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Awadh Ka Kisan Vidroh

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भारत को किसानों का देश कहा जाता है, बावजूद इसके न तो किसान कभी इस धारणा को अपने आत्मविश्वास में अनूदित कर सके, न देश के मध्यवर्ग और कर्णधारों ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया। यह देश जो लगातार आगे बढ़ता रहा है, इसका किसान या तो ख़ुद पीछे छूटता चला गया या आगे बढ़ने के लिए उसने किसान की अपनी पहचान को पीछे छोड़ा है। यह हमारे राष्ट्रीय जीवन की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में एक है। यह पुस्तक भारतीय किसान-जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पर केन्द्रित है। 1920-22 के दौरान अवध के लगभग सभी ज़िलों में स्वत:स्फूर्त ढंग से फूट पड़ा किसान-विद्रोह उस आक्रोश की अभिव्यक्ति था जो किसानों के मन में अपनी लगातार उपेक्षा से पनप रहा था। इस घटना ने एक ओर तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नीतियों की सीवन उधेड़कर उसकी वास्तविकता को उजागर किया तो दूसरी ओर राष्ट्रवादी सोच और उसके नेतृत्व के वर्ग-आधार को स्पष्ट करते हुए वर्ग और जाति की विकृतियों को भी उजागर किया। इस आन्दोलन ने शायद पहली बार राष्ट्रवाद की सुपुष्ट मिट्टी से गढ़े जानेवाले देश की वर्गीय प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। आश्चर्य नहीं कि राष्ट्र-निर्माण की आक्रामक पहलक़दमियों में आज भी न सिर्फ़ किसान बल्कि वे सब लोग बाहर रह जाते हैं जिनके पास अपनी बात कहने की भाषा और सामाजिक साहस नहीं है। किसान की अवस्थिति, क्योंकि शहर के हाशिये से भी काफ़ी दूर है, इसलिए वह केन्द्रीय सत्ताओं पर अपना दबाव और भी कम डाल पाता है। उनके किसी भी आन्दोलन के क्रान्तिकारी तेवर को दबाने और अभिजात तबकों को लाभ पहुँचाने की नीति तब भी आम थी, आज भी आम है। अवध के किसान-विद्रोह का यह पुनर्मूल्यांकन देश के एक अमूर्त विराट के बहाने एक विशाल जनसमूह के मूर्त की इस सुनियोजित उपेक्षा की परम्परा के वर्तमान को समझने के लिए भी उपयोगी है।

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भारत को किसानों का देश कहा जाता है, बावजूद इसके न तो किसान कभी इस धारणा को अपने आत्मविश्वास में अनूदित कर सके, न देश के मध्यवर्ग और कर्णधारों ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया। यह देश जो लगातार आगे बढ़ता रहा है, इसका किसान या तो ख़ुद पीछे छूटता चला गया या आगे बढ़ने के लिए उसने किसान की अपनी पहचान को पीछे छोड़ा है। यह हमारे राष्ट्रीय जीवन की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में एक है।

यह पुस्तक भारतीय किसान-जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पर केन्द्रित है। 1920-22 के दौरान अवध के लगभग सभी ज़िलों में स्वत:स्फूर्त ढंग से फूट पड़ा किसान-विद्रोह उस आक्रोश की अभिव्यक्ति था जो किसानों के मन में अपनी लगातार उपेक्षा से पनप रहा था। इस घटना ने एक ओर तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नीतियों की सीवन उधेड़कर उसकी वास्तविकता को उजागर किया तो दूसरी ओर राष्ट्रवादी सोच और उसके नेतृत्व के वर्ग-आधार को स्पष्ट करते हुए वर्ग और जाति की विकृतियों को भी उजागर किया। इस आन्दोलन ने शायद पहली बार राष्ट्रवाद की सुपुष्ट मिट्टी से गढ़े जानेवाले देश की वर्गीय प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। आश्चर्य नहीं कि राष्ट्र-निर्माण की आक्रामक पहलक़दमियों में आज भी न सिर्फ़ किसान बल्कि वे सब लोग बाहर रह जाते हैं जिनके पास अपनी बात कहने की भाषा और सामाजिक साहस नहीं है। किसान की अवस्थिति, क्योंकि शहर के हाशिये से भी काफ़ी दूर है, इसलिए वह केन्द्रीय सत्ताओं पर अपना दबाव और भी कम डाल पाता है। उनके किसी भी आन्दोलन के क्रान्तिकारी तेवर को दबाने और अभिजात तबकों को लाभ पहुँचाने की नीति तब भी आम थी, आज भी आम है।

अवध के किसान-विद्रोह का यह पुनर्मूल्यांकन देश के एक अमूर्त विराट के बहाने एक विशाल जनसमूह के मूर्त की इस सुनियोजित उपेक्षा की परम्परा के वर्तमान को समझने के लिए भी उपयोगी है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2018
Weight
340 grams
ISBN-13
9789387462410
Pages
328
Reading time
~11 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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