Kavita Ke Teen Darvaje : Agyeya, Shamsher, Muktibodh
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Author:
Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग चार दशकों से नई कविता की अपनी बृहत्त्रयी अज्ञेय-शमशेर बहादुर सिंह-गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से गुनते-लिखते रहे हैं। उन्हें लगता रहा है कि हमारे समय की कविता के ये तीन दरवाज़े हैं जिनसे गुज़रने से आत्म, समय, समाज, भाषा आदि के तीन परस्पर जुड़े फिर भी स्वतंत्र दृश्यों, शैलियों और दृष्टियों तक पहुँचा जा सकता है। इस त्रयी का साक्षात्कार अपने समय की जटिल बहुलता, अपार सूक्ष्मता और उनकी परस्पर सम्बद्धता के रू-ब-रू होना है।</p> <p>तीन बड़े कवियों पर एक कवि-आलोचक की तरह अशोक वाजपेयी ने गहराई से लगातार विचार कर अपने आलोचना-कर्म को जो फोकस दिया है, वह आज के आलोचनात्मक दृश्य में उसकी नितान्त समसामयिकता से आक्रान्ति का सार्थक अतिक्रमण है।</p> <p>'बड़ा कवि द्वार के आगे और द्वार दिखता और कई बार हमें उसे अपने आप खोलने के लिए प्रेरित करता या उकसाता है', 'शमशेर की आवाज़ अनायक की है' और 'मुक्तिबोध भाषा से नहीं अन्तःकरण से कविता रचते हैं' जैसी स्थापनाएँ हिन्दी आलोचना में विचार/संवेदना और आस्वाद के नए द्वार खोलती हैं।
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कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग चार दशकों से नई कविता की अपनी बृहत्त्रयी अज्ञेय-शमशेर बहादुर सिंह-गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से गुनते-लिखते रहे हैं। उन्हें लगता रहा है कि हमारे समय की कविता के ये तीन दरवाज़े हैं जिनसे गुज़रने से आत्म, समय, समाज, भाषा आदि के तीन परस्पर जुड़े फिर भी स्वतंत्र दृश्यों, शैलियों और दृष्टियों तक पहुँचा जा सकता है। इस त्रयी का साक्षात्कार अपने समय की जटिल बहुलता, अपार सूक्ष्मता और उनकी परस्पर सम्बद्धता के रू-ब-रू होना है।</p>
<p>तीन बड़े कवियों पर एक कवि-आलोचक की तरह अशोक वाजपेयी ने गहराई से लगातार विचार कर अपने आलोचना-कर्म को जो फोकस दिया है, वह आज के आलोचनात्मक दृश्य में उसकी नितान्त समसामयिकता से आक्रान्ति का सार्थक अतिक्रमण है।</p>
<p>'बड़ा कवि द्वार के आगे और द्वार दिखता और कई बार हमें उसे अपने आप खोलने के लिए प्रेरित करता या उकसाता है', 'शमशेर की आवाज़ अनायक की है' और 'मुक्तिबोध भाषा से नहीं अन्तःकरण से कविता रचते हैं' जैसी स्थापनाएँ हिन्दी आलोचना में विचार/संवेदना और आस्वाद के नए द्वार खोलती हैं।
Book Details
-
ISBN9788126728138
-
Pages316
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘आलोचना और विचारधारा’ डॉ. नामवर सिंह के व्याख्यानों का संग्रह है। इन व्याख्यानों के केन्द्र में ‘आलोचना’ है। संकलित 22 व्याख्यान किसी निश्चित परियोजना के तहत नहीं दिए गए हैं। इसीलिए इनमें कोई पूर्व निश्चित सिलसिला नहीं है। इन व्याख्यानों का समय भी दो दशक से अधिक तक फैला हुआ है। बावजूद इसके इनमें एक आन्तरिक एकता और सुसम्बद्धता है।
नामवर जी के व्याख्यानों की यह दूसरी पुस्तक है। ये व्याख्यान नामवर जी के उत्तरवर्ती समय की वैचारिकता की स्पष्ट झलक देते हैं। पूर्ववर्ती लेखन में वैचारिक संघर्ष के क्रम में समय-समय पर वे ‘आलोचना’ के बारे में अपनी राय रखते रहे, परन्तु आलोचना में स्वीकृत अवधारणाओं की विस्तृत समीक्षा करने और हिन्दी आलोचना की पूरी परम्परा पर एक साथ विचार करने के अवसर कम ही आए। इन व्याख्यानों में व्यक्त विचार वस्तुतः नामवर जी के सम्पूर्ण रचनात्मक जीवन के सार की तरह देखे जा सकते हैं। यह एक तरह से ‘मधु कोष’ है।
पुस्तक चार खंडों में बँटी हुई है। पहले खंड में संकलित दोनों व्याख्यान ‘नामवर के निमित्त’ के कार्यक्रमों में दिए गए थे। इधर के वर्षों में एक आलोचक के रूप में उनकी सभी प्रमुख चिन्ताएँ यहाँ एक साथ मौजूद हैं। दूसरे खंड के व्याख्यान नामवर जी की आलोचना की मूल दृष्टि को स्पष्ट करने में मदद करते हैं। इनका परिप्रेक्ष्य स्पष्टतः वैचारिक और अवधारणात्मक है।
तीसरे खंड के व्याख्यानों का सम्बन्ध हिन्दी की आलोचना विशेषतः उसके समकालीन परिदृश्य से है। आलोचना के समक्ष मौजूद संकटों को पहचानने की कोशिश करते ये व्याख्यान ज़रूरी विवादों के परिप्रेक्ष्य में अपना पक्ष मज़बूती से रखते हैं। चौथे खंड में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और राहुल सांकृत्यायन पर केन्द्रित व्याख्यान हैं। आचार्य द्विवेदी पर एक शृंखला में दिए गए तीन व्याख्यानों में पहली बार उनकी रचनात्मकता की विशिष्टता का प्रकटन होता है।
नामवर जी की परवर्ती आलोचना में राहुल सांकृत्यायन के विचारों की एक अनुगूँज सुनी जा सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा से संस्कृति सम्बन्धी विवादों का एक सिरा यहाँ तक भी जाता हुआ, स्पष्टतः देखा जा सकता है।
Bhasha-Vigyan Ka Rasayan
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘भाषा-विज्ञान का रसायन’ अखिल देशीय स्तर के पाठक्रम अर्थात् जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, इलाहाबाद, अलीगढ़, लखनऊ, अवध, कानपुर, आगरा, पूर्वांचल, गोरखपुर, सागर, रीवा, जबलपुर, जयपुर, पूना, मुम्बई, नागपुर, पटना, राँची, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ तथा विश्वभारती, शान्तिनिकेतन आदि विश्वविद्यालयों के बी.ए., (हिन्दी तथा संस्कृत) एम.ए. (हिन्दी तथा संस्कृत) के सम्पूर्ण पाठ्यक्रमों को अपने भीतर मुकम्मल रूप में तो समेटती ही है, हर प्रान्त की हिन्दी माध्यम की पीसीएस, आईएएस तथा यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा सन् 2004 से अखिल भारतीय स्तर पर बदले गए नए पाठ्यक्रमों नेट, स्लेट आदि को भी अपने में समाहित कर भाषा-विज्ञान में अपनी प्रकृति की पुस्तकों में गम्भीर पुस्तक बन गई है।
पुस्तक की भाषा जीवन्त, शैली सजीव और तथ्य प्रामाणिक तथा ज़मीनी हैं। इस कृति की शैली निजी तथा भिन्न है। लेखक तथ्यों को करीने से सिलसिलेवार उठाते हैं, उन्हें पता है कहाँ क्या देना है, उन्हें यह भी पता है कि ज़रा-सी चूक पठनीयता की हत्या कर देगी। इतने जटिल विषय और उसके रोएँ-रेशे को नितान्त सरल भाषा, मोहक शैली, आत्मीय टोन और लय में बिना किसी रूमानी अतिरंजना, उग्रता को प्रस्तुत करनेवाली इतनी सुघर और बढ़िया पुस्तकें कम हैं। कुल मिलाकर अपने ढंग का रचनात्मक स्वाद देनेवाली यह ठोस और सार्थक कृति है।
Ekta Ki Brahmmurti Sardar Vallabhbhai Patel
- Author Name:
Baldev Vanshi
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- Description: सरदार वल्लभभाई पटेल को पहले से जानता था। जब वह भारतीय संविधान परिषद् के सदस्य थे तो मेरा उनसे परिचय बढ़ गया। वहाँ दिए हुए उनके भाषणों को मुझे अच्छी तरह स्मरण है। उनकी वाणी राष्ट्र की आवाज होती थी, जिसके संबंध में न तो कोई अशुद्धि कर सकता था और न भ्रांति हो सकती थी। जब वह बंबई के बिड़ला भवन में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे तो मुझे स्मरण है कि मैं सोवियत संघ जाते समय उनसे विदा लेने गया था। उन्होंने मुझे चेतावनी दी थी कि यह कार्य बड़े-बड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों को असफलता दे चुका है, किंतु साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ‘‘जहाँ अन्य व्यक्ति असफल हो चुके हैं, वहाँ आप सफल होंगे।’’ वास्तव में सरदार के उक्त शब्द मास्को में मेरे राजदूत काल भर मेरी स्मृति में रहे। मैं आपको यह बतला रहा हूँ कि वह किस प्रकार परिस्थिति के निर्णायक, भावी रूप के विधाता तथा सुदूर भविष्य को ठीक-ठीक देख लेने की क्षमता रखते थे। जब तक वर्तमान भारत जीवित है, उनका नाम वर्तमान भारत के ऐसे राष्ट्र-निर्माता के रूप में सदा स्मरण किया जाता रहेगा, जिन्होंने 600 भारतीय देशी राज्यों का एकमात्र संघ बनाया। उनका यह कार्य हमारे देश के एकीकरण की दिशा में अत्यधिक स्थायी कार्य था। इस विषय में उनके कार्य को हम कभी नहीं भूल सकते। जैसा कि मैंने कहा है, जब तक भारत जीवित है, वर्तमान भारत के निर्माता के रूप में उनका नाम सदा स्मरण किया जाता रहेगा। —आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री की पुस्तक ‘राष्ट्रनिर्माता सरदार पटेल’ से
Chakradhar Ki Sahitya dhara
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- Description: Awating description for this book
Rasraaj Virodh
- Author Name:
Rameshraaj
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- Description: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं - ‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है। ‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था। आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामर्थ्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120] अस्तु! नये काव्यरस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है।
Meera Ka Jeevan
- Author Name:
Arvind Singh Tejawat
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Description:
मीराँ के जीवन में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए यह पुस्तक न केवल मीराँ की एक प्रामाणिक जीवनी है वरन् यह जीवनी इतिहास-दृष्टि से परिपूर्ण एवं महत्त्वपूर्ण शोध निष्कर्षों का समन्वित परिणाम है।
यह पुस्तक बताती है कि मीराँ के लिए कृष्ण भक्ति एक साधन थी न कि साध्य। कृष्ण भक्ति का सहारा लेकर मीराँ ने मध्यकालीन सामन्ती समाज में व्याप्त सती-प्रथा जैसी तमाम सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया एवं स्त्री-स्वतंत्रता के पक्ष में विद्रोह का स्वर बुलन्द किया।
यह पुस्तक ब्राह्मण कथाकारों एवं परवर्ती आलोचकों द्वारा निर्मित मीराँ की उस पारम्परिक छवि को तोड़ती है जो उसे केवल प्रेम-दीवानी कवयित्री की परिधि में सीमित कर देना चाहते थे। निश्चय ही, मीराँ को समग्र रूप से समझने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी।
Aaj Ki Kahani
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
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Description:
आज की कहानी अगर रचना और आलोचना, दोनों को एक नई प्राण-प्रतिष्ठा देती जान पड़े तो आश्चर्य नहीं। ज़हीन, संवेदनशील और जागरूक कथाशिल्पी विजयमोहन सिंह ने यहाँ जिस लगाव और शिद्दत के साथ शब्दों के अर्थ और अर्थ के सन्दर्भों की तलाश की है, यह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रामाणिकता, प्रासंगिकता, भोगा हुआ यथार्थ, रूमानीपन, फ़ैंटेसी और रूपक जैसे तमाम शब्द रोज़मर्रा आलोचना में निरर्थक ढंग से फेंके जाते रहे हैं। पर हिन्दी के कथा-साहित्य और उससे जुड़े हमारे देश-काल के व्यापक बुनियादी सवालों से मुठभेड़ होने पर वे यहाँ कुछ और ही रंग-रूप में सामने आते हैं। शिल्प, कला-रूपों, जीवन-दर्शनों की इस गम्भीर, दायित्वपूर्ण लेकिन जानदार पड़ताल में विजयमोहन सिंह की मूलतः मार्क्सवादी दृष्टि कठमुल्लापन, खेमाबंदी या सरलीकृत वर्गीकरण की धुंध से मुक्त है। इसलिए इन समीक्षात्मक निबन्धों को भी किसी बने-बनाए खाँचे में रखना मुश्किल है।
तिलमिला देने की हद तक तीखी यह उधेड़बुन नुस्ख़ों, नक़्क़ाल मूढ़ताओं, भोथरे इकहरेपनों, अतिनाटकीयताओं और छद्म गम्भीरताओं पर भारी पड़ती है। यह बेलौसपन अपने समय की सच्चाई को जीने की ईमानदार कोशिश है, और जहाँ भी लेखक को कुछ मूल्यवान लगा है, उसे रेखांकित करने में संकोच नहीं है।
एक तरह से यह हिन्दी कहानी की वर्णमाला है : प्रेमचन्द से लेकर ‘नई कहानी’, ‘अ-कहानी’ और ‘साठोत्तरी कहानी’ तक का परिदृश्य। एक ऐसा परिदृश्य, जिसमें उपस्थित-अनुपस्थित, प्रिय या अप्रिय महत्त्वपूर्ण कथाकार कहीं-न-कहीं एक-दूसरे से, अपने समय और परम्परा से, भाषा-रचना-अभिव्यक्ति-चिन्तन के धरातल पर टकराते हैं, जुड़ते-टूटते हैं। इन सम्बन्ध-सूत्रों की बारीकियाँ, और नितान्त नए कोणों से कृती और कृतित्व को परखने की कसौटियाँ आज की कहानी में मिलेंगी। उम्मीद शायद ग़लत न हो कि इससे केवल विवाद की नहीं, एक नए संवाद की भी शुरुआत होगी।
—गिरधर राठी
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