Uthal-Puthal Aur Dhruvikaran Ke Beech
(0)
Author:
ChandrashekharPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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चन्द्रशेखर ऐसे राष्ट्रनायक हैं जिनके अंतरंग से परिचित होने की सहज उत्सुकता देशवासियों में रही है। इसे ध्यान में रखते हुए, सत्तर के दशक से ही देश-विदेश के प्रमुख सम्पादकों-पत्रकारों ने चन्द्रशेखर का साक्षात्कार लेना आरंभ कर दिया था। चन्द्रशेखर के अंतरंग का साक्षात्कार करना और कराना ही सम्पादकों-पत्रकारों को काम्य था। विभिन्न पत्रिकाओं में बिखरे पड़े चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों को संकलित करना दुरूह किंतु इसलिए अनिवार्य था क्योंकि इसके बगैर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति को समझना कठिन है। तीन खंडों में प्रकाशित चन्द्रशेखर से हुई भेंटवार्ताओं का यह पहला खंड है। इस पहले खंड में समाजवाद, दोहरी सदस्यता, गरीबों की पीड़ा, राजनीतिक स्थिरता, पार्टी संगठन, राजनीतिक गठजोड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण, विपक्षी एकता, अयोध्या-विवाद जैसे राजनीति से जुड़े जज्बाती सवालों पर चन्द्रशेखर के जवाब हैं जो इतिहास के नए गवाक्ष को खोलते हैं।
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चन्द्रशेखर ऐसे राष्ट्रनायक हैं जिनके अंतरंग से परिचित होने की सहज उत्सुकता देशवासियों में रही है। इसे ध्यान में रखते हुए, सत्तर के दशक से ही देश-विदेश के प्रमुख सम्पादकों-पत्रकारों ने चन्द्रशेखर का साक्षात्कार लेना आरंभ कर दिया था। चन्द्रशेखर के अंतरंग का साक्षात्कार करना और कराना ही सम्पादकों-पत्रकारों को काम्य था। विभिन्न पत्रिकाओं में बिखरे पड़े चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों को संकलित करना दुरूह किंतु इसलिए अनिवार्य था क्योंकि इसके बगैर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति को समझना कठिन है। तीन खंडों में प्रकाशित चन्द्रशेखर से हुई भेंटवार्ताओं का यह पहला खंड है। इस पहले खंड में समाजवाद, दोहरी सदस्यता, गरीबों की पीड़ा, राजनीतिक स्थिरता, पार्टी संगठन, राजनीतिक गठजोड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण, विपक्षी एकता, अयोध्या-विवाद जैसे राजनीति से जुड़े जज्बाती सवालों पर चन्द्रशेखर के जवाब हैं जो इतिहास के नए गवाक्ष को खोलते हैं।
Book Details
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ISBN9788126704651
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Pages223
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description: "India is home to hundreds of tribal communities, each with their own unique cultures, traditions and ways of life. Among these are the Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTGs), who are identified as being at risk of losing their distinct identities, livelihoods and traditional practices. This book takes an in-depth look at the PVTGs residing in the state of Jharkhand through the analytical lens of anthropology. It consists of untold stories on its indigenous people as a tribute to their reliance, wisdom and unwavering Spirit. Through a chronological exploration, the book aims to understand the pivotal role played in shaping regional identity with political historicity, livelihood practices, indigenous knowledge, dynamic interest with local life and to investigate the indigenous’ contribution. The authors evaluate current policies related to the preservation and empowerment of PVTGs. The book highlights the urgent need to protect and uplift these ancient but vulnerable communities before their irreplaceable cultures are lost forever."
Aadhunik Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

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Description:
भारत में आधुनिक विज्ञान का नक़्शा बनाने में हिन्दुओं से ज़्यादा मुसलमानों और मुसलमानों से ज़्यादा भूमिका अंग्रेज़ों की रही। आज़ादी के पूर्व से ही भारत जात-पाँत और ऊँच-नीच के दलदल में फँसा हुआ है। आधुनिक भारतीय इतिहास पर भारत में जितनी पुस्तकें लिखी गईं, उनमें से अधिकांश के लेखक हिन्दू रहे। उनके द्वारा अधिकांश पुस्तकें भारत के प्रमुख नेताओं के पक्ष में, अंग्रेज़ों के विरोध में, मुसलमानों के योगदान और वैज्ञानिक गतिविधियों को नज़रअन्दाज़ करते हुए लिखी गईं।
आधुनिक काल के क़रीब सभी भारतीय वैज्ञानिक इंग्लैंड से विज्ञान पढ़-लिख-जान कर आए। भारत के निवासियों को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा छूत-अछूत अथवा हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव न कर सबको एक नाम भारतीय दिया। भारत का मानचित्र भी अंग्रेज़ों ने तैयार किया। अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, बैंक, प्रयोगशाला, रेलवे आदि सब अंग्रेज़ों की देन है। कलकत्ता में अंग्रेज़ों ने अपने कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए फ़ोर्ट विलियम कॉलेज नमक विशेष विद्यालय की स्थापना की थी, जहाँ भारतीय भाषाओं में अनेक पाठ्य-पुस्तकों की रचना भी की गई। अठारहवीं सदी में महलों, सड़कों, पुलों आदि से युक्त अनेक नए नगर पैदा हुए। अठारहवीं सदी में भारत में विशेष रूप से बंगाल में यूरोपीय शैली के भवन भी बनने लगे थे। 1882 में टेलीफ़ोन आया। 1914 में प्रथम ऑटोमेटिक टेलीफ़ोन एक्सचेंज लगाया गया। अगस्त 1945 से लम्ब्रेटा स्कूटर बनना शुरू हुआ।
प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक वैज्ञानिकों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। इन सभी वैज्ञानिकों को सर्वाधिक प्रोत्साहन एवं प्रेरणा इंग्लैंड से मिली। प्रथम अध्याय में आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है। प्रथम और द्वितीय महायुद्ध के दौरान भारत में विज्ञान की एक विशेष धारा दिखाई देती है। आधुनिक तकनीक और सामाजिक विकास से भारत किन-किन रूपों में प्रभावित हुआ, इसका विशद वर्णन दूसरे अध्याय में किया गया है। इसके अलावा 'द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तकनीक एवं समाज’, 'द्वितीय महायुद्ध के उपरान्त’, 'विज्ञान एवं पेट्रोल’, 'प्लास्टिक और चलचित्र तकनीक’, 'आपदा प्रबन्धन’ और 'भारतीय विज्ञान एवं अंग्रेज़ों का योगदान’ आदि अध्यायों में आधुनिक भारत में विज्ञान के विभिन्न चरणों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है।
Armeniayi Jan Sanhar : Ottoman Samrajya Ka Kalank
- Author Name:
Mane Mkrtchyan +1
- Book Type:

- Description: 2015 में आर्मेनियाई जनसंहार को सौ वर्ष हो गए, हममें से कितनों को इसके बारे में पता है? जबकि सच्चाई यह है कि आर्मेनियाई जनसंहार निर्विवाद रूप से बीसवीं सदी का पहला जनसंहार था ! सच तो यह भी है कि भारत में बहुत से लोग आर्मेनिया नामक देश से भी परिचित नहीं हैं। किन्तु उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक निरन्तर सुनियोजित तरीक़े से ऑटोमन साम्राज्य द्वारा आर्मेनियाई मूल के लोगों के संहार को जानना आज इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आज भी राज्यसत्ताएँ अपनी शक्ति बरकरार रखने के लिए जिन उपायों का प्रयोग करती हैं, उनमें से प्रमुख है अपने देश के किसी भी प्रकार के अल्पसंख्यकों को सारी परेशानियों की जड़ बताकर उनको प्रताड़ित करना। प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ऑटोमन साम्राज्य में लगभग 20 लाख आर्मेनियाई रहते थे और उनमें से क़रीब 15 लाख आर्मेनियाई सन् 1915-1923 के बीच मार डाले गए और शेष का बलात् धर्मान्तरण या विस्थापन कर दिया गया। तुर्की ने आज तक इस जनसंहार को स्वीकार नहीं किया है। दरअसल ज़रूरत इस बात की है कि इस जनसंहार की घटना को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाए, ताकि आनेवाली पीढ़ियाँ सुलह के रास्ते ढूँढ़ सकें और विश्व-भर के लोग जनसंहार की पनप रहीं स्थितियों के प्रति सचेत हो जाएँ। इस पुस्तक का उद्देश्य यही है।
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