Kavita Ke Teen Darvaje : Agyeya, Shamsher, Muktibodh
Author:
Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Unavailable
कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग चार दशकों से नई कविता की अपनी बृहत्त्रयी अज्ञेय-शमशेर बहादुर सिंह-गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से गुनते-लिखते रहे हैं। उन्हें लगता रहा है कि हमारे समय की कविता के ये तीन दरवाज़े हैं जिनसे गुज़रने से आत्म, समय, समाज, भाषा आदि के तीन परस्पर जुड़े फिर भी स्वतंत्र दृश्यों, शैलियों और दृष्टियों तक पहुँचा जा सकता है। इस त्रयी का साक्षात्कार अपने समय की जटिल बहुलता, अपार सूक्ष्मता और उनकी परस्पर सम्बद्धता के रू-ब-रू होना है।</p>
<p>तीन बड़े कवियों पर एक कवि-आलोचक की तरह अशोक वाजपेयी ने गहराई से लगातार विचार कर अपने आलोचना-कर्म को जो फोकस दिया है, वह आज के आलोचनात्मक दृश्य में उसकी नितान्त समसामयिकता से आक्रान्ति का सार्थक अतिक्रमण है।</p>
<p>'बड़ा कवि द्वार के आगे और द्वार दिखता और कई बार हमें उसे अपने आप खोलने के लिए प्रेरित करता या उकसाता है', 'शमशेर की आवाज़ अनायक की है' और 'मुक्तिबोध भाषा से नहीं अन्तःकरण से कविता रचते हैं' जैसी स्थापनाएँ हिन्दी आलोचना में विचार/संवेदना और आस्वाद के नए द्वार खोलती हैं।
ISBN: 9788126728138
Pages: 316
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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भक्ति आन्दोलन का प्रसार और विकास क्षेत्रीय-प्रान्तीय और अखिल भारतीय दोनों स्तरों पर हुआ। उसके क्षेत्रीय और प्रान्तीय रूप एक समान नहीं हैं। उनके देश-काल, धर्म-संस्कृति, भाषा में अन्तर अवश्य है। यहाँ तक कि उनके विकास के स्वरूप में भी अन्तर है। बावजूद इसके इन क्षेत्रीय और प्रान्तीय रूपों में एक अन्तर्सूत्र मौजूद है और वह अन्तर्सूत्र है भक्ति। वह सारे क्षेत्रीय-प्रान्तीय भक्ति आन्दोलन को जोड़कर रखती है। यही कारण है कि भक्ति आन्दोलन के अखिल भारतीय रूप और उसकी सामान्य विशेषता को जानने-समझने के लिए उसके क्षेत्रीय-प्रान्तीय रूपों का ध्यान रखना जरूरी है। इसी प्रकार क्षेत्रीय-प्रान्तीय रूपों की विशिष्टता को पहचानने के लिए उन्हें अखिल भारतीय भक्ति आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की जरूरत है।
असम के वैष्णव भक्ति आन्दोलन के प्रवेश द्वार शंकरदेव हैं। इसलिए उनसे और उनके जीवन कर्म एवं उनकी वैष्णव भक्ति से गुजरे बगैर असम के भक्ति आन्दोलन और भक्ति कविता को ठीक से नहीं समझा जा सकता है।
Samkaleen Kavya Yatra
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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मुक्तिबोध ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में कहा है : ‘नहीं होती, कहीं भी खतम कविता नहीं होती/कि वह आवेग-त्वरिता काल-यात्री है।’ इसका एक प्रमाण यह भी है कि आधुनिक हिन्दी कविता अज्ञेय और स्वयं मुक्तिबोध के साथ ही समाप्त नहीं हो जाती और काल के साथ वेग से उसकी यात्रा जारी रहती है। जिस कवि की रचना का स्रोत उसका अपना जीवन होता है, उसका एक न एक दिन चुकना तय है, लेकिन जो कविता इतिहासाश्रित होती है, उसका प्रवाह अजस्र रहता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इतिहास केवल काल-बोध नहीं, देश-बोध भी है। प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के सुपरिचित आलोचक डॉ. नंदकिशोर नवल ने विजयदेव नारायण साही से लेकर धूमिल तक की कविता का गहन, विशद और वस्तुपरक अध्ययन कर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक हिन्दी कविता न केवल निरन्तर गतिशील है, बल्कि वह विकासशील भी है।
अज्ञेय-मुक्तिबोध-परवर्ती इस कविता की विशेषता यह है कि यह बहुआयामी और बहुवर्णी है, जिस कारण इसका अध्ययन जनवादिता अथवा कलावादिता की किसी संकीर्ण कसौटी पर नहीं हो सकता। नवल जी ने इन दोनों कसौटियों को अपर्याप्त मानकर सर्वप्रथम उस प्रतिमान पर प्रत्येक कवि की परीक्षा की है, जो उसकी कविता से प्राप्त होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्होंने अपने मूल मानववादी दृष्टि को छोड़ दिया है। वस्तुतः इस दृष्टि में जन और कला दोनों की स्वीकृति है, पर वह इन दोनों की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती है।
इस अध्ययन और मूल्यांकन का निष्कर्ष यह है कि हिन्दी कविता बड़े पेचीदे ढंग से कल्पना से यथार्थ की ओर, व्यक्ति से समय की ओर और असाधारण से साधारण की ओर विकसित हुई है। ‘समकालीन काव्य-यात्रा’ पाठकों के बीच लोकप्रियता प्राप्त कर अब संशोधित और परिष्कृत रूप में सामने आ रही है। निश्चय ही यह पुस्तक नवल जी के आलोचनात्मक लेखन की ही नहीं, समकालीन काव्यालोचन की भी एक उपलब्धि है।
Aalochkatha
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

- Description: हिन्दी में आत्म-वृत्त कम हैं। इधर तो कहना चाहिए, उनका चलन कम ही हुआ है। सामाजिक शिष्टाचार और दबावों के कारण गोपन और संकोच की बढ़ती मनोवृत्ति शायद इसका एक कारण हो। ऐसे में 'आलोचकथा' का अपेक्षया नया विधान पाठकों का ध्यान सहज ही आकर्षित करेगा। यों तो क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, इसकी चिन्ता लेखक-मात्र को होती है पर आत्मकथा में यह समस्या कुछ और प्रबल हो उठती है। इस सामान्य लेखकीय समस्या का मूल स्रोत वस्तुत: भाषा की अपनी प्रकृति में ही अंतर्निहित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कहती भी है और छिपाती भी है, प्रकट भी करती है, छलती भी है। तब भाषा में ही सक्रिय रहनेवाले रचनाकार को यह कला सहज ही आ भी जानी चाहिए। 'आलोचकथा' से तो इसका प्रमाण और मिलना चाहिए, क्योंकि इसके लेखक का मुख्य कार्यक्षेत्र भाषा और संवेदना की अंतर्क्रिया के प्रदेशों में रहा है। यों, 'आलोचकथा' अकाल्पनिक गद्य को सम्पूर्ण रूप में बरतती है, जहाँ आत्मकथा-संस्मरण-रेखाचित्र-जर्नल-आलोचना के विविध रूप एक-दूसरे में घुलमिल गए हैं। तब रचना के इन दोनों स्तरों पर 'आलोचकथा' का वैशिष्ट्य पाठक प्रीतिकर रूप में अनुभव कर सकेगा।
Hindi Ki Jatiya Sanskriti Aur Aupniveshikta
- Author Name:
Rajkumar
- Book Type:

- Description: हिन्दी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता एक ऐसा विषय है जिस पर लगातार कई दृष्टियों से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि ऐसे वैचारिक अनुसन्धान से ही हम उन कई प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं जो हमें बेचैन किए रहते हैं। हिन्दी में बार-बार व्याप रही विस्मृति, जातीय स्मृति की अनुपस्थिति आदि ऐसे कई पक्ष हैं जो आलोचना के ध्यान में बराबर रहने चाहिए। डॉ. राजकुमार की यह नई पुस्तक ऐसे आलोचनात्मक उद्यम की ही उपज है और हम उसे सहर्ष प्रकाशित कर रहे हैं।
Aadhunik Hindi Kavya Aur Puran Katha
- Author Name:
Malti Singh
- Book Type:

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प्राचीनता पुराणों का गुण है, लेकिन वे नव्या, नूतन और नवीन भी हैं। अमरकोशकार ने इनकी इस विशेषता की ओर संकेत किया है—प्रत्यग्रोऽभिनवो नव्यो नवीनो नूतनो नवः। इस दि्-आयामी विशेषता के कारण पुराणकथाएँ प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक साहित्य की उपजीव्य बनती रही हैं।
आधुनिक हिन्दी-काव्य में भारतेन्दु युग से लेकर अब तक पुराणकथाओं के प्रयोग की विस्तृत, विविध एवं अविछिन्न परम्परा प्राप्त होती है। विशेष बात यह है कि आधुनिक हिन्दी-काव्य में प्रयुक्त पुराणकथाएँ, पुराण निर्दिष्ट आशय से भिन्न, परिवर्तित होती हुई काव्य-चेतना के परिप्रेक्ष्य में नवीन भावों से अनुवेशित होकर नितान्त नवीन सन्दर्भों की सृष्टि करती हैं।
भारतीय जनता की स्वातंत्र्य-चेतना एवं जीवित जोश को अभिव्यक्ति के लिए पौराणिक कथा-प्रसंगों एवं पत्रों का उपयोग भारतेन्दुयुगीन एवं द्विवेदीयुगीन कवियों की विवशता बन गई थी। छायावादी सूक्ष्म भावानुभूती एवं विचारानुभूती की अभिव्यक्ति के लिए पौराणिक कथाएँ सशक्त माध्यम सिद्ध होती हैं। भौतिक यथार्थवाद को स्वीकृति प्रदान करनेवाले प्रगतिवादी कवियों ने भी पुराणिक प्रतीकों का प्रयोग ख़ूब किया है।
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