Yuddha Mein Ayodhya
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Book Details
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ISBN9789352667536
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Pages480
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Avg Reading Time16 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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अपने समय में कबीर जनमानस को समझा रहे थे कि पाहन पूजने वाली दुनिया अपने घर की चक्की नहीं पूजती, जिसका पीसा खाती है। तब से लेकर आज तक कबीर के शब्द भारतीय मानस में गूँज रहे हैं। फिर भी दुनिया का पागलपन पहले से ज्यादा बढ़ गया। हमारे समाज में ज्यों-ज्यों अंधविश्वास, मिथ्या आडंबर, रूढ़ियाँ और लंपटता बढ़ती जा रही है, त्यों-त्यों कबीर और अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। जिस संसार को कबीर ने ‘दुनिया ऐसी बावरी’ कहा था, उसमें अब चतुर्दिक्, झूठ का ही बोलबाला है। झूठ ने अपने मिथ्या प्रवाद से सच का मुँह बंद कर दिया है। पूरे संसार में लोकतांत्रिक-मूल्यों का क्षरण हो रहा है। पर आज उनके विपक्ष में खड़ा कबीर-जैसा कोई कवि नहीं है।
भारतीय समाज की बहुसंख्यक जनता कबीर की कृतज्ञ है कि उन्होंने अपनी कविता से हजारों सालों से लोगों के मन पर लदा शास्त्रों के बुद्धि-विलास, परंपरा की जड़ता, अंधविश्वास, अतार्किकता, रूढ़ियों और असत्य धारणाओं का जो बोझ था, उससे निर्भार कर दिया। कबीर ने जनता को शास्त्र नहीं, कविता से शिक्षित किया, साधुता को श्रम से जोड़ा और भिक्षा से मुक्त किया। हजारों वर्ष बीत गए, हमारा अभिजात वर्ग आज भी श्रम को हेय दृष्टि से देखता है। कबीर ने अपनी चादर खुद बुनी और सिद्ध कर दिया कि दूसरे की बुनी चादर ओढ़कर कबीर नहीं बना जा सकता।
‘कबीर का युगपथ’ पुस्तक का प्रणयन जयपाल सिंह ने इसी भाव से किया है। देश की अग्रणी पंक्ति के विद्वानों ने इसमें भागीदारी की है। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह से लेकर प्रो. ए. अरविन्दाक्षन जैसे दो दर्जन विद्वानों ने इस पुस्तक में अपने विचार प्रकट किए हैं। जयपाल ने इस पुस्तक के लिए अथक श्रम किया है, मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक कबीर के अध्येताओं और बृहत्तर भारतीय समाज में प्रशंसित होगी।
—दिनेश कुशवाहा, सुप्रसिद्ध कवि
Bhatkav ke 67 Varsh
- Author Name:
Satish Chandra Mittal
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत ग्रंथ ‘भटकाव के 67 वर्ष : कुछ मुद्दे’ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् से 2014 ई. तक की कुछ प्रमुख घटनाओं तथा राष्ट्रीय समस्याओं का ऐतिहासिक संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक विवेचन है। इसमें भारतीय नेतृत्व तथा उसके विभिन्न क्रियाकलापों का वर्णन तथा उनकी सोच तथा उनके व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है। ग्रंथ में कुछ प्रमुख मुद्दों की आलोचनात्मक समीक्षा की गई है। इसमें मजहब के आधार पर निर्मित भारत विभाजन से अपनी असीम पीड़ा तथा उससे उत्पन्न अनेक समस्याओं, भारतीय संस्कृति तथा अतीत से कटकर पाश्चात्य मॉडल पर आपा-धापा में बने भारतीय संविधान, भारतीय संविधान सभा में उस पर विशद विवाद तथा चर्चा, पाश्चात्य दृष्टि पर बनी शिक्षा-नीति, देशीय भाषा के स्थान पर अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व तथा पाठ्य पुस्तकों में विकृतियाँ, कश्मीर में की गई असभ्य भूलों के साथ, भारत-पाकिस्तान के चार प्रमुख युद्धों में भारतीय सेनाओं की शानदार विजयों के साथ, चीन के साथ युद्ध में शर्मनाक हार तथा भारतीय राजनीति के प्रमुख सूत्रों में भारतीय मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने की बजाय, चुनाव की वोट की राजनीति से वशीभूत हो, मुसलिम तुष्टीकरण की नीति तथा उसके विभिन्न स्वरूपों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। निश्चय ही यह ग्रंथ गत 67 वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में हुई हलचलों तथा भारत के राजनैतिक नेतृत्व के भटकाव, अलगाव, परस्पर टकराव तथा ठहराव की अनिर्णायक स्थिति की अवस्था, अवलोकन करने में सहायक होगा।
Premchand Ke Upanyason Mein Samkalinta
- Author Name:
Rajnikant
- Book Type:

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Description:
प्रेमचन्द के उपन्यासों में जिन राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आदि समस्याओं का चित्रण है, वे आज भी वर्तमान समाज में व्याप्त हैं। केवल उन समस्याओं के रूप या बाहरी मुखौटे मात्र बदल गए हैं, पर वास्तव में वे समस्याएँ आज भी मूल में वैसी ही हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में तीन खंड हैं। पहले खंड में उपन्यास के तत्त्वों का विवेचन हुआ है। इसके अन्तर्गत प्रधानत: कथानक पर प्रकाश डाला गया है इसके पश्चात् प्रथम खंड के दूसरे भाग में ‘प्रासंगिकता’ शब्द के तात्पर्य को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय खंड में प्रेमचन्द के सभी प्रमुख उपन्यासों का विवेचन किया गया है। इसके अन्तर्गत उन सभी उपन्यासों के ‘कथानक’ एवं ‘प्रासंगिकता’ का अध्ययन किया गया है।
तृतीय एवं अन्तिम खंड में प्रेमचन्द के सभी उपन्यासों की प्रासंगिकता का समग्र मूल्यांकन किया गया है।
Padmavat Ka Anushilan
- Author Name:
Indra Chandra Narang
- Book Type:

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Description:
पदमावत ने हमारे इतिहास वाड्मय को अत्यधिक प्रभावित किया है। पदमावत का अध्ययन उसके ऐतिहासिक आधार को टटोलते हुए किया गया है। पद्मावत का अनुशीलन पदमावत के ऐतिहासिक आधार', प्रकाशित होने पर संक्षिप्त संस्करण प्रकाशित करने की जरूरत महसूस हुई, जिससे जिन पाठकों को पूरी पदमावत पढ़ने का अवकाश नहीं है, वे भी इस अमर काव्य का रसास्वादन कर सकें। प्रस्तुत संग्रह उसी प्रयास का फल है। पदमावत का यह संक्षिप्त संग्रह प्रस्तुत करने में प्रयत्न किया गया है कि-
क. पदमावत के कथानक का सूत्र अटूट बना रहे.
ख. काव्य की दृष्टि से उत्कृष्ट सभी अंशों कासमावेश हो जाय,
ग. पदमावत के सभी पात्रों का चरित्र स्पष्ट हो जाय।
ठेठ अवधी भाषा के माधुर्य और भावों की गम्भीरता की दृष्टि से यह काव्य निराला है। इसके पठन-पाठन का मार्ग कठिनाइयों के कारण अब तक बन्द-सा रहा। एक तो इसकी भाषा पुरानी और ठेठ अवधी, दूसरे भाव भी गूढ़, अतः किसी शुद्ध अच्छे संस्करण के बिना इसके अध्ययन का प्रयास मुश्किल था। पदमावत का अनुशीलन पुस्तक इसी ओर एक प्रयास मात्र है।
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