Bharat Ke Chakravarti Samrat
(0)
Author:
Devraj Singh JadaunPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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"यह पुस्तक विशेष रूप से भारत के चक्रवती सम्राटों पर है। विषय की व्यापकता को ध्यान में रखकर अत्यंत प्राचीनकाल से आरंभ कर पांडववंशी जनमेजय तक के चक्रवर्तियों को ही विषय-वस्तु में सम्मिलित किया गया है। भारत की नई पीढ़ी इस इतिहास से प्रायः अनभिज्ञ है। इतना ही नहीं, वह अपने भारतीय ज्ञान-संपदा के ग्रंथों से भी अनभिज्ञ है। उसको इस इतिहास, भारत की सार्वभौमिकता, दर्शन, संस्कृत वाङ्मय, आर्ष साहित्य आदि से परिचय कराना हमारा दायित्व है। भारत निर्माता संतों, ऋषियों, मुनियों, आविष्कारकों व विदुषी वेदज्ञ मातृशक्ति से परिचय हमारे गौरवबोध को जाग्रत् करेगा। संपूर्ण पृथ्वी पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का संदेश 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' लेकर, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का विचार लेकर, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का मंत्र लेकर, 'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः' का आचरण लेकर तथा 'राष्ट्र सर्वोपरि' की दृष्टि लेकर जो लोग चले, जिनमें बड़े-बड़े राजपरिवार तथा व्यापारी व समाज-सुधारक शामिल हैं; उनसे आज की पीढ़ी परिचित हो, इस हेतु से प्रस्तुत पुस्तक का सृजन हुआ है।"
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"यह पुस्तक विशेष रूप से भारत के चक्रवती सम्राटों पर है। विषय की व्यापकता को ध्यान में रखकर अत्यंत प्राचीनकाल से आरंभ कर पांडववंशी जनमेजय तक के चक्रवर्तियों को ही विषय-वस्तु में सम्मिलित किया गया है।
भारत की नई पीढ़ी इस इतिहास से प्रायः अनभिज्ञ है। इतना ही नहीं, वह अपने भारतीय ज्ञान-संपदा के ग्रंथों से भी अनभिज्ञ है। उसको इस इतिहास, भारत की सार्वभौमिकता, दर्शन, संस्कृत वाङ्मय, आर्ष साहित्य आदि से परिचय कराना हमारा दायित्व है। भारत निर्माता संतों, ऋषियों, मुनियों, आविष्कारकों व विदुषी वेदज्ञ मातृशक्ति से परिचय हमारे गौरवबोध को जाग्रत् करेगा।
संपूर्ण पृथ्वी पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का संदेश 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' लेकर, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का विचार लेकर, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का मंत्र लेकर, 'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः' का आचरण लेकर तथा 'राष्ट्र सर्वोपरि' की दृष्टि लेकर जो लोग चले, जिनमें बड़े-बड़े राजपरिवार तथा व्यापारी व समाज-सुधारक शामिल हैं; उनसे आज की पीढ़ी परिचित हो, इस हेतु से प्रस्तुत पुस्तक का सृजन हुआ है।"
Book Details
-
ISBN9789355626042
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि हम किस प्रकार शासित हो रहे हैं। भारत के संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार देश के हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश भारत में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए यह किताब अत्यन्त उपयोगी है। भारतीय संविधान के विश्वविख्यात विशेषज्ञ डॉ. सुभाष काश्यप ने सरल और सुगम शब्दों में पुस्तक तैयार की है इसका विशेष उद्देश्य यह है कि पाठक को भारतीय संविधान का संक्षिप्त परिचय मिले तथा वह इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संविधान निर्माण की प्रक्रिया, तथा वह इसकी संविधान की आत्मा का समुचित ज्ञान प्राप्त सकते हैं।
वस्तुत: यह किताब आधुनिक भारत के इतिहास; एक लोकतंत्र के रूप में भारत के निर्माण और विकास तथा भारत के संविधान में दिलचस्पी रखने वाले हरेक छात्र और सामान्य पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
Bisaveen Sadi Ke Tanashah
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
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तानाशाही एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का नतीजा होती है या कुछ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी एक व्यक्ति के रूप में खुद को प्रकट करती हैं? क्या समाजों और राष्ट्रों के जीवन में कोई ऐसा क्षण आता है जब जन-गण स्वयं आत्मघाती हो उठता है और आँख मूँदकर किसी अधिनायक के पीछे चल पड़ता है? आज इक्कीसवीं सदी के इतने पारदर्शी समय में तानाशाही क्या किसी नए रूप की तलाश करेगी; और इन सवालों की रोशनी में हम, जो दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों में अग्रणी रहे हैं, खुद को कहाँ देखते हैं! ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ मोटे तौर पर इन्हीं सवालों के जवाब तलाश करती है; कहने की जरूरत नहीं कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे अहम सवाल भी यही है। हिटलर, स्तालिन, मुसोलिनी, उत्तरी कोरिया के किम इल-सुंग, चिली के ऑगस्तो पिनोशे और युगांडा के ईदी अमीन पर केन्द्रित इस पुस्तक का हर अध्याय इन नेताओं के समय की आन्तरिक और विश्व-राजनीति के निर्णायक आयामों पर रोशनी डालते हुए बताता है कि ये लोग कैसे उठे, कैसे गिरे और दुनिया ने, दुनिया के विचारकों ने उन्हें कैसे देखा-समझा। इतिहास अध्येता के रूप में अशोक कुमार पाडेय इतिहास के उन अध्यायों को हिन्दी पाठक के समक्ष लाते रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी मौजूदा और आवश्यक प्रश्नाकुलताओं से है। इस प्रक्रिया में विचार उनका सहगामी रहा है। यह किताब इस यात्रा का एक और पड़ाव है और पाठकों को निश्चय ही अपने समय को लेकर सोचने और अपना पक्ष चुनने में मदद करेगी।
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