Bravehearts of Bharat: Vignettes from Indian History
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Fifteen Brave Men and Women of Bharat who Never Succumbed to the Challenges of Invaders But were Lost and Forgotten in the Annals of History. These are the stories of those Bravehearts who Fought to Protect their Rights, Faith and Freedom. History has always been the handmaiden of the victor. 'Until the lions have their own storytellers,' said Chinua Achebe, 'the history of the hunt will always glorify the hunter!' Exploring the lives, times and works of the fifteen long-forgotten and mostly neglected unsung heroes and heroines of our past, this book brings to light the contribution of the warriors who not only donned armour and burst forth into the battlefield but also kept the flame of hope alive under adverse circumstances. Narrating the tales of valour and success that India, as a nation and civilization, has borne witness to in its long and tumultuous past, the book opens a window to the stories of select men and women who valiantly fought against invaders for their rights, faith and freedom. Rajarshi Bhagyachandra Jai Singh of Manipur, Lalitaditya Muktapida of Kashmir, Chand Bibi of Ahmednagar, Lachit Barphukan of Assam, Begum Hazrat Mahal of Awadh, Rani Abbakka Chowta of Ullal, Martanda Varma of Travancore, Rani Rudrama Devi of Warangal, Rani Naiki Devi of Gujarat and Banda Singh Bahadur are some of the 'bravehearts' who fought to uphold the tradition and culture of their land. Pacy and unputdownable, Bravehearts of Bharat chronicles the stories of courage, determination and victory, which largely remained untold and therefore unknown for a long time.
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Fifteen Brave Men and Women of Bharat who Never Succumbed to the Challenges of Invaders But were Lost and Forgotten in the Annals of History. These are the stories of those Bravehearts who Fought to Protect their Rights, Faith and Freedom.
History has always been the handmaiden of the victor. 'Until the lions have their own storytellers,' said Chinua Achebe, 'the history of the hunt will always glorify the hunter!' Exploring the lives, times and works of the fifteen long-forgotten and mostly neglected unsung heroes and heroines of our past, this book brings to light the contribution of the warriors who not only donned armour and burst forth into the battlefield but also kept the flame of hope alive under adverse circumstances.
Narrating the tales of valour and success that India, as a nation and civilization, has borne witness to in its long and tumultuous past, the book opens a window to the stories of select men and women who valiantly fought against invaders for their rights, faith and freedom.
Rajarshi Bhagyachandra Jai Singh of Manipur, Lalitaditya Muktapida of Kashmir, Chand Bibi of Ahmednagar, Lachit Barphukan of Assam, Begum Hazrat Mahal of Awadh, Rani Abbakka Chowta of Ullal, Martanda Varma of Travancore, Rani Rudrama Devi of Warangal, Rani Naiki Devi of Gujarat and Banda Singh Bahadur are some of the 'bravehearts' who fought to uphold the tradition and culture of their land.
Pacy and unputdownable, Bravehearts of Bharat chronicles the stories of courage, determination and victory, which largely remained untold and therefore unknown for a long time.
Book Details
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ISBN9780143468004
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Pages334
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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- Description: यह पुस्तक परिश्रमपूर्वक इकट्ठी की गई शोध सामग्रियों के वैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर लिखी गई एक ऐसी कृति है, जो यह दरशाती है कि स्वतंत्र भारत के संविधान की ‘प्रस्तावना’, ‘मौलिक अधिकारों’ और ‘राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों’ में प्रदत अवधारणाओं और भारतीय राजसत्ता के बीच जो विरोधाभाषी प्रवृत्ति आज पैदा हो गई है, उसका विकास किस तरह से क्रमिक गति से होता गया है। एक समाजवादी और लोक कल्याणकारी भारतीय गणतंत्र की जिस अवधारणा को स्वावलंबी आर्थिक विकास, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की आर्थिक इकाइयों को सर्वोपरि महत्त्व के स्थान पर रखकर ‘समाजवादी ढाँचे के समाज’ के निर्माण के लिए चलाई जा रही आर्थिक-नीति में किस तरह के सैद्धांतिक भटकाव क्रमिक गति से आते गए कि उन्होंने इजारेदारियों को आगे बढ़ा दिया, सामंतवादी उत्पादन प्रणाली के अवशेषों को संपूर्णता में समाप्त करने में असपफल हो गए और सबसे बढ़कर साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के साथ भारतीय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के संबंधों को इस हद तक मजबूती प्रदान कर दी कि देश क्रमिक गति से आर्थिक तौर पर संकटग्रस्त होता चला गया। खास कर राजीव गांधी के शासन काल में नव-उदारवादी नीतियों की तरफ हुए अत्यधिक झुकाव के कारण भारत गहरे आर्थिक संकट में फँस गया। जरूरत थी पूर्व की कमजोरियों और गलतियों को ठीक करने की मगर नरसिम्हा राव सरकार ने इसके बदले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के सामने आत्मसमर्पण की नीति को अख्तियार कर पूर्व की सर्वमान्य स्वावलंबी विकास नीति के ठीक विपरीत नव-उदारवादी आर्थिक विकास नीति को स्वीकार करके विकास प्रक्रिया को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप जिस आर्थिक आधार का निर्माण भारत में हो रहा है वह वर्तमान संविधान की आत्मा के ठीक उल्टा है। अब तो संविधान को ही बदल देने की माँग बड़ी पूँजी के तावेदार राजनीतिक दल करने लगे हैं, जो भारत को न तो समाजवादी-लोक कल्याणकारी राज्य रहने देगा न अर्थव्यवस्था पर सरकार का नियंत्राण। इससे राज सत्ता का स्वरूप ही बदल दिए जाने का खतरा है।
Ashok Chakravijeta
- Author Name:
Maj. Gen. A.K. Shori +1
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- Description: Awating description for this book
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