Bharatvarsh ka Brihat Itihas : Vols. 1- 2
(0)
Author:
Shrinetra PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
1100
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भारतवर्ष का बृहत् इतिहास बड़ा ही लोकप्रिय ग्रन्थ बन गया है। इसकी रचना दशकों पूर्व की गई थी किन्तु इसकी मान्यता तथा लोकप्रियता आज भी पूर्ववत् बनी है। इस नवीन संस्करण का संशोधन तथा परिवर्द्धन उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार कर दिया गया है जिसके फलस्वरूप कुछ नए प्रकरणों का समावेश हो गया है।</p> <p>पुस्तक के अन्त में कुछ परिशिष्टियाँ भी जोड़ दी गई हैं। जिससे पुस्तक की अनुकूलता तथा उपयोगिता में वृद्धि हो गई है। आशा है, यह नवीन संस्करण विद्यार्थियों तथा अध्यापकों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम होगा।
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भारतवर्ष का बृहत् इतिहास बड़ा ही लोकप्रिय ग्रन्थ बन गया है। इसकी रचना दशकों पूर्व की गई थी किन्तु इसकी मान्यता तथा लोकप्रियता आज भी पूर्ववत् बनी है। इस नवीन संस्करण का संशोधन तथा परिवर्द्धन उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार कर दिया गया है जिसके फलस्वरूप कुछ नए प्रकरणों का समावेश हो गया है।</p>
<p>पुस्तक के अन्त में कुछ परिशिष्टियाँ भी जोड़ दी गई हैं। जिससे पुस्तक की अनुकूलता तथा उपयोगिता में वृद्धि हो गई है। आशा है, यह नवीन संस्करण विद्यार्थियों तथा अध्यापकों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम होगा।
Book Details
-
ISBN9788180318238
-
Pages570
-
Avg Reading Time19 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: प्रत्येक युग में राष्ट्र का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कुलीन अपनी शक्ति एवं प्रतिष्ठा को संरक्षित करते हुए अपने इस महान् विचार के प्रतिपादन द्वारा कि वह उसका प्रभुत्व सुनिश्चित करने तथा उसे कार्यान्वित करने में सक्षम है, परिवर्तन को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। ब्रिटिश साम्राज्य का संचालन उसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था। अपने विचारों को प्रधानता के बल पर अजनबियों की एक छोटी सी संख्या ने इतने बड़े साम्राज्य का संचालन किया, जिसे बहुसंख्यकों ने स्वीकार किया। स्वाधीनता- प्राप्ति के पश्चात् गणतंत्र के निर्माताओं ने एक संविधान लिखा, जिसने राष्ट्र को सत्ता के कुलीनों को आर्थिक विशेषाधिकार के पदों पर बने रहने हेतु समर्थ बनाया, जबकि संविधान में सभी को समान स्तर प्रदान किया गया था। लोकतंत्र, समानता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के विचार नए थे और समय के साथ उनका तालमेल भी था; परंतु उनका कार्यान्वयन इस प्रकार से हुआ, मानो वह सत्ता एवं विशेषाधिकारों के मौजूदा संबंधों को संरक्षित करनेवाला हो। --इसी पुस्तक से भारतवर्ष में सत्ता, उसके प्रभाव, उसके सरोकार, उसके दुरुपयोग और समाज पर उसके प्रभावों का एक व्यावहारिक चिंतन प्रस्तुत करती है यह विचारप्रधान पुस्तक.
Vishwa Itihas Ki Bhumika
- Author Name:
Ramsharan Sharma
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Description:
पृथ्वी की आयु चार अरब साठ करोड़ वर्ष से ज़्यादा मानी गई है और पृथ्वी तल पर जीवन की उत्पत्ति कोई तीन अरब पचास करोड़ वर्ष पहले। 15-20 लाख वर्ष पहले पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में प्रथम मानव कहे जानेवाले ‘होमो हैविलिस’ का आविर्भाव हुआ तथा ‘होमो सेपीयन्स’ का दक्षिणी अफ्रीका में जन्म 1,15,000 वर्ष पूर्व हुआ। आधुनिक मनुष्य का उद्भव इसी से माना जाता है, जिसका इतिहास पुरापाषाण युग (6 लाख वर्ष ई.पू. से 10 हजार ई.पू.) से आरम्भ होता है, और हम तक आता है।
प्रख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा और कृष्णकुमार मंडल की यह पुस्तक हमें इस पूरी इतिहास-यात्रा का संक्षिप्त, लेकिन सारगर्भित और सप्रमाण ब्यौरा उपलब्ध कराती है। आदिम सभ्यता से लेकर यूरोप के धर्मसुधार के समय तक चरणबद्ध रूप में लिखा गया यह इतिहास सिर्फ़ राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है, इसमें विज्ञान, समाज और दर्शन के क्षेत्र में होनेवाले वैचारिक परिवर्तनों तथा उद्भावनाओं के रास्ते से भी विश्व की प्रगति को समझा गया है।
इतिहास के जिन महत्त्वपूर्ण चरणों का विवरण इस पुस्तक में समाहित है, वे हैं : आदिम सभ्यता, प्राचीन मिस्र की सभ्यता, शहरी सभ्यताओं का उदय, पहली सहस्राब्दी ई.पू. के धर्मसुधार-आन्दोलन, यूनान, रोम और प्राचीन भारत की सभ्यता, इस्लाम का उदय और प्रसार, सामन्त प्रथा और मध्यकालीन यूरोप, यूरोप का रेनेसाँ और धर्मसुधार।
पुस्तक की विशेषता है रोचक उपशीर्षकों के माध्यम से प्रत्येक कालखंड के क्रम-विकास का रेखांकन जिससे इसे न सिर्फ़ पढ़ना रुचिकर हो जाता है, बल्कि सम्बन्धित विषय की जानकारी तक भी सुगमतापूर्वक पहुँचा जा सकता है। इतिहास के जिज्ञासुओं तथा विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
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