Communist China : Avaidh Astitva
Author:
Prof. Kusumlata KediaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
यह अल्पज्ञात तथ्य है कि चीन का ‘चीन’ नाम भारत का दिया हुआ है। चीन तो स्वयं को झुआंगहुआ कहता है। इससे भी अल्पज्ञात तथ्य यह है कि महाभारत काल में चीन भारत के सैकड़ों जनपदों में से एक था। प्रशांत महासागर के तट पर पीत नदी के पास यह लघु राज्य भारत से हजारों किलोमीटर दूरस्थ था। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपने इतिहास के अधिकांश में चीन भरतवंशी शासकों के अधीन अर्थात् परतंत्र रहा है।
आज के विशाल चीन का निर्माण तत्कालीन सोवियत संघ, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका आदि के अनुग्रह, हस्तक्षेप और प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग से ही संभव हुआ है। अन्यथा पुराने चीन को कभी भी बाहरी शक्तियों से ऐसी व्यापक एवं प्रभावकारी सहायता नहीं मिलती। इसलिए यह चीन न होकर, विस्तारवादी और उपनिवेशवादी कम्युनिस्ट चीन है और इस प्रकार यह नैसर्गिक राष्ट्र न होकर कृत्रिम देश है।
कम्युनिस्ट चीन के आततायी और दमनकारी साम्राज्यवाद से तिब्बतियों, मंगोलों, मांचुओं, तुर्कों और हानों की मुक्ति आवश्यक है और इसमें भारत की महती भूमिका हो सकती है। यह वैसे भी भारत का कर्तव्य है कि सदा से हमारे अभिन्न तथा आत्मीय रहे तिब्बत पर चीन का बलात् कब्जा कराने में मुख्य भूमिका भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री की ही रही। उन्होंने ही इतिहास में पहली बार चीन को भारत का पड़ोसी बनाया। अत: इस भयंकर भूल को सुधारना भारत का नैतिक दायित्व है। इन सभी दृष्टियों से यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक तथा अवश्य पठनीय है।
ISBN: 9789395386357
Pages: 192
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
भारत में ऐसे राजनेता बहुत कम रहे हैं जिन्होंने अपने विचारों को लिखित रूप में लगातार अपने समकालीनों और पाठकों तक पहुँचाया और इस प्रकार न सिर्फ़ अपना पक्ष स्पष्ट किया बल्कि लोगों को शिक्षित भी किया। चन्द्रशेखर उनमें अग्रणी हैं। वे लम्बे समय तक ‘यंग इंडियन’ का सम्पादन-प्रकाशन करते रहे, और देश, राजनीति और समाज को प्रभावित करनेवाली हर घटना पर बिना किसी पूर्वग्रह और स्वार्थ के लिखते रहे। यह साप्ताहिक ‘यंग इंडियन’ में उनके लिखे सम्पादकीय का संग्रह है। इस खंड में 1971 से 2001 तक की तीन दशकों की अवधि में लिखी सम्पादकीय टिप्पणियों को शामिल किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरा दौर भारतीय राजनीति में बड़ी घटनाओं और फेर-बदल का समय रहा है। इसी दौर में भारत-पाक युद्ध और तदुपरान्त बांग्लादेश का अभ्युदय हमने देखा, इंदिरा गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ आन्दोलन इसी दौर में चला; 1971 के लोकसभा चुनावों में उनकी जीत, उसके बाद जनता पार्टी सरकार, उसका भंग होना और पुन: इंदिरा गांधी की वापसी इसी कालखंड में हुई।
जिन मुद्दों और घटनाओं पर राजनेता और विचारक चन्द्रशेखर के विचार आप यहाँ पढ़ेंगे, उनमें उपरोक्त के अलावा आपातकाल, इंदिरा गांधी की हत्या, उसके बाद राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, बोफोर्स मामले के बाद उनका सत्ता से हटना और वी.पी. सिंह का प्रधानमंत्री बनना, स्वयं चन्द्रशेखर का अल्पकालिक प्रधानमंत्रित्व, राजीव हत्याकांड और नरसिम्हा राव शासन का आरम्भिक दौर आदि शामिल हैं। बतौर नेता और राजनीतिक चिन्तक चन्द्रशेखर को स्वतंत्र विचार के लिए जाना जाता है। इस पूरे दौर को उन्होंने निष्पक्ष भाव से देखते हुए, क्या सोचा और देशहित में क्या चाहा, उस सबका निरूपण वे लगातार अपने सम्पादकीय में करते रहे। इन सम्पादकीय लेखों से गुज़रना सिर्फ़ चन्द्रशेखर के विचारों से ही नहीं, उस दौर के इतिहास से भी गुज़रना है।
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