Sarkari Karalayo Mein Hindi Ka Prayog
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Author:
Gopinath SrivastavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
600
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Available
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प्रस्तुत पुस्तक ‘सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त लेखन और मुद्रण-फलक-शोधन पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। दूसरे भाग में परिशिष्ट है जिसमें दोषयुक्त और शुद्ध टिप्पणी के नमूने, विभिन्न प्रकार के प्रालेखों के नमूने, संक्षिप्त-लेखन के नमूने, मुद्रण-शोधन के नमूने, कतिपय प्रतिमित प्रालेख, प्रपत्र और सन्देश आदि दिए गए हैं। तीसरे भाग में सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिए गए हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पुस्तक उपयोगी और राजकीय कार्यों में हिन्दी की प्रगति बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
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प्रस्तुत पुस्तक ‘सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त लेखन और मुद्रण-फलक-शोधन पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। दूसरे भाग में परिशिष्ट है जिसमें दोषयुक्त और शुद्ध टिप्पणी के नमूने, विभिन्न प्रकार के प्रालेखों के नमूने, संक्षिप्त-लेखन के नमूने, मुद्रण-शोधन के नमूने, कतिपय प्रतिमित प्रालेख, प्रपत्र और सन्देश आदि दिए गए हैं। तीसरे भाग में सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिए गए हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पुस्तक उपयोगी और राजकीय कार्यों में हिन्दी की प्रगति बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
Book Details
-
ISBN9788180310744
-
Pages250
-
Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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श्याम मनोहर पाण्डेय की महत्त्वपूर्ण कृति है—‘मध्ययुगीन-प्रेमाख्यान’। जिस समय इस पुस्तक का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था, उस समय दाऊद कृत ‘चंदायन’, कुतुबन कृत ‘मृगावती’, ‘कदमराव पदम’ तथा कतिपय अन्य सूफ़ी प्रेमाख्यान प्रकाशित नहीं थे। असूफ़ी प्रेमाख्यानों में दयाल कवि कृत ‘शशिमाला कथा’, पुहुकर कृत ‘रसरतन’ आदि ग्रन्थ अप्रकाशित थे। प्रस्तुत संस्करण में इन सबका उपयोग कर लिया गया है। अवधी के विकास में सूफ़ियों ने क्या योगदान किया है, इस सम्बन्ध में इस संस्करण में अधिक विस्तार से विचार किया गया है। पुस्तक के अन्त में एक विशद् ग्रन्थ-सूची भी जोड़ दी गई है, जिससे सूफ़ी तथा असूफ़ी साहित्य के अनुसन्धानकर्ताओं को सुविधा हो सके।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के शब्दों में, “डॉ. पाण्डेय ने अपने अनुसन्धान का काम बड़े परिश्रम के साथ किया है और उसे उपयुक्त रूप प्रदान करने की सफल चेष्टा भी की है। उन्होंने उसके महत्त्वपूर्ण विषय का अध्ययन करते समय यथासम्भव मूल फ़ारसी ग्रन्थों का उपयोग किया है तथा भरसक इस बात की भी चेष्टा की गई है कि कोई बात भ्रमात्मक न रह जाए। जहाँ तक पता है, इस विषय पर अभी तक कोई शोध-कार्य नहीं किया गया था और न इतने सम्यक् रूप में विचार करके उसका परिणाम प्रस्तुत किया गया था। यह पुस्तक इस दृष्टि से एक नवीन प्रयास है और इसके साथ-साथ अपने ढंग से एक आदर्श उपस्थित करती है।”
डॉ. पाण्डेय ने समस्त मूल स्रोतों का मन्थन करके जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे महत्त्वपूर्ण हैं। इन निष्कर्षों के सहारे सूफ़ी एवं असूफ़ी प्रेमाख्यानों के अध्ययन के सम्बन्ध में रुचि-सम्पन्न पाठकों को एक नया एवं अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है।जैसा कि डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का कथन है, “डॉ. पाण्डेय का यह शोध-ग्रन्थ प्रथम कोटि का है। इसमें डॉ. पाण्डेय ने अन्य सम्बन्धित सामग्री के साथ संस्कृत एवं फ़ारसी में प्राप्त सामग्री का भी पूरी तरह उपयोग किया है। फलतः उनके निष्कर्ष बड़े मूल्यवान हैं। निश्चित रूप से यह हिन्दी साहित्य को डॉ. पाण्डेय की महत्त्वपूर्ण देन हैं।”
Nirala Kavya ki Chhaviyan
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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निराला आज खड़ी बोली के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में मान्य हैं, लेकिन इस मान्यता तक उनके पहुँचने की भी एक कहानी है—संघर्षपूर्ण। उन्होंने एक तरफ़ कविता को मुक्त किया और दूसरी तरफ़ उसमें ऐसे अनुशासन की माँग थी, जिसकी पूर्ति बहुत थोड़े कवि कर सकते हैं। उनकी विशेषता यह है कि प्रचंड भावुक होते हुए भी वे एक विचारवान कवि थे और उनकी विचारशीलता स्थिर न होकर अपनी जटिलता में भी गतिशील थी। वे वस्तुतः भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन की देन थे, लेकिन उनकी स्वाधीनता की धारणा अपने समकालीन कवियों से बहुत आगे ही नहीं थी, बल्कि क्रान्तिकार थी। यही कारण है कि वे नई पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक बने हुए हैं। ‘निराला-काव्य की छवियाँ’ नामक इस पुस्तक का पहला खंड इन तमाम बातों का विश्लेषणपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता
है।दूसरा खंड निराला की कुछ पूर्ववर्ती और परवर्ती चुनी हुई कविताओं की पाठ-केन्द्रित आलोचना से सम्बन्धित है। ‘प्रेयसी’, ‘राम की शक्ति-पूजा’, ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वन-बेला’ और ‘हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र’ निराला की ऐसी कविताएँ हैं, जो उनके पूर्ववर्ती काव्य के विषय-वैविध्य को दर्शाती हैं। यहाँ उनकी व्याख्या के प्रसंग में उनकी अखंडता को ध्यान में रखते हुए उन्हें परत-दर-परत उधेड़कर देखने का प्रयास किया गया है। पुस्तक के दूसरे खंड की अप्रतिम विशेषता यह है कि इसमें कदाचित् पहली बार निराला के परवर्ती काव्य का मार्क्सवाद और हिन्दी प्रदेश के कृषक-समाज से सम्बन्ध पूर्वग्रहमुक्त होकर निरूपित किया गया है। जैसे ‘सुमनों के प्रति पत्र’ निराला की पूर्ववर्ती आत्मपरक सृष्टि है, वैसे ही ‘पत्रोकंठित जीवन’ उनकी परवर्ती आत्मपरक सृष्टि। निराला-काव्य के अध्येता डॉ. नंदकिशोर नवल ने, जो निराला रचनावली के सम्पादक भी हैं; प्रस्तुत पुस्तक में निस्सन्देह निराला के काव्य-लोक की बहुत ही भव्य फलक दिखलाई है।
Anviti - Khand : 2
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

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Description:
कुँवर नारायण हमारे समय के बड़े कवि हैं। यदि विश्व के कुछ चुनिन्दा कवियों की तालिका बनाई जाए तो उसमें निस्सन्देह उनका स्थान होगा। वे आधुनिक बोध और संवेदना के उन कवियों में हैं जिन्होंने सदैव कविता को मनुष्यता के आभरण के रूप में लिया है।
कुँवर नारायण का काव्य मानवीय गुणों का ही नहीं, मानवीय संस्कारों का काव्य है। कविता में उनका प्रवेश चक्रव्यूह से हुआ। अपने गठन में कलात्मक किन्तु दार्शनिक प्रतीतियों वाले इस संग्रह में जीवन की पेचीदगियों को कवि ने सलीक़े से उठाया है। ‘आत्मजयी’ की लगभग अधसदी के बाद ‘वाजश्रवा के बहाने’ की रचना बतौर कुँवर नारायण यह भी जताने के लिए है कि यदि ‘आत्मजयी’ में मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो ‘वाजश्रवा के बहाने’ में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है। उनके इस कथन को हम इस रोशनी में देख सकते हैं कि सारा कुछ हमारे देखने के तरीक़े पर निर्भर है—कुछ ऐसे कि यह जीवन विवेक भी एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो।
उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है। अनेक शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण का कृतित्व बहुवस्तुस्पर्शी है। वर्ष 2002 से पहले तक उनके व्यक्तित्व एवं कृतियों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेख ‘उपस्थिति’ नामक संचयन में समाविष्ट हैं। उसके पश्चात् लिखे निबन्धों का यह संकलन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का चयन है। इसमें हाल की कुछ प्रकाशित कृतियों को छोड़कर बाक़ी कृतियों पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है जो उपस्थिति में सम्मिलित नहीं हैं। अधिकांश लेख 2015 तक के हैं जब कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘कुमारजीव’ प्रकाशित हुआ।
आशा है, पाठकों को ये दोनों खंड उपयोगी और प्रासंगिक लगेंगे तथा कुँवर नारायण के साहित्य के प्रति रुचि विकसित करेंगे।
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