तथा बी.टी. रणदिवे जैसे राजनीतिक-सांस्कृतिक चिन्तकों, ए.आर. देसाई और पूरनचन्द जोशी जैसे समाज वैज्ञानिकों तथा सव्यसाची भट्टाचार्य जैसे इतिहासकार के आलेख भी शामिल किए गए हैं।</p>
<p>प्रेमचन्द के बाद वाली पीढ़ियों के सृजनकर्मियों की आलोचना-दृष्टियों से भी आलोचनाकर्म समृद्ध हुआ है। प्रेमचन्द को अज्ञेय, अमृतलाल नागर, निर्मल वर्मा, कुँवर नारायण आदि किस तरह देखते हैं, उनकी कृतियों में अन्तर्भूत राग-संवेदना और यथार्थ की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को सृजन-प्रक्रिया के स्तर पर किस तरह परखते हैं—इन बातों को ध्यान में रखकर ही उल्लिखित सभी कृतिकारों के आलेख इसमें सम्मिलित कर लिए गए हैं।</p>
<p>सम्पादकों ने अपनी भूमिका में संचयन के आलेखों के प्रति सारसंग्रहवादी रुख़ अपनाने के बजाय आलोचनाकर्म के उन मूलभूत प्रश्नों को उठाया है जो अभी भी उलझन, मतभेद और वाग्युद्ध के लिए पर्याप्त छूट देते हैं। परम्परा के मूल्यांकन के क्रम में उठनेवाले गम्भीर सवालों की रोशनी में भूमिका के अन्तर्गत विचारोत्तेजक विश्लेषण का लचीला साँचा प्रस्तुत किया गया है। दस्तावेज़ी महत्त्व के साथ-साथ यह पुस्तक प्रेमचन्द के पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।
Book Details
-
ISBN9788126716425
-
Pages604
-
Avg Reading Time20 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वल्लभ और गौडीय सम्प्रदायों के अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों का विस्तृत विवरण भी साहित्य के अध्येताओं के समक्ष रखा गया है। निम्बार्क सम्प्रदाय का विचार इस निबन्ध की सीमा से परे है, क्योंकि हिन्दी साहित्य के सृजन में उसका कोई प्रत्यक्ष योग नहीं रहा है। ब्रजभाषा साहित्य के निर्माण का प्रारम्भ वस्तुत: वल्लभाचार्य की प्रेरणा से हुआ है। इस प्रकरण का महत्त्व अनेक स्थलों पर नवीन सामग्रियों के समावेश से बढ़ गया है। कृष्ण-भक्ति के प्रमुख कवियों का इसमें नाम निर्देश मात्र है। साहित्यिक कृतियों की समीक्षा भी नहीं है। ग्रन्थ के लघु कलेवर में उसकी अपेक्षा भी नहीं है। इस ग्रन्थ को हम एक परिचयात्मक ग्रन्थ ही कह सकते हैं। हिन्दी साहित्य में ब्रजभाषा के योगदान का उल्लेख भी किया गया है। ‘ब्रज के वैष्णव सम्प्रदाय और हिन्दी साहित्य’ के अनुशीलन से जो ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित होती है, निश्चित ही पाठक उससे लाभान्वित होंगे।
Duniya Ko Badal Denewale 50 Yuddha
- Author Name:
Pallav Kishore
- Book Type:

- Description: प्रकति में जब भूकंप या सूनामी इत्यादि आपदाओं के कारण उथल-पुथल मचती है तो दुनिया के नक्शे में बदलाव होता है और जब कतिपय कारणों से सामाजिक वर्णों में युद्ध छिड़ता है तो समाज के स्तर पर दुनिया में बड़ा बदलाव आता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अनेक यूरोपीय और अफ्रीकी देशों की भू- सीमाओं और मानविकी में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ, जिससे स्थानीय सभ्यता और संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। दूसरे विश्वयुद्ध ने आग में घी का काम किया और पूरी दुनिया को प्रभावित किया। भारत के आजादी के संग्राम और उसके बाद भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाया गया--उस दौरान हुए भीषण संघर्ष में न केवल दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का आविर्भाव हुआ, वरन् भयंकर रक्तक्रांति भी हुईं। इसने आगामी अनेक वर्षों तक मानव सभ्यता को प्रभावित किया। दरअसल जब से दुनिया बनी है, युद्ध कहीं-न-कहीं होते रहे हैं। आज भी अनेक देश युद्ध की आग में झुलस रहे हैं--सीरिया संकट, उत्तर कोरिया संकट, अफगानिस्तान में तालिबान संकट, भारत- पाक तना-तनी, इजराइल-फिलिस्तीन संकट। दुनिया में अमन-शांति के लिए आवश्यक है कि मानवहित में इन युद्धों पर पूर्णविराम लगे।
Alochana Anukramanika
- Author Name:
Neelam Singh +1
- Book Type:

-
Description:
स्वतंत्रता के बाद जिस तरह भारतीय समाज और राजनीति अपना रास्ता टटोल रहे थे; हिन्दी साहित्य की स्थिति बेशक वैसी नहीं थी। उसकी अपनी एक परम्परा थी जो ब्रिटिश भारत में भी विद्यमान और गतिशील रहती आई थी। लेकिन आजादी के बाद के नए भारत में उसके सामने कुछ नए कार्यभार थे; जिसमें सबसे अहम था भारतीय लोकतंत्र को एक सामूहिक बोध के रूप में स्थापित करना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को आगे बढ़ाना।
इसके लिए सिर्फ साहित्य-सृजन की नहीं, एक वैचारिक नेतृत्व की भी जरूरत थी। हिन्दी समाज के लिए इस काम के लिए आलोचना सामने आई। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्रिका का पहला अंक अक्तूबर 1951 में आया; और पहले ही अंक से उसने अपनी क्षमता और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप में रेखांकित कर दिया।
आलोचना को सिर्फ साहित्यिक समीक्षाओं की पत्रिका नहीं होना था, और वह हुई भी नहीं। उसकी चिन्ता के दायरे में इतिहास, संस्कृति, समाज से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सभी कुछ था। विश्व के वैचारिक आन्दोलनों और अवधारणाओं को भी उसने बराबर अपनी निगाह में रखा। इसी विराट दृष्टि के चलते आलोचना हिन्दी मनीषा के लिए एक नेतृत्वकारी मंच के रूप में सामने आई, और धीरे-धीरे मानक बन गई।
आलोचना के सम्पादक बदले, लेकिन उसकी दृष्टि का दायरा और फोकस कभी नहीं बदला। आज भी, वह लोकतांत्रिक प्रगतिशील और समतावादी मूल्यों के पक्ष में साहसपूर्वक खड़ी हुई है। अक्टूबर 1951 में प्रकाशित पहले अंक से लेकर अप्रैल-जून 2019 में प्रकाशित ‘विभाजन के सत्तर साल’ विषयक अंक तक की सामग्री इसकी गवाह है, जिसका विवरण आप इस पुस्तक में देखेंगे।
इस पुस्तक में हर अंक की सामग्री का क्रमबद्ध विवरण है जो स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य की यात्रा का द्योतक भी है; और सामाजिक-सांस्कृतिक चिन्ताओं का भी।
Meri Dharti Mere Log
- Author Name:
Sheshendra Sharma
- Book Type:

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Description:
कवि तीखा होता हुआ मनहर है—वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि। कितनी सरल, कितनी कोमल जनान्तिक, फिर भी अभिजात, कितनी आम-अवाम को पुकारती उसकी आवाज़ है। शब्दों का औदार्य, रचना की सुघराई, गिरा की गरिमा, भावों की तीखी सादगी सिद्ध करती है कि—सिम्पल इज़ द कल्मिनेशन ऑफ़ द कॉम्प्लेक्स।
—डॉ. भगवतशरण उपाध्याय
यह कृति सिखाती है कि किस तरह कवि संवेदना में जनवादी और क्रान्तिकारी हो सकता है। यह काव्य स्वाद और आग एक साथ देता है। इस आग से रूपान्तरित व्यक्तित्व आदमी नहीं रहता, वह क्रान्ति का अस्त्र बन जाता है, जिसे इतिहास इस्तेमाल करता है।
—डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
शेषेन्द्र के काव्य में भारतीय आत्मा की लाक्षणिक अभिव्यक्ति है। इसकी बनावट बौद्धिक नहीं, हार्दिक और आत्मिक है। यह केवल मस्तिष्क को उत्तेजित करके नहीं छोड़ देता बल्कि एक गहितर वेदना और संवेदना से हमें भीतर ही भीतर गला देता है।
—वीरेन्द्र कुमार जैन
शेषेन्द्र तेलगू-काव्य के ही नहीं, बल्कि विश्व-काव्य के आशा-सूर्य हैं। कविता-रहस्य जितना वह जानते हैं, उतना अन्य आधुनिक कवि कम जानते हैं। श्रमिक-जीवन की भूमिका पर आधारित ‘मेरी धरती : मेरे लोग’ बीसवीं शती की जिह्वा और आगामी पीढ़ियों की हृदय-ध्वनि है। शेषेन्द्र वह कवि हैं जिसे राजेश्वर ने अपनी ‘काव्य-मीमांसा’ में इस तरह वर्णित किया है—वायं पताकामिव यस्य दृष्ट्वा जनः कवीनाम अनुपृष्ठ मेति।
—डॉ. सरगूकृष्ण मूर्ति
Hindi Ka Vishva Sandarbha
- Author Name:
Karunashankar Upadhyay
- Book Type:

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Description:
हिन्दी को वैश्विक सन्दर्भ प्रदान करने में विश्वभर में फैले हुए तीन करोड़ से ज़्यादा प्रवासी भारतीयों का विशेष प्रदेय है। वे हिन्दी के द्वारा अन्य भाषा-भाषियों के साथ सांस्कृतिक संवाद क़ायम करते हैं। आज हिन्दी विश्व के सभी महाद्वीपों तथा राष्ट्रों—जिनकी संख्या एक सौ चालीस से भी अधिक है—में किसी-न-किसी रूप में प्रयुक्त हो रही है। इस समय वह विश्व की तीन सबसे बड़ी भाषाओं में से है। वह विश्व के विराट फलक पर नवलचित्र के समान प्रकट हो रही है। वह बोलनेवालों की संख्या के आधार पर मन्दारिन (चीनी) के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है, जबकि वह जिन राष्ट्रों में प्रयुक्त हो रही है, उनके संख्या-बल की दृष्टि से वह अंग्रेज़ी के बाद दूसरे क्रमांक पर है।
हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य प्रदान करने में फ़िल्मों, पत्र-पत्रिकाओं, प्रकाशन संस्थानों, भारत सरकार के उपायों, उपग्रह चैनलों, विज्ञापन-एजेंसियों, बहुराष्ट्रीय निगमों, यांत्रिक सुविधाओं तथा शिक्षण प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से प्रशिक्षित पेशेवर मानव संसाधन का विशिष्ट अवदान रहा है। इसके अलावा उसमें विकसित विश्वस्तरीय साहित्य तथा साहित्यकारों का आधारभूत प्रदेय तो सर्वविदित है। ऐसी स्थिति में विश्व व्यवस्था को परिचालित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में प्रयुक्त होनेवाली विश्वभाषा के ठोस निकष एवं प्रतिमान पर हिन्दी का गहन परीक्षण सामयिक दौर की अपरिहार्य माँग है। इसी लक्ष्य को पाने तथा हिन्दी जगत को वैश्विक स्तर पर हिन्दी की शक्ति एवं सम्भावना से परिचित कराने के उद्देश्य को लेकर प्रस्तुत पुस्तक संकल्पित है।
यह पुस्तक विदेश यात्राओं से प्राप्त सूचना एवं अनुभव, अनवरत अध्ययन, भाषिक चिन्तन तथा हिन्दी के विकसनशील व्यक्तित्व के तमाम आयामों की वैचारिक फलश्रुति है जो ग्यारह अध्यायों में हिन्दी के विश्व सन्दर्भ के वस्तुनिष्ठ एवं तथ्यगत विश्लेषण के प्रयास की अभिव्यक्ति है। हमें विश्वास है कि यह पुस्तक हिन्दी जगत में आत्मविश्वास भरेगी और वह खुले मन से इस पुस्तक का स्वागत करेगा।
Sarkari Karalayo Mein Hindi Ka Prayog
- Author Name:
Gopinath Srivastav
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक ‘सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त लेखन और मुद्रण-फलक-शोधन पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। दूसरे भाग में परिशिष्ट है जिसमें दोषयुक्त और शुद्ध टिप्पणी के नमूने, विभिन्न प्रकार के प्रालेखों के नमूने, संक्षिप्त-लेखन के नमूने, मुद्रण-शोधन के नमूने, कतिपय प्रतिमित प्रालेख, प्रपत्र और सन्देश आदि दिए गए हैं। तीसरे भाग में सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिए गए हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पुस्तक उपयोगी और राजकीय कार्यों में हिन्दी की प्रगति बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
Dalit Yatharth Aur Hindi Kavita
- Author Name:
Deepak Kumar Pandey
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- Description: Awating description for this book
Hindi Kahani Ka Itihas : Vol. 3 (1976-2000)
- Author Name:
Gopal Ray
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Description:
गोपाल राय हिन्दी कथा साहित्य के प्रतिष्ठित विश्लेषक और प्रामाणिक इतिहासकार हैं। हिन्दी कहानी के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक पक्ष पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। 'हिन्दी कहानी का इतिहास' शीर्षक से ये उद्भव से लेकर अब तक की हिन्दी कहानी की रचना-यात्रा को लिपिबद्ध कर रहे हैं। इस पुस्तक के दो खंड प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत पुस्तक इसी महत्त्वपूर्ण योजना का तीसरा खंड है।
पहले खंड में 1900-1950 ई. तक की हिन्दी कहानी का इतिहास प्रस्तुत किया गया है। दूसरे खंड में 1951-1975 की हिन्दी कहानी का लेखा-जोखा है। इस तीसरे खंड में 1976 से 2000 के बीच विकसित हिन्दी कहानी का व्यवस्थित इतिहास है। लेखक के अनुसार, ‘इस अवधि में जो कहानी-साहित्य रचा गया, उसकी सीमाएँ तो हैं, पर उसका आलेखन और मूल्यांकन कम ज़रूरी नहीं है। इक्कीसवीं सदी में जो कहानी-साहित्य रचा जा रहा है, उसकी नींव के रूप में इसका विवेचन आवश्यक है।’
पुस्तक की ख़ास विशेषता यह भी है कि कहानी की सक्रियताओं के साथ लेखक ने उन विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्थितियों का भी विश्लेषण किया है। जिनका प्रभाव अनिवार्य रूप से रचनाशीलता पर पड़ता है, तथ्यों की प्रामाणिकता और प्रवृत्तियों के विश्लेषण की क्षमता इसे विशेष रूप से उल्लेखनीय कृति बनाती है।
हिन्दी कहानी के विकासेतिहास में रुचि रखनेवाले पाठकों, शोधार्थियों व लेखकों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण कृति।
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