Bhartiya Samantwad
(0)
Author:
Ramsharan SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
995
796 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
भारतीय इतिहास में सामन्ती ढाँचे के स्वरूप को लेकर इतिहासकारों के बीच आज भी मतभेद बरक़रार हैं, अब भी पत्र-पत्रिकाओं में इस विषय पर बहस चलती रहती है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. रामशरण शर्मा ने पहली बार भारतीय सामन्तवाद के सम्पूर्ण पक्षों को लेकर उन पर सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया था। तब से लेकर आज तक न केवल इस पुस्तक के अंग्रेज़ी में एक से अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, बल्कि भारतीय सामन्तवाद के सर्वांगीण अध्ययन के लिए दूसरी कोई पुस्तक आज तक सामने नहीं आई है।</p> <p>प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. शर्मा ने भारतीय सामन्तवाद के जन्म से लेकर उसके प्रौढ़ होने तक प्रायः नौ सौ वर्षों के इतिहास का विवेचन किया है, जिसके दायरे में उन्होंने अनेक समस्याएँ उठाई हैं और कालान्तर से उनके विशद विवेचन का मार्ग प्रशस्त किया है। क्षेत्र की दृष्टि से उनका यह अध्ययन मुख्यतः उत्तर भारत तक सीमित है और इसमें उन्होंने सामन्तवाद के राजनीतिक तथा आर्थिक पहलुओं पर ही विशेष रूप से विचार किया है। सामन्तवादी व्यवस्था में किसानों और किराए के मज़दूरों की दुर्दशा का सविस्तार विवेचन करते हुए प्रो. शर्मा ने दिखाया है कि कैसे श्रीमन्त वर्ग अपने उच्चतर अधिकारों के द्वारा उपज का सारा अतिरिक्त हिस्सा हड़प लेता था और किसानों के पास उतना ही छोड़ता था जितना खा-पीकर वे उस वर्ग के लाभ के लिए आगे भी मेहनत-मशक़्क़त करते रह सकें।</p> <p>भारतीय इतिहास, भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति के अध्येताओं के लिए यह पुस्तक न सिर्फ़ उपयोगी है बल्कि अपरिहार्य भी है। इसमें प्रस्तुत की गई मूल स्थापनाएँ आज भी अकाट्य हैं।
Read moreAbout the Book
भारतीय इतिहास में सामन्ती ढाँचे के स्वरूप को लेकर इतिहासकारों के बीच आज भी मतभेद बरक़रार हैं, अब भी पत्र-पत्रिकाओं में इस विषय पर बहस चलती रहती है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. रामशरण शर्मा ने पहली बार भारतीय सामन्तवाद के सम्पूर्ण पक्षों को लेकर उन पर सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया था। तब से लेकर आज तक न केवल इस पुस्तक के अंग्रेज़ी में एक से अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, बल्कि भारतीय सामन्तवाद के सर्वांगीण अध्ययन के लिए दूसरी कोई पुस्तक आज तक सामने नहीं आई है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. शर्मा ने भारतीय सामन्तवाद के जन्म से लेकर उसके प्रौढ़ होने तक प्रायः नौ सौ वर्षों के इतिहास का विवेचन किया है, जिसके दायरे में उन्होंने अनेक समस्याएँ उठाई हैं और कालान्तर से उनके विशद विवेचन का मार्ग प्रशस्त किया है। क्षेत्र की दृष्टि से उनका यह अध्ययन मुख्यतः उत्तर भारत तक सीमित है और इसमें उन्होंने सामन्तवाद के राजनीतिक तथा आर्थिक पहलुओं पर ही विशेष रूप से विचार किया है। सामन्तवादी व्यवस्था में किसानों और किराए के मज़दूरों की दुर्दशा का सविस्तार विवेचन करते हुए प्रो. शर्मा ने दिखाया है कि कैसे श्रीमन्त वर्ग अपने उच्चतर अधिकारों के द्वारा उपज का सारा अतिरिक्त हिस्सा हड़प लेता था और किसानों के पास उतना ही छोड़ता था जितना खा-पीकर वे उस वर्ग के लाभ के लिए आगे भी मेहनत-मशक़्क़त करते रह सकें।</p>
<p>भारतीय इतिहास, भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति के अध्येताओं के लिए यह पुस्तक न सिर्फ़ उपयोगी है बल्कि अपरिहार्य भी है। इसमें प्रस्तुत की गई मूल स्थापनाएँ आज भी अकाट्य हैं।
Book Details
-
ISBN9788171782826
-
Pages274
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Unneesaveen Sadi Ka Aupniveshik Bharat : Navjagaran Aur Jaati-Prashna
- Author Name:
Rupa Gupta
- Book Type:

- Description: उन्नीसवीं सदी उनमें से ज़्यादातर मूल्यों की जन्मदाता रही है जो बीसवीं सदी में भारत के जन-गण, राजनीति और सामाजिक गति-प्रगति के आधार-मूल्य रहे। आधुनिकता का विचार इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है जो इसी सदी में भारत आया और जिसने हमें अपनी चारित्रिक बनावट को देखने के लिए एक नई दृष्टि दी। राष्ट्र का विचार और विभिन्न सांस्कृतिक प्रश्नों का उत्तर खोजने की ललक भी इसी सदी में पैदा हुई। परम्परा और आधुनिकता, तर्क और आस्था, विज्ञान और धर्म के तार्किक घात-प्रतिघात का यह समय आनेवाली सदियों में हमारी चिन्तनधारा की पृष्ठभूमि होना था। यह पुस्तक इस आलोड़नकारी समय में जाति के प्रश्न को टटोलती है। क्या आर्थिक आत्मनिर्भरता, विदेशी शोषकों के विरोध, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक उत्थान के अन्य प्रश्नों की चेतना का यह दौर जाति को लेकर भी उतना ही उद्विग्न था? या फिर भारतीय समाज को आज तक अपने चंगुल में दबोचे रखनेवाली 'जाति' देश के जातीय पुनर्जागरण की समग्र धारणा में कहीं पीछे छूट गई थी? छूट गई थी तो क्या वह निष्क्रिय भी थी? क्या वह देश और मनुष्यता के बोध को भीतर-भीतर खा नहीं रही थी? और भारत का अग्रणी बौद्धिक वर्ग उसे लेकर कितना सचेत और विचलित था? यह सुदीर्घ पुस्तक इन्हीं प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए नवजागरणकालीन हिन्दी साहित्य को लेकर हुए नए शोध-कार्यों की रोशनी में एक सन्तुलित दृष्टि बनाने की कोशिश करती है। भारतेन्दुकालीन साहित्य और पत्रकारिता आदि के परिप्रेक्ष्य में जाति और स्त्री विषयक चिन्तन को लेकर जो एकांगी मान्यताएँ इधर प्रचलन में आई हैं, इसमें उनका भी निवारण करने का प्रयास किया गया है। इतिहास और साहित्येतिहास की श्रेणी से स्वयं को बाहर रखते हुए भी यह शोध-ग्रंथ इन दोनों विधाओं को जोड़ते हुए आलोचना की एक नई समझ का विस्तार करता है। भाषा की सामाजिक व्याप्ति, सत्ता की भाषा, वर्ण-धर्म-जाति के समीकरण, 1857 के स्वाधीनता संग्राम में जातियाँ और जातीय बोध आदि कई विषयों को व्यापक अध्ययन के आधार पर विश्लेषित करते हुए यह पुस्तक पाठकों, शोध-छात्रों और अध्येताओं को दृष्टि तथा ज्ञान, दोनों स्तरों पर समृद्ध करेगी।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Gautam Buddh Nagar
- Author Name:
Baljinder Nasrali
- Book Type:

-
Description:
आज जब हम चारों ओर नजरें दौड़ाते हैं तो एक अजीब विडम्बना से साक्षात्कार होता है। हम सब एक ऐसी विदेशी सभ्यता के लिए जिम्मेदारी महसूस करते हैं, जिसने आजादी से पहले के लगभग दो सौ वर्षों में हमारी संस्कृति की लय को बुरी तरह से विकृत कर दिया था।
अंग्रेज विद्वानों ने हमारे शास्त्रों और पुराणों का विश्लेषण किया तो हम शायद अतिरिक्त चौकन्ने होकर ऐसी परम्परा के प्रति सजग हुए, जिसे आज तक हम बिना परिभाषित किये सहज भाव से अपने जीवन में अपनाते रहे थे। शास्त्रों और पुराणों में हमारी जिन्दगी थी। इस तरह के इतिहास के दखल होने से पहले, इस तरह की सामाजिक व्याख्या से पहले भी हमारा अपनी संस्कृति के साथ एक सहज और स्पष्ट लगाव था। वह परिभाषित नहीं था, उसे परिभाषित होने की जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि वह हमारी धड़कनों में था। एक भारतीय कभी अपनी संस्कृति को बाहर से नहीं देखता। संस्कृति तो उसके अंदर बसी होती है। अतिरिक्त सजगता तभी उत्पन्न होती है, जब मनुष्य का अपने अतीत और परम्परा से अलगाव हो जाता है। एक भारतीय की परम्परा कहीं बाहर नहीं, उसके भीतर रहती है, इसलिए सजग रूप से उससे स्वयं को जोड़ने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इसलिए यह पुस्तक गौतम बुद्ध नगर की परम्परा, संस्कृति, स्वाभिमान, सभ्यता और आजादी पर जब कुछ बातों को आपके सामने लाती है तो एक पाठक होने के नाते आप एक सहज लगाव, एक सहज भारतीय बोध स्वाभाविक रूप से महसूस करते हैं। साथ ही, गौतम बुद्ध नगर के स्वाभिमान भरे इतिहास को पढ़ते हुए आपको गर्व का अनुभव होगा। समय की धारा में ठहरे हुए संकेत और सूत्र इस पुस्तक में स्वाभिमान की एक नई कहानी कह रहे हैं।
Samvidhan, Sanskriti Aur Rashtra
- Author Name:
Kalraj Mishra
- Book Type:

- Description: No Description Available for this Book
Sarabjit Singh : A Case of Mistaken Identity
- Author Name:
Awaish Sheikh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Ek Doosre Shikhar se
- Author Name:
Chandrashekhar
- Book Type:

- Description: यह तीसरा खंड पूर्व के दोनों खंडों से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि इस दौरान चन्द्रशेखर देश के मुख्य कार्यकारी की भूमिका में हैं। इस दौरान वे देश की जनता की बुनियादी समस्याओं के बारे में कैसा रुख रखते हैं और इनके निदान के लिए उनके पास क्या कार्यक्रम है, इसकी झलक इस खंड के साक्षात्कारों से मिलती है। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता, राजनीति, राष्ट्रीय सरकार, समाजवाद, विदेश नीति तथा अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर खुलकर अपना पक्ष रखा है। प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों की विशेषता है कि वे दृढ़ता से भारत का पक्ष रखते हैं। भेंटवार्ताओं में विभिन्न बुनियादी मुद्दों पर चन्द्रशेखर के विचार अनायास व्यक्त हुए हैं। विभिन्न मुद्दों पर चन्द्रशेखर की मान्यताओं से उनकी अंतर्दृष्टि का भी पता चलता है। उन्हें और मूलभूत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों को जानने-समझने में भी ये साक्षात्कार मदद पहुँचाते हैं। सत्तर के दशक से शुरू हुआ विमर्श पूर्व-पक्ष है तो इस तीसरे खंड का विमर्श उत्तर-पक्ष।
Kattarta Ke Daur Mein
- Author Name:
Arun Kumar Tripathi
- Book Type:

- Description: बीसवीं सदी के भारी उथल-पुथल भरे आख़िरी दशक पर केन्द्रित यह पुस्तक अपने युग की प्रमुख प्रवृत्तियों पर बेबाक टिप्पणियाँ करती है। यह उदारीकरण, साम्प्रदायिकता और जातिवाद सभी का एक्स-रे करने और उसे सरल भाषा में सभी को समझाने का प्रयास है। पुस्तक इससे आगे बढ़कर उन सबसे संवाद करती है जो अपनी-अपनी प्रयोगशालाओं में विकल्पों के लिए रसायन बनाने में लगे हैं। इसमें दलित, आदिवासी, स्त्री और पर्यावरण की रक्षा के लिए चल रहे संघर्षों की जटिलताओं और सम्भावनाओं को समझने की एक तड़प है; यानी यह समाज को कट्टरता से निकालने का एक उपक्रम है।
Patriotic Pilgrimage of India
- Author Name:
Rishi Raj
- Book Type:

- Description: This book is an attempt to make our present generation aware of those great people who sacrificed their lives to protect our Motherland, thereby enabling us to breathe in the free environment. This book is an account to their acts of valour and places associated with them. With a firm view that every Indian is indebted to contributions of all such warriors, freedom fighters, revolutionaries whose debts cannot be repaid by any means, the author believes that we can lessen the debts by visiting those sacred places, by meeting their families and also by passing these virtues to our younger generation. More than a work of history, this book is the result of the author’s aspiration to visit the historical sites of our illustrious country. Through this book, the author has connected these shrines of martyrdom to their history and importance in the present. This book consists of details of about 50 such places associated with the martyrs and patriots. The book is intended to act as a bridge that may help our older generation connect with the younger generation.
Chashme Wale Masterji
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description: "बरसों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे प्रकाश मनु बच्चों के चहेते कथाकार हैं। उन्होंने बच्चों के लिए खूब लिखा है— एक-से-एक सुंदर गीत, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास, जिन्हें बच्चे चाव से पढ़ते और उनके साथ-साथ हँसते-गाते, चहकते, खिलखिलाते हैं। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ प्रकाश मनु की पिछले कुछ अरसे में लिखी गई ताजा बाल कहानियों का संग्रह है। इसमें नन्हे-मुन्नों के नन्हे सपनों की कहानियाँ हैं, तो दूसरी ओर किस्सागोई से भरपूर ऐसी दिलचस्प कहानियाँ भी, जो बच्चों को एक निराली दुनिया में ले जाएँगी। ये ऐसी बाल कहानियाँ हैं, जिनमें बचपन का हर रंग, हर अंदाज है और नटखटपन से भरी कौतुकपूर्ण छवियाँ भी, जो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी मुग्ध करती हैं। इनमें बच्चे हैं, बच्चों के सुख-दु:ख और सपने हैं तो उनके छोटे से संसार की बड़ी मुश्किलें भी हैं, और इन्हें लिखा गया है बेहद चुस्त, सधे, खिलंदड़े अंदाज में। कुछ कहानियों में बच्चों को एक भोले और अलमस्त बच्चे कुक्कू की नटखट शरारतें, खेल और मस्ती की रेल-पेल लुभाएगी तो कुछ में वे निक्का, तान्या, निक्की, साशा, मीशा, खुशी और मिली के संग खूब हँसेंगे, खिलखिलाएँगे और खेल-खेल में बहुत कुछ सीखेंगे भी। साथ ही अपनी मुश्किलों से निकलने की राह पाएँगे। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ पुस्तक की हर कहानी में बचपन की एक अलग छवि है और नटखटपन से भरी एक हँसती-खिलखिलाती दुनिया! इसीलिए ये कहानियाँ बच्चों को अपने दोस्त सरीखी लगेंगी। एक बार पढ़ने के बाद वे इन्हें कभी भूलेंगे नहीं और हमेशा एक ‘बहुमूल्य उपहार’ की तरह सँजोकर रखेंगे। "
Madhyakaleen Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

-
Description:
सल्तनत काल में चरखा भारत में लोकप्रिय हुआ। इरफ़ान हबीब कहते हैं कि निश्चित रूप से चरखा और धुनिया की कमान सम्भवत: 13वीं और 14वीं शताब्दी में बाहर से भारत आए होंगे। प्रमाण मिलते हैं कि काग़ज़ लगभग 100 ई. के आसपास चीन में बनाया गया। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, अलबरूनी ने स्पष्ट किया है कि 11वीं सदी के आसपास प्रारम्भिक वर्षों में मुस्लिम पूरी तरह से काग़ज़ का इस्तेमाल करने लगे थे। बहरत में इसका निर्माण तेरहवीं शताब्दी में ही आरम्भ हुआ जैसा कि अमीर ख़ुसरो ने उल्लेख किया है।
भारत में मुस्लिम सल्तनतों के स्थापित होने के बाद अरबी चिकित्सा विज्ञान ईरान के मार्ग से भारत पहुँचा। उस समय तक इसे यूनानी तिब्ब के नाम से जाना जाता था। परन्तु अपने वास्तविक रूप में यह यूनानी, भारतीय, ईरानी और अरबी चिकित्सकों के प्रयत्नों का एक सम्मिश्रण था। इस काल में हिन्दू वैद्यों और मुस्लिम हकीमों के बीच सहयोग एवं तादात्म्य स्थापित था। भारतीय चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से मुग़ल साम्राज्य को स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। दिल्ली की वास्तु-कला का वास्तविक गौरव भी मुग़लकालीन है। संगीत के क्षेत्र में सितार और तबला भी मुस्लिम संगीतज्ञों की देन है।
विभिन्न क्षेत्रों के इन्हीं सब तथ्यों के दायरे में यह पुस्तक तैयार की गई है। तीस अध्यायों की इस पुस्तक में ख़ास के विपरीत आम के कारनामों एवं योगदानों पर रोशनी डालने का प्रयास किया गया है। व्हेनत्सांग के विवरण को सबसे पहले पेश किया गया है ताकि मध्यकाल की सामन्तवादी पृष्ठभूमि को भी समझा जा सके। धातु तकनीक, रजत तकनीक, स्वर्ण तकनीक, काग़ज़ का निर्माण आदि के अलावा लल्ल, वाग्भट, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य, वतेश्वर, आर्यभट द्वितीय, श्रीधर, भास्कराचार्य द्वितीय, सोमदेव आदि व्यक्तित्वों के कृतित्व पर भी शोध-आधारित तथ्यों के साथ प्रकाश डाला गया है।
Yashasvi Bharat
- Author Name:
Mohan Bhagwat
- Book Type:

- Description: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन है, जिसके लाखों समर्पित स्वयंसेवक राष्ट्र-निर्माण में लगे हैं और भारत को परम वैभव संपन्न बनाने के लिए कृतसंकल्पित हैं। परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सन् 1925 की विजयादशमी को इसी उद्देश्य से संघ की स्थापना की। समर्पित भाव से व्यक्ति-निर्माण के महती कार्य को लक्षित कर संघ के स्वयंसेवक देश-समाज के प्रायः सभी क्षेत्रों—सेवा, विद्या, चिकित्सा, छात्र, मजदूर, राजनीति—में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के मूलमंत्र को जीवन का ध्येय मानकर प्राणपण से जुटे हैं। संघ दुनिया में अपनी तरह का अकेला संगठन है। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निकट से जानने और गहराई से समझने की जिज्ञासा बढ़ी है। संघ के छठे और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के विचारों पर आधारित यह पुस्तक इस दिशा में दीपशिखा का काम करेगी। यह पुस्तक अलग-अलग अवसरों पर दिए उनके व्याख्यानों का संग्रह है। ‘हिंदुत्व का विचार’, ‘भारत की प्राचीनता’, ‘हमारी राष्ट्रीयता’, ‘समाज का आचरण’, ‘स्त्री सशक्तीकरण’, ‘विकास की अवधारणा’, ‘अहिंसा का सिद्धांत’, ‘बाबा साहेब आंबेडकर’ और ‘भारत का भवितव्य’ जैसे विषयों पर दिए गए उनके व्याख्यान संघ को समझना आसान बना देते हैं। वैसे अपने व्याख्यानों में मोहनराव भागवत बार-बार कहते हैं कि ‘संघ को समझना हो तो संघ में आइए’। यह पुस्तक पाठक के विचारों को परिष्कृत करेगी और समाज में ऐसे राष्ट्रभाव जाग्रत् करेगी, जिससे ‘यशस्वी भारत’ का लक्ष्य सिद्ध होगा।
Garha Ka Gond Rajya
- Author Name:
Suresh Mishra
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक भारत के मध्य भाग के इतिहास के एक विस्मृत अध्याय को और गोंडों के गौरवशाली अतीत को उजागर करनेवाला एक दस्तावेज़ है। गढ़ा का गोंड राज्य बहुधा मुग़ल सम्राट अकबर की सेना से लोहा लेनेवाली वीरांगना रानी दुर्गावती के सन्दर्भ में ही याद किया जाता है और शेष इतिहास एक धुँधले आवरण से आवृत रहा है। यह आश्चर्य की बात है कि केवल दो सौ साल पहले समाप्त होनेवाले इस विशाल देशी राज्य के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी रही है। इस कृति में लेखक ने फ़ारसी, संस्कृत, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी स्रोतों के आधार पर गढ़ा राज्य का प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया है। वे सभी कड़ियाँ जोड़ दी गई हैं, जो अभी तक अज्ञात थीं। पुस्तक बताती है कि पन्द्रहवीं सदी के प्रारम्भ में विंध्य और सतपुड़ा और विन्ध्याचल के अंचल में गोंड राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की वह क्रमशः गढ़ा, गढ़ा-कटंगा और गढ़ा-मंडला के नाम से विख्यात हुआ। गढ़ा का गोंड राज्य यद्यपि सोलहवीं सदी में मुग़लों के अधीन हो गया, तथापि न्यूनाधिक विस्तार के साथ यह अठारहवीं सदी तक मौजूद रहा। सोलहवीं सदी में अपने चरमोत्कर्ष काल में यह राज्य उत्तर में पन्ना से दक्षिण में भंडारा तक और पश्चिम में भोपाल से लेकर पूर्व में अमरकंटक के आगे लाफागढ़ तक फैला हुआ था और 1784 में मराठों के हाथों समाप्त होने के समय भी यह वर्तमान मंडला, डिंडोरी, जबलपुर, कटनी और नरसिंहपुर ज़िलों और कुछ अन्य क्षेत्रों में फैला था। यह विस्तृत राज्य पौने तीन सौ वर्षों तक लगातार अस्तित्व में रहा, यह स्वयं में एक उल्लेखनीय बात है। राजनीतिक विवरण के साथ ही यह कृति उस काल की सांस्कृतिक गतिविधियों का परिचय देते हुए बताती है कि आम धारणा के विपरीत गोंड शासक साहित्य, कला और लोक कल्याण के प्रति भी जागरूक थे।
Dilli Chalo
- Author Name:
Renu Saini
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Vartman Jaisa Ateet
- Author Name:
Romila Thapar
- Book Type:

- Description: अतीत के बारे में प्रचलित धारणाओं को तब तक ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता जब तक उनकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल न कर ली जाए। ‘वर्तमान जैसा अतीत’ किताब मुख्यतः यही करती है। उदाहरण के लिए ये कुछ सवाल—सोमनाथ मन्दिर पर हमले के बाद वास्तव में क्या हुआ? हम में से आर्य या द्रविड़ कौन हैं? भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष होना क्यों ज़रूरी है? साम्प्रदायिकता ने एक विचारधारा के रूप में देश में कब अपने पैर जमाए? हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की संस्कृति को कैसे और कब बढ़ावा देना शुरू किया? इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के लिए कट्टरपन्थी इतने उत्सुक क्यों हैं? इन और इस तरह के अन्य प्रश्नों को लेकर उसी समय से विवाद और बहसें होती आई हैं जब इन्हें पहली बार पूछा गया था। प्रतिष्ठित इतिहासकार रोमिला थापर अकसर ही ऐसे प्रश्नों के मूल में स्थित ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच, विश्लेषण और व्याख्या करती रही हैं। वे कहती हैं कि इतिहास में सिर्फ सूचनाएँ ही नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण और व्याख्या भी शामिल होती है। चार उपखंडों के तहत विभिन्न प्रश्नों पर तथ्यात्मक और दृष्टि-सम्पन्न ढंग से विचार करने वाली यह पुस्तक ऐसे समय में निहायत ज़रूरी पाठ बन जाती है जब साम्प्रदायिकता, बनावटी ‘राष्ट्रवाद’ और ऐतिहासिक तथ्यों को धूमिल करना हमारे सार्वजनिक, निजी और बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
Pashchatya Itihas Darshan Evam Itihas Lekhan
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
- Book Type:

-
Description:
"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""
"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"
"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
Bharatiya Rajsatta : Kitni Samvaidhanik
- Author Name:
Ram Lochan Singh
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक परिश्रमपूर्वक इकट्ठी की गई शोध सामग्रियों के वैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर लिखी गई एक ऐसी कृति है, जो यह दरशाती है कि स्वतंत्र भारत के संविधान की ‘प्रस्तावना’, ‘मौलिक अधिकारों’ और ‘राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों’ में प्रदत अवधारणाओं और भारतीय राजसत्ता के बीच जो विरोधाभाषी प्रवृत्ति आज पैदा हो गई है, उसका विकास किस तरह से क्रमिक गति से होता गया है। एक समाजवादी और लोक कल्याणकारी भारतीय गणतंत्र की जिस अवधारणा को स्वावलंबी आर्थिक विकास, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की आर्थिक इकाइयों को सर्वोपरि महत्त्व के स्थान पर रखकर ‘समाजवादी ढाँचे के समाज’ के निर्माण के लिए चलाई जा रही आर्थिक-नीति में किस तरह के सैद्धांतिक भटकाव क्रमिक गति से आते गए कि उन्होंने इजारेदारियों को आगे बढ़ा दिया, सामंतवादी उत्पादन प्रणाली के अवशेषों को संपूर्णता में समाप्त करने में असपफल हो गए और सबसे बढ़कर साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के साथ भारतीय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के संबंधों को इस हद तक मजबूती प्रदान कर दी कि देश क्रमिक गति से आर्थिक तौर पर संकटग्रस्त होता चला गया। खास कर राजीव गांधी के शासन काल में नव-उदारवादी नीतियों की तरफ हुए अत्यधिक झुकाव के कारण भारत गहरे आर्थिक संकट में फँस गया। जरूरत थी पूर्व की कमजोरियों और गलतियों को ठीक करने की मगर नरसिम्हा राव सरकार ने इसके बदले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के सामने आत्मसमर्पण की नीति को अख्तियार कर पूर्व की सर्वमान्य स्वावलंबी विकास नीति के ठीक विपरीत नव-उदारवादी आर्थिक विकास नीति को स्वीकार करके विकास प्रक्रिया को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप जिस आर्थिक आधार का निर्माण भारत में हो रहा है वह वर्तमान संविधान की आत्मा के ठीक उल्टा है। अब तो संविधान को ही बदल देने की माँग बड़ी पूँजी के तावेदार राजनीतिक दल करने लगे हैं, जो भारत को न तो समाजवादी-लोक कल्याणकारी राज्य रहने देगा न अर्थव्यवस्था पर सरकार का नियंत्राण। इससे राज सत्ता का स्वरूप ही बदल दिए जाने का खतरा है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
- Rating:
- Book Type:

-
Description:
गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है।
इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते?
इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है।
साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
Hindutva Ka Ganarajya : Sangh Aur Bhartiya Loktantra
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

- Description: बद्री नारायण 'हिन्दुत्व का गणराज्य' में लगातार विस्तार करते संघ परिवार के उद्देश्यों और रणनीतियों पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं। वे बताते हैं कि मौजूदा भारत में वह शायद अकेली शक्ति है जो एक व्यापक और सामूहिक नैरेटिव की अहमियत को समझती है। ... जो लोग हिन्दुत्व की राजनीतिक अपील को समझना चाहते हैं, उनको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। —राजीव भार्गव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बर्फ़ की उस चट्टान की तरह है जिसका सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा हमें दिखाई देता है, उसका वास्तविक प्रभाव लेकिन उस हिस्से से प्रसरित होता है जो दिखाई नहीं देता। 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को नेता के रूप में चुनने से लेकर 2019 के चुनाव अभियान तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रभाव निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के उत्थान के पीछे भी उन्हीं की ताक़त है। यह जरूरी और आँख खोल देनेवाली किताब बताती है कि आएएसएस के शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों का विशाल नेटवर्क भारतीय चेतना में कैसे इतनी गहरी पैठ बना रहा है, और कैसे लामबन्दी की अपनी नई तकनीकों से उसने दलितों, पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और हाशिये के अन्य जन-गण को अपने साथ जोड़कर भारत के एक बड़े तबके को हिन्दुत्व की तरफ़ खींचा है। यही वह सामाजिक समीकरण है जिसका लाभ भाजपा चुनावी राजनीति से जाति को बहिष्कृत किए बिना भी उठा पाती है। ज़मीनी स्तर पर किए गए व्यापक शोध-सर्वेक्षण और आरएसएस कार्यकर्ताओं से किए गए साक्षात्कारों की रोशनी में यह अध्ययन बहुत स्पष्ट रूप में बताता है कि कैसे देश में एक नई जनता गढ़ी जा रही है जो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का निर्धारण करनेवाली है।
Utpeediton Ke Vimarsh
- Author Name:
Vir Bharat Talwar
- Book Type:

- Description: आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है। —इसी पुस्तक से
THE FORGOTTEN HISTORY OF INDIA
- Author Name:
Arun Anand
- Book Type:

- Description: It was a court battle between the first Prime Minister of India Jawahar Lal Nehru and Organiser, an English weekly backed by the RSS that led to restrictions on freedom of expression which we are debating today. The RSS had defended the sacred Sikh Shrine ‘Darbar Sahib’ at Amritsar twice when Muslim League led mobs attacked it in 1947. Did you know that one single anti-India and pro-China book ‘India’s China War’ written by Anglo-Australian journalist Neville Maxwell shaped the global narrative against India for more than five decades. It was a Swedish journalist Bertil Lintner who challenged it and turned the tables on Chinese propaganda with his book ‘China’s India War’ but even Indians don’t talk about it. Everyone remembers the 1962 war when India lost to China but there was another war in 1967 on Sikkim border where India took the revenge of 1967 and defeated China. Most of us don’t even know about this great victory! Indians have been made to remember the 1962 defeat and forget the glorious victory of 1967. Many such stories which comprise the forgotten history of India are part of this book. This forgotten history of India has been buried deep down in the dusty archives waiting to be told.
Badhti Duriyan Gaharati Darar
- Author Name:
Rafiq Zakaria
- Book Type:

-
Description:
भारत–विभाजन के बाद, इन क़रीब पचास सालों में, हिन्दू–मुस्लिम रिश्तों में सबसे ज़्यादा गिरावट आई है। प्रस्तुत गवेषणापूर्ण अध्ययन में डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया ने दोनों समुदायों के बीच आई टूटन के कारणों पर गहन विचार किया है।
अपने विश्लेषण की शुरुआत उन्होंने भारत पर मुहम्मद बिन कासिम (सन् 711) और महमूद गज़नवी (सन् 1020) के हमलों के परिणामों से की है। उसके बाद उन्होंने दिल्ली के सुल्तानों और बाद में मुग़लों के अधीन भारत की स्थितियों पर और दोनों समुदायों के समन्वित हितों के लिए की गई पहलक़दमियों पर नज़र डाली है। फिर वे, हिन्दुस्तान पर अंग्रेज़ी हुकूमत, उसकी ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति और मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा प्रस्तावित ‘दो–राष्ट्र सिद्धान्त’ का परीक्षण करते हैं। विभाजन की वजहों पर उन्होंने बड़ी गहराई से चिन्तन किया है और उसके दूरगामी परिणामों पर बड़े विस्तार से चर्चा की है। वे, अपने अध्ययन का समापन, एक चुनावी–शक्ति के रूप में हिन्दुत्व के उभार, 1992 में बाबरी मस्जिद की शहादत के परिणाम और भारत के वित्तीय नाड़ी–तंत्र मुम्बई में भाजपा–शिवसेना गठबन्धन की जीत से करते हैं। अपने प्रमेय का विकसन करते–करते डॉ. ज़करिया, दोनों समुदायों के बारे में प्रचलित अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमों–मिथकों को ध्वस्त करते चलते हैं।
डॉ. ज़करिया बड़े गम्भीर विद्वान और वरिष्ठ राजनेता हैं। ज़मीन से जुड़े होने की वजह से उन्हें यथार्थ की प्रत्यक्ष जानकारी है। अपने व्यापक ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ऐसी पुस्तक की रचना की है जो नए मार्ग प्रशस्त करती है, सत्याग्रही अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है और हिन्दुस्तान के हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग–अलग बाँटनेवाली समस्याओं के सही स्वरूप से जुड़े अहम सवालों का जवाब देती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि यह पुस्तक बड़े व्यावहारिक सुझाव देकर यह बताती है कि दोनों समुदायों के बीच की गहरी दरारों को कैसे पाटा जा सकता है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book