Rachnatmak Bechaini Mein
(0)
Author:
ChandrashekharPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
795
636 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
इस दूसरे खंड के साक्षात्कारों का दौर वह दौर है जब चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के पटल पर छाए हुए हैं। यह दौर कांग्रेस में रहकर पार्टी नीतियों का विरोध, जेपी आंदोलन और आपातकाल में उनके जबरदस्त हस्तक्षेप तथा जनता पार्टी के गठन और उसके अध्यक्ष बनने का दौर है। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों पर एक नजर डालें तो चन्द्रशेखर एक खास तरह की रचनात्मक बेचैनी और कुछ करने के लिए जल्दबाजी में दिखाई देते हैं। इस दौरान उनका अद्भुत रूप सामने आता है, जिसमें उनकी ऊर्जा और लक्ष्य दोनों साफ-साफ परिलक्षित होते हैं। उनके पास केवल लक्ष्य ही नहीं है, बल्कि उस तक पहुँचने का रास्ता भी है, जिसे वे मौजूदा कठिनाइयों के बीच से ही निकालना चाहते हैं। गत 30 वर्षों के भारतीय राजनीति के घटनाक्रम से साक्षात्कार करानेवाली एक संग्रहणीय पुस्तक।
Read moreAbout the Book
इस दूसरे खंड के साक्षात्कारों का दौर वह दौर है जब चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के पटल पर छाए हुए हैं। यह दौर कांग्रेस में रहकर पार्टी नीतियों का विरोध, जेपी आंदोलन और आपातकाल में उनके जबरदस्त हस्तक्षेप तथा जनता पार्टी के गठन और उसके अध्यक्ष बनने का दौर है। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों पर एक नजर डालें तो चन्द्रशेखर एक खास तरह की रचनात्मक बेचैनी और कुछ करने के लिए जल्दबाजी में दिखाई देते हैं। इस दौरान उनका अद्भुत रूप सामने आता है, जिसमें उनकी ऊर्जा और लक्ष्य दोनों साफ-साफ परिलक्षित होते हैं। उनके पास केवल लक्ष्य ही नहीं है, बल्कि उस तक पहुँचने का रास्ता भी है, जिसे वे मौजूदा कठिनाइयों के बीच से ही निकालना चाहते हैं। गत 30 वर्षों के भारतीय राजनीति के घटनाक्रम से साक्षात्कार करानेवाली एक संग्रहणीय पुस्तक।
Book Details
-
ISBN9788126704668
-
Pages219
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bharatiya Videsh Neeti
- Author Name:
Jn Dixit
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्री जे.एन. दीक्षित द्वारा पचास वर्षो की अवधि के विस्तृत फलक पर भारतीय विदेश नीति के विभिन्न चित्र सशक्त तथा प्रभावशाली ढंग से उकेरे गए हैं । लेखक ने 1947 को भारतीय विदेश नीति का आरंभ काल माना है । इन्होंने बताया है कि पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति का मूलाधार रखा तथा इसके बाद उनके उत्तराधिकारियों ने इस दिशा में किस प्रकार से व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । इस महत्त्वपूर्ण आख्यान का वर्णन करते समय लेखक ने कालक्रमानुसार भारत की विदेश नीति के विविध पक्षों को उजागर किया है । इसके साथ ही उन पक्षों के राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़नेवाले प्रभावों का भी विवेचन किया है तथा ऐसी युगांतकारी घटनाओं को शामिल किया है जिनका भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर प्रभाव पड़ा है । इसके अतिरिक्त इस पुस्तक में उन घटनाओं के परिणामों तथा प्रतिक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया है । उदाहरण के तौर पर-सन् 1947-48, 1965 तथा 1971 में भारत-पाक युद्ध; संयुक्त राष्ट्र का संदेहास्पद रवैया तथा कश्मीर का मुद्दा; 1962 में भारत-चीन युद्ध; 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्जा; महाशक्तिशाली सोवियत संघ का विघटन; कश्मीर की समस्या तथा पाकिस्तान की ' परोक्ष युद्ध ' की कार्यनीति; 1991 में खाड़ी युद्ध; मई 1998 में भारत-पाक द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण । इस पुस्तक में विश्व के विभिन्न देशों-विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, चीन तथा पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए घटनाओं के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विशद विवेचन किया गया है । भारतीय विदेश नीति को आधार बनाकर लिखी गई यह पुस्तक निस्संदेह एक उत्कृष्ट कृति है ।
RASHTRA SAMAJ EVAM CHHATRA (PB)
- Author Name:
Raj Kumar Bhatia
- Book Type:

- Description: शिशुकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सृष्टि में पले-बढ़े लेखक ने अपनी छह दशकों से अधिक की सामाजिक सक्रियता के काल में अनेक प्रकार का लेखन किया, जिसे इस पुस्तक में 5 खंडों में प्रस्तुत किया गया है। “व्यक्तित्व” एवं “राष्ट्र समाज और राजनीति” के खंडों में उनकी वैचारिक भूमि के दर्शन होते हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी सक्रियता अखिल भारतीय विध्यार्थी परिषद् में रही; अतः 'शिक्षा' एवं 'छात्र-जगत' के खंडों में उनका सहज चिंतन व्यक्त हुआ है। 'सामाजिक संगठन और कार्यकर्ता' उनकी विशेष रुचि का विषय रहा; इसलिए उस खंड में उनके तत्संबंधी लेख दिए गए हैं। राष्ट्र और समाज के निर्माण एवं विकास में सामाजिक संगठनों और छात्रों की सक्रिय सहभागिता पर प्रकाश डालती विचारोत्तेजक लेखों का पठनीय संकलन।
Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Chunav
- Author Name:
Arvind Mohan
- Book Type:

- Description: इस किताब का उद्देश्य भारत के चुनावी लोकतंत्र और उसमें जाति की भूमिका को समझना है। यह एक कठिन काम है, क्योंकि एक सामाजिक शक्ति के रूप में खुद जाति को समझना भी आसान नहीं है। आधुनिकता, शिक्षा और समझदारी के भूमंडलीय विस्तार के बावजूद भारतीय समाज में जाति जहाँ थी, अब भी वहीं है। बल्कि अब वह ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सामने आ रही है। चुनावों में अब उसकी निर्णायक स्थिति को हर कोई स्वीकार कर चुका है; जातिवार जनगणना की बातें हो रही हैं; राजनीतिक पार्टियाँ, नेता और मतदाताओं के बीच जातियों के आधार पर नए ध्रुवीकरण हो रहे हैं, टूट भी रहे हैं, फिर बन भी रहे हैं। इसलिए यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि क्या जाति की इस राजनीतिक सक्रियता का कोई पैटर्न भी है, क्या कोई तरीका है यह जानने का कि जातियों की सतत गतिशील चुनावी गोलबन्दियाँ कैसे काम करती हैं। जाहिर है जिस देश में साढ़े चार हजार से ज्यादा समुदाय मौजूद हों, वहाँ इस सवाल को लेकर समाज में उतरना समुद्र में उतरने जैसा है। वरिष्ठ पत्रकार, अरविन्द मोहन ने इस किताब में यही किया है। पत्रकारिता और चुनाव-अध्ययन के लगभग चार दशक के अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने इस किताब में पिछले 76 सालों के बदलावों को समझने और कुछ निर्णायक प्रतीत होनेवाली प्रवृत्तियों को रेखांकित करने की कोशिश की है। यह जटिल और सुदीर्घ अध्ययन उन्होंने राज्यवार विश्लेषण के आधार पर किया है। इससे पता चलता है कि यूपी-बिहार ही नहीं, लगभग पूरे देश का चुनावी भूगोल जातियों के आधार पर बनता-बिगड़ता है।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Shravasti
- Author Name:
Pawan Bakshi
- Book Type:

-
Description:
श्रावस्ती कोसल का प्रमुख नगर था। इसे बुद्धकालीन भारत के छह महानगरों—चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कोशांबी और वाराणसी में से एक माना जाता था।
आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व यह क्षेत्र अत्यंत वनाच्छादित था जिसके चलते स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती एक प्रमुख पड़ाव हुआ करता था और आंदोलनकारियों के लिए विशेष रूप से सुरक्षित माना जाता था। इस कारण और यहाँ के सामान्य जन की स्वातंत्र्य-चेतना के कारण आजादी के आंदोलन में इसकी महती भूमिका रही। 1857 में अंग्रेजों को बहराइच में कड़ा विरोध झेलना पड़ा। यहाँ के सभी छोटे ताल्लुकेदार खुलकर उनके विरुद्ध खड़े हो गए थे। इकौना रियासत का योगदान इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज है। वीरांगना रानी ईश्वरी देवी का संघर्ष भी एक उल्लेखनीय घटना थी।
इस पुस्तक में स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती जिले की भूमिका को तथ्यों के साथ स्पष्ट किया गया है। साथ ही यहाँ के भौगोलिक व सांस्कृतिक महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।
A Corner of a Foreign Field
- Author Name:
Ramchandra Guha
- Book Type:

- Description: A Corner of a Foreign Field seamlessly interweaves biography with history, the lives of famous or forgotten cricketers with wider processes of social change. C. K. Nayudu and Sachin Tendulkar naturally figure in this book but so, too, in unexpected ways, do B. R. Ambedkar, Mahatma Gandhi and M. A. Jinnah. The Indian careers of those great British cricketers, Lord Harris and D. R. Jardine, provide a window into the operations of Empire. The remarkable life of India’s first great slow bowler, Palwankar Baloo, provides an arresting new perspective on the struggle against caste discrimination. Later chapters explore the competition between Hindu and Muslim cricketers in colonial India and the destructive passions now provoked when India plays Pakistan. For this new edition, Ramachandra Guha has added a fresh introduction as well as a long new chapter, bringing the story up to date to cover, among other things, the advent of the Indian Premier League and the Indian team’s victory in the World Cup of 2011, these linked to social and economic transformations in contemporary India. A pioneering work, essential for anyone interested in either of those vast themes, cricket and India, a Corner of a Foreign Field is also a beautifully written meditation on the ramifications of sport in society at large.
Sankalp Kaal Speeches By Shri Atal Bihari Vajpayee
- Author Name:
Dr. N.M. Ghatate
- Book Type:

- Description: श्री अटल बिहारी वाजपेयी के चिंतन और चिंता का विषय हमेशा ही संपूर्ण राष्ट्र रहा है। भारत और भारतीयता की संप्रभुता और संवर्द्धन की कामना उनके निजी एजेंडे में सर्वोपरि रही है। यह भावना और कामना कभी संसद में विपक्ष के सांसद के रूप में प्रकट होती रही, कभी कवि और पत्रकार के रूप में, कभी सांस्कृतिक मंचों से एक सुलझे हुए प्रखर वक्ता के रूप में और १९९६ से भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अभिव्यक्त हुई। श्री वाजपेयी ने देश की सत्ता की बागडोर का दायित्व एक ट्रस्टी के रूप में ग्रहण किया। राष्ट्र के सम्मान और श्रीवृद्धि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। न किसी दबाव को आड़े आने दिया, न किसी प्रलोभन को। न किसी संकट से विचलित हुए, न किसी स्वार्थ से। फिर चाहे वह परमाणु परीक्षण हो, कारगिल समस्या हो, लाहौर-ढाका यात्रा हो या कोई और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा। इसी तरह राष्ट्रीय मुद्दों पर भी दो टूक और राष्ट्र हित को सर्वोपरि मानते हुए निर्णय लिये- चाहे वह कावेरी विवाद हो या कोंकण रेलवे लाइन का मसला, संरचनात्मक ढाँचे का विकास हो या सॉफ्टवेयर के लिए सूचना और प्रौद्योगिकी कार्यदल की स्थापना, केंद्रीय बिजली नियंत्रण आयोग का गठन हो या राष्ट्रीय राजमार्गों और हवाई अड्डों का विकास, नई टेलीकॉम नीति हो या आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने का सवाल, ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर जुटाने का मामला हो या विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए बीमा योजना। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में श्री वाजपेयी ने जो उपलब्धियाँ हासिल कीं, उन्हें दो शब्दों में कहा जा सकता है- जो कहा, वह कर दिखाया। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद भी उनकी कथनी और करनी एक ही बनी रही इसका प्रमाण हैं इस 'संकल्प-काल' में संकलित वे महत्त्वपूर्ण भाषण जो श्री वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में विभिन्न मंचों से दिए। अपनी बात को स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहना अटलजी जैसे निर्भय और सर्वमान्य व्यक्ति के लिए सहज और संभव रहा है। लाल किला से लाहौर तक, संसद से संयुक्त राष्ट्र महासभा तक विस्तृत विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों से दिए गए इन भाषणों से बार-बार एक ही सत्य एवं तथ्य प्रमाणित और ध्वनित होता है-श्री वाजपेयी के स्वर और शब्दों में भारत राष्ट्र राज्य के एक अरब लोगों का मौन समर्थन और भावना समाहित है। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 'मेरी संसदीय यात्रा' (चार खंडों में) के बाद 'संकल्प काल' का प्रकाशन अटलजी के पाठकों और उनके विचारों के संग्राहकों के लिए एक और उपलब्धि है।
BHRASHTACHAR KA ANT
- Author Name:
N. Vittal
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Lohia Ke Sapno Ka Bharat : Bhartiya Samajwad Ki Ruprekha
- Author Name:
Ashok Pankaj
- Book Type:

- Description: भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। संविधान के उच्च आदर्शों, मूल्यों तथा प्रगतिशील प्रावधानों के बावजूद समतामूलक समाज की स्थापना लक्ष्य से मीलों दूर है। नर-नारी की असमानता, जाति-बिरादरी की गैर-बराबरी, धार्मिक समूहों का आपसी द्वेष एवं कटुता, अमीर-गरीब की गहराती खाईं, शिक्षा, स्वास्थ्य, भुखमरी एवं बेरोजगारी की समस्या बनी हुई है। नौकरशाही राज्य एवं जनता के द्वारा चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों का सामन्तवादी एवं राजशाही सोच, तौर-तरीका एवं व्यवहार बना हुआ है। संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधनों के बावजूद भी लोकतंत्र का चौथा खम्भा, पंचायती राज, एक नकली टाँग की तरह लटका दिया गया मालूम पड़ता है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में विकास की गति तेज हुई है, लेकिन किसानों, मजदूरों, एवं औद्योगिक श्रमिकों को उसका समुचित लाभ नहीं मिला है। सामाजिक असमानता के छुआछूत जैसे अभिशाप तो मिट रहे हैं, लेकिन आर्थिक असमानता एक नये जातिवाद को पैदा कर रही है, जिससे लोकतंत्र को सचेत रहने की आवश्यकता है। चुनावों में धन का प्रभाव तथा तदनुसार राजनीतिक दलों की पूँजीपतियों पर चुनावी खर्च के लिए निर्भरता लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं है। एक प्रकार से, लोकतंत्र की कोख में राजनीतिक-आर्थिक कुलीनतंत्र का भ्रूण विकसित हो रहा है जिसके लोहिया जन्मजात विरोधी थे।
Chashme Wale Masterji
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description: "बरसों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे प्रकाश मनु बच्चों के चहेते कथाकार हैं। उन्होंने बच्चों के लिए खूब लिखा है— एक-से-एक सुंदर गीत, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास, जिन्हें बच्चे चाव से पढ़ते और उनके साथ-साथ हँसते-गाते, चहकते, खिलखिलाते हैं। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ प्रकाश मनु की पिछले कुछ अरसे में लिखी गई ताजा बाल कहानियों का संग्रह है। इसमें नन्हे-मुन्नों के नन्हे सपनों की कहानियाँ हैं, तो दूसरी ओर किस्सागोई से भरपूर ऐसी दिलचस्प कहानियाँ भी, जो बच्चों को एक निराली दुनिया में ले जाएँगी। ये ऐसी बाल कहानियाँ हैं, जिनमें बचपन का हर रंग, हर अंदाज है और नटखटपन से भरी कौतुकपूर्ण छवियाँ भी, जो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी मुग्ध करती हैं। इनमें बच्चे हैं, बच्चों के सुख-दु:ख और सपने हैं तो उनके छोटे से संसार की बड़ी मुश्किलें भी हैं, और इन्हें लिखा गया है बेहद चुस्त, सधे, खिलंदड़े अंदाज में। कुछ कहानियों में बच्चों को एक भोले और अलमस्त बच्चे कुक्कू की नटखट शरारतें, खेल और मस्ती की रेल-पेल लुभाएगी तो कुछ में वे निक्का, तान्या, निक्की, साशा, मीशा, खुशी और मिली के संग खूब हँसेंगे, खिलखिलाएँगे और खेल-खेल में बहुत कुछ सीखेंगे भी। साथ ही अपनी मुश्किलों से निकलने की राह पाएँगे। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ पुस्तक की हर कहानी में बचपन की एक अलग छवि है और नटखटपन से भरी एक हँसती-खिलखिलाती दुनिया! इसीलिए ये कहानियाँ बच्चों को अपने दोस्त सरीखी लगेंगी। एक बार पढ़ने के बाद वे इन्हें कभी भूलेंगे नहीं और हमेशा एक ‘बहुमूल्य उपहार’ की तरह सँजोकर रखेंगे। "
Jinna : Ek Punardrishti
- Author Name:
Virendra Kumar Baranwal
- Book Type:

- Description: साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना-शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज़ ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।
Santal Hool Santal-Vidroh : 1854-55
- Author Name:
Dr. S.P. Sinha
- Book Type:

- Description: सन्ताल हूल झारखंड में हुए महान उपनिवेश-विरोधी विद्रोह के वास्तविक स्वरूप और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उसके समुचित स्थान को रेखांकित करनेवाली पुस्तक है। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध का लम्बा सिलसिला रहा है। छोटानागपुर और सन्ताल परगना के आदिवासियों ने पहाड़ियों और घने जंगलों के अपने गढ़ में अंग्रेजों को कभी भी चैन से नहीं रहने दिया। वे ईस्ट इंडिया कम्पनी की शोषणकारी नीति और भेदभावपूर्ण व्यवस्था से असन्तुष्ट थे। उन्हें उसकी अधीनता स्वीकार नहीं थी। वे अपना राज चाहते थे, इसलिए उन्होंने बार-बार विद्रोह किया। उन्हीं विद्रोहों में से एक था सन्ताल हूल, जो 1857 के बहुचर्चित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक पहले 1854-55 में हुआ था। इस विद्रोह के नेता थे सिदो, कानू, चाँद और भैरव। सन्ताल हूल का–जैसा कि अन्य आदिवासी विद्रोहों में भी दिखता है—उपनिवेशवाद विरोधी तेवर और स्वाधीनता का उद्देश्य स्पष्ट था। उसके नेताओं और भागीदारों की शहादत भी असंदिग्ध थी। बावजूद इसके उसके बारे में भ्रम बना रहा और बौद्धिक-अकादमिक जगत में ‘इतिहास को नीचे से देखने’ का विचार पनपने के वर्षों बीत जाने के बाद तक सन्ताल हूल को भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में समुचित स्थान नहीं दिया गया। इसी स्थिति के मद्देनजर आदिवासी इतिहास और संस्कृति के अधिकारी विद्वान डॉ. एस.पी. सिन्हा ने इस पुस्तक में सन्ताल हूल के बारे में उपलब्ध तमाम दस्तावेजों, परम्परागत और मौखिक स्रोतों को आधार बनाकर सन्तालों की अपनी व्यवस्था, अंग्रेजी व्यवस्था से उनके असन्तोष, हूल के नेताओं के व्यक्तित्व और नेतृत्व-क्षमता, हूल के उद्देश्य और आदर्श आदि के वास्तविक स्वरूप को सामने रखा है। यह पुस्तक एक ओर सन्ताल हूल सम्बन्धी पहले के अध्ययनों की समीक्षा करती है तो भावी अध्ययनों के लिए एक प्रासंगिक दिशा निर्देश भी प्रस्तावित करती है। सिदो, कानू, चाँद और भैरव जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आरम्भिक सूत्रधारों को उनका श्रेय प्रदान करते हुए यह पुस्तक इतिहास के अधूरे परिप्रेक्ष्य को पूरा करती है।
Bharat : Itihas, Sanskriti aur Vigyan
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

-
Description:
पिछले चार-पाँच दशकों से नए स्वस्थ दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास व संस्कृति का अध्ययन करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे प्रयासों में अग्रणी रहे डॉ. दामोदर कोसंबी। अनेक विद्वानों ने भारतीय इतिहास व संस्कृति के विविध अंगों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। लेकिन वे पुस्तकें गम्भीर पाठकों और अध्येताओं के लिए हैं।
इस पुस्तक में आदिम काल से लेकर आज तक के भारतीय इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। यह पुस्तक मुख्यतः विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखी गई है। चूँकि यह पुस्तक नए ढंग से, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई है, इसलिए इसे स्कूलों के अध्यापक भी उपयोगी पाएँगे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा गया भारत का इतिहास विद्यार्थियों के हाथों में पहुँचे, इसी उद्देश्य से गुणाकर मुळे ने यह पुस्तक लिखी है। इतिहास के प्रति उनका दृष्टिकोण क्या है, इसकी जानकारी उन्होंने प्रथम अध्याय में दे दी है। पुस्तक में राजा-महाराजाओं के क़िस्से कम हैं, संस्कृति के बारे में अधिक जानकारी दी गई है। तिथियों की भी भरमार नहीं है, राजवंशों की तालिकाएँ और प्रमुख घटनाओं की तिथियाँ पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।
America 2020 : Ek Banta Hua Desh
- Author Name:
Avinash Kalla
- Book Type:

- Description: अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का आँखों-देखा हाल बयान करती यह किताब दुनिया के सबसे विकसित और शक्तिशाली देश के उस चेहरे का साक्षात्कार कराती है जो उसकी बहुप्रचारित छवि से अब तक प्रायः ढँका रहा है। 42 दिनों की यात्रा में लेखक ने कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण के दौर में 34 दिन कार चलाकर लगभग 18 हजार किलोमीटर का जमीनी सफर तय किया। नतीजा यह किताब है जिसमें लेखक ने उस अमेरिका पर रौशनी डाली है जो हमारी कल्पनाओं से मेल नहीं खाता, लेकिन जो वास्तविक है और काफी हद तक भारत के अधिसंख्य लोगों की तरह रोजी-रोटी और सेहत की चिन्ताओं से बावस्ता है। यह किताब एक ओर अमेरिका और उसके राष्ट्रपति के सर्वशक्तिमान होने के मिथक को उघाड़ती है तो दूसरी ओर उन संकटों और दुविधाओं को भी उजागर करती है जिनसे ‘दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र’ आज जूझ रहा है। यह अमेरिका के बहाने आगाह करती है कि लोकतंत्र सिर्फ़ हार-जीत या व्यवस्था का मसला नहीं है, बल्कि मानवीय उसूलों और साझे भविष्य के लिए किया जाने वाला सतत प्रयास है। इसके प्रति कोई भी उदासीनता किसी भी देश और उसके नागरिकों को आपस में बाँट कर सकती है।
Bharat Mein Angrezi Raj Aur Marxvaad : Vol. 1
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना और भाषाविज्ञान विषयक युगान्तकारी कृतित्व की कड़ी में डॉ. रामविलास शर्मा की यह एक और उपलब्धि-कृति है। दो खंडो़ में प्रकाशित इतिहास विषयक इस ग्रन्थ का यह पहला खंड है।
छह अध्यायों में विभक्त इस खंड की मुख्य प्रस्थापना यह है कि भारतीय जनता की समाजवादी चेतना उसकी साम्राज्यविरोधी चेतना का ही प्रसार है। इसे साहित्य और राजनीति, दोनों के विश्लेषण और आवश्यक प्रमाणों सहित इस खंड में स्पष्ट किया गया है। इसके पहले अध्याय में रामविलास जी ने विश्व बाज़ार क़ायम करनेवाली ब्रिटिश-नीति की विवेचना की है और सिद्ध किया है कि भारत इसी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। तभी तो भारतीय माल को ब्रिटिश बाज़ार में बेचनेवाले अंग्रेज़ व्यापारी कुछ ही वर्षों के बाद ब्रिटिश माल को भारतीय बाज़ारों में बचने योग्य हो गए। दूसरे अध्याय में गदर, गदर पार्टी और क्रान्तिकारी दल की चर्चा करते हुए जयप्रकाश नारायण, जवाहरलाल नेहरू और मार्क्सवादियों के तत्सम्बन्धी दृष्टिकोण की समीक्षा की गई है। तीसरे अध्याय में लाला हरदयाल, जयप्रकाश और नेहरू की मार्क्सवादी धारणाओं का विवेचन हुआ है। चौथा अध्याय ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उस हिन्दी साहित्य को सामने रखता है जो 1917 में रूसी क्रान्ति से पूर्व लिखा जाकर भी मार्क्सवादी विचारधारा से सम्बद्ध है। पाँचवें अध्याय में डॉ. शर्मा ने स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए समझौतावादी और क्रान्तिकारी, दोनों रुझानों का विश्लेषण करते हुए उन पर किसान-मज़दूर-संगठनों के प्रभाव का आकलन किया है और छठे अध्याय में, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारतीय क्रान्तिकारी उभार पर मुस्लिम सम्प्रदायवाद की शक्ल में किए गए साम्राज्यवादी हमले की भीतरी परतों की गहरी पड़ताल की है।
संक्षेप में डॉ. रामविलास शर्मा का यह ग्रन्थ अंग्रेज़ी राज के दौरान भारतीय जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष-चेतना और उसके विरुद्ध रची गई पेचीदा साज़िशों का पहली बार प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
Gandhi-Drishti Ke Vividh Aayam
- Author Name:
Shambhu Joshi
- Book Type:

-
Description:
जब गांधी जी बर्बरीकरण की बात करते हैं तो वह केवल स्थूल हिंसा तक सीमित नहीं है। उसमें हिंसा के वे सब रूप और आयाम शामिल हैं, जिन्हें संरचनागत हिंसा, सांस्कृतिक हिंसा और पीड़ितोन्मुख अप्रत्यक्ष हिंसा कहते हैं। प्रत्यक्ष हिंसा भी इस संरचनागत हिंसा का ही प्रतिफलन होती है, जिसे सांस्कृतिक हिंसा एक वैधता प्रदान करने की कोशिश करती है।
महात्मा गांधी के विचार-सूत्रों में यदि इस प्रकार की सभी समस्याओं के प्रति एक अद्भुत जागरूकता तथा एक नैतिक-तार्किक संगति दिखाई देती है तो इसका कारण शायद यही है कि उनका सारा जीवन और चिन्तन अहिंसा-प्रेम के नियम से प्रेरित रहा है। विस्मय इस बात का होता है कि उनके नैतिक आग्रहों में कहीं भी अर्थशास्त्रीय सवालों की अनदेखी नहीं है। वह यह मानते हैं कि 'सच्चा अर्थशास्त्र कभी उच्चतम नैतिक मानकों का विरोधी नहीं होता, ठीक उसी प्रकार सच्चा नीतिशास्त्र वही माना जा सकता है, जो नीतिशास्त्र होने के साथ-साथ एक अच्छा अर्थशास्त्र भी हो...।
अब तो मेजारोस, लेबो विट्ज और टेरी इगल्टन जैसे नए मार्क्सवादी विचारक भी विकेन्द्रीकृत प्रौद्योगिकी और उत्पादन की बात करने लगे हैं, जिस पर न कॉरपोरेट का नियंत्रण हो, न राज्य का। यह उन उत्पादन-शक्तियों के विकल्प से ही हो सकता है, जो उत्पादन के साथ-साथ मुनाफ़े के वितरण की समस्या का भी समाधान अन्तर्निहित किए हैं। लेकिन विकेन्द्रीकृत तकनीक पर ही, जिसे गांधी जी 'स्वदेशी' कहते हैं, विकेन्द्रीकृत स्वामित्व का विकास हो सकता है। राष्ट्रीय अथवा बहुराष्ट्रीय, किसी भी प्रकार के पूँजीवाद और उसके अनिवार्य प्रतिफलन साम्राज्यवाद का विकल्प इसलिए 'स्वदेशी' तकनीकी और उत्पादन-व्यवस्था ही हो सकती है, जिसके अन्तर्गत मानवीय स्वातंत्र्य और व्यक्तित्व भी पोषित होता है और प्राकृतिक विनाश का ख़तरा भी नहीं रहता।
इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें गांधी-दृष्टि के विविध आयामों को उनके साध्य सत्य तथा साधन अहिंसा अर्थात प्रेम के बीज से पल्लवित सिद्ध करने का स्तुत्य प्रयास किया गया है।...यह पुस्तक जहाँ सामान्य पाठकों को गांधी-विचार की प्रामाणिक जानकारी दे सकेगी, वहीं अध्येताओं, छात्रों और अध्यापकों के लिए भी अतीव उपयोगी साबित होगी।
—नन्दकिशोर आचार्य
1971 Bharat Pak Yuddha
- Author Name:
Lt Gen K K Nanda
- Book Type:

- Description: 1971 का भारत-पाक युद्ध सन् 1971 के अंत तक याह्या खाँ पूरी तरह से विश्वस्त हो चुके थे कि भारत के साथ पूर्व में युद्ध करना अनिवार्य हो चुका है। वे इस बात को लेकर भी विश्वस्त थे कि उनके लिए भारतीय सेनाओं को पराजित करना संभव नहीं है तथा वे पूर्वी पाकिस्तान का बलिदान करने के लिए तैयार थे। वहीं उन्हें यह भी विश्वास था कि वे पश्चिम में एक विशाल क्षेत्र पर कब्जा करके पूर्वी पाकिस्तान की क्षतिपूर्ति कर लेंगे तथा इसके द्वारा ‘वे न केवल भारत को नीचा दिखाने और अपना सम्मान बनाए रखने में सफल रहेंगे, अपितु युद्ध के अंत में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में होंगे।’ परंतु सन् 1971 में भारत के जाँबाज सैनिकों ने पाकिस्तान के नब्बे हजार सैनिकों को बंदी बनाकर ऐसा करिश्मा कर दिखाया, जो सारी दुनिया में बेजोड़ था। इस पुस्तक में 1971 की शानदार विजय की गौरव गाथा के साथ-साथ उड़ी क्षेत्र में सन् 1947-48 तथा 1965 के दौरान 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड एवं अन्य सैन्य टुकड़ियों के द्वारा उनके नियंत्रण-क्षेत्रों में उनके द्वारा किए गए सैन्य अभियानों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। लेफ्टिनेंट जनरल के.के. नंदा ने अपनी 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व करते हुए रक्षात्मक युद्ध लड़ा और अपनी बहादुरी एवं दूरदर्शिता से भारत की एक इंच भूमि भी दुश्मन के कब्जे में नहीं जाने दी। प्रस्तुत पुस्तक का अपना सामरिक महत्त्व है। भविष्य में युद्धों की योजना बनाते समय विभिन्न स्तरों के कमांडर इसके विवरणों से भरपूर लाभ उठाएँगे तथा भारत की सीमाओं की रक्षा में प्राणपण से सफल होंगे।
Bharatiya Sabhyata Ki Nirmiti
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description: भारतीय सभ्यता की निर्मिति’ भारतीय सभ्यता के इतिहास की उस बड़ी कमी को दूर करने का सुचिन्तित प्रयास है, जो सभ्यता के निर्माताओं के बजाय भोक्ताओं को केन्द्र में रख कर लिखने से पैदा हुई है। वास्तव में भोक्ताओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया इतिहास दमन के औजारों, हथियारों, संस्थाओं और वर्चस्व के रूपों का इतिहास होता है, जिसमें अर्थव्यवस्था और सामाजिक सम्बन्धों के बजाय अधिरचना को प्रमुखता दी जाती है। इससे इतिहास में समाज के वही तबके अनुल्लिखित रह जाते हैं जिनके बिना सभ्यता ही सम्भव नहीं हो पाती। यह समस्या केवल भारतीय सभ्यता के इतिहास की नहीं, बल्कि समूचे ‘सभ्य’ संसार की रही है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए यह पुस्तक इतिहास के उन अनदेखे-ओझल-पक्षों की सूक्ष्मता से और सप्रमाण विवेचना करती है, जिनके बिना भारतीय सभ्यता की महायात्रा से परिचित होना सम्भव नहीं है।
Pt. Deendayalji : Prerak Vichar
- Author Name:
Dr. Ravindra Agarwal
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Dr. Ambedkar Aur Rashtravad
- Author Name:
Basant Kumar
- Book Type:

- Description: "भारत के संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के विचारों को वामपंथियों एवं अल्पसंख्यक गठबंधन में शामिल लोगों ने सदैव तोड़-मरोड़कर पेश किया और देश में पाँच दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस ने निजी स्वार्थ के कारण बाबासाहब को सदैव दलितों एवं वंचितों के नेता के रूप में प्रस्तुत किया। मानो देश के विकास और उत्थान में उनका कोई योगदान ही न रहा हो। आज देश में दलित-मुसलिम गठजोड़ के बहाने ये अलगाववादी देश में अशांति फैलाना चाहते हैं। इन चीजों को भाँपते हुए डॉ. आंबेडकर ने सन् 1940 में देश के विभाजन की स्थिति में हिंदू एवं मुसलिम जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण की बात की थी। उन्होंने देश को ऐसा संविधान दिया जो देश की अखंडता एवं एकता को आज भी सुरक्षित किए हुए है। उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 370 का विरोध किया, पर नेहरू के मुसलिम-प्रेम के कारण इसे जोड़ा गया। नागरिकों के हितों की सुरक्षा हेतु संविधान में मूल आधारों की व्यवस्था की। अर्थशास्त्र के शोध छात्र के रूप में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया व वित्त आयोग का प्रारूप दिया। देश के कानून मंत्री के रूप में हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति में उत्तराधिकार और उनके सशक्तीकरण का पथ प्रशस्त किया। बाबासाहब आंबेडकर के राष्ट्रवादी विचारों को लोगों तक पहुँचाने और राष्ट्र के विकास में उनके योगदान पर उत्कृष्ट कृति। "
Hindustan Mein Jaat Satta
- Author Name:
Jan Dalosh
- Book Type:

-
Description:
मुग़ल साम्राज्य की अवनति के बारे में उपलब्ध यूरोपीय प्रलेखों में पादरी एफ.एक्स. वैदेल द्वारा फ़्रेंच भाषा में लिखित वृत्त-लेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। टीफैनथेलर और मोदाव के समकालीन वैदेल ने उत्तर भारत के राजनीतिक मामलों के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है। उसमें जाट-सत्ता सम्बन्धी वृत्त-लेख प्राथमिक स्रोत होने के कारण सबसे मूल्यवान हैं। ये वृत्तलेख मुग़ल राजतंत्र की तत्कालीन स्थिति और मुग़ल साम्राज्य के पतन में जाटों की भूमिका को समझने के लिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं।
वस्तुत: वैदेल धर्मप्रचारक के छद्म वेश में अंग्रेज़ों के लिए तत्कालीन शक्तिशाली जाट-शक्ति की जासूसी कर रहा था। आभिजात्य संस्कार वाला वैदेल जब किसी भारतीय घटना, वस्तु या व्यक्ति के किसी एक पक्ष की सूचना देता है तो वह व्यक्तिनिष्ठ अवधारणा के वशीभूत होकर उनको यूरोपीय मानदंड से परखता है और भारतीयों को हेयदृष्टि से देखता है। परन्तु जब वह परिस्थिति, घटना और व्यक्तियों का उनकी समग्रता में वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करता है तो वह तीक्ष्ण बुद्धिवाला विश्लेषक दृष्टिगोचर होता है। इतिहासकारों की तथ्य-अन्वेषक दृष्टि इस अन्तर को समझकर, पूर्वग्रह के झीने परदे को हटाकर इन तर्कसंगत विश्लेषणों को खोज लेती है। तत्कालीन मुख्य घटनाओं के ये विश्लेषण इतिहास की थाती हैं। इसी प्रकार वैदेल ने मुग़ल साम्राज्य के पतन के ज़िम्मेदार मुहम्मदशाह, अहमदशाह आदि अयोग्य शासकों, गुटबन्दी में लिप्त सफ़दरजंग, ग़ाज़ीउद्दीन ख़ाँ और नजीबुद्दौला, उनके स्वार्थी वजीरों तथा जाट-शक्ति के उन्नायक बदनसिंह, सूरजमल उघैर जवाहरसिंह के चरित्रों का उनकी समग्रता में मूल्यांकन करने में सफलता प्राप्त की है। संक्षेप में, वैदेल ने अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमोत्तर भारत की मुख्य रूप से मुग़ल और जाट-शक्तियों के साथ-साथ मराठा, सिख एवं राजपूतों की राजनैतिक शक्तियों की रूपरेखाओं का अंकन करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तत्कालीन सामान्य अवनति और राजनैतिक अस्थिरता के परिदृश्य में वैभवशाली जाट-सत्ता के कृषि-आधारित आर्थिक विकास के कारण सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन के शोध के लिए भी वैदेल ने पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराई है, जिसकी ओर विद्वानों का अभी तक ध्यान नहीं गया है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book