Hindi Ghazal Ki Nayi Dishayen
(0)
Author:
Sardar MujavarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
495
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आज हिंदी कवियों का एक बड़ा वर्ग ग़ज़लों की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। अपनी संक्षिप्तता, गहराई और क्षिप्रता के कारण इस विधा ने हर किसी को अपनी ओर आकर्षित और प्रभावित किया है। एक विदेशी विधा होने के बावजूद ग़ज़ल भारत की आबोहवा, यहाँ के सांस्कृतिक वातावरण में पूरी तरह घुल-मिल गई है। हिंदुस्तान की मिट्टी में लगाया गया यह ईरानी पौधा आज एक दरख़्त बनकर फैल चुका है।</p> <p>‘हिंदी ग़ज़ल की नई दिशाएँ’ बीस आलेखों का संकलन है जो हिंदी की नई ग़ज़ल के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। हिंदी की नई ग़ज़ल क्या है? उसकी तासीर, उसका मिज़ाज क्या है? कौन-सी चुनौतियाँ और क्या-क्या संभावनाएँ उसके सामने हैं? उसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं और आज हिंदी ग़ज़ल किन दिशाओं की ओर अग्रसर है, इन तमाम सवालों का सटीक उत्तर देने की कोशिश इस पुस्तक में की गई है।
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आज हिंदी कवियों का एक बड़ा वर्ग ग़ज़लों की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। अपनी संक्षिप्तता, गहराई और क्षिप्रता के कारण इस विधा ने हर किसी को अपनी ओर आकर्षित और प्रभावित किया है। एक विदेशी विधा होने के बावजूद ग़ज़ल भारत की आबोहवा, यहाँ के सांस्कृतिक वातावरण में पूरी तरह घुल-मिल गई है। हिंदुस्तान की मिट्टी में लगाया गया यह ईरानी पौधा आज एक दरख़्त बनकर फैल चुका है।</p>
<p>‘हिंदी ग़ज़ल की नई दिशाएँ’ बीस आलेखों का संकलन है जो हिंदी की नई ग़ज़ल के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। हिंदी की नई ग़ज़ल क्या है? उसकी तासीर, उसका मिज़ाज क्या है? कौन-सी चुनौतियाँ और क्या-क्या संभावनाएँ उसके सामने हैं? उसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं और आज हिंदी ग़ज़ल किन दिशाओं की ओर अग्रसर है, इन तमाम सवालों का सटीक उत्तर देने की कोशिश इस पुस्तक में की गई है।
Book Details
-
ISBN9788171195299
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी में सर्जनात्मक काव्यालोचन का प्राय: अभाव रहा है, जिससे आलोचना की सर्जनात्मक मौलिकता अब तक स्थापित-प्रतिष्ठित नहीं हो पाई है। अभाव-रूपी इस अफाट सन्नाटे को भंग करनेवाली डॉ. ‘शीतांशु’ की यह पुस्तक ऐसी पहली सहृदय-संवेद्य, प्रगुणात्मक पुस्तक है, जिसमें लेखक ने 28 हिन्दी कविताओं के काव्यमर्म तथा अन्तर्न्यस्त साभिप्रायता को उद्घाटित-विवेचित किया है।
कविता का विवेचन उसकी सर्जनात्मक सार्थकता का विवेचन होता है। यह सार्थकता भावकीय प्रतिभा से कविता की कलावटी गाँठों को खोलते हुए उसके अर्थ-गह्वर में प्रवेश करने से सम्भव हो पाती है। हिन्दी काव्यालोचन अब तक अपनी लक्ष्मण-रेखा में घिरा रहा है। वह प्रवृत्तिगत, विकासात्मक, सैद्धान्तिक और वादारोपित बहस-मुबाहसे से ग्रस्त-सा है। मार्क्सवादी आलोचना को तो अपनी एकरसता में किसी भी कविता की आन्तर गहराई में उतरने से प्राय: परहेज़ ही रहा है, जिसके कारण कविता का भावन और बोधन केवल सामाजिक यथार्थ की अभिधेयात्मकता तक सीमित-प्रतिबन्धित रह गया है, जबकि उसमें अशेष प्रतीयमान, सर्जनात्मक साभिप्रायता विद्यमान होती है। यहाँ तक कि इसमें मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थ की अनेकानेक परतें भी समाविष्ट रहती हैं।
ऐसे में प्रतीयमान आभ्यन्तर को उद्घाटित करनेवाली यह वह प्रतीक्षित आलोचना-कृति है, जो स्थापित करती है कि कविता की सही पहचान-परख उसके तलान्वेषित कथ्यों और अर्थच्छवियों की बहुआयामिता पर निर्भर है।
कहना होगा कि कविताओं की साभिप्राय पुनस्सर्जना के माध्यम से काव्यलोचन के नए क्षितिज का सन्धान और दिशा-निर्देश करनेवाली यह पुस्तक अब तक की निर्धारित लक्ष्मण-रेखा के बाहर जाकर हिन्दी काव्यालोचन को समृद्ध करती है। साथ ही नई आलोचकीय प्रतिभाओं को इस दिशा में सक्रिय होने हेतु आमंत्रित भी करती है। हिन्दी आलोचना में कविता के पाठकों और आलोचकों को संवेदन-समृद्ध करनेवाली एक अत्यन्त उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक।
Savarkar Par Thope Huye Chaar Abhiyog
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Awating description for this book
Aadhunik Hindi Kavita
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Vishwanath Prasad Tiwari
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v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>प्रस्तुत पुस्तक में प्रसिद्ध कवि-आलोचक डॉ. विश्वनाथप्रसाद तिवारी ने आधुनिक हिन्दी कविता के तेरह प्रमुख कवियों—मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, हरिवंशराय बच्चन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, नरेन्द्र शर्मा और स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की कविताओं का विश्लेषण-मूल्यांकन किया है। उपर्युक्त कवियों के काव्य का यह अध्ययन अपने संक्षिप्त रूप में विराट विस्तार को समेटने वाला है। बूँद में समुद्र की तरह। यह उन कवियों की मुख्य काव्य-विशेषताओं को उद्घाटित करता है, साथ ही एक लम्बी कालावधि की काव्य प्रवृत्तियों को भी। पुस्तक में किसी प्रकार का पूर्वग्रह नहीं है, न उखाड़-पछाड़ वाली दृष्टि। लेखक ने पूरी तरह सन्तुलित-तटस्थ दृष्टि से सहृदयता के साथ कवियों के काव्यानुभव और उनकी काव्यभाषा की समीक्षा की है। अवश्य ही यह पुस्तक पाठकों का ध्यान सही निष्कर्षों की ओर आकृष्ट करेगी।</p> <p>इस पुस्तक से हिन्दी कविता के कुछ अत्यन्त विशिष्ट कवियों के माध्यम से कविता के एक महत्वपूर्ण युग की उपलब्धियों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलेगी। इसमें सन्देह नहीं कि आकार में यह लघु पुस्तक साहित्य के अध्येताओं के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।</p>
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