Bharat Ke Chakravarti Samrat
(0)
Author:
Devraj Singh JadaunPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
500
₹ 400 (20% off)
Available
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"यह पुस्तक विशेष रूप से भारत के चक्रवती सम्राटों पर है। विषय की व्यापकता को ध्यान में रखकर अत्यंत प्राचीनकाल से आरंभ कर पांडववंशी जनमेजय तक के चक्रवर्तियों को ही विषय-वस्तु में सम्मिलित किया गया है। भारत की नई पीढ़ी इस इतिहास से प्रायः अनभिज्ञ है। इतना ही नहीं, वह अपने भारतीय ज्ञान-संपदा के ग्रंथों से भी अनभिज्ञ है। उसको इस इतिहास, भारत की सार्वभौमिकता, दर्शन, संस्कृत वाङ्मय, आर्ष साहित्य आदि से परिचय कराना हमारा दायित्व है। भारत निर्माता संतों, ऋषियों, मुनियों, आविष्कारकों व विदुषी वेदज्ञ मातृशक्ति से परिचय हमारे गौरवबोध को जाग्रत् करेगा। संपूर्ण पृथ्वी पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का संदेश 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' लेकर, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का विचार लेकर, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का मंत्र लेकर, 'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः' का आचरण लेकर तथा 'राष्ट्र सर्वोपरि' की दृष्टि लेकर जो लोग चले, जिनमें बड़े-बड़े राजपरिवार तथा व्यापारी व समाज-सुधारक शामिल हैं; उनसे आज की पीढ़ी परिचित हो, इस हेतु से प्रस्तुत पुस्तक का सृजन हुआ है।"
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"यह पुस्तक विशेष रूप से भारत के चक्रवती सम्राटों पर है। विषय की व्यापकता को ध्यान में रखकर अत्यंत प्राचीनकाल से आरंभ कर पांडववंशी जनमेजय तक के चक्रवर्तियों को ही विषय-वस्तु में सम्मिलित किया गया है।
भारत की नई पीढ़ी इस इतिहास से प्रायः अनभिज्ञ है। इतना ही नहीं, वह अपने भारतीय ज्ञान-संपदा के ग्रंथों से भी अनभिज्ञ है। उसको इस इतिहास, भारत की सार्वभौमिकता, दर्शन, संस्कृत वाङ्मय, आर्ष साहित्य आदि से परिचय कराना हमारा दायित्व है। भारत निर्माता संतों, ऋषियों, मुनियों, आविष्कारकों व विदुषी वेदज्ञ मातृशक्ति से परिचय हमारे गौरवबोध को जाग्रत् करेगा।
संपूर्ण पृथ्वी पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का संदेश 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' लेकर, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का विचार लेकर, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का मंत्र लेकर, 'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः' का आचरण लेकर तथा 'राष्ट्र सर्वोपरि' की दृष्टि लेकर जो लोग चले, जिनमें बड़े-बड़े राजपरिवार तथा व्यापारी व समाज-सुधारक शामिल हैं; उनसे आज की पीढ़ी परिचित हो, इस हेतु से प्रस्तुत पुस्तक का सृजन हुआ है।"
Book Details
-
ISBN9789355626042
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
हिमालय का गहरा नाता भारत के इतिहास और संस्कृति से है। लेकिन अपनी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति और अनूठी सांस्कृतिक महत्ता के कारण, यह जन-सामान्य के लिए इतिहास का विषय उतना नहीं रहा है जितना गौरव और श्रद्धा की वस्तु। वास्तव में एक मानवीय पर्यावास और सभ्यता के केन्द्र के रूप में हिमालय का इतिहास अब भी काफी कुछ अजाना है। इस सन्दर्भ में मदन चन्द्र भट्ट की यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण पाठ है, जिसमें भारत के उत्तरी, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र का सारगर्भित ऐतिहासिक आकलन प्रस्तुत किया गया है।
लेखक ने हिमालय क्षेत्र में मौजूद शैलचित्रों, अभिलेखों, स्थापत्य और शिल्प अवशेषों, ताम्रपत्रों, सिक्कों जैसे पुरातात्त्विक साक्ष्यों को ही नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रन्थों, लोक अनुश्रुतियों और राजस्व विवरणों में उल्लिखित विवरणों को आधार बनाकर एक सिलसिलेवार चित्र उकेरा है। उसका जोर सम्पूर्ण और प्रामाणिक लेखा प्रस्तुत करने तथा सर्वमान्य निष्कर्षों को प्रमुखता देने पर रहा है। जो तथ्य-निष्कर्ष विवादित रहे हैं उनका भी यथास्थान उल्लेख किया गया है।
सुदूर अतीत में अन्य क्षेत्रों की तरह हिमालय क्षेत्र में भी छोटे राज्यों ने आंचलिक और जनपदीय संस्कृतियों का निर्माण किया था। स्वाभाविक ही उनमें स्थानीयता का दृष्टिकोण विकसित हुआ, जब-तब सामाजिक-सांस्कृतिक संकीर्णता के कतिपय तत्त्व भी पनपे। लेकिन अन्य राज्यों और संस्कृतियों से वे कटे नहीं रहे और भारतवर्ष की बुनियादी एकता को मजबूत बनाने में उनका भी योगदान रहा। इस तथ्य को सप्रमाण बतलाते हुए यह पुस्तक एक तरफ उपेक्षित,ओझल पक्षों को सामने लती है, तो दूसरी तरफ भारत के इतिहास में हिमालय क्षेत्र के इतिहास को यथोचित स्थान देने का प्रस्ताव करती है।
इतिहास के अध्येताओं, शोधार्थियों, विद्यार्थियों से लेकर आम पाठक तक के लिए समान रूप से पठनीय और संग्रहणीय कृति!
Yashasvi Bharat
- Author Name:
Mohan Bhagwat
- Book Type:

- Description: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन है, जिसके लाखों समर्पित स्वयंसेवक राष्ट्र-निर्माण में लगे हैं और भारत को परम वैभव संपन्न बनाने के लिए कृतसंकल्पित हैं। परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सन् 1925 की विजयादशमी को इसी उद्देश्य से संघ की स्थापना की। समर्पित भाव से व्यक्ति-निर्माण के महती कार्य को लक्षित कर संघ के स्वयंसेवक देश-समाज के प्रायः सभी क्षेत्रों—सेवा, विद्या, चिकित्सा, छात्र, मजदूर, राजनीति—में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के मूलमंत्र को जीवन का ध्येय मानकर प्राणपण से जुटे हैं। संघ दुनिया में अपनी तरह का अकेला संगठन है। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निकट से जानने और गहराई से समझने की जिज्ञासा बढ़ी है। संघ के छठे और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के विचारों पर आधारित यह पुस्तक इस दिशा में दीपशिखा का काम करेगी। यह पुस्तक अलग-अलग अवसरों पर दिए उनके व्याख्यानों का संग्रह है। ‘हिंदुत्व का विचार’, ‘भारत की प्राचीनता’, ‘हमारी राष्ट्रीयता’, ‘समाज का आचरण’, ‘स्त्री सशक्तीकरण’, ‘विकास की अवधारणा’, ‘अहिंसा का सिद्धांत’, ‘बाबा साहेब आंबेडकर’ और ‘भारत का भवितव्य’ जैसे विषयों पर दिए गए उनके व्याख्यान संघ को समझना आसान बना देते हैं। वैसे अपने व्याख्यानों में मोहनराव भागवत बार-बार कहते हैं कि ‘संघ को समझना हो तो संघ में आइए’। यह पुस्तक पाठक के विचारों को परिष्कृत करेगी और समाज में ऐसे राष्ट्रभाव जाग्रत् करेगी, जिससे ‘यशस्वी भारत’ का लक्ष्य सिद्ध होगा।
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